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अप्रैल माह के कृषि कार्य

भूमिका

अप्रैल माह जिसे गांव में चैत्र-बैशाख भी कहा जाता है, बैशाखी त्योहार के लिए मशहूर है। लहलहाती फसलें कटाई के लिए तैयार है तथा मौसम बडा ही मनमोहक एवं किसान खुशहाल दिखाई दे रहे हैं।

अप्रैल माह के प्रमुख कृषि कार्य

गेहूँ की फसल की कटाई करते हैं। और उसके बाद खेत को मूंग या चारे की फसल के लिये तैयार की जाती है।अप्रैल माह के कृषि कार्य

गन्ने में पानी देकर निदाई-गुड़ाई करते हैं। उर्वरक देते हैं।

मक्का, बरबटी, लूसन को काटकर-जानवरों को खिलाया जाता है।

अरहर, जौ, सरसों, अलसी की कटाई की जाती है।

खेत की जुताई की जाती है ताकि कीड़े मकोड़ों से पौधों की रक्षा करे।

जो फसलो की कटाई हुई है, उसे सुखाकर उड़वनी कर अनाज को अच्छे से रखते हैं। कोठी, टंकी, बारदानों को अच्छी तरह साफ करने के बाद नया अनाज उनमें रखते हैं।

आम के बगीचे में पानी देते हैं।

नींबू जातिय पेड़ों में सिंचाई बन्द रखते हैं।

केले के पौधों में चारों ओर से निकलते हुए सकर्स को निकाल दिया जाता है।

ग्रीष्मकाल के भिण्डी के बीज से बुवाई करते हैं। दूसरे खड़ी फसलों की हर सप्ताह सिंचाई की जाती है। प्याज और लहसुन की खुदाई करते हैं।

कृषि में ध्यान देने योग्य आवश्यक बातें

आज के हालात में खेती करनी है तो वैज्ञानिक ढंग  से ही करें वरना लाभ की जगह नुकसान मिल सकता है। वैज्ञानिक ढंग  आपके सदियों से चले आ रहे तरीकों का सुधरा व लाभदायक रूप है जिससे उतनी ही भूमि में कम समय, मेहनत व लागत से ज्यादा उपज मिलती है। इसके लिए आपको सिर्फ सोच बदलने की जरूरत है।

फसल चक्र योजना

विशेषकर छोटे व मझोले किसान जिनके पास भूमि कम है, अपने खेतों के लिए फसल चक्र योजना जरूर बनाऐ ताकि समय पर खाद, बीज, दवाईयां व अन्य आदान खरीद सके एवं अपनी फसल को सही भाव पर सही मंडी में बेच सकें। सही फसल चक्र से खाटों का सही उपयोग, बीमारियों व कीटों की रोकथाम तथा विशेषकर दलहनी फसलें उगाने से मिट्टी की सेहत भी बनती है। कुछ लाभदायक फसल चक्र इस प्रकार हैं।

हरी खाद (ट्रेंचा/ लोबिया, मूंग) - मक्का /धान - गेहूं। मक्का / धान - आलू गेहूं।

मक्का/ धान - आलू - ग्रीष्मकार्लोन मूंग /। धान - आलू / तोरिया - सूरजमूखी।

ग्रीष्मकालीन मूंगफली - आलू / तोरिया / मटर / चारा - गेहूं।

इसके अलावा सब्जियां व फूल भी फसल चक्र में उगा सकते है।

मिट्टी परीक्षण

अप्रैल माह में खेत खाली होने पर मिट्टी के नमूने ले लें। तीन वर्षों में एक बार अपने खेतों की मिट्टी परीक्षण जरूर कराएं ताकि मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों (नेत्रजन, फास्फोरस, पोटाशियम, सल्फर, जिंक, लोहा, तांबा, मैंगनीज व अन्य) की मात्रा तथा फसलों में कौन सी खाद कब व कितनी मात्रा में डालनी है, का पता चले का पता चले। मिट्टी परीक्षण से मिट्टी में खराबी का भी पता चलता है ताकि उन्हें सुधार जा सके। जैसे कि क्षारीयता को जिप्सम से, लवणीयता को जल निकास से तथा अम्लीयता को चूने से सुधारा जा सकता है। ट्यूबवैल व नहर के पानी की जांच भी हर मौसम में करवा लें ताकि पानी की गुणवत्ता का सुधार होता रहे व पैदावार ठीक हों।

हरी खाद बनाना

मिट्टी की सेहत ठीक रखने के लिए देशी गोबर की खाद या कम्पोस्ट  बहुत लाभदायक है परंतु आजकल कम पशु पालने के चक्कर में देशी खाद बहुत कम मात्रा में मिल रही है। इससे पैदावार में गिरावट हो रही है। देशी खाद से सूक्ष्म तत्व भी काफी मात्रा में मिल जाते हैं। अप्रैल में गेहूं की कटाई तथा जून में धान / मक्का की बीजाई के बीच ५०-६० दिन खेत खाली रहते है इस समय कुछ कमजोर खेतों में हरी खाद बनाने के लिए द्वैचा, लोबिया या मूग लगा दें तथा जून में धान रोपने से १-२ दिन पहले या मक्का बोने से १०-१७ दिन पहले मिट्टी में जुताई करके मिला दें इससे मिट्टी की सेहत सुधरती है। इस तरह बारी-बारी सभी खेतों में हरी खाद फसल लगाते व बनाते रहें। इससे बहुत लाभ होगा तथा दो मुख्य फसलों के बीच का समय का पूरा प्रयोग होगा। गेहूं - फसल पकते ही उन्नत किस्म की दरातियों से कटाई करें जिससे थकान कम होगी। फसल को गहाई से पहले अच्छी तरह सुखा लें जिससे सारे दाने भूसे से अलग हो जाए तथा फफूंद न लगे। गहाई के लिए सौसर की नाली ३ फुट से ज्यादा लम्बी होनी चाहिए जिसमें ढका हुआ हिस्सा १.५ फुट से ज्यादा हो। इससे हाथ कटने कोज्ञ दुर्घटना से बचा जा सकता हैं। सौसर चलाते समय नशीली वस्तु प्रयोग न करें, ढीले कपडे न पहने, हाथ पूरा अन्दर ना डालें, रात को रोशनी का पूरा प्रबंध रखें , फसल पूरी तरह सूखी हो, यदि सौसर ट्रैक्टर से चल रहा हो तो सारे पुर्जे ढके रहे व धुए के नाली के साथ चिंगारी-रोधक का प्रबंध करें। पास में पानी, रेत व फस्ट ऐड बाक्स जरूर रखें ताकि दुर्घटना होने पर काम आ सके। कटाई व गहाई एक साथ कंबाइन - हारवेस्टर से भी हो जाती है। गेहूं के दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाकर साफ करके व टूटे दानों को निकालकर ठंडा होने पर शाम को साफ लोहे के ढोलों में भंडारण करें। नमी की मात्रा १० प्रतिशत तक रखें ससे गेहूं में कीडा नहीं लगेगा। ऊंचे पहाडी क्षेत्र जैसे कि हिमाचल में किन्नौर जिला , काश्मीर व उत्तरांचल के सीमावर्ती जिलों में गेहूं अप्रैल में बोया जाता है तथा सितम्बर-अक्टूबर में काटा जाता है।

साठी मक्का

साठी मक्का की पंजाब साठी-१ किस्म को पूरे अप्रैल में लगा सकते है। यह किस्म गर्मी सहन कर सकती है तथा ७० दिनों मेंपककर ९ किवंटल पैदावाद देती है। खेत धान की फसल लगाने के लिए समय पर खाली हो जाता है। साठी मक्का के ६ कि.ग्रा. बीज को १८ ग्राम वैवस्टीन दवाई से उपचारित कर 1 फुट लाइन में व आधा फुट दूरी पौधों में रखकर प्लांटर से भी बीज सकते है। बीजाई पर आधा बोरा यूरिया, १.७ बोरा सिंगल सुपर फास्फेट व १/३ बोरा म्यूरेट आफ पोटास डाले। यदि पिछले वर्ष जिंक नहीं डाला तो १० कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भी जरूर डालें।

बेबी कार्न

इस मक्का के विल्कुल कच्चे भुट्टे बिक जाते है जोकि होटलों में सलाद, सब्जी, अचार, पकौडो व सूप बनाने के काम आते है। यह फसल ६० दिन में तैयार हो जाती है तथा निर्यात भी की जाती है। बेबीकार्न की संकर प्रकाश व कम्पोजिट केसरी किस्मों के १६ कि.ग्रा. बीज को 1 फुट लाईनों में तथा ८ इंच पौधों में दूरी रखकर बोया जाता है। खाद मात्रा साठी मक्का के बराबर ही है।

बसंतकालीन मूंगफली

इसकी एस जी ८४ व एम ७२२ किस्में सिंचित हालत में अप्रैल के अंतिम सप्ताह में गेहूं की कटाई के तुरंत बाद बोयी जा सकती हैं जोकि अगस्त अन्त तक या सितम्बर शुरू तक तैयार हो जाती है। मूंगफली को अच्छी जल निकास वाली हल्की दोमट मिट्टी में उगाना चाहिए। ३८ कि.ग्रा. स्वस्थ दाना बीज को २०० ग्राम थीरम से उपचारित करके फिर राइजोवियम जैव खाद से उपचारित करें। लाईनों में 1 फुट तथा पौधों में ९ इंच की दूरी पर बीज २ इंच से गहरा प्लांटर की मदद से बो सकते है। बीजाई पर १/४ बोरा यूरिया, 1 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट, १/३ बोरा म्यूरेट आफ पोटाश तथा ७० कि.ग्रा. जिप्सम डालें।

सूरजमुखी

ऊचे पर्वतीय क्षेत्रों में अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक सूरजमुखी की ई.सी.६८४१७ किस्म को बीज सकते है जो अच्छे जल निकाल वाली गहरी दोमट मिट्टी तथा अम्लीय व क्षारीय स्तर को सहन कर सकती है। ७ कि.ग्रा. बीज को भिगोकर १७ ग्राम कैप्टान से उपचारित करके २ फुट लाइनों में व 1 फुट पौधों में दूरी रखकर १.५-२ इंच गहरा बोये। बीजाई पर २/३ बोरा यूरिया व १.५ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें।

मूंग व उडद

पूसा बैशाखी मूंग की व मास ३३८ और टी ९ उर्द की किस्में गेहूं कटने के बाद अप्रैल में लगा सकते है। मूंग ६७ दिनों में व मास ९० दिनों में धान रोपाई से पहले पक जाते है तथा ३-४ क्विंटल पैदावार देते हैं। मूंग के ८ कि.ग्रा. बीज को १६ ग्राम वाविस्टीन से उपचारित करने के बाद राइजावियम जैव खाद से उपचार करके छाया में सुखा लें। एक फुट दूर बनी नालियों में १/४ बोरा यूरिया व १.५ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालकर ढक दें फिर बीज को २ इंच दूरी तथा २ इंच गहराई पर बोये। यदि बसंकालीन गन्ना ३ फुट दूरी पर बोया है तो २ लाईनों के बीच सह-फसल के रूप में इन फसलों को बोया जा सकता है। इस स्थिति में १/२ बोरा डी.ए.पी. सह-फसलों के लिए अतिरिक्त डालें।

लोबिया

एफ एस ६८ किस्म ६७-७० दिनों में तैयार हो जाती है तथा गेहूं कटने के बाद एवं धान,मक्का लगने के बीच फिट हो जाती है तथा 3 क्विंटल तक पैदावार देती है। १२ कि.ग्रा. बीज को 1 फुट दूर लाईनों में लगाएं तथा पौधों में ३-४ इंच का फासला रखें। बीजाई पर १/३ बोरा यूरिया व २ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें। २०-२५ दिन बाद पहली निराई-गुडाई करें।

अरहर

सिंचित अवस्था में टी-२१ तथा यू.पी. ए. एस. १२० किस्में अप्रैल में लग सकती है। ७ कि.ग्रा. बीज को राइजोवियम जैव खाद के साथ उपचारित करके १.७ फुट दूर लाईनों में बोयें। बीजाई पर १/३ बोरा यूरिया व २ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें। अरहर की २ लाईनों के बीच एक मिश्रित फसल ( मूंग या उडद) की लाईन भी लगा सकते है जोकि ६० से ९० दिन तक काट ली जाती है।

