অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

टमाटर की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं

टमाटर की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं

टमाटर की जैविक खेती की तैयारी

मिट्टी

टमाटर की जैविक खेती के लिए आमतौर पर जंगल की मिट्टी 1 भाग + रेत 1 भाग तथा गली सड़ी खाद 1 भाग का मिश्रण तैयार किया जा सकता है जिसमें पानी सोखने की क्षमता अच्छी होती है।

क्यारी का आकार

क्यारी लगभग 1 मी. चौड़ी तथा 6 इंच ऊंची होनी चाहिए, लम्बाई जरूरत के अनुसार रखें। क्यारी जो 3 मी. लम्बी, एक मी. चौड़ी तथा 6 इंच ऊंची आकार की हो, में 20-25 कि.ग्रा. गली सड़ी गोबर की खाद तथा 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट मिलायें। क्यारी सीधी तथा समतल रखें ताकि बीच में पानी खड़ा न हो।

मिट्टी का उपचार

(क) सौर ऊर्जा द्वारा

सौर ऊर्जा से भूमि को रोगाणुरहित करने की इस तकनीक में भूमि को गर्मियों में सफर पारदर्शी पॉलीथिन से ढके, जिससे सौर ऊर्जा संचित होती है तथा भूमि का तापमान बढ़ने से इसमें उपस्थित रोगाणु या तो निष्क्रिय हो जाते हैं या मर जाते हैं। सौर ऊर्जा से भूमि के तापमान में वृद्धि भूमि के सामान्य तापमान की अपेक्षा 5 सें.मी. गहराई पर 10-12 सैल्सियस तक और इससे भी अधिक दर्ज की गई है। यह तकनीक भूमिजनित फफूद जैसे कि फ्यूजेरियम, राइजोक्टोनिया तथा स्क्लैरोशियम आदि के बीजाणुओं को 40 दिनों में सौर ऊर्जा उपचार से पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।

(ख) फार्मलीन विधि द्वारा

मिट्टी का उपचार फार्मलीन 1 भाग को 7 भाग पानी में मिलाकर 8-10 लीटर मिश्रण प्रति वर्ग मीटर में डालें तथा उसे पॉलीथिन की चादर से 7 दिनों तक ढक कर रखें। इसके बाद चादर को हटाकर समय-समय पर मिट्टी को हिलाते रहें। यह क्रिया तब तक करें जब तक दवाई की गंध इसमें न रहे, अन्यथा बीज के अंकुरण पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।

बिजाई का ढंग एवम् क्यारी की देखभाल

उपचारित बीज को पंक्तियों में 5 सें.मी. की दूरी पर बोये तथा पंक्तियों को मिट्टी तथा गोबर के मिश्रण से ढके। बिजाई के तुरन्त बाद क्यारी को सूखी घास से ढक लें। मौसम के अनुसार एक या दो बार सिंचाई करें। क्यारी में घनी बिजाई न करें तथा अधिक पानी भी न दें अन्यथा पौधों में कमर तोड रोग फैलने की संभावना रहती है। जब पौधे 8-10 सैं.मी. लम्बे हो जाये तो पंचगव्य के घोल का छिड़काव करें, जिससे पौधों में हरापन ज्यादा रहता है। समय पर खरपतवार निकालते रहें तथा हल्की गुड़ाई के बाद अवांछनीय पौधों को निकाल दें। 4-6 सप्ताह में जब पौधे 10-15 सें.मी. ऊंचे हो जाते हैं तो पौधों में पानी देना कम कर दें तथा जिस दिन पौधों का रोपण करना हो उससे 1-2 घंटे पूर्व खूब पानी दें ताकि पौध बिना जड़ टूटे सरलता से उखाड़ी जा सके। रोपण शाम के समय कर एकमद सिंचाई करें। जब तक पौधे अच्छी तरह स्थापित न हो जायें, हर रोज सिंचाई करें।

