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मक्की की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं

भूमि का चयन और तैयार

हिमाचल प्रदेश में मक्की खरीफ मौसम की एक प्रमुख फसल है। हिमाचल में मक्की का उत्पादन 19.9 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है, जबकि राष्ट्रीय उत्पादन 17.2 क्विंटल/है0 है।

यद्यपि हिमाचल प्रदेश में मक्की का उत्पादन प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक है, परन्तु अनुमोदित किस्मों को लगाने, उर्वरकों का उचित मात्रा में प्रयोग और खरपतवारों को नियंत्रण में करने से ओर भी अधिक उपज मिल सकती है। मक्की की फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में गली-सड़ी खाद व पोषक तत्व हो, अच्छी मानी जाती है। मृदा जिसकी पी.एच. 5.5-7.8 हो और जैविक कार्बन की मात्रा 1 प्रतिशत से ज्यादा हो, ऐसी भूमि उपयुक्त मानी जाती है।

यदि मृदा में जैविक कार्बन तत्व एक प्रतिशत से कम पाए जाएं तो खेत में 20-25 टन/हैक्टेयर की दर से गोबर की खाद या कार्बनिक खाद डाली जाए तथा खाद को अच्छी तरह खेत में मिलाने के लिए 2-3 बार जुताई की जाए।

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें ताकि पिछली फसल के अवशेष अच्छी तरह जमीन में मिल जायें। नमी बनाए रखने के लिए हर जुताई के बाद सुहागा अवश्य चलाएं।

बुआई का समय और मौसम

अच्छी पैदावार लेने के लिए मक्की की बिजाई समय पर करनी चाहिए। प्रदेश के विभिन्न खंडों में मक्की की बिजाई के निम्नलिखित उपयुक्त समय हैं-

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र

  • 15 मई से जून के प्रथम सप्ताह तक
  • 15 अप्रैल से मई के प्रथम सप्ताह तक, जहां वर्ष में केवल मक्की की ही फसल।

 

निचले पर्वतीय क्षेत्र

  • 20 मई से 15 जून

 

मध्य पर्वतीय क्षेत्र

  • 15 जून से 30 जून

 

चूंकि प्रदेश में मक्की की बिजाई मानसून की बारिशों पर निर्भर करती है, अतः कोई भी निश्चित बिजाई का समय देना संभव नहीं है। खंड-2 में बिजाई का समय मानसून के आने पर थोड़ा बदला जा सकता है और यदि विपरीत परिस्थितियों में मक्की की बिजाई न हो सके तो अगस्त के पहले सप्ताह तक माश या कुलथी की बिजाई की जा सकती है। यदि बिजाई में देरी हो जाये तो फलीदार फसलें साथ में बीजनी चाहिए।

अनुमोदित किस्में

गिरिजा, अरली कम्पोजिट, बजौरा मक्का-1, बजौरा पॉपकार्न, बजौरा स्वीटकॉर्न, एच.

क्यू.पी.एम.-1, कंचन- 517, पी.एस.सी.एल. 3438, पी.एच.सी.एल. 4640

बीज दर

20 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है, जिससे पौधों की निश्चित संख्या प्राप्त हो जाती है।

बीज उत्पादन

संकर किस्मों - सरताज व हिम -123 का बीज हर साल नया लेना पड़ता है जबकि कम्पोजिट किस्मों- गिरिजा कम्पोजिट, अर्ली कम्पोजिट, पार्वती व नवीन कम्पोजिट का बीज कम से कम 3-4 सालों तक रखा जा सकता है। इसके लिए नीचे दी गई सावधानियां किसानों को अपनानी चाहिए -

1) एक दूसरी किस्म का आपस में मिश्रण न हो।

2) कम्पोजिट किस्म की एक एकड़ या उससे अधिक क्षेत्र में बिजाई करनी चाहिए। खेत के मध्य से भुट्टों को तोड़कर इकट्ठा करना चाहिए जबकि चारों तरफ 9-10 मीटर का क्षेत्र छोड़ देना चाहिए। तोड़े गये भुट्टों से स्वस्थ भुट्टों को छांटना चाहिए और उनका बीज अगले साल के लिए रखना चाहिए। यह आवश्यक है कि 3000-5000 भुट्टों का छांटकर चयन करना चाहिए और आवश्यकतानुसार अगले साल के लिए बीज का सुरक्षित भंडारण करना चाहिए।

