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बधियाकरण एवं उसका महत्व

बधियाकरण

नरपशु का तकनीकी विधि द्वारा नसबंदी कराना ही बंध्याकरण कहलाता है। बाछा एवं [पाड़ा में बधियाकरण करने की सबसे अच्छी आयु 6 - 12 माह की उम्र होती है क्योंकि इस उम्र में पशु को नियंत्रित करना आसान होता है एवं इस आसान होता है एवं इस अवस्था में मस भी मुलायम होती है जिससे बधियाकरण करने में आसानी होती है ज्यादा उम्र के पशु में नस कठोर हो जाती है जिसे बधियाकरण करने में परेशानी होती है तथा कभी – कभी बधियाकरण असफल होने की संभावना रहती है।

महत्व

  1. बधियाकरण करने से उत्तम किस्म का बैल एवं भैंस तैयार करना, जो हल - गाड़ी हांकने एवं कृषि कार्यों में काम आता है।
  2. जानवर सीधा – सादा हो जाता है।
  3. देशी नस्ल के द्वारा संतानोत्पत्ति को रोका जा सकता है।

पैरा उपचार – गुणवत्ता में वृद्धि

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। पशु पालन के क्षेत्र में अन्य प्रदेश की तुलना में काफी पीछे है। पशुपालन में पिछड़ने का प्रमुख कारण पशुओं के लिए आवश्यक हरे चारे एवं पौष्टिक आहार की कमी है। फलस्वरूप किसान भाईयों का गाय, भैंस, बैल जोड़ी एवं भैंस जोड़ी अन्य राज्यों से खरीदने पड़ता है। छत्तीसगढ़ में पैरा पर्याप्त मात्रा, में उपलब्ध है परंतु यह पौष्टिक एवं सुपाच्य न होने के कारण पशुओं के शारीरिक विकास हेतु पर्याप्त नहीं होता है।

यदि पौष्टिक चारे की उपलब्धता कम लागत में पर्याप्त मात्रा में हो तो इस राज्य का किसान/पशु पालन स्वयं बछिया/बछड़े, पड़वे/पड़िया पालनकर अपनी आमदानी बढ़ा सकता है इस योजना से प्रति हितग्राही का शत – प्रतिशत अनुदान पर रू, 500/- की सामग्री क्रेन प्लास्टिक शीट, यूरिया, चूना प्रदाय किया जाता है।

यूरिया शिरा उपचार

सर्वप्रथम एक मजबूत बड़ा घड़ा (15 किलो क्षमता) लीजिए इसमें 2 लीटर साफपानी डालें अब उसमे 1.5  किलो यूरिया डालकर अच्छे से घोल लें अब इसमें 10 किलो शिरा (सात किलो गुड़ को 3 लिटर पानी में घोलकर) तैयार कर सकते हैं। एक किलो नमक एवं एक किलो खनिज मिश्रण (मिल्कमीन एग्रीमिन) डाल कर उसे पुनः अच्छी तरह घोल लें। अब इस अब मिश्रण युक्त घोले को सुरक्षित स्थान पर रख लें।

खिलाने की विधि

आधा किलो बने मिश्रण को लेकर 2 लिटर साफ पानी में मिलाकर पतला घोल बना लें। इस घोल की 5 किलो पैर कुट्टी में डाल कर अच्छी तरह से हाथों से मिला दें। इस तरह उपचारित पैर कुट्टी पर पशु को एक दिन खिलाने हेतु पर्याप्त है ज्यादा दूध देने वाली पशुओं को अलग से चुनी, खली एवं चोकर मिलाकर दे सकते हैं।

यूरिया उपचार

1 क्विंटल पैरा कुट्टी 2 मीटर का घेरा फैला लें। 4 किलो यूरिया को 50 लीटर पानी में पूर्ण रूप से घोलकर धीरे – धीरे 100 किलो ग्राम पैरा कुट्टी में अच्छे से छिड़काव करें। अच्छी तरह फैले हुए कुट्टी में समान रूप से मिलावें। उपचारित कुट्टी को पॉलीथीन (यूरिया के बोर में जोड़कर बना सकते हैं) ढक दें। जिससे बाहर की हवा अंदर न जावें। 21 दिनों के बाद उपचारित कुट्टी पशुओं को खिलाने हेतु तैयार हो जाती है। उपचारित कुट्टी को खिलाने के ½ से 1 घंटे पहले खुली हवा में रखा जाता है।

सावधानियां

  1. मवेशियों को यूरिया घोल से दूर रखना चाहिए।
  2. यूरिया का घोल बनाने के लिए पानी साफ व सही मात्रा में डालना चाहिए।
  3. चार माह से कम उम्र के पशुओं को उपचारित चारे न खिलावें।
  4. पैरा कुट्टी का उपचार पक्के फर्श या ऐसे जगह करना चाहिए जिससे यूरिया घोल निकल बर्बाद न हो या जमीन न सोखे।

पशु मूत्र उपचार

पैरा कुट्टी की कुल मात्रा में पशु मूत्र लेकर कुट्टी में अच्छी तरह से मिला दें। उक्त कुट्टी को धूप में सूखते तक रखे। सूखने के पश्चात् पशु मूत्र उपचारित कुट्टी पशुओं को आवश्यक खिला दें। इस विधि में बिना लागत के पशु मूत्र में उपस्थित नाइट्रोजन, कैल्शियम एवं फॉस्फोरस जैसी उपयोगी तत्व पैर कुट्टी में मिल जाते हैं।

चूना उपचार

समतल गोबर लिपि जमीन पर लगभग 6 इंच मोती 1 क्विंटल पैरा कुट्टी धुप में फैला देते हैं। 2 किलो छूना 40 लीटर पानी में घोल कर फैले हुए कुट्टी में बराबर मात्रा में छिड़काव करें। इस उपचारित कूट्टी को सुखने के बाद थप्पी जमाकर घर में रख लें एवं आवश्यकतानुसार पशुओं को खिला दें।

चूना उपचारित कुट्टी पशुओं को खिलाने से पैरा में विद्यमान हानिकारक पदार्थ औक्जेलिक अम्ल का असर कम हो जाता है। शारीरिक विकास एवं दूध उत्पादन हेतु आवश्यक कैल्शियम चूने के माध्यम से पूर्ती हो जाती है।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार



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