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अदरक की वैज्ञानिक खेती

अदरक की वैज्ञानिक खेती

परिचय

विश्व में अदरक की खेती मुख्यतः भारत, चीन, जमैका इत्यादि देशों में की जाती है परन्तु गुणवत्ता के दृष्टिकोण से भारत एवं जमैका में उगाये गए अदरक काफी अच्छे होते हैं। देश के अदंर केरल, उड़ीसा, मेघालय, पश्चिम बंगाल, प्रमुख राज्य हैं, जहाँ इनकी खेती होती है। झारखण्ड में अदरक की खेती मुख्यतः राँची जिले के आस-पास के क्षेत्रों  में काफी दिनों से की जाती है परन्तु फिर भी, किसानों में इसके उत्पादन की वैज्ञानिक जानकारी का अभाव है जिसके फलस्वरूप व्यापक पैमाने पर इसकी खेती आज भी संभव  नहीं हो पाई है।

जलवायु

गर्म एवं नम जलवायु हल्की छायादार जमीन इसके लिए उपयुक्त है। अंकुरण के लिए हल्की वर्षा या लगाने के बाद एक दो सिंचाई आवश्यक है। अंकुरण के बाद लगातार वर्षा तथा फसल तैयार होने के समय सुखा मौसम लाभदायक होता है।

मिट्टी

हल्ली दोमट जीवांशयुक्त मिट्टी, जिसमें पानी का जमाव न हो, अदरक के लिए उपयुक्त है।

लगाने का समय

मुख्य फसल- जून-जुलाई

अगात फसल- मार्च-15 मई

जमीन की तैयारी

पहली बारिश के साथ खेत की जुताई कर दें। 5-6 जुताई के बाद पाता चलाकर जमीन को भुरभुरा बना दें। अंतिम जुताई के समय 20-25 टन गोबर/हेक्टेयर देकर, पाटा चला दें।

बीज की मात्रा

15 से 18  कि०/हेक्टेयर जिसके एक टुकड़े का वजन 2030 ग्राम तथा जो चार फलियों वाला हो।

बोआई की विधि

खेत को 1 मीटर चौड़ी, 6 मीटर लंबी क्यारियों में बाँट ले।

क्यारियां-15 सेंटीमीटर ऊँची

क्यारियों की दुरी- 30 सेंटीमीटर गहराई-5 सेंटीमीटर

उर्वरक की मात्रा

2.5 कि०/हेक्टेयर-यूरिया

3.75 कि०/हेक्टेयर सिंगल सुपर फोस्फेट

175  कि०/हेक्टेयर म्यूरेट ऑफ़ पोटाश

बोआई के समय यूरिया की आधी मात्रा को दें तथा आधी मात्रा को 2-3 महीने बाद, खड़ी फसल में दो बार दें।

बीजोपचार

अदरक के बीज का उपचार आवश्यक है।

मोनकोजेब 3 ग्राम. लीटर+रोगर/मेटासिन-1 मिली०/ लीटर पानी में आधर घंटे तक बीज को डुबोकर रखें, फिर निकाल कर छाया में सुखा लें।

लगाने की दूरी

  • कतार से कतार - 25 सेमी०
  • पौध से पौध -  20  सेमी०
  • बीज बोने के बाद हल्की मिट्टी से ढँक लें तथा क्यारी सूखे खरपतवार/पुआल की मोटी परत से ढँक दे ताकि नमी बनी रहें, साथी ही अंकुरण में सहायता मिले।

अदरक के किस्म

नदिया, जोरहट, थिंगपू, सुप्रभा, सुरुचि।

स्थानीय किस्में

छोटी अदरक तथा बड़ी अदरक

अंकुरण

बोने के 1-12 दिन बाद, जो 2-3 सप्ताह तक चलता रहता है।

निकाई गुड़ाई

3-4 बार, खरपतवार निकाल कर,  यूरिया डाल दें।

फसल तैयार

8 से 10 महीने बाद, गुच्छों में फल की कोड़ाई कर दें। 1-2 दिन छाया में सुखाने के बाद बाजार में बेचें।

उपज

150 कि०/हेक्टेयर

अदरक के लिए समेकित कीट प्रबन्धन

मुख्य क्षतिकारक

क्षतिकारक कीट

क. अंकुर छेदक (शूट बोरर)

ख. कद मक्खी (राजजोम फ्लाई)

बीमारियाँ/रोग

क. कंद/हल्की सड़न

ख. पत्तों में धब्बे

खरपतवार

क. डक्टीलक्टेनियम एजिप्शीयम

ख. ट्रायन्थेमा पोर्तुलैकस्ट्रम

ग. पैनिकम रिपेन्स

क्षेत्रीय/कम महत्व के क्षतिकारक कीट

क्षतिकारक कीट

क. सफेद सुंडी (व्हाइट ग्रब)

ख. पतिंगा (स्किपर)

ग.  खपड़ी दार की (स्केल)

बीमारियाँ /रोग

क. जीवाणवक मुरझाना (बैक्टीरियल विल्ट)

ख. आवरण चित्ती /पत्तों  में चित्ती शीथ/लीफ ब्लाईट )

ग.  सूखा सड़न (ड्राइ रॉट)

कीट अनुश्रवण

फसल क्षतिकारक अनुश्रवण का उद्देश्य  खेतों में फसल क्षतिकारक एवं रोगों के प्रारंभिक विकास का अनुश्रवण करना है।  क्षतिकारक/रोग की घटनाओं में वृद्धि/कमी की प्रवृत्ति एंव जीव नियंत्रण संभावना की उपलब्धता को  आंकने के लिए विस्तार एजेंसियों तथा कृषकों को कीट/रोगों एवं जीव नियंत्रण जीव जन्तु/वनस्पति के लिए खेत का अवलोकन पखवारे में एक बार करना चाहिए।

अतएव विकास के विभिन्न चरणों के अंतर्गत सुनिश्चित  अंतराल में फसल क्षतिकारकों एवं रोग की घटनाओं के अवलोकन हेतु कृषकों को खेत की निगरानी के लिए गतिशील किया जा सकता है। पौधा संरक्षण के उपाय तभी किये जाने की आवश्यकता है जब खेत की निगरानी  के फलस्वरूप  फसल क्षतिकारक एंव रोग प्रारंभिक  स्तर ( ईटी एल) पार  करते हैं।

समेकित फसल क्षतिकारक  प्रबन्धन रणनीतियाँ

कृषीय अभ्यास

  1. खेतों की गहराई जोताई
  2. 20-30 दिनों तक क्यारियों को धूप मिलना फसल क्षतिकारकों एवं रोगों के गुणन को नियंत्रित करने में लाभदायक है।
  3. बीज के लिए फसल कटाई के फौरन बाद कीट/जन्तु –संक्रमण से मुक्त बड़े, सुडौल कंद का चुनाव किया जा सकता है।
  4. बीज के कंद उथली क्यारियों में, अच्छी तरह सड़े हुए पशु खाद अथवा ट्राईकोडरमा स्पीसीज (ट्राईकोडरमा से संचारित 10  ग्राम कम्पोस्ट) के साथ मिश्रित करके एक दूसरे से एवं एक से दूसरी क्यारी के बीच 20-25 से. मी. की दूरी पर लगाये जा सकते हैं।
  5. संतुलित/अनुशंसित खाद/उर्वरक को मिट्टी  जांच  रिपोर्ट  के अनुसार  उपयोग किया जाना चाहिए।
  6. अदरक की क्यारी को प्रति हेक्टेयर 10-12 टन हरी पत्तियों से ढंकना अनिवार्य है। 40 एवं  90 दिनों के बाद निकाई एवं मिट्टी को धूलने से बचाने के लिए, उर्वरक लगाने के फौरन बाद, प्रति हेक्टेयर 5 टन हरी पत्तियों से ढकना मिट्टी को नमी को संरक्षित करता है खरपतवार के विकास को रोकना और मिट्टी के भौतिक गुणों को सुधारता है।
  7. सूक्ष्म जैविक गतिविधियों एवं पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढाने के लिए प्रत्येक ढंकने की क्रिया के बाद गोबर क पतला घोल अथवा तरल क्यारी के ऊपर उड़ेला जा सकता है।
  8. उर्वरक डालने एवं ढंकने के ठीक पहले निकाई की आवश्यकता  होती है। दो से तीन बार की निकाई आवश्यक है जो खरपतवार के उगने की तीव्रता पर निर्भर करता है।
  9. प्रति हेक्टेयर 2 टन  की दर से नीम-खल्ली  लगाना।
  10. जमा हुए पानी को बाहर निकालने तथा मिट्टी के रोग कम करने के लिए भी प्रत्येक क्यारी के बीच नालियों की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  11. अदरक को अन्य फसलों जैसे कसावा, मिर्च, धान, जिंगली, रागी, मूंगफली मक्का एवं सब्जियों के साथ लगाया जाना चाहिए।
  12. कंद-सड़न के विरुद्ध, मरान सुआस, नदिया, नरास्पत्तनम, वेंजुआना, वायनाड लोकल, डब्ल्यू मन्नोनटोडी, कुरुप्पमपडी, जैसी प्रतिरोधी प्रजाति उगाना।

यांत्रिक अभ्यास

  1. जमीन तैयार करते समय क्यारियों पर सूर्य की तेज धूप पड़ना जैविक क्रिया के कारक कीट तथा रोग को नियंत्रित करने में लाभदायक है।
  2. अंकुर छेदकों के व्यस्क पतिंगों को आकर्षित एवं एकत्रित करने के लिए हल्का जाल उपयोगी होगा।
  3. जल जमाव से बचने के लिए समुचित नाली प्रणाली प्रदान करें ताकि हल्के सड़न अथवा कंद के सड़न को नियंत्रित किया जा सके।
  4. यदि हल्का कंद सड़न दिखाई देता है तो प्रभावित  खंड को उसके आसपास की मिट्टी के साथ सावधानीपूर्वक  निकाल देना चाहिए (क्योंकि यह मिट्टी जनित रोग है) ताकि फैलाव कम किया जा सके।
  5. यदि संक्रमण अधिक न फैला हो तो मुड़े हुए पत्तों को पहचान कर पत्ते मोड़ने वाले लार्वा को इकट्ठा करने का सुझाव दिया जाता है।
  6. रोपने के लिए स्वस्थ कंद का  उपयोग तथा मरे हुए पौधों एवं प्रभावित्त कंदों को पहले ही निकाल देने से कंद मक्खियों का प्रकोप कम होता है।
  7. उभरने एवं नष्ट करने के दौरान वयस्क सफेद सुंडी को यांत्रिक रूप से संग्रहित करना।

जैविक नियंत्रण अभ्यास

  1. हल्के सड़न/कंद सड़न से बचाव के ली रोपने के समय ट्राईकोडरमा स्पीसीज का प्रयोग किया जा सकता है।
  2. चूँकि ढंकने से अंकुर छेदक का प्रकोप कम हो सकता है  लंटाना कमारा और वाईटेक्स निगोन्डो का इस्तेमाल करना चाहिए।
  3. प्राकृतिक जैविक एजेंट जैसे मादा पक्षी मृंग, मकड़ा, चेरी स्पोएड्स, ट्राईकोग्रामाटिड्स इत्यादि को संरक्षित करें।
  4. लेपिडोपटेरन्स के लिए प्रति सप्ताह, प्रति हेक्टेयर 50, 000 की दर से ट्राईको गामा चिलोनिस मुक्त करना।

रासनायिक नियंत्रण अभ्यास

  1. यदि अंकुर छेदक दिख जाए तो नीम के तेल (0.5%) का छिड़काव  15 दिनों के अंतराल पर करें अथवा डायमेथोएट या क्विनाल्फोस (0.5%)  छिड़कें।
  2. हल्के सड़न/कंद नियंत्रित करने के लिए रोग नियंत्रित  उपयोग किया जा सकता है।
  3. पत्तों को मोड़ने वाले कीड़ों को नियंत्रित करने के लिए कार्बाराइल  (0.1%) का छिड़काव करें।
  4. कंद के खपड़ी दार कीट से छुटकारा पाने के लिए भण्डारण/रोपने से पहले बीज कंद को   क्विनाल्फोस (0.1%) में दो बार डुबोएं।
  5. कंद मक्खी के विरुद्ध डायमेथोएट या क्विनाल्फोस का छिड़काव प्रभावकारी  है।
  6. कंद सड़न प्रबन्धन के लिए 4 ग्राम प्रति किलो की दर से कंद का मेटालेक्सील एमजेड से उपचार एवं मेटालेक्सील एमजेड के साथ  मिट्टी को अच्छी तरह मिलाएं।

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार



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