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ढाई एकड़ की नर्सरी से ढाई लाख की आमदनी

21वीं सदी में खेती का स्वरुप बदला

 

21वीं सदी में खेती का स्वरूप बदलाहै। इसी कारण घाटे की माने जानेवाली खेती आज मुनाफे की ओर बढ़ रहीहै। इसमें भारतीय किसान अनुसंधान संस्थान का काफी योगदानहै। यहां के विशेषज्ञ आधुनिक खेती के तरीके का विकास कर रहे हैं, जिससे कृषिक्षेत्र तरक्की कर रहाहै। इन्हीं तरक्की करनेवाले किसानों में से एक हैं पटना जिले के बिहटा प्रखंड के विष्णुपुरा निवासी पप्पू सिंह, जिन्होंने बीकम तक की पढ़ाई करने के बाद नर्सरी खोलने का निर्णय लिया़ फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा़ वे आज मदर फ्लोरी कल्चर फार्म हाउस नामक संस्था भी चलाते है।कृषिक्षेत्र के कई पुरस्कार भी मिल चुके है।इनकी नर्सरी को देखने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग आते है।

ऐसे की खेती की शुरुआत

  • लगभग 12 एकड़ में फैले फूलों के इनके फार्म हाउस में गुलजार, रजनीगंधा डबल एवं सिंगल स्टिक, ग्लाइडोलस, बेली, एरिका पाम, जरबेरा, कामिनी, गेंदा आदि के अलावा खस, अश्वगंधा, सर्पगंधा, ब्राती जैसे औषधीय पौधे लगे है।इसके साथ ही साइकस के 10 पौधे भी है।इसका एक पत्ता 20 से 25 रुपये में बिकताहै। वर्ड अफ पाराडाइज में पांच वर्षो में फूल आता है, इसके एक फूल की कीमत 150 से 200 रुपये तक होतीहै। स्पाइडर लिलि आदि फूलों के पौधे भी लगे है।ये फूल और पत्ते शादी-विवाह में वाहन सजाने में काम आते है।लगन के मौसम में 50 से 55 हजार रुपये वाहन सजाने से हो जातीहै। इसके फार्म हाउस में नींबू, दशहरी, आम्रपाली, मल्लिका आम, केला एवं पपीते के साथ फल वाली लौकी का एक पौधा भी है, जिसकी ऊंचाई सात फुट तक होतीहै। पौधे में वर्ष में 10 महीने तक फल लगे रहते है।उन्होंने ने कहा कि 15 एकड़ में से ढाई एकड़ में नर्सरीहै। शेष जमीन में धान व गेंहू की खेती की जातीहै। नर्सरी से ढाई लाख की आमदनी होतीहै।

ऐसे मिली सफलता

  • गांव की पगडंडियों से होते हुए कृषिक्षेत्र में नाम कमाने वाले पप्पू के लिए यह रास्ता आसान नहीं था़ क्योंकि ये दवा व्यवसाय से जुड़े थ़े अपने पहले व्यवसाय को छोड़ कर खेती करना कठिन तो था ही, साथ ही अपनों का साथ भी छूट रहा था़ इसकी परवाह किये बिना पहले उन्होंने सब्जी की खेती की, उसके बाद सुगंधित एवं औषधीय पौधों की खेती शुरू की़ गुजरात, मध्यप्रदेश, सिक्किम (गंगटोक, कलिंपोंग), मेघालय, हिमाचल प्रदेश, पुणो, कोलकाता, उत्तर प्रदेश के बाराबंकी तथा लखनऊ जाकर पौधे, बीज एवं बाजार का जायजा लिया़ इसके बाद सब्जी तथा सुगंधित एवं औषधीय पौधों की खेती शुरू की़ इस दौरान उन्हें कई अच्छे-बुरे अनुभव मिल़े

वैज्ञानिक सहयोग से बढ़े आगे

  • पप्पू की सफलता का राज है, वैज्ञानिकों का भरपूर सहयोग़ कृषिविश्वविद्यालय पूसा (समस्तीपुर) के वैज्ञानिक एचपी मिश्र से तकनीकी ज्ञान कृषिविज्ञान केंद्र, आरा के ड पीके द्विवेदी का सहयोग रहा़ बागबानी मिशन भारत सरकार की ओर से ग्लाइडोलस,रजनीगंधा तथा गुलाब के प्लांटिंग मेटेरियल के साथ 60 हजार रुपये की सब्सिडी दी़ राज्य कृषिविभाग द्वारा सिक्किम तथा प्रगति मैदान, दिल्ली में लगनेवाली प्रदर्शनी में भेजा जाना विशेष रूप से उपयोगी रहा़ सौ-सौ के ग्रुप में तीन बार शाहाबाद क्षेत्र के किसानों के ग्रुप को केबीके, आरा द्वारा पप्पू के कृषिफार्म में शिविर लगा कर प्रशिक्षण दिया गया़ किसान उद्यान पंडित पुरस्कार मिला रू पप्पू सिंह सोनुरा मेला, 2007 में लगी कृषिप्रदर्शनी में किसान उद्यान पंडित से सम्मानित किये गय़े इसके अलावा उन्हें कई राज्य व जिलास्तरीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके है।आज पप्पू सिंह को फूलों की खेती से लगभग ढाई से तीन लाख रुपये तक की आय हो रहीहै। उन्होंने कहा कि आस्ट्रेलिया, अमेरिका व अन्य देशों के लोग नर्सरी को देखने आते रहते है।
  • अधिक जानकारी के लिए इस नबंर पर संपर्क कर सकते हैं़ 9939623980

स्त्रोत : संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार ।



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