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खाद्य सुरक्षा के लिए भविष्य की योजना-क्लाईमेट स्मार्ट खेती

खाद्य सुरक्षा के लिए भविष्य की योजना-क्लाईमेट स्मार्ट खेती

क्लाईमेट स्मार्ट खेती

प्राकृतिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन के कारण जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है जो एक चिंता का विषय बना हुआ है। संरक्षण खेती की तकनीकियों को अपनाते हुये हमें ऐसी खेती की आवश्यकता होगी जो समय के साथ चलते हुये सभी प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग करते हुये टिकाऊ उत्पादन देने में सक्षम हो। ऐसे समय में हमारे सामने क्लाईमेट स्मार्ट खेती का नाम उभरकर सामने आता है। इस विषय पर अध्ययनरत् वैज्ञानिकों का मानना है कि मानवीय गतिविधियों के कारण जलवायु परिवर्तन की वर्तमान दर पिछले 10,000 साल के किसी भी समय की तुलना में तेजी से हुई है। मानवीय गतिविधियों की वजह से उत्सर्जन के नए स्रोतों ने वृद्धि एवं जंगलों के आकार को भी निरंतर प्रभावित किया है। हरित-गृह (ग्रीन हाउस) गैसों के उत्सर्जन में मानव जनित क्रियाओं द्वारा वर्ष 1970 से 2004 के बीच 70 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हुई है और अनुमान है कि 25 से 95 प्रतिशत तक की वृद्धि वर्ष 2030 तक हो सकती है। जलवायु परितर्वन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने अपनी चौथी आंकलन रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन 1990 के बाद तेजी से बढ़ा है इसके लिए मानवीय गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जिसका पारिस्थितिकी प्रणालियों पर प्रभाव पड़ेगा। जीवाश्म ईंधन के दोहन और कृषि पद्धतियों से 20वीं सदी के दौरान वैश्विक तापमान में औसतन वृद्धि क्रमशः 0.6 डिग्री सेल्सियस एवं 0.17 डिग्री सेल्सियस हुयी है।

क्लाईमेट स्मार्ट गाँव

कृषि फसलें उगाने से वायुमण्डलीय कार्बन का स्थिरीकरण किया जाता है जो मिट्टी में कार्बन को भंडारण करने की क्षमता पर निर्भर करता है। इस प्रक्रिया को कार्बन भंडारण के रूप में जाना जाता है। भूमि कृषि प्रबंधन प्रथाओं के आधार पर कार्बन डाईऑक्साइड के लिए एक भंडार कक्ष हो सकता है जिसको संरक्षित खेती के तरीके से पूर्ण किया जा सकता है। संरक्षित खेती के तरीकों को अपनाकर हम हरित-गृह गैस उत्सर्जन कम करने के अलावा पानी, मिट्टी और हवा की गुणवत्ता को भी बढ़ा सकते हैं। sanrakshan जलवायु परितर्वन के विपरीत प्रभाव को कम करने के लिए संरक्षित खेती आधारित क्रियाएं एक समाधान का हिस्सा हो सकती है। इसके लिए सीजीआईएआर के जलवायु परिवर्तन कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (CCAFS) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को जलवायु अनुरूप कृषि पर राष्ट्रीय पहल (NICRA) अनुसंधान कार्यक्रम के तहत् भारत में क्लाईमेट स्मार्ट गाँव बनाने पर कार्य किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए जल स्मार्ट, न्यूट्रिएट स्मार्ट, कार्बन स्मार्ट, उर्जा स्मार्ट, मौसम स्मार्ट एवं ज्ञान स्मार्ट आदि तकनीकियों पर कार्य किया जा रहा है। भारत देश का हरियाणा राज्य कलाईमेट स्मार्ट खेती परियोजना पर शोध कार्य करने में अग्रणी स्थान रखता है तथा इसके तहत करनाल जिले के अन्दर कई गाँवों में इस पर कार्य किया जा रहा है तथा भविष्य में इनके अच्छे एवं दूरगामी परिणाम आने की संभावना है जो हमें एक नयी राह दिखायेंगे।

स्मार्ट तकनीक

जल स्मार्ट तकनीक के तहत धान की सीधी बिजाई, मक्का आधारित फसल चक्र, बैड प्लान्टिंग, जरूरत के अनुसार भूमि का समतलीकरण, धान में वैकल्पिक जल प्रबंधन, जीरो-टिलेज व सूक्ष्म सिंचाई आदि तकनीकियां अपनायी जाती है। न्यूट्रिएंट स्मार्ट में प्रक्षेत्र विशेष पादप पोषक तत्व प्रबंधन, मक्का और गेहूँ के लिए न्यूट्रिएंट एक्सपर्ट, ग्रीन सीकर व फसल चक्र में दलहनों का समन्वय आदि तकनीकियां को अपनाया जाता है। कार्बन स्मार्ट के अन्तर्गत जीरो—टिलेज एवं फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाता है। ऊर्जा स्मार्ट में भी जीरो-टिलेज, फसल अवशेष प्रबंधन तथा धान की सीधी बिजाई को अपनाया जाता है। मौसम स्मार्ट तकनीक में मौसम का पूर्वानुमान, सूचकांक आधारित बीमा, जरूरतों के अनुसार बीज, फसल विविधिकरण व कृषि वानिकी को लागू करने पर बल दिया जा रहा है। ज्ञान स्मार्ट में सूचना एवं प्रसारण तकनीकियां, महिला सशक्तिकरण व क्षमता विकास मुख्य तकनीकियाँ हैं। इन सभी तकनीकियों के उपयोग से बदलते वातावरण में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा के लिए भी गाँवों को सक्षम बनाया जा रहा है।

महत्वपूर्ण सिफारिशें

  • सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में धान-गेहूँ फसल प्रणाली में धान को जीरो-टिल मक्का से प्रतिस्थापित कर श्रम और पानी की बढ़ती कमी की समस्या से निपटा जा सकता है।
  • खेत की तैयारी करके प्रतिरोपित धान की जगह धान की सीधी बुवाई (डी एसआर) भविष्य के लिए एक बेहतर विकल्प है।
  • टबॉ—हैप्पी सीडर की मदद से फसल अवशेषों में लगाये गये जीरो-टिल गेहूँ का फसल उत्पादकता पर अच्छा एवं सकारात्मक प्रभाव आता है।
  • जीरो—टिल टबॉ हैप्पी सीडर तकनीक न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाती है बल्कि किसानों को फसल अवशेषों को जलाने से रोकने एवं धान अवशेष प्रबंधन के समाधान एवं पर्यावरण मैत्रिता का एक अच्छा विकल्प प्रदान करती है।
  • धान-गेहूँ फसल प्रणाली में मूंग को शामिल करने से भूमि स्वास्थ्य, उत्पादकता के साथ-साथ उर्वरा शक्ति को बरकरार रखने व प्रभावी खरपतवार नियंत्रण करने में मदद मिलती है।
  • मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार आना टिकाऊ उत्पादन के लिए एक अच्छा संकेत है।

स्त्रोत : केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद),करनाल,हरियाणा।



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