অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

जैविक खेती में पोषक तत्वों की उपलब्धता

परिचय

जैविक खेती में मिट्टी की उत्पादकता का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि इसमें जैविक पदार्थ या कार्बनिक तत्वों की मात्रा कितनी है| एक अच्छी जैविक मिट्टी में 5% तक कार्बनिक पदार्थों का होना आवश्यक होता है| मिट्टी के अंदर आदर्श तापमान एवं आद्रता उपलब्ध होने पर तथा प्रचुर मात्रा में जैविक पदार्थों की उपस्थिति में कई प्रकार की सूक्षम जैव तथा रासायनिक क्रियाएँ सतत रूप से सम्पन्न होती रहती है| मिट्टी में सूक्ष्म जीवों(बैक्टीरिया, फुफंद, शैवाल, कवक, प्रोटोजोआ, आदि) की संख्याँ में तीव्रता से वृद्धि होती है| इन सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता तथा जैव रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप प्रकृति में विभिन्न स्रोतों से आवश्यक पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में पौधे को उपलब्ध होते रहते हैं|

मिट्टी की सतह पर सूक्ष्म जीवों के प्रजनन एवं क्रियाशीलता को बढ़ाने हेतु यथा सम्भव कोशिश की जानी चाहिए ताकि मिट्टी की ऊपरी सतह को सूर्य के सीधे ताप से बचाया जा सके| पेड़ पौधों की सुखी टहनियाँ, पत्तियाँ तथा पूर्व फसल के अवशेषों का उपयोग कर मिट्टी के सतह को आच्छादित रखने के कोशिश की जाती है| यदि ऐसा सम्भव न होने पाए तो मुख्य फसल के साथ, कई प्रकार की सहायक (आच्छादन) फसलें उगाकर मिट्टी की सतह को आच्छादित रखा जाता है| जैसे-गन्ने के साथ लोबिया, उड़द या मुंग, मक्की के साथ खीरा, गेंहूँ के साथ सरसों व मसूर, चने के साथ अलसी आदि| मिट्टी को आच्छादित (ढककर) रखने की इस प्रक्रिया को मल्चिंग (आच्छादन) कहते हैं|

कृषि सिद्धांतों के अनुसार किसी भी पेड़-पौधे के समुचित विकास एवं उत्पादन हेतु 20 प्राकृतिक पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, इन तत्वों को निम्न चार वर्गों में बाँटा गया है:

मूल तत्व-कार्बन, हाइड्रोजन व ऑक्सीजन

आवश्यक तत्व-नत्रजन, फास्फोरस व पोटाष

गौण तत्व- कैल्शियम, मैग्नीशियम व सल्फर

सूक्ष्म तत्व- तम्बा, जस्ता, लोहा, मैग्नीज, बोरोन, मौलीबिडिनम, सिलिकॉन, वेनेडियम, सोडियम, कोबाल्ट आदि|

मूल तत्व

किसी भी पौधे का रासायनिक विशलेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसमें 98.6% कार्बन,  हाइड्रोजन व ओक्सीजन होता है| जबकि अन्य आवश्यक, गौण एवं सूक्ष्म तत्व्वों का प्रतिशत मात्र 1.4% होता है| कार्बन का मूल स्रोत वायु है| प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा वायु में स्थित कार्बन-ऑक्साइड का संश्लेषण कर पौधे की हरी पत्तियाँ, कार्बन को ग्रहण करती है, तथा ऑक्सीजन को हवा में वापस छोड़ देती हैं| पेड़-पौधों में 45 से 55% तक कार्बन की मात्रा होती है| इनकी सुखी पत्तियाँ, डंठल, तथा खाद्य श्रृंखला में पेड़-पौधों पर निर्भर जीव जन्तुओं के अवशेष कार्बन अंततः मिट्टी में मिल जाते हैं या मिलाए जाते हैं| इस तरह से मिट्टी में कार्बन जमा होता जाता है| जबकि ऑक्सीजन व हाईड्रोजन का प्रमुख स्रोत जल है है जो मुख्यतः पौधों की जड़ों के माध्यम से मिट्टी से प्राप्त होता है| पौधा अल्प मात्रा में वायु में स्थित ऑक्सीजन व हाईड्रोजन का भी उपयोग करता है|

मिट्टी में स्थित कार्बन का उपयोग पौधा नहीं करता लेकिन यह कार्बन सूक्ष्म जीवों की वृद्धि एवं प्रजनन हेतु अतिआवश्यक है| समान्यतः 10 किलोग्राम कार्बन 1 किलोग्राम सूक्ष्म जीवों का भोजन होता है| यदि मिट्टी में 100 किलोग्राम सूक्ष्म जीव क्रियाशील हो सकते हैं|

आवश्यक पोषक तत्व

नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश अतिअवश्यक पोषक तत्व हैं| रासायनिक खेती में इन तीन पोषक तत्वों का ही मुख्यतः प्रयोग किया जाता हैं जो कि एन०पी०के० के नाम से प्रचलित हैं|

नाइट्रोजन- इसकी मुख्य भूमिका पौधे के विकास एवं अच्छे उत्पादन हेतु मानी जाती है| जैविक खेती में नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत मिट्टी में उपस्थित जैविक पदार्थ हैं| जिसमें पिछली फसल की जड़ें, तने के अवशेष, सुखी पत्तियाँ व सूक्ष्म जीव-जन्तुओं के अवशेष तथा अवशेष तथा मवेशियों के गोबर व मूत्र से निर्मित कम्पोस्ट खाद प्रमुख हैं| 10 किलोग्राम कार्बन होने पर स्वतः ही 1 किलोग्राम नाइट्रोजन उपलब्ध हो जाता है| मिट्टी में कार्बन तथा नाइट्रोजन का अनुपात 10:1 होता है|

हमारा वायुमंडल नाइट्रोजन का मूल स्रोत इसमें 78.4% नाइट्रोजन विद्यमान है| जैविक खेती में इस वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में संग्रहित करने की प्राकृतिक तकनीक का उपयोग किया जाता है| जम जानते हैं कि दलहनी फसलों (उड़द, मुंग, लोबिया, तोर, राजमा, फ्रेचबीन, सोयाबीन, सनी तथा ढेंचा आदि) की जड़ों में एक प्रकार की ग्रंथियाँ होती हैं, जो नाइट्रोजन से भरपूर होती हैं| वास्तव में दलहनी फसलों की जड़ों में मूल रंध्र के माध्यम से मिट्टी में स्थित राइजोबियम जीवाणु पौधे की जड़ों में प्रवेश करते हैं| यह जीवाणु पौधे की जड़ों में प्रवेश करते हैं| यह जीवाणु जड़ों के अंदर पंहुचकर तेजी से प्रजनन कर ग्रंथियों का निर्माण करते हैं| इस राइजोबियम जीवाणु की यह खासियत है कि यह हवा में स्थित नाइट्रोजन का उपयोग कर पौधें की जड़ों में सग्रहित कर पौधे को उपलब्ध कराता है| बदले में यह पौधे से अपने विकास हेतु शर्करा व कार्बोहाइड्रेट प्राप्त करता है, को हम सहजीविता के नाम से जानते हैं| दलहनी पौधा अपनी जरूरत के अनुरूप नाइट्रोजन का उपयोग करता है, और अवशेष नाइट्रोजन पौधे की जड़ों तथा तने में संग्रहित होती रहती है जो अंततः मिट्टी में मिल जाती है| इस तरह से मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा में वृद्धि होती हो, जो अगली फसल के काम आती है|

जैविक खेती में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम वार्षिक फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश करें| दलहनी फसलों के उत्पादन से हम मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा 40-60% किलोग्राम प्रति एकड़ तक बढ़ा सकते हैं| अलग-अलग प्रजातियों की नाइट्रोजन संग्रहण की क्षमता भी अलग-अलग होती है|

एक बीज पत्ती फसलें, धान, गेंहूँ, मक्का, मडुवा आदि में भी कुछ जीवाणु हवा से नाइट्रोजन खींच कर पौधे को उपलब्ध कराते हैं| जैसे एजेटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, स्यूडोमोनास आदि| ये जीवाणु पौधे के साथ सहजीवी के रूप में कार्य नहीं करते बल्कि जड़ों के पास स्थित होते हैं| यद्यपि इन जीवाणुओं द्वारा हवा से बहुत कम नाइट्रोजन का संग्रहण किया जाता है जो 5 से 20 किलोग्राम प्रति एकड़ तक हो सकता है| ब्राजील के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीवाणु का पता लगाया है, जो गन्ने तथा अंगूर में हवा से नाइट्रोजन खींच कर पौधे को उपलब्ध कराता है| इसे एसीटोबैक्टर डाइजोट्रोफिकस के नाम से जाना जाता है| यह जीवाणु एक एकड़ क्षेत्र में 45-60 किलोग्राम तक नाइट्रोजन को हवा से संग्रहित कर पौधे को उपलब्ध कराता है|

