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फलोत्पादन में समेकित कीट प्रबंध

फलोत्पादन में समेकित कीट प्रबंध

भूमिका

फलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में विभिन्न कीटों द्वारा होनेवाली क्षति के नियंत्रण हेतु किसानों द्वारा मुख्य रूप से जहरीले रसायनों का अत्यधिक व अविवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जा रहा है, जिससे कई प्रकार की समस्याओं में गौण कीटों का प्रमुख नाशक कीटों में परिवर्तन, कीटों में कीटनाशकों की बढ़ती प्रतिरोधकता, प्राकृतिक शत्रु (परजीवी/परभक्षी) कीटों व परागण करने वाले कीटों पर प्रतिकूल प्रभाव, प्रर्यावरण एवं खाद्य श्रृंखला में प्रदुषण तथा फलों में कीटनाशकों के अवशेष निश्चित मात्रा से अधिक होना इत्यादि प्रमुख है। कीटनाशकों द्वारा फलों के दूषित होने की सम्भावना अपेक्षाकृत अधिक होती है, क्योंकि इन्हे तुड़ाई के तुरन्त बाद उपयोग में लाया जाता है। कीटनाशकों के अत्यधिक व अविवेकपूर्ण प्रयोग करने से मित्र कीटों जैसे मधुमक्खियों, सारकोफेगा, रिफिया, ल्यूसीलिया, एरिस्टेलिस, सिर्फस फ्लाई, काक्सीनेलिड बीटिल, मक्खियों इत्यादि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। परिणामत: फलों के परागण में विध्न उत्पन्न होने से फलों का उत्पादन कम होता है।

देश में किये गये सर्वेक्षणों से ज्ञात हुआ कि बहुत से किसानों को कीटों की सही पहचान, उनके नुकसान करने के तरीके व समय तथा उपलब्ध प्रबंधन तकनीकों का समुचित ज्ञान नहीं है परिणामस्वरूप कीटनाशकों का का प्रयोग करने से कीट नियंत्रण में अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है। अत: कीट नियंत्रण हेतु एक ऐसा सुनियोजित प्रबंधन कार्यक्रम (समेकित कीट प्रबंधन) अपनाने की आवश्यकता है जो पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित तथा क्षति को नियंत्रित करने में सक्षम हो।

समेकित कीट प्रबंधन

समेकित कीट प्रबंधन, फल उत्पादन एवं फल सुरक्षा की मिली-जुली पद्धति है, जिसका मूल सिद्धांत उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाना एवं कीट नियंत्रण के जैविक और रासायनिक विधियों के बीच समन्वय स्थापित करना है। इन विधियों के साथ-साथ कीट नियंत्रण की अन्य वैकल्पिक तरीकों जो समाजिक, आर्थिक एवं प्रर्यावरण की दृष्टि से उचित हो तथा कीटों की संख्या को एक निर्धारित आर्थिक क्षति स्तर से नीचे रखने में मददगार हो, का समावेश ही समेकित/समन्वित या एकीकृत कीट प्रबंधन कहलाता है।

समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत उद्यान स्थापित करते समय स्थान के चुनाव, गड्ढे की खुदाई तथा प्रजातियों के चयन से लेकर फलों की तुड़ाई तक उन सभी पद्धतियों/तकनीकों का प्रयोग इस प्रकार व्यवस्थित ढंग से किया जाता है, जिससे कीटों द्वारा फलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में होने वाली क्षति को नियंत्रित किया जा सके।

समेकित प्रबंधन हेतु प्रमुख घटक

उद्यानों में समेकित प्रबंधन हेतु निम्नलिखित घटकों का प्रयोग किया जाता है-

शस्य क्रियाएँ

कृषिगत क्रियाएँ, समेकित कीट प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण घटक है, जिनका सुनियोजित ढंग से पालन करने पर कीटों की वृद्धि, विकास और जीवन-चक्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप फसल में कीटों का प्रकोप कम होता है। उद्यान में विभिन्न शस्य क्रियाओं के प्रयोग से होने वाले लाभ का किसान समुदाय को समुचित ज्ञान नहीं है। यही कारण है कि समेकित कीट प्रबंधन का महत्वपूर्ण घटक होंते हुए भी कृषिगत क्रिया उपेक्षित है, जिसे प्रोत्साहित कर फलों में कीटनाशकों के प्रयोग को कम किया जा सकता है। फल उद्यानों को क्षति पहुँचाने वाले कीटों का प्रकोप कम करने में निम्नलिखित शस्य क्रिया प्रभावी सिद्ध हुई है-

  1. पौधा लगाते समय कीट अवशेष रहित पौधों का ही प्रयोग करें।
  2. उद्यान स्थापित करते समय सही स्थान, भूमि तथा उच्च कोटि की पौध सामग्री (पौध सामग्री पंजीकृत नर्सरी से प्राप्त करें) का चुनाव एवं उचित दूरी पर रोपण करें। आम, लीची, नींबू बेल, बेर, शरीफा एवं आँवला के लिए अप्रैल-मई तथा आडू एवं नाशपाती जैसे फल पौधों के रोपण हेतु अक्टूबर-नवम्बर माह में गड्ढों की खुदाई करें तथा क्रमश: जून-जुलाई एवं दिसम्बर-जनवरी माह में गड्ढों को भरने से पूर्व उसमें सूखी पत्ती या घास जलाकर गड्ढों को उपचारित कर लें। तत्पश्चात गड्ढों को भर कर पौधों का रोपण करें।
  3. नर्सरी की स्थापना के समय सही स्थान का चुनाव करें एवं उसे बदलते रहें और वनस्पतिक प्रसारण हेतु उपयुक्त एवं रोग कीट रहित मूलवृन्तों का प्रयोग करें।
  4. जब पौधे सुसुप्त अवस्था में रहें तब उनकी कटाई-छंटाई आवश्य करें। कटाई-छंटाई करते समय सूखी, कीटग्रस्त, घनी एवं एक-दूसरे से टकराने वाली टहनियों को काट दें तथा कटे हुए भाग पर चौबटिया पेस्ट अथवा ब्लू कापर का लेप करें। कटाई-छंटाई से पौधों में वनस्पतिक वृद्धि अच्छी होने के साथ-साथ फल लगने वाली शाखाएं भी नियमित बनी रहती है तथा पौधों में प्रकाश का संचार भी सुचारू रूप से होता है, जिसके फलस्वरूप फलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है तथा कीटों का प्रकोप भी कम होता है।
  5. उद्यान की सफाई, पौधों के थोलों की समय पर निराई-गुड़ाई, ग्रसित एवं गिरे हुए फलों को उद्यान से अलग करना, कीटों को आश्रय देने वाले पेड़ की ढीली छाल की सफाई, उद्यान से परपोषी पौधों का निष्कासन करें तथा उचित समय पर पौधों की सिंचाई तथा संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें।
  6. फरवरी-मार्च में पेड़ों के थालों में चारों तरफ 2-3 इंच मोटी सड़ी गोबर की खाद अथवा 6-7 इंच मोटी सूखी पत्ती/घास फैला दें, जिससे गर्मी में नमी सुरक्षित रह सके। जून में थालों में हल्की गुड़ाई करके खाद/पत्ती/घास को मिला दें तथा गुड़ाई के समय मिलने वाले कीटों/सुंडियों को एकत्र कर नष्ट कर दें। फरवरी से अप्रैल के मध्य जब फल वृक्षों में फूल खिल रहें हो, उस समय मधुमक्खियों के 15-20 बक्से प्रति हेक्टेयर में अवश्य रखें। इससे परागण अच्छा होता है तथा फल भी अधिक बनते है। फूल खिलने की अवस्था में किसी भी कीटनाशक का प्रयोग न करें अन्यथा परागण प्रक्रिया पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है।

यांत्रिक क्रियाएँ

आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कीटों के प्रकोप को यांत्रिक विधियों द्वारा कम किया जा सकता है-

  1. आम, अमरुद, आँवला और कटहल के वृक्षों में तना वेधक कीटों की सुंडी सुरंग बनाकर रहती है। इसको नुकीले मोटे तार की मदद से छेदकर नष्ट किया जा सकता है। कोई पेट्रोलियम पदार्थ छेद में भर दें ताकि कीट अंदर में ही मर जाय या छिद्रों को साफ़ करके उसमें मोनोक्रोटोफासका 0.05 प्रतिशत घोल छिद्रों में भर कर उन्हें मिट्टी से लेप दें ताकि लार्वा अंदर ही अंदर मर जाय।
  2. आम के बगीचों में नुकीले गांठ बनाने वाले कीट (शूटगोल) का बहुत अधिक प्रकोप होता है। यदि आम की प्रभावित शाखाओं को नवम्बर माह में तोड़कर नष्ट कर दिया जाय तो इस कीट के प्रकोप में कमी आ सकती है।
  3. व्हाइट ग्रव (कुरमुला कीट) के बीटिल जून में प्रथम वर्षा के बाद जमीन से निकलते हैं और अगस्त तक विभिन्न फल वृक्षों की पत्तियों एवं फलों को खाकर क्षति पहुँचाते हैं। रात्रि में यह कीट प्रकाश की ओर बहुत आकर्षित होता है। इसलिए बगीचों में पेट्रोमैक्स को रात्रि में जलाकर चौड़े बर्तन में, जिसमें मिट्टी का तेल सहित पानी मिला हो, रख दिया जाय तो इसकी रोशनी से बीटिल आकर्षित होते है और बर्तन में गिरकर मर जाते हैं।
  4. स्केल कीट/मिली वग से प्रभावित अमरुद के पौधों की टहनियाँ को काटकर जला देना चाहिए। कीटों से ग्रसित गिरे हुए अमरुद के फलों को एकत्रित करके नष्टकर देने पर अनार बटरफ्लाई एवं फलमक्खी के प्रकोप से निजात मिल जाती है।
  5. आम का दहिया कीट पेड़ के जड़ों के पास जमीन में अंडे देती है। शिशु निकलने के बाद नवम्बर-दिसम्बर माह में पेड़ पर चढ़ते है इन्हे वृक्षों पर चढ़ने से रोकने के लिए 20 सें.मी. चौड़ी अल्काथीन (800 गेज मोटी) की पट्टी 30 सें.मी. जमीन से ऊपर तने के चारों और लपेट दी जाय तथा दोनों किनारों को कीचड़ के सहारे तना से सटा दिया जाय। ऐसा करने से ये कीट चिकनी सतह पर नहीं चढ़ पते हैं तथा पौधें इनके आक्रमण से मुक्त रह जाते हैं।
  6. आम में फल मक्खी का आक्रमण होने पर एक चौड़े मुँह की बोतल लें तथा उसमें 30-5 ग्रा. गुड़ + एक ली. पानी + 2 मि.ली. मैलाथिपान कीटनाशक डाल दी जाय। प्रत्येक पेड़ में 1-2 बोतल लगा दी जाय तो इसमें मक्खियाँ फँसकर मर जाती है।
  7. लीची माइट से प्रभावित टहनियों को काट कर जला देना चाहिए ताकि कीट नष्ट हो जाय।
  8. लेमन वटर फ्लाई के लार्वा को हाथ से पकड़कर मार देना चाहिए।

जैविक नियंत्रण

जैविक नियंत्रण, समेकित कीट प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसका सफलतापूर्वक प्रयोग कीटों के प्रबंधन में प्रभावी, संतुलित एवं स्थाई सिद्ध हुआ है। इसके प्रयोग से पारिस्थितिक तंत्र के दूसरे तत्वों को हानि नही पहुँचती है। जैविक नियंत्रण में हानिकारक कीटों के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे परजीवी, परभक्षी और रोगाणुओं को खोजकर इक्ट्ठा कर तथा प्रयोगशाला में अधिक संख्या में उत्पादन कर, कीटों के विरुद्ध उचित समय पर छोड़ा जाता है, जो हानिकारक कीटों के अण्डों, सुंडियों तथा प्रौढ़ों को नष्ट कर देते है। जैविक नियंत्रण की सफलता के लिए किसानों को मौसम, फसल, कीट, परजीवी/परभक्षी तथा सुरक्षित कीटनाशकों इत्यादि के विषय का सही ज्ञान आवश्यक है।

फल उद्यानों में प्रमुख कीटों के प्रभावी परजीवी

फल वृक्ष

कीट का नाम

परजीवी

प्रयोग विधि

आम

हॉपर

 

 

गॉल मीज

पायरील्लोक्सेनोस

पराकम्पक्ट्स

 

एनकार्सिया

पार्निसिओसी

2-3 पौड/हॉपर

 

 

2000 पौंड/ग्रसित पेड़

सेव

सन्जोस

 

 

 

 

यूली एफिड

 

कोडलिंग

एनकार्सिया

पार्निसिओसी

एफ़ाड्रिटिस प्रोक्लिआ

 

एफेलिन्स

 

ट्राइकोग्रामा

 

एम्बियोफेगम

2000 पौंड/ग्रसित पेड़

 

50 पौंड/ग्रसित पेड़

 

1000 पौंड/ग्रसित पेड़

 

 

 

2000 पौंड/ग्रसित

 

समेकित कीट प्रबंधन में प्राकृतिक शत्रुओं का प्रयोग अन्य विधियों के साथ किया जाय तो कीट नियंत्रण में अपेक्षित सफलता मिलती है तथा कीटनाशकों का प्रयोग भी कम करना पड़ता है। लेकिन अभी भी इन प्राकृतिक शत्रुओं की उत्पादन तकनीक को और अधिक कारगर बनाने की आवश्यकता है, जिससे इन्हे व्यवसायिक स्तर पर उत्पादित करके किसानों को आसानी से उपलब्ध कराया जा सकें।

प्राकृतिक शत्रुओं के प्रयोग के साथ-साथ इनका संरक्षण भी आवश्यक है। प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण हेतु उद्यानों में कृषि क्रियाओं को करते समय इनके आवासों एवं खाद्य पदार्थो को नष्ट होने से बचाना चाहिए। आम में फूल आने के समय मल्लादा बोनीनेनसीस एवं क्राइसोपा, लकीपरदा (परभक्षी) फरवरी से मार्च के मध्य प्रकृति में बहुत सक्रिय रहते हैं तथा इस अवधि में मधुआ कीट का भक्षण करते हैं। इसी प्रकार उत्तरांचल के पर्वतीय क्षेत्रों के सेवा में कोक्सिनेला संपटमपंकटाटा (परभक्षी) मार्च से जून के मध्य प्रकृति में बहुत अधिक सक्रिय होते हैं तथा इस अवधि में यूली एफिस एवं थ्रिप्स कीट का भक्षण (नियंत्रण) करते हैं। अत: इस अवधि में बहुत आवश्यक होने पर ही सुरक्षित कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे इन परभक्षी कीटों की सक्रियता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ सकें।

फल उद्यानों में प्रमुख कीटों के प्रभावी परभक्षियों का विवरण

आम

हॉपरएव मिली बग

कोक्सिनेला सेप्टमपंकटाटा

30-50 पौड/ग्रसित पेड़

अमरुद

ग्रीन साईलड

स्केल

ऐफिड

क्राईप्टोलेमस मोनट्रोजाईरी

कोक्कोफेगस सेरोप्लासटेट

कोक्सेनेलिड एवं सरफीड्स प्रजाति

10-20 विटिल/ग्रसित पेड़

10-20 विटिल/ग्रसित पेड़

अंगूर

ग्रीन सईलड स्केल

कोक्सिनेला सेप्टमपंकटाटा

30-50 पौड/ग्रसित पेड़

सेव

सनजोस स्केल

 

 

यूली एफिड

थ्रिप्स

काईलोकोरस बिजुगस

चीलोकोरस बिजुगस

 

कोक्सिनेला सेप्टमपंकटाटा

एंथोकोरिस

50 पौंड/ग्रसित पेड़

20 पौंड/50 ग्रव प्रति ग्रसित पेड़

30-50 पौंड/ग्रसित पेड़

30 50 ग्रव/ग्रसित पेड़

नींबू

मिली वग लीफ माइनर सफेद मक्खी तना पाइलीड वर्ग एवं एफिड

ग्रीन लेस वींग (माल्लादा वोनोनेनसीस)

30 लावा/ग्रसित पेड़

 

ट्राइकोग्रामा

यह एक बहुभक्षी परजीवी है। इन परजीवियों के द्वारा प्राय: लिपीडोपटेरा वर्ग के कीटों का नियंत्रण होता है। फलों में कीट नियंत्रण हेतु इनका उपयोग अन्य फसलों की अपेक्षा बहुत ही कम हुआ है। ट्राइकोग्रामा हानिकारक कीटों के अण्डों में अपने अंडे देकर अपना जीवन चक्र उसी में पूरा करते है। अण्डों के निषेचन होने पर ट्राइकोग्रामा के लार्वा कीटों के अण्डों के भ्रूण को खाकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। ट्राइकोग्रामा का वयस्क अण्डों में छेदकर बाहर निकलता है। इस प्रकार कीटों को अंडें की अवस्था में ही समाप्त किया जा सकता है। ट्राइको ग्रामा की आपूर्ति कार्ड के रूप में होती है। एक कार्ड पर लगभग 20,000 अंडे होते है। यह कार्ड “ट्राइकोकार्ड” के नाम से जाना जाता है। ट्राइकोकार्ड विभिन्न नामों जैसे पारास्ट्रीप, इज्यनील, टी-कार्ड, ट्राइकोकार्ड, ई.वी. ट्राइकोकार्ड इत्यादि के नामों से उपलब्ध है। ट्राइको कार्ड प्रजाति के 50,000 से 100,000 अंडे प्रति हेक्टेयर की दर से लेपीडोपटेरा वर्ग के कीटों के नियंत्रण हेतु प्रयोग किया जाता है। आम के गॉल मींज कीटों के नियंत्रण हेतु ट्राइकोग्रामा मटीडई का प्रयोग प्रभावी सिद्ध हुआ है।

ट्राइकोग्रामा का प्रयोग सुबह या शाम के समय में करना चाहिए जब हानिकारक कीटों के अंडे पौधों पर मौजूद हों। ट्राइकोग्रामा प्रयोग के समय किसी रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

जैविक कीटनाशकों का उपयोग

समेकित कीट प्रबंधन में सूक्ष्मजीवों जैसे जीवाणु, विषाणु, प्रोटोजोआ, कवक, रिकेट्रसी और सूत्रकृमि का प्रयोग जैविक कीटनाशकों के रूप में किया जाता है।

बैक्टीरिया (जीवाणु)

कीटों में रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं में बैसिलस की प्रजातियाँ प्रमुख है। फल उद्यानों में कीट नियंत्रण हेतु बैसिलस थूरिनाजिएन्सिस का प्रयोग प्रभावी सिद्ध हुआ है। बी.टी. का सक्रिय तत्व क्रिस्टलीय डेल्टा-एंडोटाक्सिन है। यह लेपिडोपटेरा वर्ग के कैटरपीलर (लावी) की भक्षण क्रिया पर तुरन्त ही रोक लगाता है। अत: कीट 1-3 दिन के अंतर मर जाते है। बी.टी. व्यापारिक रूप बायोलेप, वायोसेप, बायोबिट, हाल्ट, डेल्फिन इत्यादि नामों से बाजार में उपलब्ध है। इनका उपयोग टैंट कैटर पिलर, इंडियन जिप्सी मॉथ, कोडलिंग मॉथ, आम एवं सेव का फल मॉथ आदि कीटों के नियंत्रण में किया जाता है। बी.टी. का प्रयोग लार्वा की प्रारंभिक अवस्था में (अर्ली इन्सटार कैटरपिलर) अधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है तथा इनकी 1.0-1.25 कि.ग्रा. मात्रा 500-700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव किया जाता है।

वायरस (विषाणु)

यह भी कीटों में रोग उत्पन्न करता है। फलों में कीट नियंत्रण हेतु अब तक वायरस का प्रयोग अन्य फसलों की तुलना में बहुत कम हुआ है। लेकिन हाल के वर्षो में सेव के कोडलिंग माथ कीट के नियंत्रण के लिए ग्रनुलोसिसवायरस का प्रयोग सफल सिद्ध हुआ है। इसका उपयोग 8 X 107 वायरस पाली हेड्रा/मि.ली. की दर से फस वृक्षों पर छिड़काव किया जाता है।

कवक

फल वृक्षों के कीटों में रोग उत्पन्न करने वाले कवक में मुख्यत: भरटीसेलियम लेकनी, वोभेरिया वेसियाना, इन्टोमोफथोरा प्रजाति एवं एक्टोमायसिस प्रजाति प्रभावी पाये गये हैं। जैसे- आम का मधुआ एवं मिली वग एवं अमरुद के माहू कीट के नियंत्रण हेतु भरटीसेलियम लेकनी का प्रयोग सफल सिद्ध हुआ है एवं इसका छिड़काव 1 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से किया जाता है।

वानस्पतिक कीटनाशकों का उपयोग

पौधों से प्राप्त रसायन, जिनमें कीटनाशक गुण होते है, “वनस्पतिक कीटनाशक” के नाम से जाने जाते है। इन पौधों में नीम, तम्बाकू, करंज, महुआ इत्यादि प्रमुख है। लेकिन इनमें से नीम एवं करंज पर आधारित कीटनाशकों का प्रयोग फलों के कीट नियंत्रण में प्रभावी सिद्ध हुआ है। यह बाजार में कई रूपों में जैसे – निमरिन, निम्बीसिडीन, अचूक, एजाडिट, निमेकटीन, नीमएजल, बायोनीम, रक्षक इत्यादि नामो से उपलब्ध है तथा इसकी 2-3 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग में लाई जाती है। नीम पर आधारित कीटनाशकों का प्रयोग भी जैविक कीटनाशकों की तरह लेपीडोपटेरा वर्ग के लार्वा की प्रारंभिक अवस्था में कारगर सिद्ध हुआ है। यदि जैविक कीटनाशकों का प्रयोग, नीम पर आधारित एवं सुरक्षित कीटनाशकों के साथ सुनियोजित ढंग से किया जाये तो न केवल कीटों को आर्थिक क्षति स्तर से  नीचे रखा जा सकता है, बल्कि जहरीले रसायनों के प्रयोग को भी कम किया जा सकता है। कीट प्रबंधन में वानस्पतिक कीटनाशकों के प्रयोग को व्यावसयिक स्वरूप देने हेतु और अधिक महत्व देने की आवश्यकता है, क्योंकि इनके प्रयोग से प्राकृतिक शत्रुओं और परागण करने वाले कीटों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है तथा फलों के प्रदूषित होने की सम्भावना भी नही रहती है।

रसायनिक कीटनाशकों का उपयोग कब और कैसे करें

यह सत्य है कि रासायनिक कीटनाशकों का कीट नियंत्रण के साथ-साथ फलों की उत्पादकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण योगदान है तथा भविष्य में भी कीट प्रबंधन का एक प्रमुख घटक रहेगा। लेकिन विगत वर्षो में रसायनिक कीटनाशकों का प्रयोग उस समय किया जाये जब अन्य विधियों के प्रयोग से कीट नियंत्रण में अपेक्षित सफलता न मिले तथा फलों को आर्थिक नुकसान होने की सम्भावना हो। बगीचों में रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग कम करना तभी सम्भव हो सकेगा जब किसान कीटों की सही पहचान तथा उनके नुकसान करने का समय व ढंग के संबंध में समुचित ज्ञान प्राप्त करें और उद्यानों की निरंतर निगरानी करते रहें। इससे कीटों के आगमन एवं प्रकोप के स्तर की जानकारी प्राप्त होती रहेगी, जो अंतत: कीटनाशकों के उचित समय पर छिड़काव, उनके विवेकपूर्ण प्रयोग तथा कीट प्रबंधन में पूर्णरूपेन सहायक सिद्ध होगा। कुछ कीटनाशक ऐसे पाये गये है जिनके विवेकपूर्ण प्रयोग से प्राकृतिक शत्रुओं (परजीवी/परभक्षी), मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है तथा हानिकर कीटों के प्रभावी नियंत्रण में भी अधिक सहायता मिलती है। जैसे इंडोसल्फान, फोसलोन, कार्वेरिल, मैलाथियान इत्यादि। अत: किसान भाईयों को इन्हीं कीटनाशकों के प्रयोग पर ध्यान देना चाहिए।

फल उद्यानों में कीट प्रबंधन हेतु रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग निम्न प्रकार से करना चाहिए -

  1. उद्यान स्थापित करते समय पौधों के रोपाई से पूर्व गड्ढे में 50 ग्राम क्लोरपायरीफास धूल मिलाकर गड्ढे को उपचारित कर लें जिससे गड्ढे में कीटों का नियंत्रण हो सके। रोपाई से पूर्व पौधों के क्लोरपाइरीफास 2 मि.ली./लीटर पानी के घोल में उपचारित कर के ही रोपाई करें।
  2. कटाई-छंटाई के बाद छिड़काव करना उपयुक्त होता है। इसी समय थालों की मिट्टी को दो फुट की चौड़ाई में चारों तरफ से हटाकर क्लोरपाइरीफास 2 मि.ली./लीटर पानी में मिलाकर घोल से जड़ों को सींच देना चाहिए। इस उपचार से पेड़ की जड़ों को नुकसान करने वाले कीटों जैसे दीमक, यूली ऐफिड, वीविल व जड़ छेदक का प्रकोप नहीं होता है। किसानों को यह उपचार प्रत्येक पेड़ में प्रति वर्ष करना चाहिए।
  3. आम में पुष्प कलिकाओं के निकलने के समय मिज कीट या हॉपर का प्रकोप दिखते ही फेनिट्रोथियोन या मोनोक्रोटोफास 1.25 मि.ली. या डाएमेथोएट 1.5 मि.ली. या इमिडाक्लोरप्रिड 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव किया जाना चाहिए।
  4. सेव, नाशपाती, आडू, प्लम एवं चेरी के थ्रिप्स कीट के नियंत्रण हेतु फरवरी-मार्च में फूल खिलने से लगभग 7-8 दिन पहले, गुलाबी कली अवस्था (पिक बड स्टेज) में मिथाइल डिमेंटन 2 मि.ली. या इमीडाक्लोरप्रिड 0.3-0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जिन फसलों में आडू के लीफ कर्ल एफिड के नियंत्रण हेतु कीटनाशक का छिड़काव किया जाता है, उन फसलों में थ्रिप्स के नियंत्रण हेतु कोई छिड़काव नहीं करना चाहिए।
  5. फरवरी-मार्च में आम नवजात फलों के निकलने पर यदि हॉपर कीट का प्रकोप 5-10 हॉपर प्रति पुष्प कली हो तो नियंत्रण के लिए बदल-बदल कर कीटनाशकों यथा कार्बोरिल 3 ग्राम या मोनोक्रोटोफास 1.25 मि.ली. या साइपरमेथ्रीन 1 मि.ली. या इमिडाक्लोराप्रिड 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
  6. आडू के लीफ कर्ल एफिड के नियंत्रण हेतु फरवरी में फूल खिलने से पहले मिथाइल डिमेटान 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
  7. मार्च में आम के खैरा रोग के नियंत्रण के लिए घुलनशील गंधक 2 ग्राम/ली. या कैराथन 2 मि.ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए तथा साथ में तरल साबुन भी मिलाना चाहिए।
  8. टेन्ट कैटरपीलर कीट का प्रकोप मार्च से मई के मध्य होता है। इस अवधि में आम, सेब खूबानी, अखरोट एवं नाशपाती फसलों की निगरानी करना चाहिए तथा आर्थिक नुकसान होने की आशंका में ही इन्ड़ोसल्फान या कार्बोसल्फान 2 मि.ली. पानी में छिड़काव करना चाहिए। आवश्यक होने पर ही दूसरा छिड़काव इनमें से कीटनाशकों को बदल कर करना चाहिए।
  9. बेर, आम एवं अमरुद में फल मक्खी से आर्थिक क्षति होने की संभावना रहने पर साइपरमेथ्रिन 1 मि.ली., क्वीनालफास 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए तथा खाद्य प्रलोभक एवं फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग करना चाहिए।
  10. पत्ती एवं फल खाने वाले कीट का प्रकोप होने की अवस्था में इन्डोसल्फान या क्वीनालफास 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव जिप्सी मोथ के नियंत्रण हेतु कार्बोसल्फान 2 मि.ली. या मोनोक्रोटोफास 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
  11. लीची वग एवं माइट कीटों के नियंत्रण हेतु मोनोक्रोटोफास 1 मि.ली. तथा केल्थेन 1.25 मि.ली. पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
  12. जुलाई के दूसरे पखवारे में आम शल्क कीट या अन्य शल्क कीट जिनका अधिक प्रभाव होता हो को देखते ही मोनोक्रोटोफास 1 मि.ली. या डायमेथोयेट 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यक होने पर 15 दिनों के बाद इनमें से किसी कीटनाशक को बदलकर प्रयोग करना चाहिए।
  13. बेर में बीटिल का प्रकोप दिखाई देने पर कार्बोरिल 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
  14. संतरा में साइला, सफेद मक्खी, काली मक्खी, रेड स्केल एवं कॉटनी कोसिन स्केल कीटों के नियंत्रण के लिए डायमेथोयेट या फेनीट्रोथियोन 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

सावधानियाँ

बगीचों में कीटनाशकों का छिड़काव करते समय किसानों को निम्नलिखित विषयों पर विशेष ध्यान देना चाहिए-

  1. उद्यानों में प्रमुख हानिकर कीटों जैसे मधुआ, फलमक्खी, इंडियन जिप्सी माथ, टेन्ट कैटरपिलर एवं पत्ती व फल खाने वाले कैटरपिलर के प्रकोप होने की अवस्था में फसल की निरंतर निगरानी करते रहना चाहिए तथा आर्थिक नुकसान होने की संभावना रहने पर ही कीटनाशकों का छिड़काव करना चाहिए।
  2. कीटनाशकों का छिड़काव पौधों/वृक्षों पर समान रूप से करना चाहिए तथा कीटनाशकों के घोल में स्टीकर जैसे सैन्डोविट या टिपाल 1 मि.ली. प्रति लीटर कीटनाशक के घोल में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। स्टीकर के प्रयोग से कीटनाशक की 25-30 प्रतिशत प्रभावशीलता बढ़ जाती है।
  3. कीटनाशकों का छिड़काव अधिक धूप अथवा बदली के मौसम में नहीं करना चाहिए। यदि छिड़काव के छ: घंटे के अंदर वर्षा हो गई तो कीटनाशक धुल जाती है और कीटनाशकों का उपयोग पुन: करना पड़ता है।
  4. कीटनाशकों को प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए यह ध्यान रहना चाहिए कि कीटनाशक नया हो और उसे उचित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। कीटनाशक बदल-बदल कर छिड़काव करना चाहिए अन्यथा कीटों में कीटनाशक सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है और इस प्रकार बाद में उस कीटनाशक का प्रभाव कम हो जाता है। जब फूल पूर्णरूप से खिले हो उस समय कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना चाहिए अन्यथा परागण करने वाले कीटों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  5. प्राकृतिक शत्रुओं (परजीवी/परभक्षी) के संरक्षण एवं प्रोत्साहन हेतु यह भी आवश्यक है कि उस क्षेत्र में कार्यरत संगठनों द्वारा मित्र कीटों की कीटनाशक प्रतिरोधी जातियों का विकास किया जाय। जैविक नियंत्रण परियोजना निदेशालय, बंगलौर द्वारा अंड परजीवी कीट, ट्राइकोग्रामा किलोनिस की इन्डोग्रामा प्रजाति विकसित की है जो इन्डोसल्फान के विरुद्ध 0.07 प्रतिशत सांद्रता तक प्रतिरोधी है। इस अंड परजीवी का प्रयोग कई फसलों में लेपीडोपटेरा वर्ग के कैटरपीलर के नियंत्रण में किया जाता है। इन प्रतिरोधी स्ट्रेन का व्यवसायिक उत्पादन इक्सेल इंडस्ट्रीज लिमिटेड, मुंबई द्वारा किया जा रहा है।
  6. कीटनाशकों के उपयोग के पूर्व तैयार फलों को तोड़ लेना चाहिए और छिड़काव के उपरांत 10-15 दिनों के बाद ही फल को उपयोग में लाना चाहिए।
  7. समेकित कीट प्रबंधन में कीटों का निरीक्षण एवं अवलोकन पद्धति का महत्वपूर्ण योगदान है। इस पद्धति के प्रयोग से फल को नुकसान करने वाले कीटों की पहचान, उनके आगमन की सूचना तथा प्रकोप के स्तर की जानकारी प्राप्त होती है जो अंतत: कीट प्रबंधन तकनीकों के क्रियान्वयन में सहायक होता है। राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को कीटों के प्रकोप की अग्रिम चेतावनी/सूचना के प्रसार हेतु प्रयास किये जा रहे है तथा माहू (एफिड), हॉपर, पाइरिला एवं अमेरिकन वालवर्म (कैटरपीलर) इत्यादि कीटों के प्रकोप व प्रभाव का अध्ययन करके किसानों को अग्रिम सूचना उपलब्ध कराने में सहायता भी मिलती है। कीट प्रबंधन में इस पद्धति को और अधिक सुदृढ़ करने तथा व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न संचार माध्यमों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।

उपरोक्त सभी तकनीकों का फल उद्यानों में समय से क्रियान्वयन सुनिश्चित करके कीट प्रबंधन में कीटनाशकों के प्रयोग कम करना ही अहम उद्देश्य है। इसे और अधिक प्रभावी बनाने हेतु विषय विशेषज्ञों और प्रसार-कर्मियों को समय-समय पर प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है, जिससे प्रसार कार्यो के लिए संचालित किये जा रहे प्रदर्शनों, प्रशिक्षणों तथा साहित्य में कीट प्रबंधन तकनीकों का समावेश कर फलों की उत्पादकता व गुणवत्ता में वृद्धि की जा सके तथा फलों के निर्यात हेतु आदर्श मानक स्तर को प्राप्त कर सके।

स्रोत एवं सामग्रीदाता- समेति, कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार



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