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अदरक की वैज्ञानिक खेती

भूमिका

अदरक प्रमुख मसालों में एक है इसकी खेती नगदी फसल के रूप में की जाती हैं। अदरक का वानस्पतिक नाम 'जीन्जीबरअदरक ओफीसीनेली है। अदरक के भूमिगत रूपांतरित तन अर्थात प्रकद का उपयोग किया जाता हैं। इन प्रकदो को फसल के खोदाई के बाद हरा तथा सुखाकर दानों ही रूपों में उपयोग करते हैं। ताजा अदरक व्यंजनों को खूशबूदार तथा चटपटा बनाने एवं मुरब्बा बनाने के काम आते है। चाय का स्वाद बढ़ाने के लिये विशेष तौर पर सर्दियों में अदरक का उपयोग किया जाता है। अदरक का उपयोग मसालों के रूप में सलाद, अचार, मुरब्बा, चटनी आदि के रूप में किया जाता हैं। पकी गांठों को सुखाकर उनसे सोंठ तैयार किया जाता है। जिसका काफी मात्रा देशों में नियति किया जाता है। सबसे अधिक अदरक का उत्पादन भारत वर्ष में होता है। सभी देशों को मिलाकर जितना अदरक का उत्पादन होता है उसमें भारत वर्ष अकेले 33 प्रतिशत अदरक का उत्पादन करता है ।

औषधीय गुण

अदरक का प्रयोग सब्जियों को चटपटा बनाने के साथ गुणकारी बनाने में किया जाता हैं। यह घबराहट, थकान, प्यास आदि को शांत करके शरीर में ताजगी और ढंडक भरती है। कफ से ग्रस्ति लोगो के लिये अदरक काफी कारगर औषधि के रूप में उपयोग होता है । अदरक के उपयोग से छाती पर जमा सारा बलगम निकालकर बाहर करती है, अतः खांसी नहीं बनने पाती है। सिरदर्द, कमर के दर्द, पेट दर्द, बेचैनी, घबराहट आदि छोटे-मोटे रोगों के लिये यह रामबाण औषधि है। अदरक को चुसते ही मुंह में लार ग्रन्थि अपना काम शुरू कर देती है। इसमें कठ की खशखशाहट दूर होती है।

स्त्रियों के लिये भी अदरक वरदान है। जिन युवतियों को मासिक धर्म, गर्भाधान, प्रसव के बाद स्तन में दूध न उतरने की शिकायत रहती है, उनके लिये अदरक कीमती दवा से भी बड़ा काम करती है।

जलवायु

अदरक की अच्छी अपज के लिए थोड़ी गर्म तथा नम जलवायु होनी चाहिए। अदरक की अच्छी ऊपज  के लिए 20 से 30 डिग्री से0 तापमान उपयुक्त होता है। इससे ज्यादा होने पर फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कम तापमान के कारण (10' से0 से कम) पत्तों तथा प्रकन्दों को नुकसान पहुँचता है। बोआई के अंकुर फूटने तक हल्की नमी, फसल बढ़ते समय मध्यम वर्षा तथा फसल के उखाड़ने के एक माह पहले शुष्क मौसम होना चाहिए।

भूमि

अदरक की अधिक ऊपज  के लिए हल्की दोमट या बलूई दोमट भूमि उयुक्त होती है। 60 से 7.5 पी0 एच0 मान वाली भूमि में अदरक की अधिक पैदावार होती है। अदरक के खेती के लिए ऊँची जमीन एवं जल निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। भारी एवं क्षारीय भूमि में अदरक का उत्पादन अच्छा नहीं होता है। अदरक उत्पादन के लिए फसल चक्र अपनाना अति आवश्यक है।

भूमि की तैयारी

अदरक की खेती के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाली हल से जुताई करने के बाद, चार बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई करते हैं। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाना चाहिए। जिससे मिट्टी भूरभूरी हो जाए। अंतिम जुताई से 3 से 4 सप्ताह पूर्व खेत में 250 से 300 क्विंटल सड़ा हुआ गोबर का खाद देते है। गोबर का खाद देने के बाद एक या दो बार खेत की जुताई कर गोबर के खाद को मिट्टी में मिला देते हैं।

बोआई की विधि

अदरक की बोआई तीन विधियों के द्वारा की जाती है।

कयारी विधि

इस विधि में 120 मीटर चौड़ी तथा 30 मीटर लम्बी उभारयुक्त क्यारियाँ जो जमीन की सतह से 15-20 से0मी0 ऊँची हो। प्रत्येक क्यारी के चारो तरफ 50 से0मी0 चौड़ी नाली बनानी चाहिए। क्यारी में 30-20 से0मी0 दूरी पर 8-10 से0मी0 की गहराई में बीज की बोआई करनी चाहिए। यह विधि जहाँ पानी लगता है वैसे जगह पर इस विधि से बोआई करनी चाहिए।

मेड़ विधि

इस विधि में 60 से0मी0 की दूरी पर तैयार खेत में 20 से0मी0 दूरी पर बीज की बोआई करने के बाद मिट्टी चढ़ाकर मेड़ बनावें। इस बात का ध्यान होना चाहिये कि बीज 10 से0मी0 गहराई में हो जिससे बीजों का अंकुरण अच्छा हों यह विधि जहाँ पर जल जमाव की संभावना होती है वैसी जगह इस विधि से अदरक की खेती की जाती हे ।

समतल विधि

यह विधि हल्की एवं ढ़ालू भूमि में अपनाई जाती है। इस विधि में 30 से0मी0 पंक्ति एवं 20 से0मी0 गांठ से गांठ या पौधे की दूरी तथा 8-10 से0मी0 की गहराई में बोआई की जाती है। जहाँ पर जल जमाव की संभावना नहीं होती है वैसे जगह पर इस विधि से खेती करते हैं।

अदरक की उन्नत किस्में

बिहार की लिए नदिया, सुप्रभा, सुरूचि, सुरभी जोरहट, रीयो-डी जेनेरियो, मननटोडी एवं मरान उपयुक्त किस्में हैं।

नदिया - यह किस्म बिहार के लिये उपयुक्त है यह 8 से 9 माह में तैयार हो जाती है इसकी ऊपज  क्षमता 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टर होती है।

मरान - यह एक अच्छी किस्म है इसकी ऊपज  क्षमता 175 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टर होता है साथ ही इस किस्म में मृदु विगलन रोग नहीं लगता है।

जोरहट -यह असम की लोकप्रिय किस्म है इसकी ऊपज  क्षमता 200-225 क्विंटल प्रति हेक्टर है यह 8 से 10 माह में तैयार हो जाती है।

सुप्रभा - यह किस्म 225 से 230 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म में अधिक किलें (टोलरिंग) निकलते हैं प्रकद का सिरा मोटा, छिलका सफेद एवं चमकदार होता है। इस किस्म की ऊपज  क्षमता छिलका 200-230 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म प्रकन्द विगलन रोग के प्रति सहनशील है।

सुरूचि - यह किस्म हल्के सुनहले रंग की होती है एवं 230-240 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्में  की ऊपज  200-225 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म प्रकन्द विगलन रोग के प्रति निरोधक है ।

सुरभि - इसके गांठ काफी आकर्षक होते हैं। यह 225-235 दिन में तैयार हो जाती है। इसकी ऊपज  क्षमता 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म भी प्रकन्द विगलन बीमारी के प्रति सहनशील है।

खाद एवं उर्वरक

अदरक लम्बी अवधि के फसल है तथा ज्यादा खाद चाहने वाली होती है। अत: अधिक ऊपज  के लिये गोबर की सडी खाद 250—300 क्विंटल / हेक्टर नेत्रजन, फास्फोरस वा पोटाश कृमश: 80—100, 50-60 एवं 100 किलोग्राम/ हेक्टर की दर से खेत में डालें। गोबर खाद रोपाई से 20-30 दिन पहले तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय जबकि नेत्रजनित खाद को तीन बराबर भाग में बाँटकर, पहला भाग रोपाई से 40 से 45 दिन बाद या दो से अधिक पत्तियाँ होने के बाद, दूसरा भाग 80 से 90 दिन बाद तथा तीसरा भाग 100 से 120 दिन बाद देना चाहिए। नेत्रजनित उर्वरक का प्रयोग करते समय खेत में भरपूर नमी होनी चाहिए। बिहार में जिंक, बोरान (सुहागा) एवं लोहा की मिट्टी में कमी पायी गई है अतः मिट्टी का परीक्षण कराने पर सूक्षम तत्वों की कमी हो तो मिट्टी में रोपाई के पहले जिक सल्फेट एवं बोरेक्स का कमश: 20-25 एवं 10-12 किलो प्रति हेक्टर दें। लोहा के कमी की अवस्था में 0.5 से 0.8 प्रतिशत का घोल बनाकर उसमें 25 से 30 बुन्द नींबू का रस डालकर दो छिड़काव करे। पहला छिड़काव रोपाई से 60 दिन के बाद तथा दूसरा रोपाई से 90 दिन के बाद करें।

कन्द (गांठ) की बोआई

बीज प्रकन्द मध्यम आकार के जिनका भार 20–25 ग्राम तथा 2–3 आँखो वाली ही, कन्द का चुनाव करना चाहिए। बीज प्रकन्द स्वस्थ, बीमारी वा कीट रहित होनी चाहिये । प्रति हेक्टर 18-20 क्विंटल कन्द की जरूरत होती है। कन्दो को इण्डोफिल एम-45 का 25 ग्राम एवं स्ट्रेप्टो-साइक्लिन ¼ ग्राम प्रति लीटर पानी के मिश्रित घोल में या रीडोमिल के 2 से 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के दर से घोल बनाकर आधा घंटे तक उपचारित करें। तत्पश्चात छाया में सुखाकर रोपाई करें। जिन इलाकों में सूत्रकृमि का प्रकोप हो वहाँ पर नीम की खल्ली 25 क्विंटल या थिमेट 10 जी0 12 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से खेत की तैयारी करते समय डालें। रोपाई 30 × 20 से0मी0 की दूरी एवं 8-10 से0मी0 गहराई पर करे। रोपाई का उचित समय 15 से 31 मई है। लेकिन विशेष परिस्थिति में इसकी रोपाई 20 जून तक की जा सकती है।

झपनी

रोपाई के बाद शीशम की हरी पत्ती या अन्य चीजों की मोटी तह बिछाकर ढ़क देना चाहिए। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है तथा कन्दों का अंकुरण सामान्य रूप में होता है तथा तेज धूप से अंकुरण का बचाव होता है। साथ ही खरपतवार कम निकलते हैं एवं ऊपज  भी अधिक प्राप्त होती है।

सिंचाई

अदरक बरसात वाली फसल है इसलिए इसकी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन अक्टूबर-नवम्बर माह में वर्षा नहीं होने की परिस्थिति में सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि अक्टूबर-नवम्बर माह में अदरक का गांठ बनता तथा उसका विकास होता है इसलिए अक्बूबर-नवम्बर माह में खेतों अधिक नमी होनी चाहिए।

फसल-प्रबंधन

रोपाई के दो से तीन माह बाद क्यारियों में निकाई-गुड़ाई कर मिट्टी चढ़ानी चाहिये। अदरक में खरपतवारनाशक दवाईयों का जयादा इस्तेमाल नहीं किया जाता है क्योंकि लम्बे समय की फसल होने के कारण रोपाई से पहले या तुरन्त बाद के छिड़काव से अच्छे परिणाम नहीं मिले हैं।

अदरक की फसल सामान्यतः 8-9 महीनों में तैयार होती हैं जब पौधे की पत्तियाँ पीले पड़नी शुरू हो जाये तब खुदाई करनी चाहिए। जिन इलाकों में पाला नहीं पड़ता है वहां इसे कुछ दिन बाद भी खुदाई की जा सकती है। खुदाई के बाद इसे 2-3 दिन तक छाया में सुखायें। एक हेक्टर क्षेत्र में औसत 100 से 150 क्विंटल पैदावार होती है। कुछ किसान को अच्छा भाव मिलने पर समय से पहले ही अदरक को उखाड़ लेते हैं ऐसी स्थिति में उखाड़ा गया अदरक ज्यादा दिन तक अच्छी दशा में नहीं रहती हैं। अतः इसे तुरन्त बेच दें या इस्तेमाल कर लेना चाहिए। भण्डारण के लिये रखने वाला अदरक कभी भी समय से पहले नहीं निकालना चाहिए।

भण्डारण

ज्यादातर अदरक अगले वर्ष में रोपाई हेतु भण्डारित किये जाते हैं। इसके लिये स्वस्थ्य वा बीमार रहित गांठ को छांट करके इन्डोफिल एम-45 का 2.5 एवं स्ट्रेप्टो-साइक्लिन 1/4 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिश्रित घोल में उपचारित करके 48 घंटे तक छाया में सुखाने के बाद गडढों में रखें। गडढों में गांठ को रखने के बाद पुआल या लकड़ी के तख्तों से ढ़ककर तख्तों को गोबर से लेप दें लेप करते समय छोटी मुँह हवा निकास के लिए अवश्य रखें। हवा निकास के लिये सुराख वाली पाईप या नाली का भी इस्तेमाल किया जाता है जिसका एक मुँह गडढों से बाहर होना चाहिए।

 

स्रोत: कृषि विभाग, बिहार सरकार


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