गन्ना

गेहूं की कटाई के बाद अप्रैल में भी लगा सकते है। इसके लिए उपयुक्त किस्म सी.ओ.एच.-३७ है। इसे दवि-पंक्ति विधि से लगाएं। फसल में 1 बोरा डी.ए.पी. तथा 1 बोरा यूरिया २-२.५ फुट दूर बनी लाईनों में डालकर मिट्टी से ढक दे फिर ऊपर ३७००० दो आखों वाली या २३००० तीन आखों वाली पोरियों (३७-४० किंवटल) को ६ प्रतिशत पारायुक्त ऐमीसान या ०.२७ प्रतिशत मेन्कोजैव के १०० लीटर पानी के घोल में ४-५ मिनट तक डुबों कर लगायें। उपचार करने वाला व्यक्ति रबड के दस्ताने पहने तथा उसके हाथ में खरोंच न हो। पहली सिंचाई ६ सप्ताह बाद करें।

शरदकालीन गन्ना

जो कि सितम्बर-अक्टूबर में बोया गया है उसमें दीमक, कनसुआ, काली सुंडी व पाइरिल्ला के प्रकोप से बचने के लिए ७०० मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ईसी को ५०० लीटर पानी में घोलकर छिडके। पाइरिल्ला की रोकथाम ३ प्रकार के परजीवी (टेट्रास्टीक्स पायरिल्ली, आयनसिटेस पेपीलोओनस तथा काली न्यूरस पाईरिल्ली ) भी प्रयोग कर सकते है।

बसंतकालीन गन्ना

यह फरवरी में लगा दें  इसमें I/३ नत्रजन की दूसरी किस्त 1 बोरा यूरिया अप्रैल में डाल दें। खेत में खाली स्थानों को पोरिया या नर्सरी में उगाएं गये पौधों से भर दें। अप्रैल में सिंचाई १० दिन के अन्तर पर करते रहे। गन्ने की २ लाईनों के बीच एक लाईन मूर्ण या उडद भी लगा सकते है जिसके लिए कोई विशेष खर्च नहीं करना पडता है।

कपास

बीजाई के लिए २१-२७ डिग्री से. तापमान सर्वोत्तम है जोकि मई में होता है परंतु बीज १६ सै. पर भी जम जाता है जोकि अप्रैल माह में मिल जाता है। टिण्डे बनने के लिए २७-३२ डिग्री सै. दिन का तापमान तथा ठंडी रातें जरूरी है जो कि सितम्बर-नवम्बर का मौसम है। गेहूं के खेत खाली होते ही कपास की तैयारी शुरू कर दै। किस्मों में ए ए एच 1, एच डी १०७, एच ७७७, एच एस ४५, एच एस ६ हरियाणा में तथा संकर एल एम एच १४४, एफ १८६१, एफ १३७८ एफ ८४६, एल एच १७७६, देशी एल डी ६९४ व ३२७ पंजाब में लगा सकते है। बीज मात्रा (रोएं रहित) संकर किस्में १.७ कि.ग्रा. तथा देशी किस्में ३ से ७ कि.ग्रा. को ७ ग्राम ऐमीसान, 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन, 1 ग्राम सक्सीनिक तेजाब को १० लीटर पानी के घोल में २ घंटे रखें। फिर टीमक से बचाव के लिए १० मि.ली. पानी में १० मि.ली. क्लोरीपाईरीफास मिलाकर बीज पर छिडक दें तथा ३०-४० मिनट छाया में सुखाकर बीज दें। यदि क्षेत्र में जडगलन की समया है तो बाद में २ ग्राम वाविस्टीन प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से सूखा बीज उपचार भी कर लें। कपास को खाद - बीज ड्रिल या प्लाटर की सहायता से २ फुट लाईनों में व 1 फुट पौधों में दूरी रखकर २ इंच तक गहरा बोये। २-३ हप्ते बाद कमजारे व बीमार पोधों को निकाल दें। विरला करने पर पोधों की संख्या २०००० प्रति एकड होनी चाहिए। बीजाई पर अमेरिकन कपास में १.७ बोरे तथा संकर किस्म में ३ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट दें। बीजाई पर सभी किस्मों में १० कि.ग्रा. जिंक सल्फेट भी डालें। देशी कपास में १/२ बोरा , अमेरिकन में ३/४ बोरा तथा संकर कपास में १८ बोरे यूरिया डालें। पहली सिंचाई जितनी देर से हो तो अच्छा है परंतु फसल को नुकसान नहीं होना चाहिए। सिंचाई डोलिया बनाकर करें इससे पानी की बचत, खरपतवार नियंत्रण तथा बरसात में जल निकास ठीक रहता है। हर १७ दिन बाद खेतों का कीडों के लिए निरिक्षण करें।