इस प्रकार के कार्बनिक पदार्थों के विघटन तथा नाइट्रिफाईग जीवाणुओं से प्रति एकड़ 80-150 किलोग्राम तक नाइट्रोजन उपलब्ध हो सकता है जो की किसी भी फसल के विकास तथा उत्पादन हेतु पर्याप्त से भी अधिक है|

जैविक खेती एवं सूक्ष्म जीव

उचित तापमान, आद्रता तथा प्रचुर मात्रा में जैविक कार्बन की उपस्थिति, जैविक खेती में सूक्ष्म जीवों की संख्या में इतनी वृद्धि होती है कि 1 एकड़ क्षेत्र में 800 से 1000 किलोग्राम तक सूक्ष्म जीव उत्पन्न हो जाते हैं| ये सूक्ष्म जीव सतत रूप से पैदा होते रहते हैं और मरते भी रहते हैं| एक जीवाणु की जब मृत्यु होती है तो इसमें 14% नाइट्रोजन 40% कार्बन तथा 3% फस्फोसट प्राप्त होता है, इस तरह से यदि 1000 किलोग्राम  सूक्ष्म जीव जब मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं तो इस इससे 400 किलोग्राम, कार्बन, 140 किलोग्राम नाइट्रोजन तथा 30 किलोग्राम फास्फोरस मिट्टी में मिल जाती है|

सूक्ष्म जीव की कोशिका का रासायनिक संगठन

तत्व

प्रतिशत मात्रा

तत्व

प्रतिशत मात्रा

कार्बन

40%

फास्फेट

3%

नाइट्रोजन

20-30%

पोटाश

1%

ऑक्सीजन

14%

सल्फर

1%

सोडियम

1.0%

क्लोरीन

0.5%

कैल्शियम

0.5%

लोहा

0.3%

मैग्नीशियम

0.5%

अन्य सूक्ष्म तत्व

0.3%

हाईड्रोजन

8.18%

 

 

 

जैविक खेती में प्रति एकड़ नाइट्रोजन की उपलब्धता

1

दलहनी फसलों का फसल चक्र अपनाने से या मिश्रित खेती  में दलहनों का समावेश करने पर

- 60 किलोग्राम

2

जैव-अवशेषों से

- 60 किलोग्राम

केंचुओं की गतिविधियों से

- 126 किलोग्राम

4

100 किलोग्राम  मृत सूक्ष्म जीवों की विघटन से

- 140 किलोग्राम

5

मिट्टी में एजेटोबैक्टर, राइजोबियम, आदि सूक्ष्म जीवों द्वारा हवा से संग्रहित किया गया नाइट्रोजन

- 125 किलोग्राम

6

वर्षा ऋतु में बार-बार बिजली कड़कने से जो नाइट्रोजन वर्षा के साथ खेत में आ जाती है

- 34 किलोग्राम

कुल

545 किलोग्राम

हरी खाद

जिन क्षेत्रों में धान व गेंहूँ का फसल चक्र अपनाया जाता है उनको चाहिए कि गेंहूँ के बाद खेत में हरी खाद की बुववाई करें जैसे कि सनई, ढेंचा तथा लोबिया आदि| जब हरी खाद की फसल 60 दिन की हो जाती है तो इसको काटकर मिट्टी में जोत दिया जाता है| हरी खादें दलहनी फसलें हैं जो हवा से नाइट्रोजन को मिट्टी में संग्रहित करने का कार्य करती है| इस प्रकार से मिट्टी में 30-60 किलोग्राम/एकड़ तक नाइट्रोजन जमा हो जाती है, जो अगली फसलों के काम आती है| अदलहनी फसलों (धान, मक्का, मडुआ झंगोरा आदि) के साथ दलहनी फसलों की मिश्रित खेती करने से भी दलहनी फसल अदलहनी फसलों को पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है, तथा  अदलहनी फसल, दलहनी फसल को अन्य तत्व जैसे फास्फेस्ट व पोटाष उपलब्ध कराती है|

हरी पत्तियों या हरे जैविक पदार्थों (हरी खाद) को सीधे जमीन में मिलाने से जमीन की उर्वरता बढती है| जमीन में जैविक तत्वों की वृद्धि कर पोषक तत्वों की उपलब्धता को बढ़ाती है| जमीन को जुताई योग्य बनाकर खरपतवार के उगने व बढ़त को रोकती है| यह जमीन में जैविक प्रक्रियाएं बढ़ाती है व साथ ही साथ कीटनाशक का भी काम करती है|

हरी खाद फसलों को प्रमुख फसलों से पहले यह उनके साथ उगाया जा सकता है| फलीदार हरी फसलों पोषक तत्वों को जमा करती हैं जैसे सरसों, मेथी या बथुवा आदि फास्फोरस को बांधने वाले हैं| जबकि सनई, ढेंचा व दालें जमीन में नाइट्रोजन जमा करती है| हरी खाद पेड़ों से भो ली जा सकती है| पेड़ों को फसलों के साथ बोने की पद्धति को कृषि वानिकी कहा जाता है| पेड़ों का चयन इस प्रकार किया जाता है कि वह फसलों को प्रभावित ना करें| हरी खाद के आलावा इन पेड़ों से ईंधन व चारे का भी लाभ है| हरी खाद के लिए फसलीदार फसलें उपयुक्त है, जैसे कि सनई, उड़द, मुंग, कुलथी, बरसीम व लोबिया है| हरी खाद के लिए पेड़ों का चयन करते समय इन बातों का ध्यान रखें कि वह जल्दी बढ़ने सड़ने वाले व पत्तियां टहनियाँ काट लेने पर भी जिन्दा रहते हैं| साथ ही प्रचुर मात्रा में जैविक पदार्थ पैदा करते हों| फूल आने पर, हरी खाद को फसल बोने से 20-21 दिन पहले सीधे खेत में जोत दिया जाता है|

फास्फोरस-का मूल स्रोत वह शैल व चट्टानें हैं जिससे कि मिट्टी का निर्माण होता है, सामान्यतः मिट्टी की सतही 1 फीट परत में 40 से 1600 किलोग्राम फस्फोस्ट/एकड़ होता है| लेकिन यह फास्फेट अनुपलब्ध अवस्था में मुख्यतः कैल्शियम तथा सर्वाधिक फास्फेट होत्ता है| सामान्यतः मिट्टी की सतही 1 फीट परत में 40 से 1600 किलोग्राम फस्फोस्ट/एकड़ होता है| लेकिन यह फास्फेट अनुपलब्ध अवस्था में मुख्यतः कैल्सियम तथा आयरन फास्फेस्ट के रूप में विद्यमान होता है| अग्नेय चट्टानों से निर्मित मिट्टी में सर्वाधिक फास्फेट होता है| सामान्यतः पौधों में फास्फेट के आपूर्ति का प्रमुख स्रोत जैविक पदार्थ ही हैं, 75% से अधिक फास्फेट इसी स्रोत से प्राप्त होता है| जीवाणुओं द्वारा जैविक पदार्थ के विघटन की प्रक्रिया के फलस्वरूप फास्फेट ,मिट्टी में मिल जाती है जहाँ सूक्ष्म जीवाणु इस अनुपलब्ध फास्फेट के रूपांतरित कर पौधों को ग्रहण करने योग्य फास्फेट में बदलते है| इन जीवाणुओं को पी०एस० बी० (फास्फेट सोल्यूबलाईजिंग बैक्टीरिया) के नाम से जाना जाता है| पी०एस० बी० मिट्टी में स्थित मूल अघुलनशील अकार्बनिक फास्फेट तथा जैव पदार्थों में स्थित कार्बनिक फास्फेट को अनुपलब्ध अवस्था से रूपांतरित कर पौधों को ग्रहण करने योग्य फास्फेट में बदलते हैं| इसलिए कृषि विज्ञान केंद्र अथवा कृषि विकास केन्द्रों के माध्यम से किसानों को पी०एस० बी० का कल्चर दिया जाता है| इस कल्चर को गोबर या वर्मीकम्पोस्ट की खाद के साथ मिलकर खेत में डालने पर इसके अंदर विद्यमान अघुलनशील फास्फेट को उपलब्ध फास्फेट में रूपांतरित करनेवाले जीवाणु मिट्टी में विद्यमान कार्बन का भक्षण कर अपनी जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि करते हैं जिससे अधिक मात्रा में ग्रहण योग्य फास्फेट पौधों को उपलब्ध हो पाता है|

फास्फेट की उपलब्धता का एक अन्य प्रमुख साधन माइकोराजमा है| यह एक प्रकार का फुफंद है जो बंद गोभी व फूल गोभी को छोड़कर अन्य सभी पेड़ पौधों की जड़ों में विद्यमान होता है| माइकोराजमा एक तरह से पौधे की जड़ों तथा मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के बीच एक पुल का कार्य करता है| रासायनिक खेती में रासायनिक फुफंदनाषक से उपचारित बीज तथा फुफंदनाषकोण के प्रयोग से यह समाप्त प्रायः हो जाता है| लेकिन  जैविक खेती में यह प्रचुर मात्रा में होता है, जो जड़ों के आसपास एक जाले का निर्माण करता है और इस साइफनयुक्त जाले के तंतुओं से ही मिट्टी में स्थित फास्फेट, पोटाश तथा अन्य सूक्ष्म तत्व पौधे को उपलब्ध होते हैं इसलिए आज खेती में  माइकोराजमा कल्चर का प्रयोग बढ़ रहा है|

केंचुआ किसान का मित्र क्यों?

जैविक खेती में पोषक तत्वों को उपलब्ध कराने तथा मिट्टी को भुरभुरी बनाकर, हवा का संवहन बढ़ाने में केंचुआ का महत्वपूर्ण योगदान होता है| मुख्यतः केंचुओं को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है जैविक कचरा खाने वाले तथा मिट्टी खानेवाले| वर्मीकम्पोस्ट बनाने हेतु जैविक कचरा खाने वाले केंचुआ का प्रयोग किया जाता है| जैसे कि एसीना फेटिडा ये लाल रंग के तथा आकार में छोटे होते हैं| जबकि मिट्टी खाने वाले केंचुए साधारणतः: आकार में बड़े  होता हैं, इनकी कई प्रजातियाँ हैं जो कि मिट्टी खाने वाले केंचुए साधारणतः आकार में बड़े होते हैं, इनकी कई प्रजातियाँ हैं जो कि मिट्टी के सतह से लेकर 15 फुट गहराई तक निवास करती है|

मिट्टी में उचित आर्द्रता होने तथा सतह पर गाय या नया जानवरों के गोबर व गौमूत्र से निर्मित घोल (जीवामृत) के प्रयोग करने से इन मिट्टी खाने वाले केंचुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है| अच्छी परिस्थितियों में प्रति वर्गफुट 4 केंचुए होते हैं इस प्रकार से एक एकड़ क्षेत्र में 400,00 100,000 तक केंचुए हो सकते हैं|

केंचुए मिट्टी की विभिन्न सतहों से मिट्टी खाकर पचाकर, उसे मल(वर्मीकास्ट) के रूप में खेत के सतह पर छोड़ते रहते है| यदि 10 प्रतिशत केंचुए भी सक्रिय हैं तो एक घंटें में 30 किलोग्राम तक वर्मीकास्ट (केंचुए का मल) खेत की ऊपरी सतह पर जमा होता है\ वर्मीकास्ट) में सभी तत्व (फास्फेट, पोटाश व अन्य सूक्ष्म तत्व) घुलनशील अवस्था में होते हैं जिसे पौधा तुरंत ग्रहण कर सकता है| इस प्रकार से केंचुओं द्वारा मिट्टी की सतह से 15 फुट नीचे तक के पोषक तत्व खेत की ऊपरी सतह पर उपलब्ध हो जाते हैं| जब ये केंचुए मरते हैं तो इनके विघटन से भी सभी प्रकार के पोषक तत्व मिट्टी में मिल जाते हैं| साथ ही साथ केंचुओं की गतिविधियों से मिट्टी भी भुरभुरी होती है, जिससे इसकी जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है तथा हवा का संचार बढ़ जाता है ये सभी परिस्थितयाँ सूक्ष्म जीवों के प्रजनन एवं विकास के लिए आर्दश होती हैं|

इस प्रकार से जैविक खेती में केंचुए, सूक्ष्म जीवाणुओं तथा जैविक पदार्थों के समन्वयित प्रक्रिया के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में फास्फेट की आपूर्ति होती है|

पोटेशियम- पौधों में वायु रंध्रों के संचालन को नियंत्रित करने तथा फल या बीज की गुणवत्ता  बढ़ाने हेतु पोटेशियम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, पोटेशियम का मूल स्रोत भी फास्फेट की तरह वे शैल हैं जिनके क्षरण से मिट्टी का निर्माण होता है है| यह मिट्टी के कणों में अजैविक रूप में विद्यमान होता है| सभी प्रकार के जैविक पदार्थों व जीव जन्तुओं में भी पोटेशियम 0.5 से लेकर 3% तक विद्यमान होता है| प्राकृतिक रूप से यह गतिशीलता तत्व है जो बाहरी वातावरण से काफी प्रभावित होता है|

अधिक वर्षा होने पर यह मिट्टी के निचले सतह पर जमा हो जाता है| यह वर्षा के जल के साथ बहकर के स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होता रहता है| पौधों में जब फसल पक जाती है तो यह पत्तियों से जड़ों में स्थानांतरित हो जाता है और अंततः मिट्टी में मिल जाता है|

पी०एस० बी० की तरह ही मिट्टी में पोटाश घुलनशील जीवाणु होते हैं, जो अजैविक व जैविक, अनुपलब्धता पोटाश के रूप में पौधों को उपलब्ध कराते हैं| माइकोराजमा के माध्यम से भी पोटाश पौधे की उपलब्ध होता है| वर्मीकास्ट में 1.5% तक पोटाश होता है, जो पूर्णतः घुलनशील अवस्था में होता है| सूक्ष्म जीवों के मृत शारीर से भी लगभग 5-10 किलोग्राम  पोटाश पौधों को उपलब्ध होता है इसके अतिरिक्त जानवरों में मूत्र में 20-25% तक पोटाश होता है, जीवमृत, मटका खाद या घनामृत के माध्यम से जानवरों में मूत्र में विद्यमान पोटाश मिट्टी में जमा होता है| राख पुर्णतः पोटाश ही है, इसे गोबर से निर्मित खाद/कम्पोस्ट के साथ मिलाकर खेत में डालना चाहिए| जैविक पदार्थों के विघटन से भी पर्याप्त उपलब्ध होता है| कुल मिलाकर जैविक खेती में पोटाश का प्रबन्धन स्वतः ही होता रहता है|

गौण तत्व

सल्फर, एमिनोएसिड तथा विटामिन के निर्माण हेतु आवश्यक है, इसी प्रकार से मैग्नीशियम, क्लोरोफिल निर्माण हेतु आवश्यक है, पत्तियों के हरेपन हेतु मैग्नीशियम की मुख्य भूमिका होती है| कैल्शियम की कमी से पौधे का विकास रुक जाता है|

इन तीनों गौण तत्वों की अल्प मात्रा में आवश्यकता पड़ती है| ये सभी मूल रूप से मिट्टी तथा जैविक पदार्थों में अघुलनशील अवस्था में विद्यमान होते हैं और सूक्ष्म जीवाणुओं तथा केंचुओं की गतिविधियों के फलस्वरूप सतत रूप से फसल को उपलब्ध रहते हैं|

सल्फर- प्रोटीन व वसा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है| यह जैविक अवशेषों तथा मिट्टी में मुलभुत रूप से विद्यमान होता है| मिट्टी में स्थित 70% सल्फर पानी में घुलनशील न होने के कारण पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता, इसलिए मिट्टी में स्थित थायोबेसिलस, माइक्रोबैक्टर, पेंसिलीन आदि सूक्षम जीव कवक आदि की कोशिकाओं में स्थित सल्फ्यूरिक अम्ल, जब इस अघुलनशील सल्फर पर पड़ता है तो यह घुलनशील सल्फेट में बदल जाता है| जिसे पौधा ग्रहण कर सकता है| लहसुन, गोभी, शलजम, सरसों आदि तिलहनी पौधों में अधिक मात्रा में सल्फर जमा होता है| इसलिए इन फसलों को फसल चक्र में सम्मिलित करने पर मिट्टी में सल्फर की उपलब्धता में वृद्धि  होती हैं| एक एकड़ हेतु 8.11 किलोग्राम सल्फर की जरुरत होती है|

सल्फर की उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रत्येक 2-3वर्ष में कम से कम एक या दो बार खेत में तिलहन उगाना चाहिए| तिलहनों में (तिल, राई, सरसों, अलसी आदि) सल्फर अधिक मात्रा में होता है| तिलहन की भूसी को मिट्टी में मल्चिंग या खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिए|

कैल्शियम- कोशिकाओं के विभाजन हेतु महत्वपूर्ण है| यह पोषक तत्वों को पौधे के विभिन्न भागों में पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है| कैल्शियम मिट्टी में चुना-पत्थर के रूप में रहता है| जैविक अवशेषों में भी यह प्रचुर मात्र में होता है| केंचुओं से प्राप्त वर्मीकास्ट या वर्मीकम्पोस्ट में भी यह अधिक मात्रा में पाया जाता है| सामान्यतः जैविक खेती में कैल्शियम आसानी से उपलब्ध होता रहता है| एक एकड़ फसल हेतु 40 किलिग्राम कैल्शियम की आवश्यकता होती है|

मैग्नीशियम-की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका होती है| यह पत्तियों के हरेपन हेतु आवश्यक है| यह पौधों की जड़ों में अधिक मात्रा में जमा होता है| मिट्टी में मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है| एक एकड़ फसल हेतु 16 किलिग्राम मैग्नीशियम के भंडार से आसानी से पौधों को उपलब्ध होता रहता है|

सूक्ष्म तत्व- तम्बा, लोहा, जस्ता, मैगनीज, बोरोन, सोडियम, निकिल, क्लोरीन, कोबाल्ट मालीब्नेम आदि प्रमुख सूक्ष्म पोषक तत्व हैं जैविक खेती में केंचुओं तथा सूक्ष्म जीवाणुओं  की क्रियाशीलता के कारण ये सभी तत्व प्रचुर मात्रा में पौधों को उपलब्ध होते रहते हैं| 11 सूक्ष्म तत्वों में से भी 5 सूक्ष्म तत्व, लोहा, जस्ता, तम्बा, मालीब्नेम तथा बोरोन की पौधे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका होती है|

लोहा – प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण उत्प्रेरक का कार्य करता है| क्लोरोफिल के निर्माण हेतु लोहे का होना आवश्यक है| एक एकड़ फसल हेतु 800 ग्राम लोहे की आवश्यकता होती है| पेड़-पौधों के अवशेष तथा मिट्टी में प्रचुर मात्रा में लोहा  उपलब्ध होता है|

जस्ता-इम्जाइम की  क्रियाशीलता को बढ़ाता है| जस्ते की कमी से पत्तियाँ छोटी यह जाती है| जिससे उत्पादन में कमी आ जाती है| एक एकड़ फसल हेतु 100 ग्राम जस्ते की जरूरत होती है| यह जैव-अवशेषों तथा मूल रूप से मिट्टी में प्रचुर मात्रा में विद्यमान होता है|

ताँबा- मिट्टी में तथा जैव-अवशेषों में प्रचुर मात्रा में होता है| लेकिन जिस मिट्टी में वायु का संचरण कम हो जाता है उसमें पौधा तम्बा ग्रहण नहीं कर पाता| इसलिए पौधे की फुफंद रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता  क्षीण हो जाती है| ऐसी स्थिति में फसल बार-बार फुफंद रोग से ग्रसित हो जाती है| एक एकड़ फसल हेतु मात्र 400 ग्राम ताम्बे की आवश्यकता होती है|

बोरोन” बोरोन-कोशिकाओं के विभाजन हेतु महत्वपूर्ण है| इसकी कमी से पेड़ों में फसल कम हो जाती है तथा पौधे का विकास रुक जाता है| फसल की जड़ों के विकास हेतु बोरोन जरुरी  है| मिट्टी तथा जैव-अवशेषों में यह प्रचुर मात्रा में होता है|

जैविक खेती में सूक्ष्म व गौण तत्वों का प्रबन्धन सतत रूप से होता रहता है इसलिए हमें बाहर से कुछ भी डालने की आवश्यकता नहीं होती|

मल्चिंग

मिट्टी की सतह को किसी भी प्रकार की सामग्रियों स ढकने की विधि  को मल्चिंग कहते हैं| फसलों के अवशेषों एवं अन्य मक्का के डंठल, कुसुम की फूस एवं अन्य स्थानीय उपलब्ध सामग्री जो चारे के लिए बहुत कम अथवा नहीं प्रयुक्त होती हो, को मल्चिंग के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है| आज कल कहीं-कहीं काली पालीथीन को भी मिट्टी को ढकने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है| मल्चिंग करने से मिट्टी से जल निकासी घट जाती है, नमी संरक्षित रहती है व मिट्टी का तापमान एक समान बना रहता है| फलतः खेतों में खरपतवार कम हो जाते हैं व पोषक तत्व पौधे को मिलने लगते हैं|

