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बागवानी फसलों के लिए सूक्ष्म सिंचाई

बागवानी फसलों के लिए सूक्ष्म सिंचाई

भूमिका

सूक्ष्म सिंचाई एवं उन्नत सिंचाई प्रणाली है जिसके द्वारा पौधों के जड़ क्षेत्र में विशेष रूप से निर्मित प्लास्टिक पाइपों द्वारा कम समय अंतराल पर पानी दिया जाता है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में निम्न साधन होते हैं।

  • सूक्ष्म/छिड़काव यंत्र
  • वितरण लाइने और साज-समान
  • कंट्रोल हैड प्रणाली
  • उर्वरक टैंक
  • साज-समान

सूक्ष्म सिंचाई के गुण व दोष

  1. इस प्रणाली में 40-60% सिंचाई जल की बचत होती है।
  2. फसल की उत्पादकता में 40-60% वृद्धि होती है।
  3. उत्पाद की गुणवत्ता उच्च होती है।
  4. मजदूरी खर्च में कमी होती है।
  5. जड़ क्षेत्र में नमक एकत्र होने की संभावना कम हो जाती है।
  6. रोगों के प्रकोप में कमी आ जाती है।
  7. सिंचाई जल के साथ घुलनशील रसायनों एंव उर्वेरकों का उपयोग आसानी से किया जा सकता है।

इस प्रणाली को अपनाकर यदि उर्वरक दिया जाए तो इससे काफी बचत होती है। इस प्रणाली के गुण के साथ कुछ दोष भी हैं जैसे-आरंभिक अवस्था में पाइप लाइन तथा आवश्यक तन्त्रों में अधिक निवेश होता है। कभी-कभी किसी कारणवश छिद्र बंद हो जाते हैं। इनके अलावा कभी-कभी पाइप तथा पुर्जों की चोरी हो जाती है।

सूक्ष्म सिंचाई का विकास

इस प्रणाली पर सबसे पहले जर्मनी में सन 1860 में कुछ कार्य किये गये। इसके बाद सन 1913 में अमेरिका के कालोरेड़ो में श्री हॉउस द्वारा एक अध्ययन किया गया। इसी तरह सन 1920 में जर्मनी में एक महत्वपूर्ण सफलता टीवी मिली जब छिद्र वैल पाइप से ड्रिप सिंचाई आंरभ की गई। सिम्बा ब्लास नामक एक इजरायली इंजीनियर ने सन 1940 में यह देखा कि नल के निकट जो वृक्ष था वह नया वृक्षों की तुलना में अधिक विकसित तथा। कारण अधिक विकसित वृक्ष को नल से रिसता हुआ जल सिंचाई के रूप में उपलब्ध हो रहा था।

इस प्रणाली  में सन 1960 के वास उत्तरोतर वृद्धि पाई गई। अमेरिका, आस्ट्रलिया, इजराइल, मैक्सिको में व्यापक रूप में तथा कनाडा, साइप्रस, फ्रांस, ईरान, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, ग्रीस और भारत में यह प्रणाली अंशतः अपनाई गई। सन 1960 में मात्र 40 हेक्त्तेयर  क्षेत्र ड्रिप सिंचाई के अधीन था जो सन 1975 में बढ़कर 54,000, हेक्टेयर हो गया। इस प्रणाली के अधिक सिंचित क्षेत्र 4,12,760 हेक्टेयर था वह सन 1986  में बढ़कर 10.81,631 हेक्टयेर तथा सन 1998 में 26,71,५६१ हेक्त्टेयर हो गया । उपरोक्त आंकड़े यह बताते हैं कि करीब 18 वर्षों में छह से सात गुना वृद्धि सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत हुई।

भारत में भी सूक्ष्म सिंचाई विधि  किसी न किसी रूप में की जाती है, हालाँकि इसका रूप विभिन्न राज्यों में अलग-अलग है। साथ ही इस प्रणाली में काम आने वाली सामग्रियां विशेषकर छिद्र वाले पाइप के रूप स्थानीय सुलभ वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। जैसे उत्तर पूर्व के पर्वतीय राज्यों के निवासी खोखले बांस में छिद्र  कर पाइप की जगह इस्तेमाल करते है। मेघालय के निवासी पहाड़ी ढलानों पर इस पाइप का प्रयोग कर प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पानी की दिशा मोड़कर जंगली पेड़ों पर लगे पान एवं कालीमिर्च की लताओं या अन्य पौधों की सिंचाई करते हैं। महाराष्ट्र के किसान मिट्टी से निर्मित पाइप तथा राजस्थान के किसान रिसने वाले मिट्टी के घड़े का उपयोग फलों एवं सब्जियों के खेत की सिंचाई के लिए करते हैं। कहीं-कहीं पर चीनी मिट्टी से बने छिद्र युक्त पाइपों का प्रयोग किया जाता है।

भारत में सूक्ष्म सिंचाई पर शोध कार्य

भारत में इस प्रणाली पर शोध कार्य कई संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है कृषि अनुसन्धान परिषद एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालय में अनुसन्धान का मुख्य ध्येय फसलों की जल मांग प्रणाली के लेआउट एवं डिज़ाइन लागल एवं  लाभ रहा है। कृषि में प्लास्टिक से बने पदार्थों के उपयोग विषय पर विभिन्न परियोजनाएं चलाई जा रही हैं जैसे- अखिल भारतीय  समन्वित अनुसन्धान परियोजना जल प्रबन्धन पर अखिल भारतीय  समन्वित अनुसन्धान परियोजना तथा डिप्र नेट परियोजना। विभिन्न जलवायु में स्थित प्लास्टिक कल्चर विकास केन्द्रों के माध्यम से कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा भी प्रयोग का तुलनात्मक विवरण सारणी-२ में दिया गया है। सारणी से इस बात पता चलता है कई विभिन्न जलवायु एवं फसल में सूक्ष्म सिंचाई से 84% पानी की बचत हो सकती है और पैदावार में 60% वृद्धि हो सकती है।

प्लास्टिक कल्चर विकास केन्द्र

कृषि में प्लास्टिक पदार्थों के ऊपयोग के संबध में राष्ट्रीय समिति ने 22 विकास केन्द्रों की स्थापना  भारतीय कृषि अनुसधान परिषद द्वारा संबंधित प्लास्टिक कल्चर विकास केन्द्रों के रूप में जानी जानी थी। इस समय प्लास्टिक पदार्थों के उपयोग पर राष्ट्रीय समिति 16 प्लास्टिक विकास केन्द्रों के कार्यकलापों का समन्वय कर रही है। इस कार्य के लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था कृषि मंत्रालय की प्लास्टिक योजना के अंतर्गत की जा रही है। केन्द्रीय सिंचाई एवं विद्युत बोर्ड के अंतर्गत भी दस और प्लास्टिक कल्चर विकास केन्द्रों की स्थापना की गई है। सूक्ष्म सिंचाई भारतीय कृषि अनुसधान परिषद द्वारा शोध कार्य भारतीय कृषि अनुसधान परिषद द्वने विभिन्न फसलों में सूक्ष्म सिंचाई के उपयोग पर अनुसन्धान करने हेतु एक ड्रिप नेट परियोजना आंरभ की है। इस परियोजना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:

क) फलदार फसलों में ड्रिप सिंचाई दक्षता का मुल्यांकन

ख) फसल विनिमयन, पौष्टिक गुणों और गीलेपन के स्वरूप का मूल्यांकन करना।

ग) फसल विकास के विभिन्न अवस्थाओं पर उर्वरक उपयोग की तकनीकी को मानक करना।

सरकार द्वार सूक्ष्म सिंचाई पर किये जा रहे विकासात्मक कार्य

यह अनुमान लगाया गया है कि देश में लगभग 2.7 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र ड्रिप सिंचाई के अनुकूल है। आठंवी योजना के दौरान आरंभ की गई प्रमुख योजनाओं में कृषि में प्लास्टिक के उपयोग संबंधी केन्द्रीय प्रायोजित योजना भी एक थी, जिसका परिव्यय 250 करोड़ रूपये था। देश में ड्रिप/सूक्ष्म सिंचाई के लिए 200 करोड़ रूपये की राशि निर्धारित की गई थी। सरकार छोटे और सीमांत/अनु.जाति/अनु.जनजाति और महिला कृषकों के लिए बागवानी फसलों में ड्रिप सिंचाई संबधी उपकरणों की स्थापना के लिए कुल लागत के 90% अथवा 25,000 रूपये प्रति हेक्टेयर जो भी कम हो और सामान्य वर्ग के किसानों के लिए कुल लागत के 70% अथवा 25,000 रूपये जो भी कम हो, सहयता दी गई थी। इस प्रणाली प्रदर्शन के लिए सरकारी सहायता 22,500 रूपये हेक्टेयर दी गई थी। इस प्रणाली पर कुल लागत का 75% जो भी कम हो, देने की व्यवस्था थी। नवीं योजना के दौरान, 375 करोड़ राशि निर्धारित किया गया तथा सहायता में सुधार की गयी है जिसके अनुसार कुल राशि का 50% देय होगा।

सरकार की इस उदार सहायता से केवल केन्द्रीय सरकार की योजना के अंतर्गत देश में ड्रिप सिंचाई के अंतर्गत २.38 लाख हेक्टयेर क्षेत्र लाया जाना संभव हो सका है। वर्ष 1999-2000 के दौरान सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत 40.000 हेक्टेयर वर्षवार कवरेज ग्राफ में दर्शाया गया है। बागवानी फसलों के अंतर्गत औसतन 30,000 हेक्टेयर क्षेत्र प्रतिवर्ष  ड्रिप सिंचाई के अंतर्गत लाया जा रहा है।

भारत सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकी के उपयोग करने वाले प्रमुख देशों में अपना विशेष स्थान बना चूका है।

महाराष्ट्र सरकार न अपनी राज्य योजना के माध्यम से ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयोप्त प्रयास किए हैं इसके परिणामस्वरुप राज्य में ड्रिप सिंचाई के अंतर्गत लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र लाया गया है।

सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाये गये क्षेत्र का लगभग 22% नारियल के अंतर्गत रहा है इसका मुख्य करण इस फसल की बड़ी मात्रा में जल की आवश्कता 100 लीटर प्रतिदिन और इसके व्यापक अंतराल 7.5 x7.5 मीटर के कारण अपेक्षित कम साधन है। पपीता, स्ट्राबेरी, आमरुद फसलो आदि के अंतर्गत काफी क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली में लिया गया है। अन्य फसलों आम, अंगूर, नीबू वर्गीय और केला है।

सूक्ष्म सिंचाई कार्यक्रम का प्रभाव

इस योजना के ड्रिप/ सूक्ष्म सिंचाई घटक का मूल्याकन 1997-98 के दौरान कृषि वित्त निगम लिमिटेड के माध्यम से किया गया था। इस आध्ययन में आंध्रप्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा और तमिलनाडु राज्यों में 26 जिलों में फैले लगभग 3900  किसानों को लिया गया। इस अध्ययन से पता चला कि ड्रिप सिंचाई के अंतगर्त 1985 में 1500 हेक्टेयर से बढ़कर अप्रैल 1998 तक 1.86 लाख हेक्टेयर क्षेत्र  हो गया। उपरोक्त अवधि में कुल तीन लाख हेक्टेयर क्षेत्र ड्रिप सिंचाई संबधी राज्य क्षेत्र की योजना के अंतर्गत लिया गया क्षेत्र भी शामिल है। इस अध्ययन से यह भी पता चाल कि ड्रिप प्रणाली लगाए जाने के बाद लाभाविन्त किसानों ने निविवाद रूप से अधिक आमदनी वाली बागवानी फसलें जैसे  अंगूर, नीबू वर्गीय और जैसी अनार जैसी फसलों के लिए राज्य में औसत उपज की तुलना में ड्रिप सिंचाई अपनाने से अंगूर एवं अनार के उत्पादन में क्रमशः 41 एवं 141% की वृद्धि पाई गई। 195 लाभान्वित किसान और 76 गैर लाभान्वित किसानों जिन्होंने किसी सरकारी राज सहयता के बिना ड्रिप प्रणाली लगाई के आर्थिक विश्लेषण से पता चला कि अधिकतर  मामलों में तीन से भी कम मौसमों की अवधि में लागत ‘राज सहायता सहित’ वसूली हो गई। इस  अध्ययन से यह भी पता चला कि आंध्रप्रदेश में ड्रिप सिंचाई के अंतर्ग्रत लगभग 65% कवरेज चेगलपट्ट, एम्.जी.आर डिंडीगुल कोयम्बटूर और पेरियर जिलों में थी। इस अध्ययन से यह भी पता चला कि अधिकतर किसान ड्रिप प्राणाली पर किये गये निवेश को तीन मौसमों की अवधि के भीतर वसूल कर लेते हैं।

सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने में समस्याएँ

कृषि वैज्ञानिक ने यह सिद्ध कर दिया है कि ड्रिप सिंचाई प्रणाली अन्य सिचाई विधियों की तुलना में बहुत फायदेमंद है। लेकिन अभी भी इस प्रणाली में कुछ समस्याएँ हैं। जिनके वैज्ञानिक समाधान के लिए अभी शोध कार्य की आवश्यकता है जिससे बागवानी फसलों में सूक्ष्म सिंचाई की उपयोगिता बढ़ाई जा सके।

  • दक्षं राज्यों की पठारी भूमि में ड्रिप सिंचाई का अंसतुलित विकास एक चिंतनीय विषय है। ड्रिप सिंचाई के अंसतुलित विकास का मुख्य कारण सूक्ष्म सिंचाई के लाभ के बारे में जानकारी अभाव है।
  • कुछ राज्यों, खासकर उत्तरी तथा पूर्वी भारत में सतही तथा भूमिगत जल की आसानी से पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता।
  • प्रशिक्षित मानव श्रम की कमी।
  • किसानों को इस कार्य के लिए पर्याप्त संस्थागत ऋण सुविधा का अभाव।
  • इस विधि में उपयोग आने वाले कल-पुर्जों की अनुलब्धता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी जानकारी एवं सामग्री का अभाव।

सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए भावी कार्यक्रम

केंद्र पोषित योजना – सूक्ष्म सिंचाई

यह एक केंद्र द्वारा प्रायोजक योजना है जिससे सूक्ष्म सिचाई प्रणाली की कुल लागत में से 40% हिस्सा केंद्र सरकार, 10% हिस्सा राज्य सरकार और शेष 50% हिस्सा लाभार्थी द्वारा वहन किया जाएगा। लाभार्थी इसे स्वयं अपने संसाधनों से या वित्तीय संगठनों से आसान कर्ज वहन कर सकते है। अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि सरकारी सहायता में से 80% हिस्सा (यूनिट लागत का 40%) भारत सरकार द्वारा वहन किया जायेगा और शेष 20% वहन किया जाएगा। सबंधित राज्य अपना 20% हिस्सा वित्तीय वर्ष के दौरान कार्यान्वयन एंजेसी (आई.ए)को उपलब्ध करायेंगे।