बिजाई का ढंग

प्रदेश में किसान प्रायः मक्की की फसल को छुट्टा विधि के साथ बीजते हैं, जो सही तरीका नहीं है, क्योंकि इससे पौधों में समानान्तर दूरी, रोशनी, कार्बन डाईऑक्साईड तत्वों एवं नमी की प्राप्ति नहीं हो पाती और साथ में बीज या तो ऊपरी सतह पर रह जाता है या नीचे गहरा चला जाता है। अतः अधिक उपज लेने के लिए मक्की को हल के पीछे 60 सें.मी. दूरी की कतारों में और बीज से बीज 20 सें.मी. की दूरी पर बीजना चाहिए जिससे 75,000 पौधे प्रति हैक्टेयर मिल सके। यदि एक हैक्टेयर क्षेत्र में 50,000 से कम पौधे हों तो पूरी पैदावार नहीं मिलती है। मक्की के बीज को 3-5 सें. मी. गहरा बीजना चाहिए ताकि अंकुरण सही हो। यदि बिजाई ढलानदार भूमि पर करनी हो जहां भूस्खलन की समस्या हो तो वहां पर कतारों को ढलाने की विपरीत दिशा में रखकर बिजाई करनी चाहिए।

नमी संरक्षण एवं निकास

बारानी परिस्थिति में यह आवश्यक है कि उपज बढ़ाने के लिए चील की पत्तियां या कोई अन्य स्थानीय घास-फूस आदि को 10 टन प्रति हैक्टेयर भूमि पर बिछा दें ताकि अधिक देर तक चलने वाली सूखे की स्थिति में फसल को नमी की कमी न झेलनी पड़े। अगस्त के महीने में मक्की की फसल में फुलणू, सल के पत्ते, बसूरी या कोई अन्य स्थानीय घास-फूस 10 टन प्रति हैक्टेयर डालने से भूमि में नमी बनी रहती है, जो बारानी क्षेत्रों में गेहूं की बिजाई में सहायक होती है।

मक्की की फसल में पानी की उस समय सबसे अधिक आवश्यकता होती है, जब नर व मादा फूल निकल रहे हों। यदि इस समय बारिश न हो तो खेत में पानी देना चाहिए। किसी भी अवस्था में खेत में खड़ा पानी नहीं रहना चाहिए। अतः पानी के निकास का सही प्रबंध होना चाहिए। यह काम उस समय आसान हो जाता है जब बिजाई कतारों में की हो। पानी को किसी भी हालत में थोड़े समय के लिए भी खेत में खड़ा नहीं रहने देना चाहिए।

अंतः फसल-प्रणाली

हिमाचल प्रदेश में यह आम प्रथा है कि मक्की के साथ फलीदार फसल भी लगाई जाती है ताकि इकाई क्षेत्र में एक और फसल से पैदावार मिल जाए। यह प्रथा संभवत: सही है, परंतु किसान इसे सही ढंग से नहीं करते हैं; अतः उपज कम रह जाती है। मक्की की दो कतारों के बीच सोयाबीन हर परिस्थिति में और माश को केवल कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगाना चाहिए। जब मक्की को 60 या 75 सें.मी. दूरी की कतारों में लगाया है तो इसकी दो कतारों के बीच में सोयाबीन या माश की एक कतार आसानी से लगाई जा सकती है। इससे भूमि का अच्छा उपयोग होता है और साथ में पानी व पोषक तत्वों का भी लाभ उठाया जाता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाओं और बीमारियों व कीड़ों के प्रकोप से भी यह प्रथा लाभदायक है। फलीदार फसलें खरपतवारों को दबाए रखती हैं। और साथ में ढलानदार खेतों में भूमि का संरक्षण भी करती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि मक्की की फसल को अनुमोदित उर्वरक दें, जबकि साथ में बीजने वाली सोयाबीन की फसल के लिए 15-20 कि.ग्रा. नाईट्रोजन के साथ 20-25 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर अतिरिक्त दें। यदि मक्की के साथ माश/मूग बीजा हो तो अनुमोदित मात्रा से 50 प्रतिशत उर्वरक (7.5 कि.ग्रा. नाईट्रोजन व 22.5 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर) अरहर की फसल को दें। खंड -1 में मक्की की दो कतारों के बीच तिल को लगाने का परामर्श दिया जाता है। जब कोई भी अन्य फसल मक्की में बीजनी हो तो बीज की मात्रा 50 प्रतिशत कम कर देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

मक्की की फसल में खरपतवारों की रोकथाम बिजाई से 20-30 दिनों के बाद बहुत आवश्यक है, ताकि फसल में दी गई खाद्य भली-भांति मिल सके व उपज में बढ़ौतरी हो सके। मानसून वर्षा के दौरान खरपतवार मक्की की फसल को बहुत हानि पहुंचाते हैं। और इससे फसल की बढ़ौतरी और पैदावार पर असर डालते हैं। अतिरिक्त फसल प्रणाली का प्रयोग भी खरपतवारों को नियंखण में रखते हैं।

पौध संरक्षण

(अ)    कीट

कटआ कीट व सफेद सण्डी:

यह कीट जमीन के अंदर पाए जाते हैं। पौधों के अंकुरण के बाद यह तने को जमीन के पास काटकर व उनकी जड़ों को हानि पहुंचाते हैं।

रोकथाम

  • कच्ची गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करें व जहां तक संभव हो, केचुआ खाद का प्रयोग करें।
  • जिन क्षेत्रों में प्रकोप अधिक हो, बीज की मात्रा 10-20 कि.ग्रा. अधिक प्रयोग करें।
  • बिजाई से पहले खेतों के आस-पास की झाड़ियों, खरपतवारों इत्यादि को नष्ट कर दें।
  • अंकुरण के बाद पौधों पर व आसपास राख का छिड़काव करें।
  • बिजाई के समय मेटाराइजियम फफूद (100 कि.ग्रा./है.) का प्रयोग करें।
  • फसल कटाई के बाद, अवशेषों को निकाल कर जला दें।

तना छेदक

 

यह मक्की का मुख्य कीट है जो नए पत्तों के पर्णचक्र में घुसकर, पौधों की मध्य शाखा व तने को क्षति पहुंचाते हैं। नए पत्तों के पर्णचक्र के पास छोटे-छोटे छिद्र कीट का मुख्य लक्षण हैं। नए पौधों पर नुकसान अधिक होता है जो सूखकर मुरझा जाते हैं। इस कीट की सुण्डियां भुट्टों में भी हानि पहुंचाती हैं।

रोकथाम

  • स्वस्थ बीज का प्रयोग करें, छेद वाले बीजों को निकाल दें।
  • ग्रसित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें।
  • बीज की मात्रा अधिक रखें।
  • खरपतवारों व घास इत्यादि को नष्ट कर दें व कटाई के समय फसल के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • नीम/अग्नि अस्त्र/बेसिलस थ्यूरिनजेनेसिस का छिड़काव करें।
  • खमीर वाली लस्सी (एक भाग) व गौमूत्र (एक भाग) को पानी (20 भाग) में मिलाकर छिडकाव करें।

बालों वाली सुण्डियां व धारीदार भंग

यह कीट क्रमशः पौधों के नर्म पत्तों व फूलों को क्षति पहुंचाते हैं।

रोकथाम

  • बालों वाली सुण्डियां जब शुरू में झुण्ड में होती हैं तब उनका इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  • खमीर वाली लस्सी + गौमूत्र या फार्मूलेशन-2 का छिड़काव करें।

(ब) बीमारियां

बीजाणु जनित तना-गलन

 

जमीन के पास की सतह का तना नर्म हो जाता है व कुछ समय बाद टूट कर गिर जाता है I अग्रिम अवस्था में ग्रसित खेतों में शराब जैसी दुर्गन्ध आती है I

रोकथाम

  • खेतों में पानी के निकास की सही व्यवस्था करें
  • वीजाई और गुड़ाई के समय पौधों के इर्द-गिर्द खेत में संजीवक व वयोसोल का घोल बनाकर डालें I

झुलसा रोग

मक्की के पत्तों पर कई तरह के धब्बे, धारियां या झुलसन के लक्षण दिखाई देते  हैं। जिससे खेतों में सूख जैसे लक्षण दिखते हैं।

रोकथाम

  • पत्तों में झुलसा के लक्षण दिखाई देने पर एक सप्ताह के अन्तराल में वर्मीवाश या पंचगव्य से छिड़काव करें।
  • रोग ग्रसित बीज अंकुरण से पहले या एक दम बाद गलकर मर जाते हैं।

बीज गलन

 

रोकथाम

  • स्वस्थ बीज का प्रयोग करें।
  • बिजाई से पहले बीजामृत, ट्राइकोडर्मा से उपचारित करें।

कटाई

 

अधिक उपज देने वाली किस्में, जल्दी ही पक कर तैयार हो जाती हैं, जबकि पौधा अभी तक हरा नहीं होता है। भुट्टों के बाहर पणच्छिद भूरा हो जाता है। जब दोनों में 30 प्रतिशत से कम नमी हो तो भुट्टों को तोड़ लेना चाहिए और खेत में अधिक देर तक नहीं रहने देना चाहिए अन्यथा जानवरों और पक्षियों से हानि हो सकती है। भुट्टों को पौधों से तोड़ने के बाद सुखा लें व दाने निकाल कर उनमें जब 15 प्रतिशत तक नमी हो तो मंडी/मार्केट में ले आएं। शेष बचे तनों को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। दूसरा ढंग यह भी है कि फसल पकने पर पौधों को भुट्टों के साथ ही काट कर छोटे गर्छ बनाकर ढेर लगा दें व सुखा लें और फिर दानों को सुविधानुसार निकाल लें।

फसल चक्र

 

खंड -1 में मक्की पर आधारित निम्नलिखित फसल - चक्र लाभदायक है –

  • सिंचित क्षेत्र : मक्की-तोरिया-गेहूं- मक्की चारा
  • बारानी क्षेत्र : मक्की+ तिल-गेहू+चना

खादें

मक्की को जैविक विधि द्वारा उत्पादन के लिए 10 टन देसी खाद और 1 टन बी.डी. कम्पोस्टर प्रति हैक्टेयर उपयुक्त हैं या गोबर की खाद की जगह केचुआ खाद 5 टन और बी.डी. कम्पोस्ट 1 टन प्रति हैक्टेयर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 8-10 टन/हैक्टेयर गोबर की खाद को हल चलाते समय, गोबर की खाद की पूरी मात्रा + वर्मी कम्पोस्ट 4-5 टन प्रति हैक्टेयर मिलाएं। उसके पश्चात 1/3 भाग वर्मी कम्पोस्ट को जमीन की तैयारी के समय और 2/3 भाग + पी.एस.बी. 4.5 कि.ग्रा./हैक्टेयर बीज बोने के समय डालें। जमीन में सूक्ष्म जीवों की संख्या की बढ़ौतरी के लिए और फसल को समय से पोषक तत्वों के मिलने हेतु जीवामृत 500 लीटर /हैक्टेयर की दर से जमीन में प्रयोग करें। फसल की अच्छी बढ़ौतरी के लिए वर्मी वाश और गौमूत्र की स्प्रे 7-10 दिन के अंतराल पर भुट्टों में दाने आने तक करते रहें।

भंडारण

अनाज को अच्छी तरह से सुखाया जाना चाहिए (धूप में), जब दानों में नमी की मात्रा 12 प्रतिशत से कम रह जाए तब दानों का भंडारण किया जा सकता है। अनाज को भंडार करने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले गोदामों को भली-भांति साफ करना चाहिए ताकि उसमें किसी प्रकार की नमी न रह जाए। अनाज में, मक्की के दानों में 0. 5 प्रतिशत पीसा हुआ मिर्च का पाउडर मिलाएं ताकि अनाज बीटल की क्षति से बच सके। इसी प्रकार (दो) 20 प्रतिशत नीम पाऊडर के प्रयोग से भंडार किए गए अनाज में कीट-पतंगों का प्रकोप नहीं होता।

उपज

जैविक विधि से तैयार की गई मक्की की औसत उपज 35-45 क्विंटल/हैक्टेयर आंकी जाती है।

स्रोत: इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर


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