प्रोट्रेज में पौध तैयार करना

टमाटर की पौध तैयार करने के लिए प्लास्टिक ट्रे जिसमें 3 इंच सुराख हो लें तथा इन्हें दो प्रकार के मिश्रणों से भरा जा सकता है। पहला जिसमें एक भाग गली सड़ी गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट तथा एक भाग कोकोपीट हो, दूसरा जिसमें तीन भाग कोकोपीट | एक भाग केचुआ खाद तथा एक भाग वर्मीकुलाईट हो। ट्रे के एक-एक छिद्र में एक ही उपचारित बीज डालें। इन मिश्रणों के प्रयोग से पौधों में विभिन्न प्रकार के मिट्टी जनित रोग नहीं लगते तथा पौध स्वस्थ तथा सुदृढ़ बनती है। रोपण के बाद पौधे मरते नहीं तथा फसल उपज जल्दी तथा अधिक निकलती है।

नर्सरी लगाना

सबसे पहले टमाटर की पौध तैयार की जाती है। नर्सरी बिजाई का उचित समय निम्न है-

  • निचले पर्वतीय क्षेत्र - जून- जुलाई (बारानी क्षेत्र)

नवम्बर - फरवरी (सिंचित क्षेत्र)

  • मध्य पर्वतीय क्षेत्र -   फरवरी-मार्च (सिंचित अवस्था)

मई-जून (आंशिक सिंचित बारानी)

  • ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र - रोपण योग्य पौध को निचले क्षेत्रों में तैयार करना तथा अप्रैल-मई में स्थानांतरण करना।

बीजों में अंतराल (नर्सरी)

बीजों की बुआई लगभग 5 सें.मी. गुणा 2 सें.मी. के अंतराल पर और 0.5 सें.मी. से 1 सैं.मी. की गहराई पर की जानी चाहिए। पानी लगाने के बाद क्यारियों को नमी बरकरार रखने के लिए घास और सूखी टहनियों से ढक देना चाहिए। ऐसा करने से कीटों और रोगों को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।

पौध को संसाधित करना

पौध को चूषक कीटों जैसे सफेद मक्खी (वाइट फ्लाई) और कीटों से बचाव के लिए 15 दिन पुरानी पौध पर नीम के साबुन का छिड़काव (7 ग्रा0 /लीटर) किया जाता है। प्रतिरोपण (बुआई से 20 दिन बाद) से 2-3 दिन पूर्व पानी में थोड़ी कमी कर और प्रतिरोपण से 1-2 दिन पूर्व उन्हें सीधे धूप के संपर्क में लाकर पौध को सख्त किया जाता है। खेत में प्रतिरोपण से 12 घंटे पूर्व पौध को अच्छी तरह पानी दें। एक अच्छी पौध मजबूत और 4 से 5 पत्ते (लगभग 4 सप्ताह पुरानी) वाली होती है। पत्तों के रोगों से बचाव के लिए पौध को प्रतिरोपण से पूर्व सुडोनोमास फ्लोरोसेन्स (10 ग्रा0 /लीटर) में भिगोया जाता है। टमाटर की नर्सरी पौध की जड़ को 15-30 मिनट तक हींग के घोल (एक बर्तन में 5 लीटर पानी में लगभाग 100 ग्राम हींग मिलाएं और अच्छी तरह हिलायें) में डुबोएं और मुरझाने संबंधी मृदा जनित रोग कारकों से बचाव के लिए पौध को मुख्य खेत में प्रतिरोपित करें।

मृदा की उर्वरकता का प्रबंधन

दाल/फलीदार जैसी दलहनी परिवार की फसलों के साथ आवर्तन से मृदा में नाइट्रोजन की स्थिति समृद्ध होती है। आखिरी बार जुताई करते समय 8-10 टन प्रति हैक्टेयर के हिसाब से लगभग 40 टन भली भांति अपघटित गोबर की खाद अथवा वर्मी कम्पोस्ट/कम्पोस्ट खाद का प्रयोग किया जाता है। खाद के 500 ग्रा0 प्रति टन की दर से ट्राईकोडर्मा के साथ गोबर की खाद का प्रयोग किया जा सकता है। 1 मीटर के अंतराल पर मेंढ़ और नाली बनाई जाती है और मेंढ़ बनाते समय और प्रतिरोपण के 7 सप्ताह बाद भी 250 कि0ग्रा0/है0 के हिसाब से नीम की खली का प्रयोग किया जाता

प्रतिरोपण और अंतराल (मुख्य खेत)

अच्छी वायु प्रवाह और पर्णीय रोगों को तेजी से फैलाव को न्यूनतम करने के लिए टमाटर की जैविक खेती के लिए 60 सें.मी. X 45 सें.मी. बौनी किस्मों के लिए तथा 90 सैंमी. x 30 सें.मी. ऊंची किस्मों के अंतराल की सिफारिश की जाती है। पॉली हाऊस में पंक्तियों की दूरी 70-90 सें.मी. रखी जाती है।

सिंचाई और पानी की आवश्यकता

प्रतिरोपण के तत्काल बाद, फूल आने के दौरान और फल के विकास होने के दौरान टमाटर पानी की कमी के प्रति सर्वाधिक संवेदी होता है। फसल की अच्छी बढ़ौतरी के लिए, सही समय पर नालियां बनाना तथा ड्रिप सिंचाई प्रभावी होती है।

प्रात:काल मुरझाने से पता चलता है कि फसल की सिंचाई की जानी चाहिए। शुष्क मौसम के दौरान प्रतिरोपण के बाद पहले 3-4 दिन के अंतराल पर सिंचाई और तदोपरांत फसल तैयार होने तक 5-7 दिन के अंतराल पर सिंचाई की जानी चाहिए।

कांट-छांट तथा सहारा देना

लम्बी किस्मों में अधिक ऊंचाई के कारण सहारे की आवश्यकता होती है जिसके लिए तने की सतह से पौधों को प्लास्टिक की सुतली या रस्सी से सहारा दिया जाता है। टमाटर के पौधे में मुख्य तने ही रखें तथा इनमें निकलने वाली अन्य शाखाओं को समय-समय पर निकालते रहें।

पौधों को सहारा देने से फल मिट्टी और पानी के सम्पर्क में नहीं आते जिससे वे सड़ने वाले रागों से बचे रहते हैं। इस क्रिया से प्रति वर्ग मी. ज्यादा पौध भी रोपी जा सकती है, जिससे उत्पादन में भी वृद्धि रहती है।

परंपरागत विधियां और खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार हाथ द्वारा खरपतवार निकालने से मृदा ढीली हो जाएगी। निराई प्रतिरोपण के बाद तीसरे और सातवें सप्ताह में की जा सकती है। दूसरी निराई के दौरान मृदा से उखाड़ा जा सकता है। खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए फसल चक्र अपनाएं, फसल को ढके और पलवार (मल्चिंग) करें। पंक्तियों में, मल्चिंग बनाकर खरपतवार को नियंत्रित कर सकते हैं। ये तिनके अथवा निराई गई घास से जैविक मल्च भी हो सकती है I

फसल की सुरक्षा

कीट प्रबंधन

टमाटर की फसल को बहुत से नाशी कीट जैसे कटवा कीड़ा, फल छेदक, फल मक्खी, माईट, सफेद मक्खी, सुरंगी कीड़ा, जड़ गांठ, सूत्रकृमि इत्यादि हानि पहुंचाते हैं, जो टमाटर की पैदावार ही कम नहीं करते बल्कि इसकी गुणवत्ता पर भी प्रभाव डालते हैं। टमाटर में लगने वाले नाशी कीटों का वर्णन नीचे दिया गया है I

कटवा कीड़ा

 

इस कीट का प्रकोप टमाटर के पौधे रोपने के कुछ दिनों बाद ही शुरू हो जाता है। विशेषकर मार्च व अप्रैल में इसका प्रकोप अधिक होता है। इस कीट की सुंडियां बड़े आकार तथा भूरे रंग या गहरे रंग की होती हैं। इन सुंडियों के प्रौढ़ गहरे भूरे या गेहूं रंग के आकार के होते हैं जो कि लगभग 5-6 सै.मी. के आकार के होते हैं। इनके पंख हल्के सफेद रंग के होते हैं।

रोकथाम

क्योंकि इस कीट की सुंडियों मिट्टी के अंदर रहती हैं इसलिए इससे बचाव के लिए पूर्ण रूप से गली-सड़ी खाद का प्रयोग करना चाहिए।

  • खेत को तैयार करते समय मिट्टी को जीवामृत से उपचारित करें।
  • जहां प्रकोप अधिक दिखाई दें वहां नीम, तेल का छिड़काव करें। ।
  • जिस खेत में प्रत्येक वर्ष टमाटर लगाए जा रहे हों वहां रोपित सब्जियों का चक्र न अपनाएं।

फल छेदक

यह टमाटर का मुख्य कीट है। इसके पतंगे मोटे व पीले भूरे रंग के होते हैं, जबकि पीछे के पंख हल्के भूरे सफेद रंग के होते हैं। इस कीट की सुंडियां हल्के भूरे रंग या गुलाबी रंग की होती हैं, जिनके शरीर के दोनों तरफ लंबाई की ओर दो भूरे रंग की लाइनें होती हैं। इस कीट के अंडे छोटे, गोल तथा हल्के पीले रंग के होते हैं। यह कीट मार्च-अप्रैल में सक्रिय होता है और प्रौढ़ रात्रि में प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। इस कीट की मादा टमाटर के ऊपर के पत्तों पर नीचे की तरफ या ऊपर की तरफ अंडे देती हैं, जिनमें से सुंडियां निकलकर पत्तों को छिलने लगती हैं। अधिक प्रकोप की अवस्था में 70-80 प्रतिशत फसल को नुकसान पहुंचता है।

रोकथाम

  • जब टमाटर में फूल आ रहे हों तो उस समय बेसिलस थूरिनजैन्सिस वार कुर्सटाकी 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें और 15 दिन बाद पुन: छिड़काव करें।

फल मक्खी

फल मक्खी का नियंत्रण करना काफी मुश्किल है। यह पंख वाली व मध्यम आकार की होती है। इसका शरीर हल्के भूरे रंग का होता है तथा दोनों पंखों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे होते हैं। प्रौढ़ के पैर हल्के पीले रंग के होते हैं, जबकि सुंडियां हल्के सफेद रंग की तथा बिना पैर वाली होती हैं। इस मक्खी की मादा टमाटर में डंडी वाले स्थान पर या उसके आसपास अंडे देती है। इस कीट की सुंडियां ही नुकसान पहुंचाती हैं जो कि टमाटर के अंदर घुसकर उसके गूदे को खाती हैं, जिससे फल सड़ जाता है और बाद में जमीन में गिर जाता है।

रोकथाम

  • जून- जुलाई में वर्षा शुरू होने पर इस कीट के प्रौढ़ दिखाई देने लगते हैं।
  • रोगग्रस्त फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें तथा जमीन में 10-15 सें.मी. गहराई में दबा देना चाहिए।
  • नीम, तेल का छिड़काव भी इसके प्रकोप को कम करता है।

माईट

इस नाशी जीव के प्रौढ़ बहुत छोटे, हल्के रंग के या हल्के पीले रंग के होते हैं तथा शरीर के पृष्ठ भाग में दो धब्बे होते हैं। यह जीव पत्तों पर मकड़ी की तरह जाला बनाता है।

रोकथाम

  • इस कीट की रोकथाम के लिए नीम के बीजों को पीसकर पाउडर बनाकर पानी | में घोलकर तथा इस घोल को कपड़े से छानकर पांच प्रतिशत के हिसाब से पानी में घोल बनाकर 10 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।

सफेद मक्खी

यह कीट बहुत छोटा होता है, जिसके चारों पंख सफेद होते हैं। निम्फ बहुत ही छोटे तथा पत्तों के निचले भाग में चिपके होते हैं। प्यूपा के शरीर में विशेष प्रकार की संख्या में बाल होते हैं। इस कीट के प्रौढ़ तथा निम्फ दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा यह कीट चीनीनुमा पदार्थ भी छोड़ता है, जिससे सारा पत्ता चिपचिपा हो जाता है। और इससे बीमारियां पैदा हो जाती हैं, जो कि बाद में पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्रिया को हानी पहुंचाती है।

रोकथाम

  • इस कीट की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम (1-3 मि.ली. प्रति लीटर पानी) | का छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करें।
  • पीले ट्रेप्स का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

सुरंगी कीड़ा

 

यह दो पंखों वाला बहुत छोटा कीट है, जिसके पृष्ठ भाग का रंग पीला होता है तथा पीठ के ऊपर पीला धब्बा होता है। यह पत्तों में सुरंगें बनाते हैं जो कि कीट की विशेष पहचान है। मादा पत्ते के अंदर अंडे देती है, जिसमें से कुछ दिनों बाद सुंडियां निकलती हैं जो पत्तों में सुरंग बनाती हैं और यह पत्तों के अंदर जाकर पत्तों का हरा पदार्थ चूस लेती हैं, जिससे क्लोरोफिल बनने की क्रिया कम हो जाती है और पौधा कमजोर होता रहता है, जो पैदावार पर बुरा असर डालता है।

