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सतरंगी खेती से मिली अलग पहचान

कहा जाता है कि जिसके पास जज्बा होता है वह पहाड़ के सीने को चीर कर अपना रास्ता बना लेता है। क्योंकि उसे लगता है कि कृषि पेशा अलाभकारी हो गया है। परंतु इन्हीं सब के बीच कुछ प्रगतिशील किसान ऐसे हैं जो कृषि वैज्ञानिक सहयोग से सफलता की नयी गाथा लिख रहे हैं। ऐसी ही अनुभव किसान में से एक है जो कैमूर जिले के दुर्गाववती प्रखंड के कृपालपुर गांव निवासी जयप्रकाश सिंह । जिन्हें राज्य सरकार द्वारा किसानश्री के सम्मान से सम्मानित किया गया । इस सम्मान में मेंडल, प्रशस्थिपत्र के अलावा एक लाख रुपये का चेक प्रदान किया गया था। पारंपरिक रूप से खेती तथा पशुपालन से जुड़े किसान जयप्रकाश सिंह की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं थीं पर पिछले सात- आठ वर्षो से अपनी नयी सोच एवं वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर आज ये अपने आसपास के किसानों के लिए एक उदाहरण बन गये हैं

कर्ज लेकर की शुरूआत

एक लाख रुपये बैंक से कर्ज लेकर डेयरी फार्म से 100 लीटर दूध का उत्पादन कर रह रहे हैं। जो 32-35 रुपये प्रति लीटर इनके घर पर ही बिक जाता है। इसके अलावा बकरी पालन भी कर रहे हैं। इनकी बकरियां देसी हैं जो एक से डेढ़ लीटर तक दूध देती है। बकरी के बच्जचे 5-6 माह में लगभग 2500 से लेकर 3000 रुपये तक में बिक जाते हैं। बकरी पालन से इनकी वार्षिक आय लगभग तीस हजार रुपये से अधिक की है। मछली पालन एक एकड़ में करते हैं इनके इस निजी तालाब में रेहू, कतला तथा मांगुर आदि मछलियां हैं जिससे इनकी वार्षिक आय लगभग 50-55 हजार रुपये तक की हो जाती है। इसके अलावा इनका एक छोटा सा मुर्गी फार्म भी है। इस फार्म में लगभग 150 से 200 मुर्गे -मुर्गिर्यो का समूह है इस छोटे से मुर्गा फार्म से भी लगभग 50 हजार रुपये की आय वर्ष में हो जाती है। इन सबसे अतिरिक्त पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक खेती के भी कर रहे हैं।

ट्रेंनिग से शुरू की मेंथा की खेती

औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती में लेमनग्राम तथा मेंथा प्रमुख है। मेंथा की खेती बीते सीजन में 100 लीटर तेल का उत्पादन ढ़ाई एकड़ की खेती से हुआ। तेल भंडारण की सुविधा न होने के कारण लगभग 470।00 रुपये प्रति लीटर की दर से बाराबंकी में बेचना पड़ रहा। मेंथा की खेती ट्रेनिंग राज्य सरकार द्वारा तीन लोगों के समूह में सीमैप लखनऊ जाकर प्राप्त किया था। वहां से ट्रेनिग लेने बाद मेंथा की खेती शुरू की जिसमें आशातीत सफलता मिली है। इसकी खेती के लिए मेंथा का बीज लखनऊ से ही ले आये थे। मेंथा की इस खेती पर सरकार द्वारा 11000 रुपये का अनुदान भी मिला। जयप्रकाश सिंह ओल (जिमीकंद) की खेती कर रहे हैं। जिसकी ब्रिकी के लिए लगभग 140 रुपये से अधिक प्रति क्विंटल की दर से स्थानीय स्तर पर बाजार उपलब्ध है। इसके साथ ही अपनी परंपरागत खेती गेहूं ,धान, मक्का, दलहन तथा तिलहन की भी अच्छी खेती कर रहे हैं। इस समय इन्होंने पांच एकड़ में धान की जैविक खेती किया है। जिसमें राजेंद्र वन,गोबिंद भोग-2729 तथा नाटा मंसूरी आदि शामिल है। इसके अतिरिक्त 18 एकड़ में धान व गेंहूं की रासायनिक खेती प्रति वर्ष करते हैं। गेंहू में पीबीडब्ल्यू 273 तथा एचडी 2733 की खेती मुखय रूप से करते हैं। धान व गेहूं की के बीज का उत्पादन बड़े स्तर पर करते हैं। पिछले वर्ष राजेंद्र वन धान का आधार बीज एक एकड़ का सरकार द्वारा इन्हें दिया गया है। इस एक एकड़ में जितना भी धान का बीज तैयार होगा उस बीज को सरकार खरीदती है।

कृषि वैज्ञानिकों को मिला सहयोग

वनवासी कृषि सेवा केंद्र कृषि सेवा केंद्र अधौरा के कृषि वैज्ञानिक डा। सुरेंद्र सिंह से मार्गदर्शन लेकर खेती करने वाले प्रगतिशील किसान जयप्रकाश सिंह समय-समय पर कृषि विभाग द्वारा लगने वाले मेले सह कृषि प्रदर्शनी द्वारा लगने वाले मेले सह कृषि प्रदर्शनी भाग लेते रहते हैं। पिछले वर्ष आयोजित इसी तरह की एक प्रदर्शनी में उन्होंने पपीता,करेला, कोहरा,अमरूद कागजी, नींबू थता गाजर का प्रदिर्शत किया था जिसमें इन्हें जिला स्तर पर गाजर व कोहरा का उत्पादन में प्रथम तथा करेला उत्पादन में द्वितीय स्थान प्राप्त करने के लिए डीएम द्वारा प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया गया था। किसान सहकारी संघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में महराष्ट्र से आये कृषि वैज्ञानिकों द्वारा जैविक खेती में नीम, करंज,मदार तथा जंगली तंबाकू के पत्ते से जैविक कीटनाशी बनाकर प्रयोग की जानकारी दी गयी। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार खेत की मिट्टी की जांच कराना तथा कृषि वैज्ञानिकों से सलाह प्राप्त करते रहते हैं। रासायनिक खाद व कीटनाशी का प्रयोग करना ही सफलता का राज है। आसपास के किसान इनकी प्रगतिशील खेती देखने व इनके अनुभव का लाभ उठाने के लिए आते रहते हैं। इनका मानना है कि किसान भाइयों को एक दूसरे के अनुभव तथा नफा नुकसान की चर्चा करते रहना चाहिए तभी हम खेती में अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं।

ऐसे मिलती है जानकारी

खेती से संबंधित प्रकाशन संबंधी साम्रगी तथा कृषि मेलों में किसानों की अधिक से अधिक भागीदारी होने से उन्हें खेती पर होने वाले नये अनुसंधानों की जानकरी मिलेगी। जिससे वे अपने खेती में आधुनिक कृषि यंत्रों तथा कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनुसंसित बीज, खाद व कीटनाशी का प्रयोग कर अपनी कृषि उपज से अधिक मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं। उनहोंने कहा कि गेहूं का भूसा, धान का पुआल तथा तिलहन की फसलों का निकले भूसे तथा खली पशुओं के खाने के काम में आता है गाय व बकरी का गोबर जैविक खेती में खाद के रूप में अत्यंत ही उपयोगी हो रहा। मुर्गियों के अपशिष्ट को मछलियों के चारे के रूप में उपयोग कर रहे हैं। इसी उपयोगिता को देखेते उन्होंने एक साथ खेती, पशुपालन, मुर्गीपालन, बकरी पालन तथा मछली पालन एवं औषधीय व सुगंधित पौधों की खेती कर रहें हैं। जिसमें उन्हें बहुत सारी सामग्री बाजार में खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है । कैमूर जैसे क्षेत्र में बहुत से किसान अपनी खेती के प्रति नयी सोच तथा लग। व उत्साह तथा कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से जुआ कही जाने वाली खेती की प्रगति में कई कदम आगे बढ़कर पारिवारिक जीवन स्तर को उंचा उठाते हुए अपने बच्चों को उच शिक्षा दिलाने में सक्षम हो रहें हैं।

स्त्रोत : संदीप कुमार,स्वतंत्र पत्रकार,पटना बिहार ।



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