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आम एवं लीची के बागों में अन्तर्वर्ती फसलें

परिचय

क्या है अंतराशस्यन: स्थाई फसल के बीच में पड़ी अनप्रयुक्त भूमि पर अप्रतियोगी, कम समय वाली फसलों को अतिरिक्त लाभ के लिए उगाना अंतराशस्यन कहते हैं। स्पष्ट है कि अंतराशस्यन हेतु सभी फसलें उपयुक्त नही होती है।

आम एवं लीची के बागों में अंतराशस्यन हेतु उपयुक्त फसलें

  1. मुख्य फसल की उम्र 6 वर्ष तक – पपीता, करौंदा, केला, अनार, नीबू, फालसा, सब्जिया, पुष्पीय फसलें मसाला फसलें।
  2. 7 वर्ष से 12 वर्ष तक के फल वृक्ष – सब्जियाँ कन्दीय फसलें, मसाला व पुष्पीय फसलें।
  3. 12 वर्ष से अधिक उम्र के फल वृक्ष – हल्दी, अदरक,जिमीकंद।

फसल चुनाव में सावधानियाँ

  1. स्थाई फसल का रोपड़ न करें नही तो मुख्य फसल (आम, लीची) की उपज पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
  2. किसी भी दशा में सूर्य का प्रकाश बाधित न हो नही तो फल वृक्ष असमय पीले पड़कर मरने लगेगें।
  3. अन्तर्वर्ती फसल अधिक रोगों की वाहक न हो नही तो मृदा में रोग कारक धीरे-धीरे पनपकर फल वृक्षों को रोग ग्रसित करने लगेगें।
  4. बाग़ की किसी भी अवस्था में लतर वाली सब्जी/फसल न उगाएं और न ही लतरों को वृक्षों पर चढ़ने दें।
  5. अन्तर्वर्ती फसल कम धूप व पानी में भी उत्पादन दे सके।

अंतराशस्यन की तकनीक

  1. साधारणत: सामान्य दूरी पर लगे फल वृक्षों (आम, लीची 10 x 10 मीटर) को बिरला करें, सूखी टहनियों, डालों, झुकी हुई, जमीन को छुती हुई, रोग ग्रस्त व वृक्षों में उलझी हुई शाखाओं को काट कर निकाल दें। इसके बाद में पोषण एवं जल प्रबंधन में सुविधा होगी। हवा एवं प्रकाश अबाध रूप से मिल सकेगा। अन्तर्वर्ती फसल निरोगी होगी।
  2. मृदा में खरपतवार, झाड़ियाँ, बहुवर्षीय घासें, अधसड़ी पत्तियाँ व लकड़ियाँ आदि को निकाल दें।
  3. बाग के चारों ओर मेढ़की सफाई करें तथा कम से कम 2 फीट ऊँची मेढ़ बनायें रखें।
  4. बाग़ की मिट्टी पलट हल से गहरी जुताई करें यह कार्य वर्ष में दो बार प्रथम गर्मियों में व दूसरी बार वर्षा समाप्त होने के ठीक बाद अवश्य करें।
  5. खेत को समतल व समरस कर लें।
  6. फल वृक्ष के चारों ओर दो फीट व्यास का एक फीट गहरा थाला बनायें।
  7. फल वृक्षों के बीच पड़ी भूमि का मापन करें। मान लीजिए यदि आपने वर्गाकार विधि से 10 x 10 मीटर की दूरी पर आम, लीची रोपित की है। अब आपको फल वृक्ष से 2.5 फीट की दूरी से पहली लाइन हल्दी/अदरक की बुआई करनी है तो गणना करने पर पायेंगें कि – फल वृक्षों की कतारों की संख्या = 11, फल वृक्षों की संख्या = 100 तथा ढाई फीट फल वृक्षों के चारों ओर छोड़ने पर वह क्षेत्रफल जिस पर अन्तर्वर्ती फसल नहीं लगायी जा सकेगी = 1600 वर्ग मीटर, अन्तर्वर्ती रोपण हेतु प्राप्त शुद्ध क्षेत्रफल = 10000 – 1600 = 8400 वर्ग मीटर या 84 प्रतिशत क्षेत्रफल पफ हल्दी/अदरक की खेती की जा सकेगी। दो फल वृक्षों के बीच अन्तर्वर्ती फसल अदरक/हल्दी 30 x 10 सें.मी. की दूरी पर रोपनी है। अत: लाइनों की संख्या 30 होगी। एक हेक्टेयर में कुल लाइनों की संख्या 30 x 10 = 300 होगी। एक लाइन में हल्दी के बीजों की संख्या 335 होगी। हल्दी/अदरक के एक बीज/कंद का वजन 30 ग्राम है। अत: हल्दी की 10150 बीजो का वजन (335 x 30) 3 क्विंटल होगा। अत: एक हेक्टेयर के बाग़ में हल्दी/अदरक का लगभग 3 क्विंटल बीज लगेगा।
  8. अच्छी तरह से तैयार खेत में लगभग 200 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद, 3 क्विंटल यूरिया, 2 क्विंटल सिंगल सुपर फास्फेट तथा 2 क्विंटल म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का प्रयोग करें। गोबर की खाद, फास्फोरस व पोटास बुआई के ठीक पहले खेत में मिलाएं। जबकि यूरिया का एक तिहाई भाग रोपाई के 35 दिन बाद एक तिहाई 85 दिन बाद एक तिहाई 110 दिन बाद प्रयोग करें।
  9. हल्दी/अदरक की उन्नतशील प्रजातियों का चयन करे। हल्दी – राजेन्द्र सोनिया, आरएच 5, आरएच 9/10, आरएच 13/19, एनडीआर 181 एवं अदरक-नाडिया, हिमगिरी, सुरभि, सुरुचि, समस्तीपुर, सुप्रभा।
  10. कंदों का शोधन बाविस्टीन एक ग्राम एक लीटर पानी का घोल बनाकर आधा घंटा कंदों को डुबोएं फिर निकाल कर छाया में सुखाएं।
  11. बुआई मेढ़ बनाकर मई माह में करें, पंक्ति की दूरी 30 सें.मी. और पौध के बीच की दूरी 20 सें.मी. रखें तथा लगभग 5 सें.मी. गहरा बोयें।
  12. रोपाई के बाद खेत को पलवार से ढकें इससे जमाव अच्छा होता है।
  13. समय-समय पर खरपतवार निकालें व सिंचाई करें।
  14. फसल की बढ़वार के दौरान कम से कम दो बार मिट्टी चढायें।
  15. रोग एवं कीटों का प्रबंधन करते रहें।
  16. लगभग सात माह में फसल तैयार हो जाती है। पौधे पीले पड़कर सूख जायें तभी खोदाई करें।

लाभ

अन्तर्वर्ती फसल के तौर पर एक हेक्टेयर में लगभग 250 क्विंटल हरी कन्दें प्राप्त होगी। जिनका थोक मूल्य रु.2000 से 25000 प्रति क्विंटल है। अत: कुल आय रु. 5.00 से 6.25 लाख प्रति हेक्टेयर होगी। इसकी खेती में कुल लागत रु. 3.00 से 4.00 लाख तक आएगी। अत: किसान भाईयों को शुद्ध मुनाफ़ा रु. 2.00 से 2.25 लाख प्रति हेक्टेयर प्राप्त हो सकेगा।

 

स्त्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार



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