संतरा, राष्ट्रीय स्तर पर उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। क्षेत्रफल की दृष्टि से देश में उगाए जाने वाले फलों में आम के बाद नीबूवर्गीय फलों का स्थान आता है। नीबूवर्गीय फलों में संतरे का स्थान सबसे ऊपर है। यह मैदानी-पठारी भागों के अतिरिक्त दक्षिण भारत की उष्णकटिबंधीय जलवायु समेत उत्तर-पूर्व में एक प्रधान बागवानी फसल के रूप में उगाया जाता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, असोम, मेघालय इत्यादि संतरा उत्पादन के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। पौधे की अधिक उत्पादन क्षमता एवं शीत तथा गर्म जलवायुवीय परिस्थितियों के प्रति पुष्पण अनुकूलता के कारण विशेष रूप से पठारी क्षेत्रों में संतरे की खेती बहुत प्रचलित है। यह गर्मी में 45 डिग्री सेल्सियस के असहनीय तापमान से लेकर सर्दी में 0 डिग्री सेल्सियस तापमान को बखूबी सहन करता है, ताप की ऊष्णता से इसके पेड़ों पर एकसार फूल आते हैं। यही कारण है कि अधिक फलनशीलता के कारण एवं बदलते मौसम की प्रतिकूलता के प्रति सहिष्णुता के मद्देनजर संतरा देश में उगाये जाने वाले अनेक फलों के बीच एक प्रमुख फल के रूप में वर्षों से बागवानों में लोकप्रिय है। संतरे के बगीचे में उचित जल प्रबंधन एक महत्वपूर्ण घटक है। बदलते कृषि बागवानी के परिवेश में पानी एक ऐसा घटक हो गया है, जिसकी आपूर्ति दिनोंदिन घटती जा रही है। अतः जल का उचित प्रबंधन आवश्यक है। बून्द-बून्द सिंचाई इस दृष्टि से सिंचाई का अति प्रभावी तरीका है। जल प्रबंधन में पौधे के लिए जल की मांग जानना आवश्यक है। निम्न सूत्र से पौधे की जल मांग की गणना इस प्रकार की जाती हैः जल की आवश्यकता (लीटर/दिन)= पात्र वाष्पोत्सर्जन (मि.मी. प्रतिदिन) × पौधे की पंक्ति से पंक्ति की दूरी (मीटर) × पौधे से पौधे के बीच की दूरी (मीटर) × फसलगुणांक × पात्र गुणांक सिंचाई किये जाने वाले भाग का प्रतिशत। मान लिया जाये कि पात्र वाष्पीकरण = 10 मि.मी., पौधे की पंक्ति से पंक्ति की दूरी = 6 मीटर, पौधे से पौधे की दूरी = 6 मीटर, फसल गुणांक = 0.6, पात्र गुणांक = 0.7, सिंचाई किये जाने वाले भाग का प्रतिशत = 0.3 अब जल की आवश्यकता होगी = 10×6×6×0.6×0.7×0.3 = 30.24 लीटर प्रतिदिन पौधे में सिंचाई तब करनी चाहिए, जब फूलों की पंखुड़ियां झड़ गई हों एवं स्पष्ट रूप से फल मटर के छोटे दाने के आकार के बन जाएं। मेघ नहाए वृक्ष नमी संरक्षण कर संतरे के वृक्षों से अधिक उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण फल प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके लिए घास का बिछावन (मल्चिंग) बहुत ही कारगर है। मल्चिंग हेतु स्थानीय उपलब्ध घास-पफूस का प्रयोग किया जा सकता है। घास क 10-15 सें.मी. मोटी परत को संतरे के पेड़ के फैलाव में जमीन पर बिछा देना चाहिए। इससे नमी संरक्षण के अतिरिक्त ताप नियमन के साथ-साथ खरपतवार नियंत्रण, मृदा को भुरभुरी बनाए रखना, सूक्ष्मजीवों की संख्या को बनाये रखना आदि लाभ भी होते हैं। संतरे के पौधे से भी पर्याप्त मात्र में पत्तियां झड़ती हैं। संतरे के पेड़ से प्रति वर्गमीटर लगभग 100 ग्राम सूखी पत्तियां झड़ती हैं। ये पत्तियां बगीचे में पड़ी-पड़ी स्वतः सड़कर मृदा के कार्बनिक पदार्थ का रूप लेती हैं। इस तरह इसे उर्वर बनाने में योगदान करती हैं। पौधे को रखें स्वस्थ अधिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त करने के लिए संतरे के वृक्षों की समय-समय पर देखभाल अतिआवश्यक है। इसके लिए पौधों में विभिन्न प्रकार की मृदाओं के आधार पर पोषक तत्व उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। मृदा में पोषक तत्वों की उपस्थिति की जानकारी के लिए मृदा एवं पौधे में पोषक तत्वों की जांच करवा लेनी चाहिए। पौधों में पोषक तत्व उनकी बढ़वार के अनुसार समय पर दिए जाने चाहिए अन्यथा पौधों की बढ़वार धीमी पड़ने लगती है एवं उपज भी कम प्राप्त होती है। वृक्षों का उचित पोषण आवश्यक है। रोपण के समय प्रति चूना एवं नीला थोथा मिश्रित घोल से पौधा 20-25 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद या 6-8 कि.ग्रा. वर्मीकम्पोस्ट और 1.0 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फॉस्फेट डालना अनिवार्य है। रोपण के इसके बाद प्रति पौधा प्रतिवर्ष खाद एवं उर्वरक की जानकारी सारणी में दी गई है। सारणीः संतरे में खाद एवं उर्वरक की मात्र (कि.ग्रा. प्रति पेड़) खाद/उर्वरक प्रथम वर्ष द्वितीय वर्ष तृतीय वर्ष चतुर्थ वर्ष पंचम वर्ष एवं इसके बाद खाद देने का समय अम्बे बहार (फरवरी में फूल आना) मृग बहार (जुलाई में फूल आना) गोबर की खाद 15.0 30.0 45.0 60.0 75.0 दिसम्बर मई-जून यूरिया 0.125 0.250 0.375 0.500 0.625 मार्च-अप्रैल जून सुपर फाॅस्फेट 0.250 0.500 0.750 1.000 1.250 जनवरी जून म्यूरेट आॉफ पोटाश - - 0.200 0.200 0.400 जनवरी जून उर्वरकों को सक्रिय जड़ क्षेत्र में डालना अधिक लाभकारी है। उर्वरकों को तने से 30-50 सें.मी. दूर वृक्ष के वानस्पतिक फैलाव के नीचे 20 सें.मी. गहरी तथा 15 सें.मी. चाैड़े थाले में डालना चाहिए। उर्वरक प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि उर्वरक सीधे तने के सम्पर्क में न आएं तथा एक स्थान पर अधिक मात्र में न गिरें, क्योंकि इससे जड़ों को क्षति पहुचने की आशंका रहती है। उर्वरकों के प्रयोग के बाद हल्की सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। फलों की तुड़ाई एवं उपज संतरे के फलों को उचित अवस्था पर तोड़ना अत्यंत आवश्यक है। अम्बे और मृग बहार के फलों में कुल घुलनशील पदार्थ की मात्र 10 प्रतिशत एवं रस लगभग 40 प्रतिशत होना चाहिए। अम्बे बहार के फलों को परिपक्व होने में लगभग 270 दिनों एवं मृग बहार के फलों को पकने में लगभग 240 दिनों का समय लगता है। फलों की तुड़ाई कैंची की सहायता से की जाती है। हाथ से तुड़ाई करते समय फल को धीरे से घुमाकर डंठल के साथ तोड़ा जाना चाहिए। एक 8 वर्ष पुराने पूर्ण विकसित एवं स्वस्थ संतरे के पेड़ से 125-150 कि.ग्रा. तक उपज प्राप्त हो जाती है। फूलों से लद जाते हैं, संतरे के पेड़ <p">फूल आने की ऋतु में संतरे का पेड़ फूलों से लद जाता है। संतरे में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं। यह फरवरी-मार्च, जुलाई-अगस्त तथा अक्टूबर-नवम्बर में फूल आने की अवस्था में होता है। सामान्यतः इन ऋतुओं के फूलों का संतरे के उत्पादन में क्रमशः 30 प्रतिशत, 60 प्रतिशत एवं 10 प्रतिशत योगदान होता है। जिस वर्ष सर्दी ऋतु में ठण्ड अधिक पड़ती है एवं ग्रीष्म ऋतु में गर्मी अधिक उष्ण होती है। संतरे के पेड़ों में फूलों की उतनी ही प्रचुर बहार आती है। यदि समूल पेड़ पर सामान्य स्थिति में फूलों की गिनती की जाये तो प्रति एक मीटर शाख पर 800 की संख्या में फूल आते हैं। सकल रूप से देखा जाये तो एक पेड़ पर फूलों की कुल संख्या लगभग तीन लाख होती है। इन फूलों को उत्पादन के अनुकूल जलवायु एवं प्रबंधन मिल जाये, तो अधिकाधिक संख्या में फल बन सकते हैं। सामान्यतः संतरे में फल झड़न की दर 90-92 प्रतिशत होती है। यदि इतने अधिक संख्या में गिरने वाले फूलों में से कुछ फूलों को गिरने से बचा लिया जाये तो निश्चित ही संतरे के उत्पादन स्तर में बढ़ोतरी की जा सकती है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), जितेन्द्र सिंह और कल्पना चौधरी’ फल विज्ञान विभाग, उद्यानिकी एवं वानिकी महाविद्यालय, कृषि विश्वविद्यालय, कोटा परिसर, झालावाड़-326023 (राजस्थान)