रोकथाम

इस कीट की रोकथाम के लिए पौधों पर नीम (1-3 मि.ली. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर करें।

जड़ गांठ सूत्रकृमि

 

जड़ गांठ सूत्रकृमि टमाटर के पौधों को तीन प्रकार से भारी नुकसान पहुंचाते हैं -

  • पौधों की कोशिकाओं से अपना भोजन प्राप्त करके।
  • जड़ों की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करके।

सूत्रकृमि द्वारा किए गए जख्मों हानिकारक फफूद, जीवाशु इत्यादि सूक्ष्म जीव आसानी से प्रवेश कर जाते हैं।

सूत्रकृमि अक्सर जड़ों पर पलते हैं। जिससे जड़े मिट्टी से जरूरी तत्व व पानी नहीं ले पाती और पौधों के ऊपरी भागों पर कई तरह के विकार पैदा हो जाते हैं। जैसे कि -

  • पौधों की बढ़ौतरी रूकना।
  • पत्तियों का पीला पड़ना।
  • शाखाओं का कम निकलना।
  • खेतों में टुकड़ों में पीले छोटै छितराए पौधे दिखना।
  • फूल व फलों के लगने में कमी आना।
  • पौधों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना।

रोकथाम

  • खेतों की 2-3 बार जुताई करने के बाद 15-20 दिनों के लिए धूप में खुला छोड़ दें, जिससे सूत्रकृमि ऊपर आकर धूप की गर्मी से मर जाते हैं।
  • यदि जुताई के बाद खेतों को पॉलीथिन की चादर से 3-6 सप्ताह ढककर रखें तो भी बेहतर नियंत्रण होगा।
  • टमाटर की फसल के बाद खेतों में लहसुन, प्याज, तिल, बाथू, मक्की, पालक एवं गेंदे या गुलदाऊदी फसलें लगाएं, जिससे सूत्रकृमियों की संख्या में भारी गिरावट आती है।

बीमारियां

कमर तोड़ रोग (पिथियम,फाइटोप्थोरा, फ्यूजेरियम प्रजातियां तथा राइजोक्टोनिया सोलेनाई)

 

टमाटर व अन्य सब्जियों जैसे शिमला मिर्च, मिर्च, बैंगन, बंद गोभी, फूल गोभी, ब्रॉकली, प्याज इत्यादि का एक महत्वपूर्ण रोग है। इस रोग के लक्षण पौधों पर दो रूप में दिखाई देते हैं। बीज अंकुर भूमि की सतह से निकलने से पहले ही रोगग्रस्त हो जाते हैं तथा मर जाते हैं। बाद में इस रोग का आक्रमण पौधों के तनों पर होता है तथा तने का विगलन होने पर पौधे भूमि की सतह पर लुढ़क जाते हैं तथा मर जाते हैं।

रोकथाम

  • पौध को जालीनुमा घर में ही उगाएं।
  • पौधशाला का स्थान हर वर्ष बदलें।
  • पौधशाला की मिट्टी का उपचार फार्मलीन (1 भाग फार्मलीन तथा 7 भाग पानी) या सौर ऊर्जा से करें।
  • बिजाई से पूर्व बीज का उपचार ट्राइकोडर्मा से करें।
  • पानी उतना ही दें जितनी जरूरत है। अधिक पानी पौधे को रोगग्राही बनाता है।

बकाई फल सड़न रोग

 

इस फल के लक्षण फलों पर ही दिखाई देते हैं तथा फलों पर हल्के तथा गहरे भूरे रंग के गोलाकार धब्बे दिखाई देते हैं जो हिरण की आंख की तरह लगते हैं। रोगग्रस्त फल प्रायः जमीन पर गिर जाते हैं तथा सड़ जाते हैं।

रोकथाम

  • पौधे को झाबे का सहारा देकर सीधा खड़ा रखें।
  • भूमि की सतह से 15-20 सें.मी. तक की पत्तियों को तोड़ दें।
  • वर्षाकाल के आरंभ होते ही उपयुक्त पानी निकास नालियां बनाएं।
  • समय-समय पर रोगग्रस्त फलों को इकट्ठा करके गड्ढे में दबा दें।
  • वर्षाकाल के आरंभ होने से पहले खेत की सतह पर चील या घास की पत्तियों का बिछौना बिछाएं।
  • फसल के दौरान खेतों में गौमूत्र, पंचगव्य, खट्टी लस्सी इत्यादि का छिड़काव करते रहें।

पछेता झुलसा रोग

 

इस रोग के लक्षण अगस्त के अंतिम व सितंबर माह के पहले सप्ताह में पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, जो बाद में भूरे काले धब्बों में परिवर्तित हो जाते हैं। नमी व ठंडे मौसम में यह धब्बे फैलने लगते हैं तथा 3-4 दिनों में पौधे पूरी तरह झुलस जाते हैं। फलों पर भी गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।

रोकथाम

  • फसल चक्र अपनाएं, खेत में उपयुक्त पानी की निकास नालियां बनाएं तथा खरपतवार को नियंत्रण में रखें।

रोगग्रस्त फलों तथा पत्तियों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।

पत्तों का धब्बा रोग

पत्तों पर गहरे भूरे रंग के गोलाकार चक्रनुमा धब्बे बनते हैं जो लक्ष्य पटल की तरह दिखाई देते हैं और नमी वातावरण में यह धब्बे आपस में मिल जाते हैं और भूरे रंग के हो जाते हैं और समय से पहले पीले पड़ जाते हैं तथा गिर जाते हैं।

रोकथाम

  • रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • फसल चक्र अपनाएं तथा खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
  • स्वस्थ फलों से ही बीज निकालें।
  • बीज का ट्राइकोडर्मा से उपचार करें।
  • भूमि से 15-20 सें.मी. की ऊंचाई तक के पत्तों को तोड़ दें ताकि हवा का प्रभाव ठीक हो सके।

पाउडरी मिल्ड्यू रोग

 

इस फफूद के लक्षण पत्तों की निचली सतह पर चूर्णी धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं, जिससे पत्तों की ऊपरी सतह पीली पड़ जाती है और पत्ते समय से पहले गिर जाते हैं।

रोकथाम

  • पंचगव्य का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  • जल निकास का उचित प्रबंध करें।
  • ट्रिकोडर्मा हर्जियाम (10 ग्रा0/लीटर पानी) स्यूडोमोनास फ्लोरोसेन्स (10 ग्रा0/लीटर पानी) बेसिलस सबटिल्स (12 ग्रा0/लीटर पानी) का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

मुझन रोग (राल्सटोनिया

सोलेनेसियरम)

रोगग्रस्त पौधों के पत्ते बिना पीले पड़े ही नीचे की ओर झुक जाते हैं तथा बाद में पूरा पौधा मुरझा जाता है और मर जाता है। फलों पर सफेद रंग से घिरे छोटे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।

रोकथाम

  • रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को नष्ट करें।
  • फसल चक्र अपनाएं तथा रोगग्रस्त भूमि में कम से कम टमाटर की फसल तीन वर्ष तक न लगाएं।
  • रोग मुक्त बीजों का उपयोग करें तथा बीज को ट्राईकोडर्मा से उपचारित करें।
  • खेत तैयार करते समय ब्लीचिंग पाउडर (10 कि.ग्रा./हैक्टेयर) मिट्टी में मिलाएं तथा हल्की सिंचाई करें।
  • रोगग्रस्त खेतों में रोग प्रतिरोधक संकर किस्में जैसे कि सन सीड 7711 का ही रोपण करें।
  • रोगग्रस्त पौधों को निकाल कर नष्ट करें।

चित्तीदार मुझन रोग (टोमैटो स्पॉटिड विल्ट विषाणु)

इस रोग से ग्रस्त पौधों के पत्तों का रंग कांस्य की तरह हो जाता है। पत्ते मुड़ जाते हैं। और पौधों की लंबाई भी कम हो जाती है। फलों की सतह पर लाल-पीले रंग के चक्र बनते हुए धब्बे भी दिखाई देते हैं। विषाणु की अपेक्षा टोमैटो स्पॉटिड विल्ट विषाणु की मार क्षमता बहुत अधिक है। शिमला मिर्च, लेट्यूस, मटर, तम्बाकू, आलू, टमाटर और बहुत सी सजावटी पौधों की प्रजातियां इस विषाणु की मुख्य परिपोषक फसलें हैं।

रोकथाम

  • पौध को जालीनुमा घर में उगाएं ताकि थ्रिप्स पौधशाला में प्रवेश न कर पाएं।
  • यदि फसल पर रोग के लक्षण दिखाई दे तो तत्काल प्रभावित पौधों को जड़ से निकाल कर नष्ट कर दें तथा फसल पर नीम के तेल का छिड़काव करें।

मोजेक (टोमैटो मोजेक

विषाणु)

 

रोगग्रस्त पौधों के पत्तों पर हल्के व गहरे रंग की चित्तियां दिखाई देती हैं तथा छोटे पत्ते कभी - कभी विकृत हो जाते हैं। पत्तों का आकार भी कम हो जाता है। इस रोग को कोई भी रोगवाहक कीट संचारित नहीं करता। यह विषाणू रोगी बीज या भूमि में रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों में कई माह तक जीवित रहता है।

रोकथाम

  • इस विषाणु को आसरा देने वाले खरपतवारों को नष्ट कर दें।
  • विषाणु मुक्त बीज के उपयोग से इस रोग की तीव्रता में काफी कमी आ जाती है
  • फसल चक्र अपनाते रहें।

तुड़ाई एवं पैदावार

टमाटर के फलों की तुड़ाई इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कितनी दूर ले जाना है। सामान्यतः फलों को हरी परिपक्व जब फल के निचले भाग के एक चौथाई हिस्से में गुलाबी रंग आ जाए ऐसी अवस्था में तोड़कर दूर मंडियों में भेजा जा सकता है। सामान्य किस्मों की पैदावार 300-400 क्विंटल/हैक्टेयर तथा संकर किस्मों की 450-500 क्विंटल/हैक्टेयर है परन्तु औसतन पैदावार कई संकर प्रजातियों में अधिक भी हो सकती है।

भण्डारण

टमाटर का भण्डारण 10-15° सै. तापमान और 80-85 प्रतिशत सापेक्षित आर्द्रता में 30 दिन तक किया जा सकता है जब फलों का तुड़ान हरे रंग से पीले रंग में परिवर्तित हो रहा हो। पके हुए टमाटर 5 सै. तापमान पर 10 दिन तक रखे जा सकते हैं।

बीज उत्पादन

टमाटर स्वपरगित फसल होते हुए भी इसमें 2-5 प्रतिशत तक परागण आ सकते हैं। अतः बीज उत्पादन करते समय दो किस्मों के मध्य 50 से 100 मीटर की दूरी रखनी चाहिए। बीज प्राप्ति के लिये स्वस्थ पौधों का जिनमें एक जैसे आकार तथा रंग के फल लगते हो का चुनाव करना चाहिए। पूर्ण रूप से पक जाने पर ही बीज के लिए फलों का तुड़ान करना चाहिए। फलों से बीज मुख्यतः दो विधियों से निकाला जा सकता है –

1) किण्वन विधि

इस विधि में टमाटर के गुद्दे को किसी मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में किण्वीकरण के लिए 3- + दिनों तक रखते हैं। इसके बाद इसमें पानी डाला जाता है जिससे मुद्दा एवं छिलका तैरने लगता है तथा बीज नीचे बैठ जाते हैं। इसके बाद बीज को छाया में सुखाकर बंद लिफाफों में रख दिया जाता है। इस विधि में फल का कोई भी भाग खाने के काम नहीं आता है।

2) अम्लोपचार विधि

बड़े स्तर पर यदि बीज उत्पादन करना हो तो इस विधि का प्रयोग करें। फलों का गुद्दा इसमें खाने में लाया जाता है। 14 किलो पके हुए टमाटर के फलों में 100 मि.ली. व्यापारिक हाईड्रोक्लोरिक अम्ल गुर्दे के साथ अच्छी तरह मिलाकर 30 मिनट तक रख लें तथा इतने में ही बीज गुद्दा लसलसे पदार्थ से अलग हो जाता है। अम्लीय घोल में से बीजों को निथार कर साफ पानी में धोकर छाया में सुखायें। गोल किस्मों में 125-150 कि.ग्रा. तथा नाशपाती आकार वाली किस्मों में 75-100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर बीज प्राप्त किया जा सकता है। संकर बीज उत्पादन के लिए हमेशा नर व मादा जातियों का संकरण करना पड़ता है।

स्रोत: इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर


© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate