<h3 style="text-align: justify;">बाजरा</h3> <h4 style="text-align: justify;">मृदा</h4> <p style="text-align: justify;">दोमट या बलुई दोमट मृदा, बाजरा की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है। भलीभांति समतल व जीवांश वाली मृदा में बाजरा की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। खेत में जल निकास का सही इंतजाम होना चाहिए, क्योंकि यह फसल ज्यादा पानी नहीं बर्दाश्त कर सकती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">बुआई</h4> <p style="text-align: justify;">बाजरे की बुआई मार्च के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">तापमान</h4> <p style="text-align: justify;">बाजरा एक पर-परागित फसल है तथा इसके परागकण 46 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी जीवित रह सकते हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">बीज की मात्रा</h4> <p style="text-align: justify;">जहां तक बीज की मात्रा की बात है, तो 4-5 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर की दर उपयुक्त रहती है। बुआई के समय पंक्तियों की आपसी दूरी 25 सें.मी. होनी चाहिए, बीजों को 2 सें.मी. से ज्यादा गहरा नहीं बोना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">प्रजातियां</h4> <p style="text-align: justify;">बाजरे की संकुल प्रजातियां जैसे-पूसा कम्पोजिट-383, आइ.सी.टी.पी.-8203, राज.-171 व आई.सी.एम.वी.-221 तथा बाजरे की संकर प्रजातियां जैसे-जी.एच.बी.-558 एवं 86,एम-52 डी.एच.-86, आईसीजीएस-44, आईसीजीएस-1, आर-9251, टीजी 37, आर-8808, जी.एच.बी.-526, पीबी.-180 आदि प्रमुख हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई</h4> <p style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन बाजरे की फसल में 4-5 सिंचाइयां पर्याप्त होती हैं। 10-15 दिनों के अंतराल से सिंचाई करते रहना चाहिए। कल्ले निकलते समय व फूल आने पर खेत में पर्याप्त मात्रा में नमी होनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मक्का</h3> <h4>निराई-गुड़ाई</h4> <p style="text-align: justify;">ग्रीष्मकालीन मक्का की खेती में निराई-गुड़ाई का अधिक महत्व है। इससे निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही ऑक्सीजन का संचार होता है, जिससे वह दूर तक फैल कर भोज्य पदार्थ को एकत्र कर पौधों को देती है। पहली निराई, जमाव के 15-20 दिनों के बाद कर देनी चाहिए एवं दूसरी निराई 35-40 दिनों बाद करनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">खरपतवारनाशी</h4> <p style="text-align: justify;">खरपतवारनाशी दवा एट्राजीन (50 प्रतिशत डब्ल्यूसी.) 1.5-2.0 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर के घुलनशील चूर्ण को 600-800 लीटर पानी में घोलकर बुआई के दूसरे या तीसरे दिन अंकुरण से पूर्व प्रयोग करने से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। दूसरे खरपतवारनाशी एलाक्लोर (50 ई.सी.) 4-5 लीटर का बुआई के तुरन्त बाद अंकुरण के पूर्व 600-800 लीटर पानी में मिलाकर भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। यदि मक्का के बाद आलू की खेती किसान को करनी हो, तो एट्राजीन का प्रयोग न करें। मक्का की फसल में शेष नाइट्रोजेन की आधी मात्रा का दो बार खड़ी फसल में टॉपड्रेसिंग के रूप में प्रयोग करें। आधी मात्रा बुआई के 25 से 30 दिनों बाद, शेष फूल आने के समय नाइट्रोजन की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">सारणी 2. <strong>मक्का की प्रजातियां </strong></p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%; height: 136px;" border="1"> <tbody> <tr style="height: 20px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;"><strong>प्रजातियां </strong></td> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;"><strong>उपज (क्विंटल/हैक्टर) छिलका सहित</strong></td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;"><strong>छिलका सहित लम्बाई (सें.मी.)</strong></td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;"><strong>बेबीकाॅन की छिलका रहित उपज</strong></td> </tr> <tr style="height: 36px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 36px;"><br /> पूसा अगेती संकर मक्का-2 </td> <td style="width: 23.6279%; height: 36px;">45.50 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 36px;">5.6 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 36px;">16.18 </td> </tr> <tr style="height: 20px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">आजाद कमल </td> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">45 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">4 .5 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">15.20 </td> </tr> <tr style="height: 20px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">प्रकाश </td> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">45.50 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">4 .5 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">16.18 </td> </tr> <tr style="height: 20px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">एच.एम.-4 </td> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">45.50</td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;"> 7.8 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">15.20 </td> </tr> <tr style="height: 20px;"> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">जी-5414 </td> <td style="width: 23.6279%; height: 20px;">50.55 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">7.8 </td> <td style="width: 23.7223%; height: 20px;">18.20</td> </tr> </tbody> </table> <h3 style="text-align: justify;">बेबीकार्न </h3> <h4 style="text-align: justify;">मृदा</h4> <p style="text-align: justify;">बेबीकार्न की खेती के लिए पर्याप्त जीवांश वाली दोमट मृदा अच्छी होती है। भलीभांति समतल एवं अच्छी जल धारण शक्ति वाली मृदा, मक्का की खेती के लिए उपयुक्त होती है। पलेवा करने के बाद मृदा पलटने वाले हल से 10-12 सें.मी. गहरी एक जुताई तथा उसके बाद कल्टीवेटर या देसी हल से दो-तीन जुताइयां करके पाटा लगाकर खेत की तैयारी कर लेनी चाहिए। बेबीकॉर्न के बिल्कुल कच्चे भुट्टे बिक जाते हैं, जोकि होटलों में सब्जी, सूप, सलाद व अचार बनाने के काम आते हैं। यह फसल 50-60 दिनों में तैयार हो जाती है और निर्यात भी की जाती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उन्नत प्रजातियों का चुनाव करें</h4> <p style="text-align: justify;">बेबीकॉर्न की संकर प्रकाश व कम्पोजिट केसरी किस्मों के बीज को एक फीट पंक्तियों में और आठ इंच पौधों में दूरी रखकर बोया जाता है। जायद के लिए बेबीकॉर्न की उन्नत प्रजातियों का चुनाव करें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="370" height="134" /></p> <h4 style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग</h4> <p style="text-align: justify;">उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण से प्राप्त संस्तुतियों के आधार पर करें। मृदा परीक्षण की सुविधा उपलब्ध न होने की दशा में संकर प्रजातियों के लिए 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश तथा संकुल प्रजातियों के लिए 60 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप) राजीव कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय और एस.एस. राठौर सस्य विज्ञान संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-11001, विनोद कुमार सिंह, निदेशक, भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, संतोष नगर, हैदराबाद।</p>