आलू

अधिक ऊंचाई वाले पहाडी क्षेत्रों में आलू अप्रैल के पहले पखवाडे में लगा सकते हैं। इसके लिए झुलसा रोग-रोधक कुफरी ज्योति किस्म का रोगरहित बीज लें। आलू अच्छे जल निकास वाले भूमि में ही लें। बीजाई पर 1 लीटर क्लोरपाइरीफास ३७ ई.सी. को १० कि.ग्रा. रेत में मिलाकर खेत में छिडके इससे कटुआ, सफेद सुंडी व दीमक पर नियंतत्र रहेगा। बीजाई के लिए ढलान के विपरीत १० इंच दूरी पर नालियां बनाएं तथा १० टन गोबर की खाद, 1 बोरा यूरिया, 9 बोरे सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 बोरा पोटाशियम सल्फेट डालकर मिट्टी से ढक दें फिर आलू के बीज के मध्यम आकार के १०-१२ किवंटल २-३ आंख वाले टुकुडों को ०.२७ प्रतिशत एमिसान-६ के घोल में ६ घंटों तक डुबोकर ८-१० इंच दूरी पर लगाकर मिट्टी से ढक दें। खरपतवार नियंत्रण के लिए बीजाई के ४८ घंटों के अन्दर ७०० ग्राम आइसोप्रोटान ७७ प्रतिशत पाउडर ३०० लीटर पानी में घोलकर खेत पर छिडक दें। बारानी क्षेत्रों में नमी बनाये रखने के लिए सूखी घास खेतों पर बिछा दें। रोगग्रस्त पोधों को निकालते रहे तथा निराई-गुडाई करके पोधों पर मिट्टी चढ़ा दें।

चारा फसलें

अप्रैल माह में बोया चारा गर्मीयों व बरसात में चारे की कमी नहीं आने देता।

ज्वार

जे.एस.२०, एस.सी.१७१ स्वीट सुडान घास ७९-३, एच सी २६० व ३०८ किस्में, २०० किवंटल हरा चारा तथा ७५ क्विंटल सूखा चारा देती है। ज्वार का २०-२४ कि.ग्रा. बीज तथा सूडान घास का १२-१४ कि.ग्रा. बीज को १० इंच के फासले पर लाइनों में बोये। बीजाई पर 1 बोरा यूरिया व 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट दें। सिंचित हालत में १/२ बोरा यूरिया बीजाई के 1 माह बाद फिर दें तथा सुडान घास में हर कटाई के बाद १/२ बोरा यूरिया डालें।

बाजरा

इसमें एच एच बी -७०, ६०, ६७,६८९४ , पी सी बी १४१, एच सी ४ व १०, डब्ल्यू सी सी ७७ के ३-४ कि.ग्रा. बीज 1 फुट दूर लाईनों में बीजे। बाजरा के साथ लोबिया का ७ कि.ग्रा. बीज मिलाकर भी बो सकते है। तथा 1 बोरा यूरिया बीजाई व आधा बोरा यूरिया एक महीने बाद डाले इससे ५०-५५ दिन बाद १६० क्विंटल चारा मिला जायेगा ।

लोबिया

लोबिया ८८ उन्नत किस्म है तथा ११०-१५० क्विंटल हरा चारा ५०-५५ दिनों में देती है। २७ कि.ग्रा. बीज को 1 फुट दूर लाईनों में बोयें। १७ कि.ग्रा. लोबिया और १७ कि.ग्रा. मक्का को मिलाकर भी बो सकते है। बीज को २ ग्राम वाविस्टिन प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित करें। बीजाई के साथ १/३ बोरा यूरिया व ३ बोरे सिंगल सुपर फासफेट डालें।

ग्वार

ग्वार-८०, एफ.एस-२२७,एच.एफ.जी-११९, एच.एफ.जी-१७६ किस्में ७०-९० दिन में ११०-१४० क्विंटल हरा चारा देती है। सिंचित क्षेत्रों में बीजाई पर आधा बोरा यूरिया व 3 बोरे सिंगल सुपर फासफेट डालें।

संकर हाथी घास

नेपियर बाजरा संकर-२१, पी.वी.एन-२३३ व ८३ किस्में १००० किवंटल चारा पूरे साल भर देती है। इसे जडों या तनों के टुकडों दवारा लगाया जाता है। २० इंच लम्बे २-३ गाठों वाले ११००० टुकडे २.७ फुट लाईनों में तथा २ फुट दूरी पोधों में रखें। रोपाई से पहले २० टन गली-सडी गोबर की खाद 9 बोरे सिंगल सुपर फासफेट तथा १.५ बोरे यूरिया डालें। हर कटाई के बाद १.५ बोरे यूरिया डाले।

मक्का

किस्म जे-१००६ उन्नत है जोकि ५०-६० दिन बाद १६७ किवंटल हरा चारा देती है। इसके ३० कि.ग्रा. बीज को 1 फुट दूर लाईनों में बोये तथा एक बोरा यूरिया, 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट व १/३ म्यूरेट आफ पोटास डालें।

बागवानी

नीबू में 1 वर्ष के पोधे के लिए २ कि.ग्रा. कम्पोस्ट तथा ७० ग्राम यूरिया प्रति पौधा दें। यह मात्रा आयु के हिसाब से गुणा कर दें। परंतु १० या अधिक वर्ष के पोधे को सिर्फ १० गुणा ही दें। अप्रैल में नीबू का सिल्ला, लीफ माइनर और सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए ३०० मि.ली. मैलाथियान ७० ईसी. को ७०० लीटर पानी में घोलकर छिडके। तने व फलों का गलना रोग के लिए बोडों मिश्रण (4:4:50 का छिडकाव करें। जस्ते की कमी के लिए ३ कि.ग्रा जिंक सल्फेट को १.७ कि.ग्रा. बुझा हुआ चून के साथ ५०० लीटर में घोलकर छिड़कें।

अंगूर - नई लगाई वेलों में १७० ग्राम यूरिया तथा २७० ग्राम पोटाशियम सल्फेट प्रति वेल दें। पुरानी वेलों की मात्रा आयु के अनुसार गुणा कर दें। सिाप, हरा तेला, पत्ता लपेट सुण्डी व पत्ते खाने वाली वीटल की रोकथाम के लिए ७०० मि.ली. मैलाथियान को ७०० लीटर पानी से १०० वेलों पर छिडकें।

आम - फलों को गिरने से बचाने के लिए यूरिया के २ प्रतिशत घोल से पेड पर छिडकाव करें। मीलीबग नई कोपलों, फूलों व फलों का रस चूसकर काफी नुकसान करती है। नियंत्रण के लिए ७०० मि.ली. मिथाईल पैराथियान ७० ई.सी. को ७०० लीटर पानी में छिडके तथा नीचे गिरी या पेडो पर चढ़ रह कीडो को इकट्ठा करके जला दें तथा घास वगैरा साफ रखें। यदि तेला (हापर) फूल पर नजर आये तो ७०० मि.ली. मैलाथियान ७० ई.सी. ७०० लीटर पानी में छिडके। ब्लैक टिप रोग से फल बेढगे व काले हो जाते है इसके लिए बोरेक्स ०.६ प्रतिशत का छिडकाव करें।

अमरूद - अप्रैल में सिंचाई न करें, फूलों को तोड दें ताकि फल मक्खी फूलों में अण्डे न दें पाये जिससे फल सड जाते है। अमरूद की सिर्फ शरदकालीन फसल ही लेनी चाहिए। बेर - बीजों को अच्दी तरह तैयार की गई क्यारियों में बोये। पौध सितम्बर तक तैयार हो जाएगी। अच्छी किस्में सिंधूरा, नारनौल, सेव, गोला, कैथली व उमरान है।

लीची - १०० ग्राम यूरिया प्रति पेड प्रति वर्ष आयु के हिसाब से डालें।

आडू - अप्रैल में १०० ग्राम यूरिया प्रति पेड प्रति वर्ष आयु के हिसाब से डालें।

पपीता - अप्रैल मे पपीते की नर्सरी लगाने के लिए ४० वर्ग मीटर में १७० बीज को ६ x ६ इंच की दूरी तथा 1 इंच गहरा लगाएं। उन्नत किस्मों में सनराइज, हनीडयु, पूसा डिलीशियस, पूसा डर्वाफ व पूसा जांयट है एक नर्सरी में १ क्विंटल खाद मिलाकर बेड तैयार करें और बीज को १ ग्राम कैपटोन से उपचारित करें , जब पौधा उग आये तो ०.२ प्रतिशत कैपटोन से स्प्रे करने से  पौध अर्द्धगलन से बच जाएगी।

तरबूज - तरबूज में कीडों के लिए २ मि.ली. मैलाथियान प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडके। पाऊडरी मिल्डयु बीमारी के लिए २ ग्राम वाविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडके। दवाई छिडकने से पहले फल तोड लें या फिर १० दिन बाद तोड़े।

फूल

उगाने के लिए खेत तैयार कर धूप लगाएं ताकि कीड़े तथा बीमारियों की रोकथाम हो। गेंदा - के पौधे अप्रैल शुरू में लगा सकते है ताकि गर्मियों में फूल मिल सकें। गेदां के फूलों की मंदिरों, शादी तथा अन्य सजावटों में बहुत मांग होती है। गेंदा उगाना सबसे आसान कार्य है। इसके फूल कई दिनों तक खराब नहीं होते। इस फसल में बीमारी भी नहीं लगती। गुलाब - के फूल ग्रीष्म तथा सर्दी दोनों मौसमों में आते हैं तथा होटल व्यवसाय में इनकी बहुत मांग है। पहाडी क्षेत्रों में गुलाब की कटाई-छटाई के बाद २ बोरा यूरिया, ४ बोरा सिंगल सुपर फासफेट तथा 1 बोरा म्यूरेट आफ पोटाश के साथ २-३ टन कम्पोस्ट खेतों में डालें। अप्रैल में नए गुलाब के पोधे भी लगा सकते हैं। गूलाब के लिए अच्दी जल निकास वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। बाकी फूल - बालसम , डैजी, डाइएनयस, पारचुलका, साल्विया, सनफल्वार, बरवीना, जीनिया इत्यादि फूल घर सजावट के लिए गमलों या क्यारियों मे लगा सकते है।

औषधीय फसलें

आमदनी बढ़ाने के लिए ये फसले बहुत लाभदायक हैं। इनका दवाईयों में, शराब , खुशबू तथा सौंदर्य पदार्थों में प्रयोग होता है। मैंथा - सिंचित हालात में मैथा अप्रैल में लगाया जा सकता है। इसे इन फसल चक्रों में आसानी से लगाया जा सकता है मैंथा-आलू , मैंथा-तोरिया, मैंथा-जई तथा मैंथा -गेहूं-मक्काआलू। गन्ने के दो लाईनों के बीच भी 1 लाईन मैंथा लगा सकते है। उन्नत किस्मों में पंजाब सपीरमिट-१, रसीयन मिंट, मास-१ को अच्छी जल निकाल वाली दोमट दोष रहित भूमि में उगाया जा सकता है। बीजाई के लिए 1 क्विंटल जड के टुकडों को ०.१ प्रतिशत कार्बडेजियम ५० पाउडर घोल में ५-१० मिनट तक डुबोकर १.७ फुट दूरी पर २ इंच गहरी नालियों में दबा दें तथा सिंचाई करें। बीजाई से पहले १०-१७ टन कम्पोस्ट, १/३ बोरा यूरिया, २ बोरा सिंगल सुपर फासफेट डालें बाकी यूरिया (१/३ बोरा) ४० दिन बाद तथा इतनी ही यूरिया पहली कटाई व उसके ४० दिन बाद डालें। फसल से साल में २ कटाईया एक जून तथा दूसरी सितंबर में मिलती है। हल्दी - फसल को गर्म तथा नमी वाला मौसम चाहिए। अप्रैल में ६-८ क्विंटल हल्दी के बराबर कंद लेकर लाईनों में 1 फुट तथा पौधों में ८ इंच दूरी पर लगाएं। बीजाई पर १० टन कम्पोस्ट, 1 बोरा सिंगल सुपर फास्फेट तथा १/२ बोरा सल्फेट आफ पोटाश डालें। बीजाई हल्की तथा जल्दी करें। गोडाई भी करें। फसल नवम्बर माह में पीली पड़ जाने पर कंदों को खोद कर निकाल लें , इसमें लगभग ६०-८० क्विंटल पैदावार मिल जाती है। अदरक- अदरक के ४-६ किलोग्राम कंद १.५ फुट लाईनों में व 1 फुट पौधों में दूरी पर लगाएं। बीजाई पर १० टन कम्पोस्ट, 1 बोरा यूरिया, 1 बोरा डी ए पी तथा 1 बोरा पोटाशियम सलफेट बीजाई पर डालें तथा 1 बोरा यूरिया जून में गुडाई पर दें।

