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मधुमक्खी पालन बना आय का स्रोत

परिचय

श्री हरिओम गाँव बलड़ी जिला करनाल का रहने वाला एक सीमान्त किसान था। जमीन कम होने की  वजह से इस का खर्चा बड़ी मुशिकल से चलता था। वर्ष 1990 में इन्होने कृषि विज्ञान केंद्र, राष्ट्रीय डेरी अनुसन्धान संस्थान करनाल से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया। इसी वर्ष दिसंबर में इस व्यवसाय को केवल 5 मधुमक्खी पालन कॉलोनियों के साथ आरंभ किया। वर्ष 1991 में कॉलोनियों की संख्या 20 हो गई। मधुमक्खी पालक द्वारा कॉलोनियों को बढ़ाने का क्रम जारी रहा तथा वर्ष 2005 में यह संख्या बढ़कर 140 हो गयी। फूलों को देखते हुए मधुमक्खी कॉलोनियों को दो बार स्थानान्तरण भी किया। इन कॉलोनियों से 29.40 क्विंटल शहद का उत्पादन हुआ जिसमें से 10 क्विंटल सरसों के शहद को 42 रूपये प्रति कि.ग्रा. के भाव से बेचकर लगभग 42,000 रूपये की आय प्राप्त की। इसकी अलावा 25 मधुमक्खी कॉलोनियों के 720 रूपये प्रति चार फ्रेम के सतत बेचकर 18,000 रूपये की आय प्राप्त की।

अधिक उत्पादन पश्चात बोतलों में भी भरकर बेचा मधु

चूँकि हरि राम का खेत तथा उसमें रखी मधुमक्खी कालोनियां जी.टी.रोड के किनारे पर ही स्थित हैं इसलिए वह ग्रीष्म ऋतु शहद को अच्छी तरह प्रोसेस करने के बाद स्वच्छ बोतलों में भरकर सड़क के किनारे ही बेचता है। यह शहद 100 रूपये से 125 रूपये प्रति कि.ग्र. के भाव से बिक जाता है। हरि  राम ने अपने लड़के गुरमेर सिंह को भी कृषि विज्ञान केंद्र से मधुमक्खी पालन मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण करवाया है। समय-समय पर वह मधुमक्खी कॉलोनियों के रखरखाव एवं शहद की बिक्री में अपने पिता का हाथ बांटता है। वर्ष 2005 में शहद एवं कालोनियां की बिक्री से सभी खर्चे निकालकर श्री हरि  राम को 1.25 लाख रूपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई।

इस व्यवसाय को देखते हुए गाँव बलड़ी को पांच अन्य किसानों ने मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लेकर इस व्यवसाय को आरंभ दिया है। इस गाँव के अलावा कई आसपास के ऐसे किसान हैं जो शहद को प्रोसेस करके तथा इन्हें बोतलों में भरकर सड़क के किनारे बेचने लगे हैं।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार



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