सहायता का स्वरुप

ड्रिप सिंचाई के मामले में इस सहायता को विशिष्ट फसल अंतराल तथा किसान द्वारा फसल के तहत शामिल क्षेत्र के लिए प्रणाली की कुल लागत के 50% तक समिति रखा जायेगा। छिड़काव सिंचाई में भी सहायता का कुल लागत के 50% तक समिति रखा जायेगा। दोनों ही मामलों में सहायता को प्रति लाभार्थी परिवार के लिए पांच हेक्टेयर तक सिमित रखा जायेगा। राज्य/केंद्र सरकार से संबधित फर्मों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, भा,कृ.अ.प. संस्थानों प्रगतिशील किसानों तथा गैर सरकारी संस्थानों/ट्रस्ट से संबधित फार्मों पर सूक्ष्म सिंचाई के प्रदर्शन के लिए सहयता 0.50 हेक्टेयर प्रति लाभार्थी के अधिकतम क्षेत्र के लिए लागत का 75% को सम्पूर्ण रूप से केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जायेगा। योजना में किसानों से सभी वर्गों को शामिल किया जायेगा, इसमें कृषि क्षेत्र के आकार को ध्यान में नहीं रखा जायेगा। यद्यपि लाभार्थियों का चयन करते समय पंचायती राज संगठनॉन के शामिल किया जायेगा।

ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित करने की आंकलित लागत

अंतराल

लागत (रूपये में ) क्षेत्र (हेक्टेयर

 

0.4

1.0

2.0

3.0

0.4

0.5

12x12

 

10600

16700

15100

31600

71300

10x10

 

12100

18000

27700

3600

76900

9x9

 

12400

22100

35500

55900

811100

8x8

 

12900

19900

31300

41700

86200

6x6

 

14400

30200

51200

64900

137400

5x6

 

15100

32800

56600

83100

150800

4x4

 

16900

39300

63100

100700

179300

3x3

 

17900

35600

71400

96100

158300

3x1.5

 

19700

40200

80500

109700

180900

2.5x2.5

 

20000

39800

81400

111200

239600

2x2

 

21300

49800

86400

12700

223400

1.5x.1.5

 

26100

55000

109500

165100

281000

1x1

 

26500

57600

96500

146500

249200

निष्कर्ष एवं अनुशंसा

बागवानी फसलों का कार्यक्षेत्र दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। इनके समुचित रख-रखाब के लिए सिंचाई जल की मांग का भ्दना भी स्वाभाविक है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने में सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकी काफी हद तक सहयक सिद्ध हो सकती है है। कारण इस विधि की दक्षता लगभग 95% है। इस विधि से सिंचाई करने में जल बचत के अलावा फसल की पैदावार में वृद्धि फसल की उच्चतर गुणवत्ता, जल तथा ऊर्जा की कम खपत, रसायनों एवं उर्वरकों का कम उपयोग, कम विक्षलन तथा कम खरपतवार और कम मृदा संकुचन को सुनिश्चित करती है। मुख्यतः सरकार के हस्तक्षेप  के कारण देश में ड्रिप सिंचाई के तहत लाये गए क्षेत्रों में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है।

कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे

  • क्षेत्र की कृषि जलवायु संबधी परिस्थतियों के अनुकूलन प्रणाली की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिये तथा वर्तमान फलीद्यान के लिए विशेष देखभाल की जानी चाहिए। मृदा में आद्रता के दबाव को कम करने के लिए पर्याप्त मात्रा में मृदा डाली जाए।
  • इस प्रणाली की अड़चनों को दूर करने के लिए उपयुक्त उपाय करना अपेक्षित है।
  • रखरखाव संबधी अनुसूची का सख्ती स एपालं किया जाए, ताकि इलाके में एकरूपता का वांक्षित स्तर हो सके।
  • प्रणाली में बिक्री के बाद की सेवाओं, प्रणाली के खुले हिस्सों और किसानों के प्रशिक्षण की आवश्यकता को बढ़ाने के लिए समुचित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है।
  • उपयुक्त प्रशिक्षकों का प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित किया जाना जरुरी है ताकि पूरे देश की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।
  • सिंचाई संबधी अनुसूची तैयार करने के एकरूप एवं प्रभावकारी प्रस्ताव का अनुसरण करके अनुसधान परीक्षणों को पूरा किया जा सकता है।
  • फसल के लिए जल की मांग का अनुमान लगाने हेतु सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, एम.ए.ओं. पेंमान्मोटीयथ एफ.ए.ओं. प्रकशन सं.56 विधि को अपनाया जा सकता है।
  • विभिन्न कृषि जलवायु संबधी उपयुक्त सुधारात्मक तत्वों को विकसित किया जा सकता था।
  • देश में ड्रिप सिंचाई के तहत क्षेत्र की वार्षिक कवरेज लगभग 40 हजार हेक्टेयर के  वर्तमान स्तर के मुकाबले कम से कम 50 हजार से 60 हजार हेक्टयेर तक बढ़ाये जाने की आवश्यकता है।
  • अन्य देशों में उप सतही ड्रिप सिंचाई जैसे अधिक कुशल अनुप्रयोग विकसित किया गये हैं, भारतीय परिस्थतियों तहत अभिग्रहण एवं प्रयोग के लिए जिनका परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
  • उर्वरकों के उपयोग को किफायती बनाने के लिए ‘फर्टिगेशन’ को लोकप्रिय बनाना जरुरी है।

परम्परागत सिंचाई प्रणाली और सूक्ष्म सिंचाई के साथ फसलों की वृद्धि का तुलनात्मक विवरण

फसल

स्थान

उपज किव्न/हे.

सिंचाई सें.मी.

डब्ल्यू.यू.ई. किव्न/हे. सें.मी.

एम.आई.अग्रिम बचत

पैदावार में वृद्धि

 

 

सतही

ड्रिप

सतही

ड्रिप

सतही

ड्रिप

बचत

(प्र.श.)

चुकंदर

कोयंबटूर

5.70

8.90

86.00

18.00

0.07

0.50

79.10

36.00

करेला

चालाकुड़े

32.00

43.99

76.00

33.00

0.42

1.30

56.60

25.60

बैंगन

अकोला

91.00

148.00

168.00

64.00

0.55

2.30

61.00

38.50

लालमिर्च

एनसीपीए

42.30

60.90

109.00

4170

0.39

1.50

61.70

30.50

खीरा

पूना

155.00

225.00

54.00

24.00

2.90

9.40

55.60

31.10

भिन्डी

कोयंबटूर

100.00

113.10

53.50

8.60

1.87

13.20

84.00

11.60

प्याज

दिल्ली

284.00

342.00

52.00

26.00

5.50

13.20

50.00

17.00

आलू

दिल्ली

172.00

291.00

60.00

27.50

0.23

10.60

54.29

41.00

मुली

कोयंबटूर

10.50

11.90

46.00

11.00

0.67

1.10

76.00

11.80

शकरकंद

कोयंबटूर

42.40

58.90

63.00

25.00

1.24

2.40

60.30

28.000

टमाटर

कोयंबटूर

61.80

88.70

49.80

10.70

3.27

8.28

78.50

30.30

केला

एनसीपीए

75.00

875.00

176.00

97.00

5.00

9.00

45.00

34.30

अंगूर

एनसीपीए

264.00

325.00

53.00

28.00

0.03

11.60

47.20

18.80

अमरुद

इलाहाबाद

.16

0.22

6.40

5.21

0.65

0.04

18.80

27.30

नीबू

दिल्ली

15.00

27.00

23.00

17.50

1.62

1.54

23.90

40.40

अनार

हैदराबाद

34.00

67.00

21.00

16.00

1.62

4.20

23.80

49.30

तरबूज

पूना

82.00

504.00

72.00

25.00

5.90

20.20

65.30

16.30

 

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि एवं गन्ना विकास विभाग, झारखण्ड सरकार



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