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मटर की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं

भूमिका

हरा मटर हिमाचल प्रदेश की एक प्रमुख बेमौसमी सब्जी है। व्यावसायिक रूप से इसे सर्दियों में मध्यवर्ती व निचले क्षेत्रों में और गर्मियों में ऊंचे पर्वतीय व आर्द्र शीतोष्ण वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है। गर्मियों में पर्वतीय क्षेत्रों का वातावरण मटर की फसल के लिए अनुकूल होने के कारण इस क्षेत्र के किसानों की आय में पर्याप्त वृद्धि होती है। मैदानी क्षेत्रों में अधिक गर्मी होने के कारण इसका उत्पादन नहीं हो पाता। पर्वतीय क्षेत्रों के मटर अपनी विशेष सुगन्ध, मिठास व ताजगी के लिए सभी को आकर्षित करते हैं। प्रदेश में लगभग 18,930 हैक्टेयर क्षेत्र से 2,02,521 मट्रिक टन उत्पादन होता है।

भूमि का चयन व तैयारी

जिस मृदा में पीएच रेंज 6.5 से 7.5 और जहां एक प्रतिशत जैविक कार्बन हो, वह मटर की खेती के लिए उपयुक्त भूमि होती है। यह भी जरूरी है कि मृदा के पीएच स्तर, जैविक कार्बन, गौण पोषक तत्व (एनपी.के.) तथा खेत में सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा की जांच के लिए वर्ष में एक बार मृदा परीक्षण किया जाए। जैविक कार्बन की मात्रा । प्रतिशत से कम होने पर 25 से 30 टन गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से उपयोग में लाना चाहिए और खाद को अच्छी तरह मिलाने के लिए दो से तीन बार जुताई करनी चाहिए।

बुआई का समय

क्षेत्र

अगेती किस्में

 

मध्य ऋतु की किस्में (मुख्य फसल)

 

निचले पर्वतीय क्षेत्र

सितम्बर - अक्तूबर

नवम्बर

मध्य पर्वतीय क्षेत्र

सितम्बर (पहला पखवाड़ा)

नवम्बर

ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र

मार्च - जून

अक्तूबर-नवम्बर, मार्च - जून

अनुमोदित किस्में

बोनविला, किन्नौरी, लिंकन, वीएल-3, पालम प्रिया, सोलन निरोग, जीसी-477,पंजाब - 89, अरकल, वीएल-7, मटर अगेता -6

बीज का उपचार

बीज के लिए स्वस्थ व रोग मुक्त बीजों का चयन करना चाहिए और खेत में बीजने से पहले बीज का उपचार ट्राईकोडर्मा, बीजामृत से करना चाहिए।

बीज दर व अंतराल

शीघ्र पकने वाली किस्मों के लिए 125 से 150 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर (10-12 कि.ग्रा.प्रति बीघा)।

मध्य तथा देर से पकने वाली किस्मों के लिए 60-75 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर (5-6 कि.ग्रा. प्रति बीघा)। अगेती किस्में - 30x7.5 सें.मी.,

मध्य और देर से पकने वाली किस्में - 60x7.5 सें.मी.

मृदा उर्वरक प्रबंधन

मटर की अच्छी उपज पाने के लिए 15 टन वर्मी कम्पोस्ट तथा 2 टन बीडी कम्पोस्ट या 20 टन गोबर की खाद तथा 2 टन बीडी कम्पोस्ट इस्तेमाल करनी चाहिए। यह खादं अच्छी प्रकार हल चलाते समय भूमि में मिलानी चाहिए। वर्मी कम्पोस्ट अंतिम बुआई के समय प्रयोग में लानी चाहिए।

सिंचाई व पानी प्रबंधन

मटर की बिजाई से पहले एक सिंचाई करें तथा उसके उपरांत 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहें। मटर की फसल के लिए पानी की आवश्यकता भूमि व वर्षा पर निर्भर करती है। आम तौर पर मटर की फसल के लिए 2-3 सिंचाईयां बहुत जरूरी होती हैं। पहली सिंचाई बीज बोने से पहले, दूसरी सिंचाई फूल आने पर और तीसरी सिंचाई जब फलियां तैयार हो रही हों। जमीन में अधिक नमी मटर की फसल के लिए हानिकारक होती है जो कि जड़ सड़न रोग, पौधों का पीला पड़ जाना और फसल के दूसरे तत्वों को उपयोग में लाने में अवरोधक होती है।

खरपतवार प्रबंधन

फसल में 1-2 बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है जो कि फसल की किस्म पर निर्भर करती है। पहली निराई व गुड़ाई, जब पौधों में तीन-चार पत्ते हों या बिजाई से 3-4 सप्ताह बाद करें। दूसरी, फूल आने से पहले करें। खेत की मेढ़ों पर पाए जाने वाले वार्षिक घास वाले और चौड़ी पत्तों वाले खरपतवारों की रोकथाम उनको नष्ट करने के उपरांत की जा सकती है।

पौध संरक्षण

(अ) कीट

लीफ माईनर

लार्वे पत्तों पर सुरंग बनाते हैं तथा फरवरी से अप्रैल तक हानि पहुंचाते हैं। प्रौढ़ थ्रिप्स फूल के अन्दर तथा शिशु पत्तों और फलियों पर पलते हैं।

रोकथाम -  पंचगव्य अथवा दशपर्नी के 5 से 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

 

फली छेदक

सुण्डियां पत्तों पर पलती हैं और बाद में फलियों में घुसकर बीज खाती हैं।

रोकथाम - 1 किलोग्राम मेथी के आटे को 2 लीटर पानी में डालकर 24 घंटे के लिए रख देते हैं। इसके उपरान्त इसमें 10 लीटर पानी डालकर फसल पर छिड़काव करते हैं। इससे 50 प्रतिशत तक सुण्डियों की रोकथाम हो जाती है।

 

(ब) बीमारियां

फफूद जनित रोग

पाउडरी मिल्ड्यू

इस रोग के लक्षण पहले पत्तियों पर और बाद में पौधे के अन्य भागों में तने व फलियों पर सफेद चूर्ण वाले धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं। बाद में यह धब्बे आपस में मिल जाते हैं तथा सभी हरे भाग सफेद चूर्ण से ढक जाते हैं। दूर से फसल ऐसे दिखाई देती है। जैसे आटे का छिड़काव किया हो। रोगग्रस्त फलियां आकार में छोटी तथा सिकुड़ी हुई होती हैं और बाद में फलियों के धब्बों का रंग भूरा हो जाता है।

रोकथाम

  1. रोगग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें।
  2. रोग प्रतिरोधी किस्में लगायें।
  3. फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने से पहले लहसुन की गठियों के द्रव्य (2 प्रतिशत) का छिड़काव 7 दिन के अंतराल पर करें। दूध में हींग मिलाकर (5 ग्रा./लीटर पानी) का छिड़काव करें। चूर्ण आसिता बीमारी के नियंत्रण के लिए 2 कि.ग्रा. हल्दी का चूर्ण तथा 8 कि.  ग्रा. लकड़ी की राख का मिश्रण बनाकर पत्तों के ऊपर डालें।
  4. अदरक के चूर्ण को 20 ग्राम प्रति लीटर पानी में डालकर घोल बनाएं तथा 15 दिन के अंतराल पर तीन बार छिड़कने से चूर्ण आसिता तथा अन्य फफूद वाली बीमारियों का प्रकोप कम होता है।

एस्कोकाईटा ब्लाईट

प्रभावित पौधे मुरझा जाते हैं। जड़े भूरी हो जाती हैं। पत्तों और तनों पर भूरे धब्बे पड़ जात हैं। इस बीमारी से फसल कमजोर हो जाती है।

रोकथाम

  1. बीज का उपचार बीज अमृत व पंचगव्य से करें।
  2. बीमारी के आने पर गौमूत्र और लस्सी का 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  3. मोटे और स्वस्थ बीज का प्रयोग करें।
  4. रोग ग्रसित पौधों को नष्ट कर दें।
  5. हल्की सिंचाई दें व जल निकासी का उचित प्रबन्ध करें।

फ्युजेरियम विल्ट

इस रोग से ग्रस्त पौधों की निचली पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा पौधे बौने हो जाते हैं। पत्तियों के किनारे अंदर को मुड़ जाते हैं तथा पौधों का ऊपर का भाग मुरझा जाता है तथा पौधे मर जाते हैं।

रोकथाम

  1. अधिक संक्रमित क्षेत्रों में अगेजी बुआई न करें।
  2. संक्रमित क्षेत्रों में तीन वर्षीय फसल चक्र बनाएं।
  3. स्वस्थ बीज का प्रयोग करें।
  4. बीमारी वाले खेत में केंचुआ खाद और सीपीपी को डालें।
  5. खादें संतुलित मात्रा में भूमि परीक्षण के आधार पर प्रयोग में लाएं।
  6. खेती की भूमि का गर्मियों में 45 दिन के लिए सौर ऊर्जा से उपचार करें।

सफेद विगलन

इस रोग के लक्षण पौधे के किसी भी ऊपरी भाग पर सूखे बदरंग धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं, जो ज्यादातर तने और शाखाओं पर अधिक होते हैं। फलियों का गुद्दा सड़ने लगता है तथा विभिन्न नाप व आकार की काली टिक्कियां बन जाती हैं।

रोकथाम

  1. रोग ग्रस्त पौधों के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  2. फसल चक्र धान से अपनाएं।
  3. पंक्तियों का फासला 50-60 सें.मी. रखें।
  4. खेत तैयार करते समय ट्राइकोडर्मा हरजियानम फफूद (120 कि.ग्रा./है.) के हिसाब से मृदा में मिलायें। इस रोग से ग्रस्त पत्तों की ऊपर सतह पर पीले से भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं तथा नमी वाले मौसम में पत्तों की निचली सतह पर इन धब्बों पर बैंगनी रंग की मृदुलरोमिल आसिता वृद्धि देखी जा सकती है। फलियों पर भी पीले से भूरे रंग के अंडाकार धब्बे बन जाते हैं। फलियों में पनप रहे बीज पर भी छोटे एवं भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं।

डाऊनी मिल्ड्यू

रोकथाम

  1. फसल के रोगग्रस्त अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें।
  2. तीन वर्ष का फसल चक्र अपनाएं।
  3. रोगमुक्त बीज का चयन करें।
  4. खेत में पानी की निकासी का उचित प्रबंध करें।
  5. बीज को बोने से पहले ट्राइकोडर्मा एवं बीजामृत से उपचारित करें।

किट्ट (रस्ट)

इस रोग के सर्वप्रथम लक्षण पत्तियों, तनों तथा कभी-कभी फलियों पर पीले, गोल या लंबे धब्बे समूह के रूप में दिखाई देते हैं। इसको इशियमी अवस्था कहते हैं। इसके बाद यूरीडोस्फोट पौधों के सभी भाग या पत्तियों के दोनों सतहों पर बनते हैं। वे चूर्णी तथा हल्के भूरे रंग के होते हैं। बाद में इन्हीं धब्बों का रंग गहरा भूरा या काला हो जाता है, जिसे टिलियम अवस्था कहते हैं। रोग का प्रकोप 17-220 सै. तापमान व अधिक नमी तथा ओस व बार - बार हल्की बारिश होने से अधिक बढ़ता है।

रोकथाम

  1. रोगग्रस्त अवशेषों को नष्ट कर दें।
  2. लंबा फसल चक्र अपनाएं, जिसमें ब्राडबीन या लैथाइरस जैसी परपोषी फसलें न लगाएं। जिन क्षेत्रों में इस रोग का अधिक प्रकोप होता है उनमें फसल का जल्द रोपण करें।
  3. रोगरोधी प्रजातियों को ही लगाएं।

 

जीवाणु अंगमारी

 

इस रोग के लक्षण पत्तियों, तने एवं फलियों पर जलसिक्त धब्बों के रूप में विकसित होते हैं। पत्तियों पर इनका भूरा रंग हो जाता है तथा रोशनी के सामने यह चमकदार व पारभासक दिखाई देते हैं। तनों पर भी यह धब्बे जलसिक्त होते हैं तथा आयु के बढ़ने के साथ-साथ भूरे रंग के हो जाते हैं। फलियों पर भी ये धब्बे जलसिक्त होते हैं तथा ग्रीज जैसे लगते हैं और इनका रंग भी बहुत कम बदलता है। ठंडा तथा नमी वाला मौसम इस रोग के पनपने के लिए सहायक है। पाला पड़ने से भी इस रोग की वृद्धि अधिक होती है।

रोकथाम

  1. रोगग्रस्त अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट करें।
  2. तीन वर्षीय फसल चक्र अपनाएं।
  3. स्वस्थ बीज का चयन करें।
  4. बीज बिजाई से पहले ट्राइकोडर्मा एवं बीजामृत से उपचारित करें।

 

मटर बीज जनित मोजेक

 

 

इस रोग के पौधे बौने हो जाते हैं, पत्तियों छोटी हो जाती हैं, शिराएं साफ दिखाई देने लगती हैं तथा पत्तियों के गुच्छे बन जाते हैं। रोगग्रस्त पौधों पर फूल बहुत कम संख्या में लगते हैं तथा फलियां या तो बनती ही नहीं, अगर बन गई तो बीज नहीं लगते। इस विषाणु का विस्तृत परिपोषक परिसर है परंतु मुख्य मटर, मसर तथा ब्राडबीन हैं, जिनके बीज द्वारा यह एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फैलता है।

रोकथाम

  1. रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें।
  2. रोगहवाहक कीटों की रोकथाम के लिए नीम, तेल का 10-14 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। खेत में परावर्ती बिछौना बिछाने से भी रोगवाहक कीटों की संख्या में कमी आ जाती है।

 

अगेता भूरापन

 

 

रोगग्रस्त पौधों का विकास कम होता है तथा उन पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। फलियों पर जामनी रंग के धब्बे चक्र बनाते हुए या गड्ढे के रूप में दिखाई देते हैं। अगर रोग का संक्रमण अगेती अवस्था में हो जाए तो ग्रस्त फलियां छोटी तथा विकृत हो जाती हैं। प्रकृति में इस विषाणु का संक्रमण सेमवर्गीय फसलों तथा मटर पर ही होता है। सेमवर्गीय खरपतवार भी इस रोग के शिकार हो जाते हैं।

रोकथाम

  1. विषाणुमुक्त बीज का ही इस्मेताल करें।
  2. सेमवर्गीय खरपतवारों को खेत से तथा आसपास के क्षेत्र से नष्ट करें
  3. रोगवाहक सूत्रकृमि की रोकथाम के लिए मिट्टी का उपचार ट्राइकोडर्मा से करें।
  4. तीन वर्षीय फसल चक्र अपनाएं।

तुड़ाई व उपज

मंडी में अच्छी कीमत के लिए फलियों का समय पर तोड़ना अनिवार्य है अन्यथा इनके गुण पर प्रभाव पड़ता है। फलियां तब तोड़े जब वह पूर्णतया दानों से भर जाएं। इसके पश्चात हरा रंग घटने लग जाता है। सामान्यतः फसल की तुड़ाई 7-10 दिन के अंतराल पर करें। मटर की फसल की कुल 4-5 तुड़ाईयां होनी चाहिए। मटर की अगेती फसल की उपज 60-85 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है जबकि मुख्य फसल की उपज 100-150 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती है। मटर की तुड़ाई सुबह-शाम करें। दिन में तेज धूप पड़ने पर मटर की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। मटर की तुड़ाई बेलों से बहुत सावधानी से करनी चाहिए ताकि पौधों को क्षति न पहुंचे।

भण्डारण

हरी मटर की फलियों की ग्रेडिंग व पैकिंग बहुत ध्यानपूर्वक करनी चाहिए। प्रायः मटर को बोरियों, बांस की टोकरियों आदि में पैक किया जाता है और मण्डियों में पहुंचाया जाता है। मटर की फलियों पर अधिक नमी नहीं होनी चाहिए अन्यथा इस पर फफूद जैसी बीमारियां व व्याधियां आ सकती हैं।

स्रोत: इंटरनेशनल कॉम्पीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर


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