जंगली प्याज (Urginia indica Kunth) स्वरूप एक छोटा छुप, पत्ते मूल से उत्पन्न होते हैं, लम्बे, चिपटे, रेखाकार, नोकदार, सवंडी पुष्प ध्वज जिसपर हरित सफेद पुष्प गुच्छे होते हैं। उपयोग श्वास रोग, श्वसनी शोथ, बच्चों के जीर्ण कफ रोग में-कंद १० तोला, जल ३२ तोला मिलाकर सात दिन तक भिगोये रहने के पश्चात् छानकर इसका सेवन ५-१५ बूंदें प्रतिदिन। इससे हृदय बल बढ़ता है, कफ शीघ्र मुक्त होता है, भोजन का पाचन होकर दस्त साफ होता है, भूख बढ़ती है। तुलसी-रामा-श्यामा (Ocimum sanctum Linn) स्वरूप क्षुप तीव्र गंधवाला शाखायें सीधी फैली पत्ते विपरीत सुगंधित, शाखाओं के अंत में मंजरी होती है, हरे सफेदी लिये पत्ते (रामा) पत्ते, डंडियाँ काली (श्यामा)। उपयोग पाँच पत्तों के नित्य सेवन से रक्तचाप का नियंत्रण । टॉन्सिल खाँसी-जुकाम में-नित्य पान के पत्ते में तुलसी के सात पत्ते, काली मिर्च तीन दाने रखकर पान की तरह चबाकर रस उतारने से लाभ। मलेरिया ज्वर में-पत्तों का स्वरस एक चम्मच प्रातः नित्य सेवन से। उदर शूल में-पत्तों तथा अदरख का रस एक चम्मच दो-दो घण्टे पर सेवन। कपूर तुलसी (Ocimum basilicum Linn) स्वरूप १-२ फीट का सीधा क्षुप, हरी या पीली- हरी शाखायें। पत्ते चमकीले-हरे, नुकीले, फूलों की हरी मंजरियाँ शाखा के अंत में। उपयोग खाँसी में-पत्तों के स्वरस का मधु के साथ सेवन । दंतशूल तथा कर्णशूल में-पत्तों के स्वरस का बाह्य प्रयोग। बिच्छू काटने पर-पत्तों को पीसकर लेप किया जाता है। सर्प विष में-पत्तों का स्वरस चार से पाँच तोला चार-चार घण्टे पर पिलाया जाना चाहिए। वन तुलसी (Lantana camera Linn) स्वरूप गुल्म, पुष्प गोल मुंडक में विभिन्न वर्णी होते हैं, काण्ड पर वक्रकांटे, पत्र विपरीत, नोकदार दंतुर निचली सतह श्वेत रोमश। उपयोग पंचांग के क्वाथ का प्रयोग विषम ज्वर तथा आमवात में लाभकारी। प्रसव पीड़ा में-इसके बीज का प्रयोग क्वाथ बनाकर प्रसव के बाद किया जाता है। कास-खाँसी में-पत्रों का प्रयोग चाय बनाकर देने से कास-खाँसी में लाभकारी। मात्रा१/४-१/२ तोला। करौंदा (Carissa carandas) स्वरूप झाड़ीनुमा सदाहरित वृक्ष, तीक्ष्ण युग्म कांटे होते हैं, पत्ते चिकने चर्मवत विपरीत, पुष्प सफेद सुगंधित, फल हरे लाल या काले (पकने पर)। उपयोग मसूड़ों में खून आता हो, तो इसके प्रयोग से लाभ। (फल)सर्प ने काटा है या नहीं इसकी परीक्षा की जा सकती है। इसकी जड़ को शीतल जल में घिस कर पिलाने से यदि साँप ने काटा है, तो खट्टा नहीं लगता। विषम ज्वर में-इसके पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं। बच (Acorus calamus Linn) स्वरूप सुगंधित ३-४ फीट का गुल्म, जड़ की शाखायें जमीन में फैली रहती हैं। पत्ते लंबे, पतले तलवार के समान, पत्र कोषों से ढकी, सघन मंजरियाँ २-४ डंडी पर होती हैं। उपयोग अपस्मार में-इसका चूर्ण मधु के साथ या इसके टुकड़े कर सात दिन तक घी में रखें। इसके पश्चात् इसका तेल निकालकर सूंघने से लाभ। इसके चूर्ण से मेधा शक्ति बढ़ती है, उन्माद में इसके स्वरस में कोष्ठ कुलिंजन का चूर्ण मधु में मिलाकर सेवन करें। इसके चूर्ण का सेवन जल या दूध के साथ ' एक माह तक करने से मेधा का विकास होता है। बड़ी लूणा (दुग्धी) (Portulaca oleracea Linn) स्वरूप भूप्रसरी (जमीन पर फैलने वाली), क्षुप, जमीन पर फैलने वाली, पत्ते मांसल, छोटा पौधा का रूपचम्मच आकार के, पुष्प पीले, पत्ते खट्टे होते हैं। इसका शाक भी बनाते हैं। उपयोग इसके बीज तथा पत्र के क्वाथ के सेवन सेअश्मरी, मूत्रकृच्छ, रक्तमूत्रता, वृक्कशोथ, बस्ती शोथ में लाभकारी। प्रतिदिन ५-९ तोला। शिरः शूल में-१०० ग्राम इसके पत्ते +४०० मि. ली. जल में उबाले, १५० मि. ली. जल बाकी रहे, तब उबालना बंद कर दें। इसको ठंडा कर छानकर इसमें सफेद प्याज का रस मिलाकर सेवन से लाभ। अश्वगंधा (Withania somnifera Dunal) स्वरूप सघन क्षुप ३-४ टेढ़ी-मेढ़ी शाखायें, ताराकार रोमाच्छादित पत्ते एकांतर कुंठिताग्र, फल व मूल संकुचित, पुष्प गुच्छों में, हरिताभ पिताभ पत्र कोषों से, फल हरे, पकने पर लाल, जो बाह्म कोश प्रवर्ध से ढके रहते हैं। उपयोग मूल का आधा तोला चूर्ण घी में गरम कर दूध तथा चीनी मिलाकर सेवन से-क्षय-सुखण्डी रोग में लाभ।कमजोरी में-इसके मूल का चूर्ण दूध के साथ एक मास तक सेवन से लाभ (प्रात: एवं सायं)। नपुंसकता में-इसका चूर्ण घी के साथ, इसमे थोड़ा मधु मिलाकर सेवन। रक्त प्रदर में-इसका चूर्ण समभाग, मिश्री का चूर्ण मिला हुआ एक-एक चम्मच प्रातः एवं सायं सेवन से लाभ। शरपुंखा(Tephrosia purpurea Linn) स्वरूप २-३ फुट ऊँचा क्षुप, कांड चिकना या रोमश, संयुक्त पक्षवत पत्रक पुष्प २१-२३ पत्ते तोड़ने से बाण के पुंख के आकार के समान टूटते हैं। पुष्प लाल या जामुनी मंजरियों में, फल मुड़ा हुआ चिकना होता है। उपयोग उदर शूल में-ताजे मूल की छाल काली मिर्च के साथ पीसकर गोली बनाकर सेवन गुणकारी है। प्लीहा वृद्धि में- इसके पंचांग का चूर्ण १/४-१/२ तोला प्रतिदिन सेवन करें या इसके जड़ की दातून चबाकर रस उदर में उतारने से प्लीहा रोग ठीक हो जाता है। जल पीपल (Phyla nodiflora (L) Greene) स्वरूप प्रसरी क्षुप, पत्ते विपरीत आरावत्। दंतुर कुंठिताग्र, पुष्प छोटे सफेद, जो मुंडकाकार व्यूह में आते हैं। उपयोग पत्तों का फांट-बच्चों के अजीर्ण अतिसार में लाभ। आन्तरिक घाव में सूजन पर इसकी पोल्टिस बाँधने से जलन कम होकर जल्दी पकती है। अजवायन पत्ता (पाषाण भेद) (Coleus aromaticus Benth) स्वरूप रोमश मांसल लघुगुल्म, पत्ते मोटे सुगंधित रोमश दंतूर, स्वाद में कटु, पुष्प हल्के, नीले रंग के। उपयोग अश्मरी जन्य मूत्र कृच्छ में-इसके मूल का क्वाथ सेवन । शुक्राश्मरी-पंचांग के क्वाथ का सेवन कुपचन तथा आध्मान में। उदर शूल में-पत्तों के सेवन से लाभ। शिरःशूल मेंपत्तों को पीसकर सिर पर लेप करने से लाभ। दवना (दौना) (Artemissia vulgaris Linn) स्वरूप गुल्म एक से दो मीटर लंबा, पत्ते अति खंडित, खंड पतले सुगंधित पुष्प हरे मंजरियों में होते हैं। उपयोग कृमि रोग में-पत्तों के स्वरस के सेवन से बच्चों के कृमि नष्ट होते हैं। उदर शूल तथा अजीर्णता में-पत्तों के स्वरस का सेवन । दुष्ट व्रण-इसके पंचांग के क्वाथ से व्रण को धोने से दर्द कम होकर व्रण ठीक हो जाता है। कृमि रोग में-इसके पंचांग का चूर्ण रातभर जल में भिगोकर प्रातः छानकर, भोजन के पश्चात् इस जल को पीने से थोड़ी ही देर में कृमि बाहर निकल आते हैं। शमी (छुयोंकर) (Prosopis spiciger L. Syn. P. Cineraria) स्वरूप काँटेदार छोटा वृक्ष, पतली शाखायें, कांटे सीधे चिपटे, पत्ते द्विपक्षवत, उपपक्ष दो जोड़े, पत्रक ८-१२ जोड़े, फली लंबी बीच-बीच में, पुष्प पीताभ छोटी मंजरियों में। उपयोग गर्भपात रोकने के लिए इसके पुष्पों का चूर्ण मिश्री मिलाकर गर्भवती महिलाओं को खिलाया जाता है। शरीर से अनचाहे बालों को निकालने के लिए इसकी पत्तों सहित टहनियों को जलाकर इसकी राखा का प्रयोग किया जाता है। छोटी दुग्धी(Euphorbia prostrata) स्वरूप छोटा भूप्रसरी क्षुप, हरा या जामुनी काला। पुष्प छोटे तथा समूह में, पत्ते केवल अग्र पर दंतुर। उपयोग इसकी जड़ को चबाने से उल्टी रुक जाती है। इसके अतिरिक्त दंतशूल में लाभ होता है। स्त्रोत : उद्यान एवं जड़-बूटी विभाग, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, मथुरा।