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गेंदा फूल की खेती से बदली तकदीर

भूमिका

साहरघाट (मधुबनी) के हरलाखी प्रखंड सीमा गांव के क्यारियों में लगे गेंदा के फूल को देखकर रास्ते से गुजरने वाले हर व्यक्ति का मन प्रफुल्लित हो उठता है। बड़े भू-भाग में लहलहाते गेंदा देखने लायक हैं। मनमोहक, आकर्षक व मनोरम नजारा देखते ही बना है। एनएच से गुजरते राहगीर सोचने को मजबूर होता है कि क्या फूल की खेती बड़े पैमाने पर कर अच्छी कमाई की जा सकती है। अबतक तो लोग फूल को घर के अहाते व नर्सरी की शोभा बढ़ाने वाला ही मानते रहे हैं। मगर यहां आकर लोगों का नजरिया बदल जाता है। गंगौर के रामदयाल भंडारी के जज्बे व नयी तरह की खेती देखकर करने का हिम्मत देखकर आकर्षित होते हैं। खाद-बीज व पानी की बढ़ती कीमत के कारण खेती अलाभकारी हो गयी है। इसी कारण परंपरागत खेती से इतर किसान नयी तरह की खेती करने को आगे आये हैं। हरलाखी प्रखंड क्षेत्र के गंगौर निवासी रामदयाल भंडारी महज गेंदा की बड़े स्तर पर खेती कर अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत बन गये हैं।

परिवार की तस्वीर बदल दी

रामदयाल ने परंपरागत खेती से अलग जब फूल की खेती शुरू की, तो मन में एक डर था कि पता नहीं क्या होगा। लेकिन पहले साल ही लाभ दिखने लगा। एक दर्जन सदस्यों के भरे-पूरे परिवार का भरण-पोषण अब पहले से ठीक ढंग से कर रहे हैं। वे उन किसानों के लिए एक बेहतरीन उदाहरण बन चुके हैं, जो कृषि कार्यों के प्रति उदासीन हो चुके हैं। वे गांव एवं आस-पास के किसानों से अनुबंध पर जमीन लेकर हर वर्ष तकरीबन तीन हेक्टेयर भू-भाग में गेंदा की खेती करते हैं। रामदयाल को फूल की खेती से तीन लाख से अधिक रुपये की सालाना आमदनी हो जाती है। इसके बदौलत वे फूलों के साथ ही अपने सात बच्चों के परिवार को भी लगातार सींचने में लगे हैं। उन्होंने फूलों से होनेवाली आमदनी से ही अपने चार बच्चों का शादी-ब्याह संपन्न कराया है। या यूं कहें कि गेंदा की खेती करने के जुनून ने रामदयाल के परिवार की तकदीर बदल दी।

जनकपुर समेत कई बाजारों में खपते हैं फूल

इनके द्वारा उत्पादित किये गये फूल छोटे-छोटे व्यापारियों के जरिये प्रतिदिन मिथिला की ऐतिहासिक नगरी जनकपुर, गिरिजा स्थान (फूलहर) और मनोकामना स्थान (कमतौल) के अलावा बेनीपट्टी उच्चैठ के दुर्गास्थान के बाजारों तक पहुंचते हैं। किसान रामदयाल करते हैं कि हम कभी एक-एक दाने को मोहताज थे। अब हमारी किस्मत बदल रही है। वे आग कहते हैं कि अपने पुश्तैनी पेशे को बदलते परिवेश के मुताबिक बदलकर जी-तोड़ मेहनत से अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी है और आज हमारा परिवार खुश है। फसलों की तरह ही इसकी सिंचाई और उर्वरकों का उपयोग करहम फूलों का अपेक्षित उत्पादन करते हैं, जो किसी चुनौती से कम नहीं है।

उपेक्षित होने का दुख

रामदयाल को इस बात का दुख है कि आज भी माली समुदाय के लोग घोर उपेक्षित है और उनके जीवन स्तर को उठाने के लिए सरकारी तौर पर कोई खास पहल नहीं की जा सकी है। फूलों की खेती करनेवाले किसानों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से न तो कोई प्रयास किये गये हैं न ही किसी तरह की सहायता ही प्रदान की जा सकी है। लिहाजा, माली समाज आज भी अपने विकास की बाट जोह रहा है।

स्त्रोत: संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार।



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