आच्छादन फसल

खेतों को ढकने के लिए फसल चक्र के क्रम में खेत खाली छोड़ने के बजाए बहुत जल्दी बढ़ने वाले पौधे लगाने से खेतों में खरपतवार कम हो जाते हैं| (आच्छादन फसलें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और मिट्टी एवं जल के संरक्षण में मदद करती हैं| खरपतवार की पैदावार रोकती हैं जिसके फलस्वरूप खेती का काम कम हो जाता है| आच्छादन फसल के चयन हेतु यह ध्यान रखना अति आवश्यक है कि चयनित फसल जल्दी बढ़ने वाली हो| फसल कीट एवं बीमारी रोधक हो व बड़ी मात्रा में मिट्टी को जकड़ने की क्षमता रखती हो साथ ही साथ पौधे जमीन में फैलने व छाया करनेवाले हों|

फसल चक्र

साल दर साल एक ही अथवा एक जैसी ही फसलों के उत्पादन से मिट्टी की उर्वरता क्षीण होती है| वैज्ञानिक तरीके से फसलें बदलते रहने के क्रमवार चक्र को फसल चक्र कहते हैं| एक वर्षीय फसलें वातावरण एंव मौसमी परिवर्तनों के हिसाब से बदली जाती है| फसल चक्र जैसे” धान-गेंहूँ एवं मक्का- गेंहूँ-मुंग, वार्षिक फसल चक्र के उदाहरण हैं|

मिश्रित खेती

जब एक ही समय में एक ही खेत पर कई फसलें एक साथ बोई तथा उगायी जाती हैं इसे मिश्रित खेती कहते हैं| मिश्रित खेती विभिन्न पौधों के संरक्षण में मददगार होती इससे मिट्टी के स्वास्थ्य/गुणवत्ता में सुधार होता है| कुल मिलाकर उत्पादकता भी बढ़ती है| मिश्रित खेती फसल की सुरक्षा में मदद करती है, जैसे-खेतों की मेढ़ों पर हल्दी या अदरक उगाने से खेतों में रोग नहीं फैलते हैं| खेतों की मेढ़ पर गेंदा, तुलसी, धनिया इत्यादि लगाने से कीट पतंगें दूर भागते हैं| दलहनी व अदलहनी फसलों का फसल-चक्र अपनाने या मिश्रित खेती करने से जहाँ दलहनी फसल से अदलहनी फसलों को नत्रजन उपलब्ध होता है वहीँ अदलहनी फसल से दलहनी फसलों को फास्फेट, जस्ता, सल्फर आदि प्राप्त होता है| हर एक प्रजाति की इसी फसल के उगाने से खेत में उक्त पोषक तत्व का उपयोग अधिक मात्रा में करती है| बार-बार खेत में इसी फसल को उगाने से खेत में उक्त पोषक तत्व की कमी हो जाती है जिससे उत्पादन घटने के साथ-साथ कई तरह के रोग लगने शुरू हो जाते हैं| जैसे, धान अधिक मात्रा में जस्ते का उपयोग करता है| इसी तरह मक्का अधिक मात्रा में नाइट्रोजन का उपयोग करता है| दलहनी फसलें ताम्बें का उपयोग अधिक करती हैं|  बार-बार दलहनी फसल उगाने से खेत में ताम्बें की कमी हो जाती है जिससे उकठा जैसा गंभीर फुफंद रोग लगना शुरू हो जाता है|

विविध फसलें उगाने से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों के भोजन हेतु आवश्यक तत्व नाइट्रोजन. कार्बन तथा प्रोटीन उपलब्ध होता रहता है| जिससे खेत में जैव-रासायनिक प्रक्रियाएं सम्पन्न होती रहती है| जबकि एक ही प्रकार की फसल उगाने से खेत में फसल नाशी कीटों की संख्यां में लगातार वृद्धि होती रहती है| जबकि फसल चक्र, मिश्रित फसल अपनाने से मित्र व शत्रु कीटों के बीच एक संतुलन बना रहता है जिससे शत्रु कीटों का प्रकोप नहीं होता |

 

स्रोत:  उत्तराखंड राज्य जैव  प्रौद्योगिकी विभाग; नवधान्य, देहरादून



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate