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पपेन से लाभान्वित होते किसान

पपीते की खेती में बढ़ता रुझान

मध्यप्रदेश के प्रगतिशील किसान ऐसे पपीते की पैदावार लेनेमें लगे हैं जिससे पहले पपेन निकाला जा रहा है। उसके बाद वही पपीता बाजार में बिक रहा है। इसके बावजूद पपीते की गुणवत्ता में फर्क नहीं आता है। दवाई निर्माण के अलावा अन्य उत्पादन में सहयोग के रूप पपेन का बहुउपयोग है। इसे कहते हैं एक फल दो फायदे। या यों कहे आम के आम गुठली के दाम। इसमें कोई शक नहीं है कि कम पानी में होने वाली पपीते की पैदावार की ओर अब काश्तकारों का रूझान बढ़ेगा क्योंकि कम लागत में अधिक मुनाफा जो मिलेगा।

रतलाम-डेढ़ दशक से अंगूर और स्ट्राबेरी की रिकार्ड पैदावार लेने वाले तीतरी-मथुरी उन्नतिशील काश्तकारों ने रतलाम जिले का नाम देश में रोशन किया है। काश्तकारों की सफलता का सिलसिला लगातार चल रहा है। सफलता की इसी शृंखला में पपीते से पपेन निकालने का कार्य भी शुरू हो गया है। इस कार्य को अंजाम दिया है रुपाखेड़ा के काश्तकार धन्नालाल पाटीदार ने।

अब तक तो लोगों को पता था कि रतलाम के पड़ौसी जिले मंदसौर में अफीम के डोड़े पर चीरा लगाकर दूध निकालते हैं, जिससे अफीम सहित अन्य मादक पदार्थ बनते हैं मगर अब रतलाम जिले में पपीते से दूध निकाला जा रहा है। रुपाखेड़ा के उन्नतिशील काश्तकार धन्नालाल पाटीदार ऐसे पपीते की पैदावार लेने में लगे हैं, जिससे पपेन निकाला जा रहा है।


धन्नालाल की जुबानी पपेन की कहानी

पपीते से पपेन निकालने के नवीनतम् प्रयोग में लगे धन्नालाल ने बताया कि उसने 6 एकड़ में पपेन निकालने वाले पपीते का बगीचा बनाया। जब पपीते की आकृति नारियल के समान छोटी होती है, तभी फल में नीचे की ओर चीरा लगाते हैं जिससे दूध निकलता है। यह प्रक्रिया लगभग तीन माह तक चलती है। इसके बाद दूध आना बंद होता है। फिर पपीता पकता है। उसके बाद बाजार में आ जाता है। दूध निकालने के बाद भी पपीते के स्वाद और गुणवत्ता में कोई फर्क नहीं होता है। इस कार्य को व्यवस्थित करने के लिए हाल फिलहाल तो महाराष्ट्र से प्रशिक्षित कर्मचारी बुलवाएं तो जो बगीचे में कार्य कर रहे हैं।

उत्पादन के फायदे

पपेन वाले पपीते का उत्पादन करने वालों को यह सुविधा रहती है कि एक बीघा में 500 पौधे लग सकते हैं। जहां अंगूर के एक पौधे को हर दिन 16 लीटर पानी की जरूरत होती है, वहीं इसे केवल चार-पांच लीटर पानी चाहिए। एक बीघा से करीब 500 किलो पपेन निकलता है और 300 से 500 क्विंटल फल मिलता है। पपेन का मूल्य 120 रुपए प्रतिकिलो है तो फल का मूल्य 3 से 5 रुपए प्रति किलो। यदि फरवरी में पौधे लगाते हैं तो पांच माह तक उत्पादन चलेगा और यदि जून में लगाते हैं तो दस माह उत्पादन चलता है।

भविष्य की संभावनाएं

सहयोगी धर्मराज पाटीदार ने बताया यदि रकबा बढ़ता है तो उत्पादन भी बढ़ेगा। उत्पादन के बढ़ने के साथ ही भाव में वृध्दि की संभावना है। पपेन का मूल्य 150 रुपए प्रति किलो हो सकता है। यह मूल्य पाने के लिए करीब 100 एकड़ में इसका उत्पादन होना जरूरी है। इसके लिए प्रशासनिक एवं फलोद्यान विभाग का भरपूर सहयोग चाहिए। इसके बाद ही यह फसल कम पानी में अच्छी आमदनी देने वाली फसल साबित हो सकती है। यह फसल किसानों के लिए कम लागत में अधिक लाभ देने वाली है।

पपेन के उपयोग

पपेन का मुख्य उपयोग तो दवाई के निर्माण में होता है। इसके अलावा कास्मेटिक, लेदर, बीयर आदि की वेनीशिंग प्रोसेस में उपयोगी है।

औद्योगिक स्तर पर उत्पादन

देश में पपेन बनाने के दो प्लांट है। एक गुजरात में और दूसरा मुम्बई में है। मुम्बई में इंजियो कंपनी का प्लांट है, जहां पपेन को बहुउपयोगी बनाया जाता है।

स्त्रोत:मनीष पराले,२१लक्ष्मणपुरा,कुएकेपास,रतलाम(जनसंपर्क विभाग,मध्यप्रदेश)



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