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गुलदाउदी

गुलदाउदी को जाड़े की रानी भी कहते हैं। इसे अमेरिका में सामान्यत: ‘ग्लोरी ऑफ़ ईस्ट’ या ‘मम’ भी संक्षिप्त रूप से कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति संभवत: चीन में मानी जाती है। यह बहुत विस्तृत रूप से बगीचे में उगाया जाता है तथा भारत में व्यावसायिक रूप से खेती किए जाने वाले पाँच फूलों में से एक है।

इसका मुख्यत: माला बनाने के लिए, खुले फूलों के लिए, वेनी में लगाने, गुलदस्तों में सजाने एवं प्रदर्शनी के लिए तथा बगीचा सजाने में इस्तेमाल करते हैं। जापान में इसे राजशाही का प्रतीक अभी भी माना जाता है।

गुलदाउदी सामान्य रूप से छोटी दिन अवधि का पौधा है। दिन की अवधि अगर 14.5 घंटे से ज्यादा हो जाए तो फूल खिल नहीं पाएगा एवं दिन की अवधि अगर 13.5 घंटे से बढ़ जाए तो कली का विकास बंद हो जाएगा, अपवाद स्वरूप कुछ अगेती किस्मों को छोड़कर। पौधे के वानस्पतिक विकास के लिए ज्यादा लंबे दिन की आवश्यकता होती है। इसकी विस्तृत रूप से खेती तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, बिहार, बंगाल एवं मध्यप्रदेश में होती है। गुलदाउदी का वैज्ञानिक नाम डेंड्रेन्थेमा ग्रेंड्रीफ्लोरा है और यह ऐस्टेरसी कुल का पौधा है। चीन इसका उत्पत्ति स्थान माना जाता है।

वर्गीकरण

  1. 1. वृद्धि का आधार पर

(क) वार्षिक गुलदाउदी: इसकी तीन जातियाँ हैं – क्राईसेन्थिमम केरिनेटम (इन-कलर-क्राईसेन्थमम), क्राईसेन्थिमम कोरोनेरियम (क्राउन डेजी या मला गुलदाउदी) एवं क्राईसेन्थिमम सेजेटिम (कॉर्न मेरीगोल्ड)। इसके पौधे लंबे एवं एकहरे फूलने वाले होते हैं।

(ख) बहुवार्षिक गुलदाउदी: इसकी भी तीन प्रजातियाँ होती हैं जोकि क्राईसेन्थिमम मेक्सिमम, क्राईसेन्थिमम फ्रुटीसेन्स एवं क्राईसेन्थिमम मेरिफोलियम हैं। इसमें बहुत ही आकर्षक एकहरे, लगभग दोहरे एवं दोहरे फूल विभिन्न रंगों एवं आकारों में खिलते हैं।

२. फूल खिलने के आकार के आधार पर: फूल के आकार के आधार पर गुलदाउदी की प्रजातियों को दो समूहों में बाँटा गया है, यथा – बड़े फूल एवं छोटे फूल वाली गुलदाउदी। बड़े फूल वाली गुलदाउदी को निम्न वर्गो में पुन: विभाजित किया गया है: इनकवर्ड (गदा आकार का), रिफ्ले रिफ्लेक्स्द (नीचे की ओर पंखुड़ियाँ), इंटरमीडिएट (बाहर वाली पंखुड़ियाँ की तरफ मुड़ी हुई एवं नीची, जबकि अंदर की पंखुड़ियाँ मुड़ी हुई), इर्रेगुलर (बाहर की तरफ की पंखुड़ियाँ मुड़ी हुई एवं टेढ़ी मेढ़ी), क्विल्ड (बाहर के पंखुड़ियाँ ट्यूब के आकार की, स्पून (बाहर वाली पंखुड़ियाँ का बाहरी किनारा चम्मच की तरह), बॉलर रेयोनेट (लगभग पूर्ण गेंदा जैसा), एनीमोन (एक पंखुड़ी का जिसमें ट्यूब के आकार का मध्य डिस्क)।

इसी प्रकार दूसरे छोटे आकार के फूलों को अन्य समूहों में इस प्रकार विभाजित किया गया है – एनीमोन, बटन, कोरियन (एकहरे एवं दोहरे) डेकोरेटिव, पामपॉन, क्विल्ड, सेमी-क्विल्ड एवं स्टीलेट।

