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बिहार में लहसुन की खेती

परिचय

लहसुन एक बहुत ही उपयोगी मसाला फसल है। इसकी पत्तियों की चटनी पकौड़ा, कोफ्ता, सलाद आदि बनाने में उपयोग किया जाता है। इसके जड़ों का उपयोग विभिन्न शाकाहारी तथा मांसाहारी व्यंजनों के बनाने में होता है। मसाले और अचार के रूप में इसका ज्यादा प्रयोग किया जाता है। पोषण की दृष्टि से लहसुन काफी धनी होता है। यह कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन और फास्फोरस का मुखय स्रोत है तथा इसमें एस्कार्बिक अम्ल (विटामिन सी) बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती है।

किस्मों का चुनाव

राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान नासिक द्वारा लहसुन की विकसित की गई पाँच किस्मों का चयन किया जा सकता है।

एग्रीफाउण्ड सफेद

इस किस्म के कंद बड़े (3.5-4.0 से.मी. व्यास) आकार के होते हैं। कंद ठोस त्वचा चांदी की तरह सफेद, गूदा क्रीम के रंग का एवं जवे बड़े होते हैं। एक कंद में (पोटी) 20-25 जवे होते हैं।

यमुना सफेद

इस किस्म के लहसुन के कंद ठोस त्वचा सफेद, एवं गूदा क्रीम रंग का होता है। कंद का आकार बड़ा (4.0-4.5 से.मी. व्यास) एवं प्रत्येक कंद में 20-25 जवे होते हैं।

यमुना सफेद-2

इनका शल्क कंद ठोस, त्वचा सफेद एवं गूदा क्रीम रंग का होता है। यह बुआई के 165-170 दिनों बाद तैयार हो जाती है। इस पर बैंगनी धब्बा रोग या झुलसा रोग का प्रकोप कम होता है।

जी0282 (यमुना सफेद-3)

इसके शल्क कंद बड़े आकार के (व्यास 6.0 से.मी ) सफेद रंग के एवं ठोस होते हैं। जड़े 1.04-1.05 से.मी. मोटे होते हैं और प्रत्येक जवे का वजन 2.5-2.8 ग्राम होता है। एक कंद में 15-18 जवे पाये जाते हैं। यह किस्म लगाने के 140-150 दिनों बाद तैयार हो जाती है।

एग्रीफाउण्ड पार्वती

यह पर्वतीय क्षेत्रों के लिए ज्यादा उपयुक्त है। यह शल्क कंद बड़े, हल्का सफेद, बैंगनी रंग मिश्रित तथा 10-12 जवे वाले होते हैं। शल्क कंद का व्यास 5-7 से.मी. होता है। जवे क्रीम रंग के होते हैं और प्रत्येक जवे का वजन 4.5-5 ग्राम होता है।

इसके अलावे यमुना सफेद-4 (जी.323), जी. 1, एवं एग्रीफाउण्ड सफेद (जी.41) उन्नत प्रभेद है।

खेत का चुनाव

वाली या अम्लीय-क्षारीय (उदासीन) दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। वैसे लहसुन की खेती प्रायः सभी प्रकार की मिट्टियों में हो जाती है।

खेत की तैयारी

200-250 क्विंटल कम्पोस्ट या 40-50 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई से पूर्व खेत में अच्छी तरह बिखेर कर जुताई कर मिला देते हैं। यह काम बुआई के 20-25 दिन पूर्व करते हैं। तीन-चार जुताई कर एवं हरेक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत की मिट्‌टी को हल्की एवं भुरभुरी बना ली जाती है।

बुआई का समय

लहसुन के बुआई का समय अक्टूबर से नवम्बर माह तक किया जाता है।

बीज दर

300-500 किलोग्राम जवा प्रति हेक्टेयर की दर से लगाते हैं।

बीजोपचार

बुआई के 24 घंटे पूर्व जवों को थीरम 2.5 ग्राम या वैविस्टीन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम जवा बीज दर से उपचारित कर देने से बीज रोग रहित हो जाता है (उपचारित बीजों को भोजन में व्यवहार नहीं करें)।

बुआई दूरी

कतार से कतार 15 से.मी. एवं पौधों से पौधों की दूरी 10 से.मी. रखनी चाहिए।

उर्वरक प्रबंधन

120 किलोग्राम नेत्रजन, 80 किलोग्राम स्फुर तथा 100 किलोग्राम पोटाश/हेक्टेयर की अनुशंसा की गई है।नेत्रजन की आधी मात्रा, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा आधारीय रूप से खेत की तैयारी के समय डाल देते हैं। शेष नेत्रजन दो किस्तों में 35 दिनों एवं 65 दिनों बाद उपरिवेशन के रूप में डाल देते हैं। यदि गंधक रहित उर्वरक का प्रयोग किया गया हो तो 30-40 किलोग्राम गंधक उर्वरक प्रति हेक्टेयर की दर से आधारीय रूप से अवश्य डालनी चाहिए । यदि क्यारियों में जिंक की कमी हो तब 25 किलों जिंक सल्फेट या 16 किलो मोनो जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की तैयारी के समय अवश्य डालनी चाहिए । खड़ी फसलों में यदि सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण दिखे तब मल्टीप्लेक्स सूक्ष्म पोषक तत्व का 1.5-2.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के 40-50 दिनों बाद 600-800 लीटर पानी में घोलकर अवश्य छिड़काव कर दें।

निकाई-गुड़ाई

50-75 दिनों बाद करें, इससे फसल की बढ़वार अच्छी होगी। यदि खेत में खरपतवार का प्रकोप ज्यादा हो तब बुआई के आठ दिन पूर्व परती खेत में अच्छी नमी दशा में 2.5 लीटर से 3.5 लीटर ग्लाईफोसेट नामक खरपतवार नाशी का 600-800 लीटर पानी में घोलकर करें। खड़ी फसल में खरपतवार का प्रकोप तरगासुपर नामक तृणनाशी का बुआई के 15-20 दिनों बाद 2-2.5 मिली लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इससे तृण नियंत्रण में मदद मिलेगा।

सिंचाई

पहली सिंचाई- बुआई के तुरंत बाद करनी चाहिए। बाद की सिंचाईयां 10-15 दिनों के अन्तराल पर हवा के वेग मिट्टी के प्रकार एवं मौसमानुकूल आवश्यकतानुसार करनी चाहिए।  जब पौधों के वृद्धि कारक और जवों के विकास का समय होता है, उस समय क्यारियों में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा कंदों की बढ़वार रुक जाती है। खुदाई के कुछ दिन पूर्व सिंचाई रोक दी जाती है। जिससे पोटी के जवे अच्छी तरह सूख जाए ताकि भंडारण अच्छी तरह से हो सके।

पौधा संरक्षण

कीटों में प्रायः थ्रिप्स (चुरदा) का प्रकोप एवं हरा पिल्लू का प्रकोप होने पर पानी में प्रोफेनोफॉस एक मिली लीटर या कार्वोसल्फान दो मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर स्टीकर मिलाकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करने से दोनों कीटों का नियंत्रण हो जाता है।

रोग नियंत्रण

रोगों में प्रायः बैंगनी धब्बा एवं स्टेमीफिलियम झुलसा का प्रकोप पाया जाता है। इन दोनों रोगों से बचाव हेतु सल में प्रकोप होने पर क्लोरोथैलोनील 2 ग्राम अथवा साफ नामक दवा का 15 दिनों के अंतराल पर दो बार छिड़काव करनी चाहिए।

कंदों की खुदाई एवं सुखाना

क्यारियों में जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाती है और वे सूखने लगे जब क्यारियों का पटवन बंद कर देनी चाहिए। शीर्ष से 2-2.5 से.मी. भाग छोड़कर पत्तियाँ या डंठल को काट देनी चाहिए। सुखाये गये लहसुन कंदों की छटाई करके हवादार स्थान में रखना चाहिए।

 

स्रोत व सामग्रीदाता: कृषि विभाग, बिहार सरकार



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