सब्जियां

चुलाई - की फसल अप्रैल में लग सकती है। जिसके लिए पूसा किर्ती व पूसा किरण ५००-६०० कि.ग्रा. पैदावार देती है। ७०० ग्राम बीज को लाइनों में ६ इंच तथा पौधों में 1 इंच दूरी पर आधी इंच से गहरा न लगाएं। बीजाई पर १० टन कम्पोस्ट, आधा बोरा यूरिया तथा २.७ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट डालें। चुलाई की कटाइयां मई से लेकर अक्टूबर तक मिलेंगी। हर कटाई के बाद १/४ बोरा यूरिया डाले व सिंचाई करें।

मूली - की पूसा चेतकी किस्म का 1 कि.ग्रा. बीज 1 फुट लाइनों में तथा ४ इंच पौधों में दूरी रखें तथा आधा इंच से गहरा न लगाएं। बीजाई पर आधा बोरा यूरिया, 1 बोरा सिंगल सुपर फासफेट तथा आधा बोरा म्यूरेट आफ पोटाश के साथ १० टन कम्पोस्ट डालें। फसल में जल्दी-जल्दी हल्की सिंचाईयां करें। फसल मई में तैयार होकर १००० कि.ग्रा. से अधिक पैदावार देती है।

ग्वार - फलियों के लिए पूसा सदावहार, पूसा मौसमी व पूसा नववहार किस्में अप्रैल में लगा सकते है। ८-१० कि.ग्रा. बीज को १.५ फुट दूर लाईनों में लगाएं तथा बीजाई पर १/३ बोरा यूरिया व २.७ बोरे सिंगल सुपर फास्फेट दें। फलियां सब्जी के लिए जून में तैयार मिलती है।

ककडी, लौकी, कछू, टमाटर, बैगन, टिंडा व मिंडी - इनकी खडी फसलों पर यदि हरा तेला दिखाई दे तो फल तोडकर ०.१ प्रतिशत मैलाथियान ७० ईसी का घोल फसल पर स्प्रे करें। यदि झुलसा रोग दिखाई दे तो जाइनेव २ ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडके। तना व फली छेदक के लिए २ मि.ली. एण्डोसल्फान ३७ ईसी 1 लीटर पानी में घोलकर छिडके।

बैगन - मैदानी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च में लगाई नर्सरी अप्रैल में रोपी जा सकती है। पूसा भैरव व पूसा पर्पल लोग किस्में उपयुक्त हैं। पहाडी क्षेत्रों में पूसा पर्पल कलस्टर किस्म अप्रैल में रोपने से बढिया उपज देती है।

फूल गोभी, बंदगोभी, गांठगोभी, मटर, फ्रांसबीन व प्याज - पहाडी व सर्द क्षेत्रों में अप्रैल माह में ये सभी फसलें लगाई जाती हैं।

प्याज की नर्सरी लगाकर जून माह में खेत मे रोपी जा सकती हैं। मशरूम - खुम्ब बहुत कम स्थान लेती है तथा काफी आमदनी देती है। इसे उगाने के लिए गेहूं के भूसे या धान के पुआल का प्रयोग करें। हल्के भीगे पुआल में खुम्ब के बीज डालने के ३-४ हपते बाद खुम्ब तोडने लायक हो जाती है।

स्रोत: जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची



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