किस्में

(1) बड़े फूल वाली किस्में: कस्तूरबा गाँधी (सफेद),चन्द्रमा (पीला),महात्मा गाँधी (बैंगनी), मीरा, ताम्र एवं अरुण (लाल) ।

(2) छोटे फूल वाली किस्में: शरद मुक्ता, शरद तनाका, शरद माला (सफेद), शरद बहार, शरद प्रभा (बैगनी), राखी, अरुण श्रृंगार, सुहाग श्रृंगार (लाल) ।

एन. बी. आर.आई., लखनऊ द्वारा विकसित कुछ नई किस्में को विभिन्न मौसमों में नीचे दी गई सूची के अनुसार लगा सकते हैं। इसे लगाने में कोई विशेष खर्च नहीं होता है:

किस्में

लगाने का समय

खिलने का समय

ज्वाला, ज्योति

जनवरी

गर्मी

वर्षा, मेघदूत

फरवरी

वर्षा ऋतु

शारदा, शरद शोभा

मार्च

सितम्बर-अक्टूबर

शरदमाला, शरदकांति

जुलाई

अक्टूबर-नवंबर

अन्य सभी किस्में

जुलाई

नवंबर-दिसम्बर

वसंतिका, जया

अगस्त

दिसंबर-जनवरी

शालिनी, केस्केड

अगस्त

फरवरी-मार्च

हाल ही में जारी की गई किस्में: शांति, सद्भावना, वाइ.2-के, कारगिल 99 इत्यादि।

बिना पिनचिंग एवं डंडियों वाली किस्में: अकीता, कोवन।

प्रवर्धन: इसका प्रवर्धन बीज एवं वानस्पतिक दोनों विधियों द्वारा होता है। बीज द्वारा प्रवर्धन मुख्यत: वैज्ञानिकों द्वारा नई किस्में विकसित करने के क्रम में होता है। बीज से प्रवर्धन वार्षिक गुलदाउदी में भी होता है। वानस्पतिक प्रवर्धन द्वारा प्राप्त पौधे आसानी से स्थापित हो जाते हैं तथा ये मजबूत एवं सीधे होते हैं। वानस्पतिक प्रसारण मुख्यत: जड़ से विकसित तनों, तनों की कटिंग एवं सूक्ष्म प्रवर्धन द्वारा होता है। फूल समाप्त होने के लगभग एक महीने बाद जड़ से विकसित तनों की वृद्धि बहुत होती है। जड़ से विकसित तनों, जो कि लगभग 10-15 सें.मी. लम्बे हों, को फरवरी-मार्च महीने में गमले या क्यारियों में लगा देते हैं। तनों की कटिंग मातृ पौधे से जून माह में लेते हैं। लगभग 4-6 सें.मी. लंबी एवं 3-5 मि.मी. व्यास वाली कटिंग को फफूंदनाशी वेवीस्टीन या केप्टान 2 ग्राम/ली. पानी में घोल कर उपचारित कर क्यारियों में लगाएं। जल्दी एवं अच्छी जड़ें प्राप्त करने के लिए कर्त्तनों (कटिंग) को सेरेडिक्स बी-1 या 2000 पी.पीएम, आई.बी.ए. में डुबाकर तुरन्त निकाल लें। इस तरह से कटिंग द्वारा पौधे लगभग 1 महीने में तैयार हो जाते हैं। बहुत से देशों में व्यावसायिक रूप से तथा वायरस रहित कटिंग तैयार करने के लिए उत्तक प्रवर्धन विधि का इस्तेमाल करते हैं।

पौध रोपण: अधिक फूल प्राप्त करने के लिए जड़ द्वारा विकसित तनों को 30 X 30 सें.मी. की दूरी पर विभिन्न आकार की क्यारियों में लगाते हैं। पौधा लगाने का समय किसी क्षेत्र विशेष के ऊपर निर्भर करता है जो मार्च से अगस्त तक होता है। पौधों को गमलों में लगाने पर तीन बार गमले बदले जाते हैं।

पहली बार 10 सें.मी. का गमला लेते है। लगाने का उचित समय फरवरी-मार्च होता है। इसमें मिश्रण के रूप में एक भाग बालू, एक भाग मिट्टी एवं एक भाग पत्ती खाद या गोबर की सड़ी खाद डालते हैं।

दूसरी बार गमला को अप्रैल महीने के अंतिम सप्ताह में बदलते हैं। इसके लिए 15 सें.मी. का गमला चाहिए। इसमें मिश्रण के लिए एक भाग मिट्टी एक भाग बालू एवं दो भाग पत्ती खाद, एक भाग हड्डी चूर्ण या सिंगल सुपर फास्फेट एवं एक चौथाई भाग लकड़ी की राख डालते हैं।

तीसरी एवं अंतिम बार गमला बदलने का काम अगस्त एवं सितम्बर महीने में करना चाहिए। इसके लिए 30 सें.मी. का गमला लेते हैं। इसमें एक भाग बालू, दो भाग मिट्टी, दो भाग पत्ती खाद, दो भाग गोबर की सड़ी हुई खाद दो चम्मच हड्डी चूर्ण या सिंगल सुपर फास्फेट एवं एक चौथाई भाग लकड़ी की राख मिलाकर गमले में भरते हैं।

खाद डालना: अच्छी पैदावार के लिए प्रति वर्ग मीटर 40 ग्राम नाईट्रोजन, 20 ग्राम पोटाश एवं 20 ग्राम फ़ॉस्फोरस डालते हैं। नाईट्रोजन की आधी मात्रा एवं फ़ॉस्फोरस एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा को पौधा लगाते समय तथा शेष नाईट्रोजन की आधी मात्रा पौधा लगाने के एक महीने बाद डालनी चाहिए।

वृद्धि नियामक: पौधा की वृद्धि को नियंत्रित करने की तीन विधियां हैं:

(1)  भौतिक विधियाँ

(2)  रासायनिक विधियाँ

(3)  कल्चर विधियाँ

(1)  भौतिक विधियाँ: भौतिक विधियों के अंतर्गत निम्नविधियाँ है:

(क) कली तोड़ना: यह ज्यादा कलियों को तोड़कर हटाने की विधि है। इसमें फूलों की संख्या को घटाकर उसकी गुणवत्ता को बढ़ाया जता है। लेकिन कोरियन, पोमपॉन एवं इकहरी में कलिकाएँ तोड़ी नहीं जाती हैं।

(ख) पिनचिंग: इसमें तने का शीर्ष भाग तोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा शाखाओं का विकास करना, पौधे की लंबाई रोकना एवं देर से फूल प्राप्त करना होता है।

(ग) शाखाएँ तोड़ना: इसमें अनापेक्षित शाखाओं को निकाल दिया जाता है। इसका उद्देश्य शाखाओं का विकास करना, पौधे की लंबाई रोकना एवं देर से फूल प्राप्त करना होता है।

(घ) डंडिया लगाना: पौधों में बाँस या अन्य किसी लकड़ी या छड़ के सहारे सीधा खड़ा कर बाँधने को स्टेकिंग कहते हैं। इसका उद्देश्य पौधों को उचित दिशा में बढ़ाना होता है।

(2) रासायनिक विधियाँ: पौधे की वृद्धि को रासायनों, जैसे कि बी-नाइन, फॉस्फोन और साइकोसेल द्वारा भी नियंत्रित किया जाता है। पिनचिंग के लिए इमगार्ड 2077 का भी प्रयोग सफलतापूर्वक किया गया है।

(3) कल्चर विधियाँ: पौधे की लंबाई को बढ़ाने के लिए मिट्टी में नमी को बनाये रखें एवं उसे बड़े गमलों में लगायें। कृत्रिम रूप से पौधों के दिन, अवधि एवं तापमान को नियंत्रित कर उचित समय पर फूल प्राप्त कर सकते हैं।

कीड़े एवं बीमारियाँ

जाड़े में एफिड (माहू) की रोकथाम के लिए एक लीटर पानी में 2 मि.ली. मालाथियान दवा की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। पाउडरी मिल्ड्यू एवं उकठा जैसी बीमारियों के लिए केरेन्थान दवा 3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकें तथा काली धब्बे वाली पत्तियाँ को रोकने हेतु डाइथेन-एम 45 का 3 ग्राम/ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव समय-समय पर करना चाहिए।

गोबरैले एवं बग्स बरसात के समय काफी नुकसान पहुँचाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए फालीडॉल या इन्डोसल्फान दवा 2 मि.ली./ली. पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

बीमारी रोधी किस्में बार्नहाल्म, व्हाइट हैरिको इत्यादि को भी लगा सकते हैं।

 

स्त्रोत: रामकृष्ण मिशन आश्रम, दिव्यायन कृषि विज्ञान केंद्र, राँची।



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