भूमिका हाड़ो बड़ीउली, ग्राम – बारकुंडिया, पंचायत – तुईबीर, प्रखंड – सदर, जिला – पश्चिमी सिंहभूम। प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने पेशा के रूप में खेती को चुना। शुरुआत में पारम्परिक विधि से धान एवं सब्जी का उत्पादन करता रहा, परन्तु आय में वृद्धि नहीं हो सकी। वर्ष 2011-12 में आत्मा से जुड़ा, जहाँ खेती के संबंध में मार्ग दर्शन मिला। साथ ही आत्मा के कार्यकलापों एवं योजनाओं की जानकारी भी मिली। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन को भी हमारे गाँव में प्राथमिकता के आधार पर संचालित किया गया। वर्ष 2013 में आत्मा की ओर से श्री विधि से धान की खेती पर पाँच दिवसीय प्रशिक्षण किसान भवन-सह-प्रशिक्षण केंद्र, आत्मा चाईबासा में आयोजित की गई, जिसमें जिला के विभिन्न प्रखंडों के कृषकों ने भाग लिया, परन्तु उन्हें श्री विधि से धान की खेती की उत्पादकता पर विश्वास नहीं हुआ। अंतराज्यीय भ्रमण हेतु हाड़ो को जिला से केन्द्रीय चावल अनुसंधान केंद्र, उड़ीसा भेजा गया, जहाँ उन्होंने श्री विधि के अतिरिक्त अन्य विधि यथा संकर तकनीकी एवं अन्य विधियों से उन्नत खेती को देखा। तब उसने निश्चय किया कि वह भी श्री विधि पद्धति से ही धान की खेती करेगा। वर्ष 2013 में आत्मा द्वारा संचालित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत उसे एक हेक्टेयर में धान का प्रत्यक्षण प्राप्त हुआ जिसे उसने सफलतापूर्वक किया। अंतराज्यीय भ्रमण हेतु हाड़ो को जिला से केन्द्रीय चावल अनुसंधान केंद्र, उड़ीसा भेजा गया, जहाँ उन्होंने श्री विधि के अतिरिक्त अन्य विधि यथा संकर तकनीकी एवं अन्य विधियों से उन्नत खेती को देखा। तब उसने निश्चय किया कि वह भी श्री विधि पद्धति से ही धान की खेती करेगा। वर्ष 2013 में आत्मा द्वारा संचालित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत उसे एक हेक्टेयर में धान का प्रत्यक्षण प्राप्त हुआ जिसे उसने सफलतापूर्वक किया। अंतराज्यीय भ्रमण और श्री विधि से धान उत्पादन प्रत्यक्षण के लिए हाड़ो को बीज – 5.00 किलोग्राम (प्रभेद – एम.टी.यू.-1010) ब्यूटाक्लोर। लीटर तथा आवश्यकतानुसार कीटनाशी एवं कवकनाशी उपलब्ध कराया गया। हाड़ो ने बताई गई विधि से खेत और बिचड़ा तैयार किया। 5 किलोग्राम बीज से बिचड़ा तैयार करने पर गाँव के कृषकों द्वारा खा गया कि इतने थोड़े से बीज से क्या और कैसी खेती होगी? तदोपरांत रोपनी का भी समय आ गया। मार्कर चलाने के बाद 25-25 सेंटीमीटर की दूरी पर 1-1 पौधा की रोपाई करवाई। महज 5 किलोग्राम बीज से पूरे 2.39 एकड़ खेत में रोपाई हो गई। दूसरे दिन किसानों द्वारा कहा गया कि धान की खेती कर रहे हो या लत्ती वाली सब्जी की। इतनी दूरी तो सब्जी में रखी जाती है। इसकी उपज से तो दो माह का चावल भी नहीं होगा। इस प्रकार की बातें सुन कर हाड़ो भयभीत हो गया। एक बार मन किया कि उसी खेत में और बीज लाकर सीधी बुआई कर दें, परन्तु आत्मा के पदाधिकारी द्वारा आवश्वासन देने पर उनके मन से भय दूर हुआ। तीसरी बार कोनोवीडर चलाने के उपरान्त कल्लों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि को देखकर हाड़ो दंग रह गया। पौधे बड़े होने पर पूरा खेत भर गया, जिसे देख गाँव के किसान दंग रह गए। किसानों ने हाड़ो के संकल्प की दाद दी। उपज आकलन हेतु परियोजना निदेशक द्वारा प्रतिनियुक्त अधिकारीयों के समक्ष 100 वर्ग मी. में कटनी की गई। आत्मा के उप-परियोजना निदेशक एवं उनके विशेषज्ञों की उपस्थिति में प्रक्षेत्र दिवस-सह-कृषक गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमें प्रत्यक्षण प्लाट एवं सामान्य विधि तथा पारंपरिक विधि से की गई खेती के उपज का आकलन किया गया। श्री विधि से 85 क्विंटल, उन्नत विधि से 25 क्विंटल एवं पारंपरिक विधि से 15 क्विंटल उत्पादन हुआ है। इस प्रत्यक्षण का सहभागी कृषकों पर काफी प्रभाव पड़ा और सभी ने श्री विधि अपनाने का संकल्प लिया। गोष्ठी के माध्यम से उपस्थित किसानों से आग्रह किया गया कि प्रशिक्षण प्राप्त कर वे इस विधि को जरुर अपनाएं और अपने जिले में खाद्य उत्पादन को बढ़ाने में सहयोग करें, तभी राज्य खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होगा। श्री बुड़ीउली अपने ग्राम ही नहीं पंचायत, प्रखंड एवं जिला के कृषकों के प्रेरणाश्रोत बने हैं और श्रीविधि से धान की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किसानों को उत्प्रेरित कर रहें हैं। हाड़ो की प्रेरणा से अन्य किसान भी आज श्रीविधि को अपना कर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार