परिचय बिहार में मिर्च की खेती मुख्यतः नगदी फसल के रूप में की जाती है। इसकी खेती से लगभग 90 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर आमदनी होती है। वर्गीकरण एवं किस्में मिर्च की उगायी जानेवाली किस्मों को विभिन्नताओं के आधार पर पाँच प्रमुख प्रजातियों में रखा जा सकता है। 1. कैप्सीकम एनुअम, 2. कैप्सीकम पूफटेमेन्स, 3. कैप्सीकम पेण्डुलम, 4. कैप्सीकम प्यूबेसेन्स, 5. कैप्सीकम चाइनीज। मिर्च की मुख्य किस्में पूसा ज्वाला इसके फल लम्बे एवं तीखे तथा फसल शीघ्र तैयार होनेवाली है। प्रति हेक्टेयर 15 से 20 क्विंटल मिर्च (सूखी) प्राप्त होती है। कल्याणपुर चमन यह संकर किस्म है। इसकी फलियाँ लाल लम्बी और तीखी होती हैं। इसकी पैदावार एक हेक्टेयर में 25 से 30 क्विंटल (सूखी) होती है। कल्याणपुर चमत्कार यह संकर किस्म है। इसके फल लाल और तीखे होते हैं। कल्याणपुर-1 यह किस्म 215 दिन में तैयार हो जाती है तथा 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है। कल्याणपुर-2 यह किस्म 210 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 15 क्विंटल है। सिन्दूर यह किस्म 180 दिन में तैयार होती है तथा इसकी उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 14 क्विंटल है। आंध्र ज्योति यह किस्म पूरे भारत में उगाई जाती है। इस किस्म की उपज क्षमता प्रति हेक्टेयर 18 क्विंटल है। भाग्य लक्ष्मी यह किस्म सिंचित एवं असिंचित दोनों क्षेत्रों में उगायी जाती है। असिंचित क्षेत्र में 10-15 क्विंटल एवं सिंचित क्षेत्र में 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है। जे - 218 यह संकर किस्म है इसकी ऊपज 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर(शुष्क फल ) प्राप्त होती है। पंजाब लाल यह एक बहुवर्षीय किस्म है। यह मोजैक वायरस, कुकर्विंट मोजैक वायरस के लिए प्रतिरोधी है। इसकी उपज क्षमता 47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है । पूसा सदाबहार यह एक बारह-मासी किस्म है जिनमें एक गुच्छे में 6-22 फल लगते हैं। इसमें साल में 2 से 3 फलन होता है। यह किस्म 150 से 200 दिन में तैयार होती है। उपज 35 क्विंटल/हेo होता है । अन्य मुख्य किस्में सूर्य रेखा, जवाहर मिर्च-218, एन पी 46, ए एम डी यू 1, पंत सी 1, पंत सी 2, जे सी ए 154 (अचार के लिए) किरण एवं अपर्णा। जलवायु अच्छी वृद्धि तथा उपज के लिए उष्णीय और उप-उष्णीय जलवायु की आवश्यकता होती है। प्रतिकूल तापमान तथा जल की कमी से कलियाँ, पुष्प एवं फल गिर जाते हैं। भूमि अच्छी जल निकास वाली जीवांश युक्त दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है। असिंचित क्षेत्रों की काली मिट्टियाँ भी काफी उपज देती है। 3-4 बार जुताई करके खेत की तैयारी करें। बुआई बीजों को पहले नर्सरी में बोते हैं। शीतकालीन मौसम के लिये जून-जुलाई एवं ग्रीष्म मौसम के लिए दिसम्बर एवं जनवरी में नर्सरी में बीज की बुआई करते हैं। नर्सरी की क्यारियों की तैयारी करके बीज को एक इंच की दूरी पर पंक्तियों में बोकर मिट्टी और खाद से ढक देते हैं। फिर पूरी क्यारियों को खरपतवार से ढक देना चाहिए। बीज को जमने के तुरंत बाद सायंकाल में खरपतवार को हटा देते हैं। बीज को थीरम या कैप्टान 2 ग्राम रसायन (दवा) प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बुआई करना चाहिए। बीज की मात्रा एक हेक्टेयर मिर्च के खेती के लिए 1.25 से 1.50 किग्रा0 बीज की आवश्यकता होती है। रोपाई पौधे 30-35 दिन बाद रोपने योग्य हो जाते हैं । 60 सेमी x 45 सेमी एवं 45 सेमी x 30 सेमी की दूरी पर क्रमशः शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन मौसम में रोपना चाहिए। खाद एवं उर्वरक 250-300 क्विंटल/हे0 गोबर या कम्पोस्ट, 100-110 किग्रा0 नाइट्रोजन, 50 किग्रा0 फास्फोरस एवं 60 किग्रा0/हे0 पोटाश की आवश्यकता होती है। कम्पोस्ट, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा रोपाई के पहले खेत की तैयारी के समय तथा शेष नाइट्रोजन को दो बार में क्रमशः रोपाई के 40-50 एवं 80-120 दिन बाद परिवेशन की जानी चाहिए। सिंचाई एवं अन्य क्रियायें शीतकालीन मौसम के मिर्च के खेती में सिंचाई की आवश्यकता बहुत कम होती है। सिंचाई की आवश्यकता पड़ने पर दो-तीन सिंचाई दिसम्बर से फरवरी तक करनी पड़ती है। ग्रीष्म कालीन मौसम की खेती में 10 से 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। मिर्च की अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए खेत को खरपतवार से मुक्त रखना अनिवार्य है। कटाई शाक या सलाद के लिए प्रयोग की जानेवाली मिर्च को हरी अवस्था में ही पूर्ण विकसित हो जाने पर तोड़ लेते हैं। शुष्क मसालों के रूप में प्रयोग की जानेवाली मिर्चों को पूर्णतः परिपक्व हो जाने पर तोड़ते हैं। उपज असिंचित फसल (सूखी मिर्च) - 5 से 10 क्विंटल/हे0 तथा सिंचित क्षेत्र की फसल से (सूखी मिर्च) - 15 से 25 क्विंटल/हे0 औसतन उपज प्राप्त होती है। हरी मिर्च की औसत उपज - 60 से 150 क्विंटल/हेक्टयर। मिर्च के प्रमुख कीट एवं रोग तथा प्रबंधन थ्रिप्स यह भूरे रंग का बेलनाकर छोटे कीट होते हैं। व्यस्क एवं शिशु कीट दोनों ही पत्तियों को खुरचकर उनका रस चूसते हैं, जिससे पत्तियों पर सफेद छोटे-छोटे धब्बे बनते हैं। ज्यादा आक्रमण होने पर पत्तियाँ सिकुड़ जाती है। प्रबन्धन 1. बिचड़ा की अवस्था में पौधों को नायलान की जाली से सुरक्षित रखें इससे भंगुड़ी/किकुड़ी रोग से सुरक्षा भी हो जाती है। 2. फसल लगाने के कुछ दिन बाद ही पीला स्टीकी ट्रेप लगा देना चाहिए। लाही, सफेद मक्खी और थ्रिप्स कीट का पीला रंग से आकर्षण होता है। 3. इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस0एल0 का 1 मिलीलीटर या डायमेथोएट 30 ई0सी0 का 2 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। लाही कीट (एफिड) हरे, भूरे, काले रंग का पंखविहीन एवं पंखयुक्त छोटे कीट होते हैं। पार्थेनोजेनेसिस की क्रिया द्वारा यह अपनी संखया को बढ़ाते रहते हैं एवं पौधों के कोमल भाग से रस चूसते रहते हैं। प्रबन्धन 1. लेडिबर्ड विटिल, सिरफिडफ्लाई, क्राईसोपा इनके प्राकृतिक शत्रु हैं। मैना तथा गौरेया इनको चुनकर खाती है, इन्हें संरक्षित करें। 2. 10-20 पक्षी बैठका प्रति हेक्टेयर लगायें। 3. नीम आधारित जैविक कीटनाशी का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। 4. प्रोफेनोफास 50 ई0सी0 का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। सफेद मक्खी यह सफेद रंग की पंखवाली मक्खी है, जो लगभग 1 मिलीमीटर लम्बी होती है तथा शरीर पीले रंग का होता है। शिशु एवं व्यस्क दोनों ही पत्तियों पर रहकर रस चूसते हैं। यह पौधों में लीफ कर्ल वाइरस का भी वाहक होते हैं। प्रबन्धन 1. लेडिबर्ड विंटिल, सिरफिड फ्लाई, क्राईसोपा इनके विभिन्न अवस्थाओं के प्राकृतिक शत्रु हैं। इन्हें संरक्षित करें। 2. खेत को खर-पतवार से मुक्त रखें। 3. इमिडाक्लोप्रीड 17.8 ई0सी0 का 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। डायबैक रोग पौधों की फुनगी शुरू में ऊपर से नीचे की ओर गलने लगती है, जो बाद में काला पड़ जाता है और सूख जाता है। आर्द्रता अधिक होने पर रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है। पके फलियों पर छोटा धब्बा बनता है, जो धीरे-धीरे बड़ा और सफेद हो जाता है। कुहासा वाले वातावरण में यह तेजी से फैलता है। प्रबन्धन 1. ग्रसित खेत की उपज का व्यवहार बीज के रूप में नहीं करें। 2. ट्राइकोडरमा से बीज एवं बीजस्थली का उपचार करें। 3. खड़ी फल में मैन्कोजेब 75 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें। उखड़ा रोग (विल्ट) इस रोग में मिट्टी की सतह के ऊपर का तना भाग सिकुड़ कर संकुचित हो जाती हैं। धीरे-धीरे पौधा मुरझा कर सूख जाता है। प्रबंधन 1. फसल चक्र अपनायें। 2. ट्राइकोडरमा से बीज का उपचार करें। 3. पाँच किलोग्राम ट्राइकोडरमा से 50 किलोग्राम कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट को उपचारित कर प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलायें। स्रोत व सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार