खेत की तैयारीᅠ ब्रोकली को उत्तर भारत के मैदानी भागों में जाड़े के मौसम में अर्थात् सितम्बर मध्य के बाद से फरवरी तक उगाया जा सकता है। इस फसल की खेती कई प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन सफल खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी बहुत उपयुक्त है।ᅠᅠ सितम्बर मध्य से नवम्बर के शुरु तक पौधा तैयार की जा सकती है बीज बोने के लगभग 4 से 5 सप्ताह में इसकी पौध खेत में रोपाई करने योग्य हो जाती है। इसकी नर्सरी ठीक फूलगोभी की नर्सरी की तरह की जाती है।ᅠᅠ जलवायु ब्रोकली के लिए ठंडी और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है यदि दिन अपेक्षाकृत छोटे हों तो फूल की बढ़ोत्तरी अधिक होती है। फूल तैयार होने के समय तापमान अधिक होने से फूल छितरेदार, पत्तेदार और पीले हो जाते हैं।ᅠᅠ मिट्टी इस फसल की खेती कई प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन सफल खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी बहुत उपयुक्त है। जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद हो इसकी खेती के लिए अच्छी होती है। हल्की रचना वाली भूमि में जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद डालकर इसकी खेती की जा सकती है।ᅠᅠ किस्में ब्रोकली की किस्में मुख्यत: तीन प्रकार की होती है- श्वेत हरी व बैंगनीᅠᅠ इसमें हरे रंग वाली किस्में अधिक पसंद की जाती है, इनमें- नाइन स्टार, पेरिनियल, इटैलियन ग्रीन, बाथम 29, ग्रीन हेड,पाईरेट पेक, पूसा ब्रोकली-1, और के.टी.एस-9 प्रमुख हैं।ᅠᅠ लगाने का समय उत्तर भारत के मैदानी भागों में ब्रोकली उगाने का उपयुक्त समय ठण्ड का मौसम होता है इसके बीज अंकुरण तथा पौधों को अच्छी वृद्धि के लिए तापमान 20-25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसके नर्सरी तैयार करने के लिए अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा होता है।ᅠᅠ पवर्तीय क्षेत्रों में कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सितम्बर-अक्टबूर, मध्यम ऊँचाई वाले क्षेत्रों में अगस्त-सितम्बर और अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मार्च-अप्रैल में तैयार की जाती है।ᅠ बीज दर गोभी की भांति ब्रोकली के बीज बहुत छोटे होते हैं एक हेक्टेयर की पौध तैयार करने के लिए लगभग 375 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है।ᅠ नर्सरी तैयार करनाᅠᅠ पौधे उगाने के लिए 3 फिट लम्बी और 1 फिट चौड़ी तथा जमीन की सतह से 1.5 सेमी. ऊँची क्यारी में बीज की बुवाई की जाती है। क्यारी की अच्छी कार से तैयार करके एवं सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर पंक्तियों में 4-5 सेंमी. की दूरी पर 2.5 सेमी की गहराई पर बुवाई करते है। बुवाई के बाद क्यारी को घास-फूस की महीन परत से ढक देते है तथा समय-समय पर सिंचाई करते रहते है। जैसे ही पौधे निकलना शुरु होता है ऊपर से घास-फूस हटा दिया जाता है। नर्सरी के पौधों को कीटों से बचाव के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र का प्रयोग करें।ᅠ रोपाईᅠᅠ नर्सरी में जब पौधे 8-10 सेमी. या 4 सप्ताह के हो जाये तो उनको तैयार खेत में कतार से कतार 15 से 60 सेमी. तथा पौधे से पौधे 45 सेमी. दूरी रखकर रोपाई कर दें। रोपाई करते समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।ᅠ खाद व उर्वरकᅠ 50 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद के साथ 1-1 किलो नीम और अरंडी की खली को अच्छी तरह मिलाकर प्रति 10 वर्ग मी. की दर से क्यारी में रोपाई से पूर्व समान मात्रा में बिखेर लें इसके बाद क्यारी की जुताई करके पौधे की रोपाई करें। क्यारी की अंतिम बार तैयार करते समय प्रति 10 वर्ग मी. में 50 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद, 1 किलो भू-पावर, 1 किलो माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट, 1 किलो माइक्रो नीम, 1 किलो सुपर गोल्ड कैल्सीफर्ट, और 1 किलो अरंडी की खली का प्रयोग करें।ᅠᅠ रासायनिक खाद की दशा में गोबर की सड़ी खादः 50-60 टन प्रति हेक्टेयरᅠ नाइट्रोजन 100-120 किलों प्रति हेक्टेयरᅠ फॉस्फोरसः 45-50 किलों प्रति हेक्टेयरᅠ गोबर तथा फॉस्फोरस खाद की मात्रा को खेत की तैयारी में रोपाई से पहले मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला लें। नाइट्रोजन को 2 या 3 भागों में बांटकर रोपाई के क्रमश: 25, 45, तथा 60 दिन बाद प्रयोग करें।ᅠᅠ निराई गुड़ाई व सिंचाई मिट्टी, मौसम तथा पौधों की बढ़वार को ध्यान में रखकर इस फसल में लगभग 10-15 दिन के अन्दर हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है।ᅠᅠ कीड़े व बीमारियाँ काला सड़न, तेला, तना सड़न, मृदु रोमिल रोग यह प्रमुख बीमारियाँ हैं। ᅠ रोकथाम इसकी रोकथाम के लिए 5 ली. देशी गाय के मठ्ठे में 2 किलो नीम की पट्टी, 100 ग्राम तम्बाकू की पट्टी, 1 किलो धतूरे की पट्टी को 2 ली. पानी के साथ उबालें जब तक 1 ली. बचे तो ठंडी करके छान के मठ्ठे में मिला लें। 140 ली. पानी के साथ मिश्रण तैयार कर पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें।ᅠᅠ कटाई फसल में जब हरे रंग की कलियों का मुख्य गुच्छा बनकर तैयार हो जाये, शीर्ष रोपण के 65-70 दिन बाद तैयार हो जाते है तो इसको तजे चाकू या दरांती से कटाई कर लें। ध्यान रखें कि कटाई के साथ गुच्छा खूब गुंथा हुआ हो तथा उसमें कोई कली खिलने न पाए।ᅠ