गेहूं सिंचाई गेहूं की फसल में प्रथम तथा अन्तिम सिंचाई अपेक्षाकृत हल्की करें। फसल को गिरने से बचाने के लिए बाली निकलने के बाद सिंचाई वायु की गति के अनुसार करें। समय पर बोई गई गेहूं की फसल में फूल आने लगते हैं। इस दौरान फसल को सिंचाई की बहुत जरुरत होती है। गेहूं में समय से बुआई की दर से तीसरी सिंचाई गांठ बनने (बुआई के 60-65 दिनों बाद) की अवस्था तथा चौथी सिंचाई फूल आने से पूर्व (बुआई के 80-85 दिनों बाद) एवं पांचवीं सिंचाई दुधिया (बुआई के 110-115 दिनों बाद) अवस्था में करें। पछेती या देर से बोयी गयी गेहूं की फसल में कम अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए फसल में अभी क्रांतिक अवस्थाओं जैसे-शीर्ष जड़ें निकलना, कल्ले निकलते समय, बाली आते समय, दानों की दूधिया अवस्था एवं दाना पकते समय सिंचाई करनी चाहिए। मार्च या अप्रैल में अगर तापमान सामान्य से अधिक बढ़ने लगे तो एक या दो अतिरिक्त हल्की सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। पौधों की उचित बढ़वार एवं विकास पौधों की उचित बढ़वार एवं विकास के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से पौधों की वृद्धि, जनन क्षमता एवं कार्यिकी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। भारतीय मृदा में जस्ते की औसत मात्रा एक पीपीएमके लगभग पाई जाती है। मृदा में जस्ते की मात्रा 0.5 पीपीएम से कम होने पर इसकी कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। पौधों में जस्ते की कमी की क्रांतिक मात्रा 20 पीपीएम होती है। जस्ता के प्रयोग की मात्रा जस्ता की कमी, मृदा एवं फसल के प्रकार आदि पर निर्भर करती है। खड़ी फसल में कमी के लक्षण दिखाई देने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल का छिड़काव 10 दिनों के अन्तराल पर 2-3 बार करना चाहिए। मृदा में लौह तत्व की कमी मृदा में लौह तत्व की कमी कम कार्बनिक पदार्थ वाली मृदा, चूनेदार मृदा, लोहा-पीलापन एवं क्षारीय मृदा में फसल उत्पादन में मुख्य रूप से बाधा हैं। मृदा एवं पौधों में इसकी क्रांतिक मात्रा क्रमशः 4-5 एवं 50 पीपीएम है। लौह तत्व की कमी की पूर्ति पर्णीय छिड़काव से भी की जा सकती है। गेहूं, धान, गन्ना, मूंगफली, सोयाबीन आदि में 1-2 प्रतिशत आयरन सल्फेट का पर्णीय छिड़काव, मृदा अनुप्रयोग की अपेक्षा अधिक लाभकारी पाया गया है। मृदा में अनुप्रयोग की मात्रा (20-150 कि.ग्रा./हैक्टर आयरन सल्फेट), पर्णीय छिड़काव की अपेक्षा अधिक होने के कारण यह आर्थिक रूप से लाभप्रद नहीं है। लौह तत्व की कमी को दूर करने में आयरन-चिलेट, अन्य अकार्बनिक स्रोतों की अपेक्षा अधिक लाभकारी होता है, परन्तु महंगा होने के कारण किसान इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। पर्ण झुलसा रोग यह एक जटिल रोग है, जो अल्टरनेरिया ट्रिटिसाईना, पायरेनोफोरा ट्रिटिसाई रीपेंटिस एवं बाइपोलेरिस सोरोकिनियाना द्वारा उत्पन्न होता है। इस रोग में पत्तियों पर बहुत छोटे, गहरे भूरे रंग के, पीले प्रभामंडल से घिरे धब्बे बनते हैं, जो बाद में परस्पर मिलकर पर्ण झुलसा रोग उत्पन्न करते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए खड़ी फसल में 0.1 प्रतिशत टिल्ट 25 ई.सी. (प्रॉपीकोनेजोल) का छिड़काव करें। 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से कार्बोक्सिन (वीटावैक्स 75 डब्ल्यू.पी.) रसायन के साथ बीजोपचार कर बुआई करें। इस रोग की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधी किस्में उगाएं। अनावृत कण्डुआ इस रोग में बालियों के दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है, जो सफेद झिल्ली द्वारा ढका रहता है। बाद में झिल्ली फट जाती है और फफूंदी के असंख्य बीजाणु हवा में फैल जाते हैं और स्वस्थ बालियों में फूल आते समय संक्रमण करते हैं। करनाल बंट आजकल गेहूं में टिलिशिया इण्डिका नामक कवक के कारण उत्पन्न इस रोग में थ्रेसिंग के बाद निकले दानों में बीज की दरार के साथ-साथ गहरे भूरे रंग के बीजाणु समूह देखे जा सकते हैं। अनावृत कण्डुआ एवं करनाल बन्ट के नियंत्रण के लिए थीरम 75 प्रतिशत डब्ल्यू.एस. की 2.5 ग्राम अथवा कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत, डब्ल्यूपी. की 2.5 ग्राम अथवा कार्बाक्सिन 75 प्रतिशत, डब्ल्यू.पी. की 2.0 ग्राम अथवा टेबूकोनाजोल 2 प्रतिशत, डीएस. की 1.0 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से बीज उपचार कर बुआई करनी चाहिए। मृदाजनित एवं बीजजनित रोगों के नियंत्रण के लिए जैव कवकनाशी (बायोपेस्टीसाइड) ट्राइकोडर्मा विरिडी एक प्रतिशत, डब्ल्यू.पी. अथवा ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2 प्रतिशत, डब्ल्यू.पी. की 2.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर मात्रा को 60-75 कि.ग्रा. सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिनों तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर मृदा में मिला देने से रोगों के प्रबंधन में सहायता मिलती है। अतः स्वस्थ एवं निरोगी बीज पदैा करने के लिए बाली निकलते ही 2.0 कि.ग्रा. मैन्कोजेब या 500 मि.ली. टिल्ट 25 ई.सी. (प्रॉपीकोनेजोल) को 500-600 लीटर पानी में घोलकर/हैक्टर की दर से छिड़काव करें। चूर्णी फफूंद रोग के प्रबंधन के लिए रोग सहिष्णु किस्मों का प्रयोग करें। रोग के आते ही दाने बनने की अवस्था तक 0.1 प्रतिशत टिल्ट 25 ई.सी. (प्रॉपीकोनेजोल) का पत्तियों पर छिड़काव करें। गेहूं की फसल में गेरुई या रतुआ जैसे रोग के लक्षण गेहूं की फसल में गेरुई या रतुआ जैसे रोग के लक्षण दिखाई देने पर टेबूकोनेजोल 25 ई.सी. (फोलिकर) या ट्राइडिमिफोन 25 डब्ल्य.पी. (बेलिटॉन) या टिल्ट 25 ई.सी. (प्रॉपीकोनेजोल) का 0.1 प्रतिशत का घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़काव करें। फैलाव तथा रोग के प्रकोप को देखते हुए दूसरा छिड़काव 15-20 दिनों के अन्तराल पर करें। बुआई के लिए अच्छे एवं स्वस्थ बीज का ही प्रयोग करें। उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र के लिए एच.डी. 2967, एच.डी. 3086, डब्ल्यू.एच. 1105 एच.डी.3043, एच.डी. 3059 एवं डीपी.डब्ल्यू. 621-50 आदि किस्मों का चुनाव किसान भाई करें। माहूं का प्रकोप माहूं का प्रकोप हो तथा माहूं को खाने वाले गिडारों की संख्या कम हो तो क्वीनालफॉस 25 ई.सी. का 1.0 लीटर या मोनोक्रोटोफास 25 ई.सी. 1.4 लीटर दवा या मिथाइल-ओ-डीमेटान 25 ई.सी. का 1.0 लीटर दवा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर/ हैक्टर की दर से छिड़काव करें। चूहों का प्रकोप गेहूं के खेत में चूहों का प्रकोप होने पर जिंक फॉस्फाइड से बने चारे अथवा एल्यूमिनियम फॉस्फाइड की टिकिया का प्रयोग करें। चूहों की रोकथाम के लिए सामूहिक प्रयास अधिक सफल होगा। रस चूसने वाले कीट रस चूसने वाले कीट जैसे चेंपा के लिए इमिडाक्लोरोप्रिड 200 एस.एल. या 20 ग्राम सक्रिय तत्व का छिडक़ाव खेत के चारों तरफ दो मीटर बार्डर पर करें। अधिक प्रकोप होने पर इस कीटनाशी का प्रयोग पूरे खेत में करें। जौ की फसल सिंचाई जौ की फसल में दूसरी सिंचाई गांठ बनने की अवस्था (बुआई के 55-60 दिनों बाद) में और तीसरी सिंचाई दुधिया अवस्था (बुआई के 95-100 दिनों बाद) में करें। निराई-गुड़ाई जौ की फसल में निराई-गुड़ाई का अच्छा प्रभाव होता है। कडुंवा रोग्रस्त खेत में यदि कडुंवा रोग्रस्त बाली दिखाई दे, तो उसे निकाल कर जला दें। क्षारीय एवं लवणीय मृदा क्षारीय एवं लवणीय मृदा में अधिक संख्या में हल्की सिंचाई देना, ज्यादा गहरी तथा कम सिंचाई देने की अपेक्षाकृत उत्तम माना जाता है। रतुआरोधी किस्मों का प्रयोग धारीदार या पीला रतुआ पत्तों पर पीले, छोटे-छोटे कील पंक्तियों में, बाद में पीले रंग के हो जाते हैं। कभी-कभी ये कील पत्तियों के डंठलों पर भी पाए जाते हैं। रतुआरोधी किस्मों का प्रयोग करें। काला रतुआ लाल भूरे से लेकर काले रंग के लंबे कील पत्तियों के डंठल पर पाये जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए प्रति हैकटर 2 कि.ग्रा. जिनेब (डाइथेन जेड-78) का छिड़काव करें। 500-600 लीटर घोल एक हैक्टर क्षेत्रफल के लिए काफी रहता है। सी.ए.एन. की सिफारिश जौ एवं गेहूं इत्यादि के जिन खेतों में अधिक वर्षा का पानी भर जाता है, उनमें पानी निकालने के बाद नाइट्रोजन के लिए सी.ए.एन. डालने से कुछ मात्रा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। अधिक पानी के भर जाने से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसलिए सी.ए.एन. की सिफारिश की जाती है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, राजीव कुमार सिंह, विनोद कुमार सिंह, कपिला शेखावत, प्रवीण कुमार उपाध्याय, एस.एस. राठौर और अवनि कुमार सिंह,सस्य विज्ञान संभाग एवं संरक्षित खेती और प्रौद्योगिकी, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली-110012