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संरक्षण खेती के फायदे

किसी भी विशेष प्रक्षेत्र में फसलों, फसल प्रणालियों का प्रबंधन वहां पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों एवं प्रबंधन तकनीकियों के अनुसार करना आज के समय की जरुरत बन गयी है। नवीन तकनीकियों को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए एक बड़े नियोजित समूह को आकर्षित करने की जरूरत होती है। इसमें किसानों को जो वे कर रहे हैं और उनको क्या जरूरत है के बीच अन्तर को समझाने की आवश्यकता पड़ती है। संरक्षण खेती को वृहद स्तर पर लागू करने के लिए इससे मिलने वाले लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ानी होगी। इससे मिलने वाले लाभ निम्न प्रकार हैं:-

आर्थिक फायदे

फसल सघनीकरण के कारण भूमि में मुख्य पोषक तत्वों जैसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर के साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, लोहा, मैंगनीज इत्यादि की कमी के कारण भूमि की उर्वरा शक्ति का गिरना, भू-जलस्तर में गिरावट, कृषि मजदूरों में कमी व कृषि आयातों की बढ़ती कीमतों की वजह से पारम्परिक खेती के अन्तर्गत उत्पादन खर्च में वृद्धि व शुद्ध मुनाफे में कमी हो रही है। जबकि दूसरी ओर संरक्षण खेती को अपनाकर पारम्परिक खेती की तुलना में 25-30 प्रतिशत तक समय, ईंधन व मजदूरी की बचत की जा सकती है। पारम्परिक खेती की मौजूदा कृषि पद्धतियों में मजदूरों की उपलब्धता दिन प्रतिदिन घटती जा रही है व इस पर होने वाले खर्च में भी निरतर वृद्धि हो रही है। संरक्षण खेती में बुआई पर होने वाले खर्च को 5000 रुपये प्रति हैक्टेयर तक आसानी से कम किया जा सकता है।

मृदा में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि

संरक्षण खेती में मिट्टी को स्वस्थ तथा उसकी पैदावार बनाए रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है कि मिट्टी की सतह पर फसल अवशेषों का पर्याप्त आवरण हो। मृदा में फसल अवशेष का स्थायी आवरण होने के कारण उसमें उपस्थित सूक्ष्म जीवों की जैविक गतिविधियां बढ़ जाती हैं जिससे मृदा में कार्बनिक पदार्थों की वृद्धि होती है जिसके परिणामस्वरूप फसल को समुचित मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। कार्बनिक पदार्थ का मृदा के भौतिक गुणों जैसेः मृदा संरचना, जल धारण क्षमता, मृदा भार घनत्व, उर्वरक उपयोग क्षमता, मृदा समुच्चय, मृदा पारगम्यता दर, पोषक तत्व प्रतिधारण (रिटेंशन) को फसल के जड़ीय क्षेत्र (राइज़ोस्फियर) में बढ़ाने में मुख्य भूमिका है। संरक्षण खेती के अन्दर किसान का मित्र कहे जाने वाले कंचुए की संख्या में वृद्धि होती है। फसलों की जड़ों एवं केंचुए द्वारा बनाये हुये छिद्रों में पानी एवं हवा का अनुपात (11) बना रहता है जिससे फसलों की वृद्धि एवं विकास ठीक ढंग से होता है।

प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं समुचित उपयोग

संरक्षण खेती प्रणाली को अपनाने से पर्यावरण एवं संसाधन दोनों का संरक्षण होता है। न्यूनतम जुताई, फसल अवशेष का स्थायी आवरण तथा फसल विविधिकरण अपनाने से मृदा एवं जल संसाधनों की गुणवत्ता और फसल की उत्पादक क्षमता बढ़ती है। फसल अवशेष जैव विविधता, जैविक गतिविधियों एवं वायुवीय गुणवता में बढ़ोत्तरी करते हैं। यह कार्बन को संचय (सिक्वेस्ट्रेशन) करने एवं मृदा तापमान को नियंत्रित करने में भी सहायक होती है। मृदा सतह पर उपस्थित फसल अवशेष मृदा सतह पर बहने वाले पानी (रन ऑफ) और हवा की गति को कम कर देते हैं जिससे मिट्टी के महीन कणों का उपरी सतह से विस्थापन एवं मृदा काबर्निक पदार्थों का क्षरण बहुत कम हो जाता है। फसल अवशेष मृदा सतह से पानी का वाष्पीकरण कम करने में सहायक होते हैं जिससे अधिक समय के लिए मृदा में नमी बनी रहती है।

पर्यावरणीय लाभ

फसल अवशेषों में बुआई करने वाली मशीनों के अभाव एवं किसानों के साफ-सुथरा खेत रखने की सोच के कारण सिंधु-गंगा के उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों में फसल अवशेषों से छुटकारा पाने के लिए फसल अवशेषों को पूरी तरह से जलाने का परम्परा बनी हुयी है। धान के अवशेषों को जलाने से इनमें से जहरीली गैसें जैसेः कार्बन डाइऑक्साइड (CO), सल्फर डाइऑक्साइड (SO), नाइट्रस ऑक्साइड (NO), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) आदि निकलती हैं जिनसे समूचा वातावरण प्रदूषित हो जाता है एवं मृदा के पोषक तत्वों तथा जैव पदार्थों को नुकसान होता है।

धान की पुआल के जलाने से कार्बन – लगभग 90-99 प्रतिशत, नाइट्रोजन – 80 प्रतिशत, फास्फोरस एवं पोटेशियम – 20 प्रतिशत तथा सल्फर – 50 प्रतिशत का नुकसान होता है। धान की पुआल में लगभग 50–55 प्रतिशत कार्बन, 0.62-068 प्रतिशत नाइट्रोजन, 0.20–0.23 प्रतिशत फास्फोरस एवं 0.78-1.15 प्रतिशत पोटेशियम होते हैं जो जलाने के उपरान्त नष्ट हो जाते हैं। धान की पुआल को जलाने पर उसमें उपस्थित कार्बन का 70, 7 एवं 07 प्रतिशत उत्सर्जन कार्बन। डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं मिथेन के रुप में होता है जबकि कुलनाइट्रोजन का 21 प्रतिशत हिस्सा नाइट्रस ऑक्साइड के रुप में उत्सर्जित होता है। पूरे भारत में लगभग 9281 मिलियन टन फसल अवशेषों को जला दिया जाता है जिससे काफी मात्रा में पौधों के लिए जरुरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। पंजाब एवं हरियाणा में अनुमानतः 196 एवं 0.91 मिलियन टन फसल अवशेषों को प्रतिवर्ष जला दिया जाता है।

संरक्षण खेती आधारित फसल प्रणालियों को अपनाकर पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है तथा साथ ही उपलब्ध संसाधनों को समुचित उपयोग में भी लाया जा सकता है। संरक्षण खेती में हैप्पी/ टर्बो सीडर तथा रोटरी डिस्क ड्रिल की मदद से गेहूँ को धान के अवशेषों के मध्य (10 टन फसल अवशेष भार के साथ) सफलतापूर्वक बोया जा सकता है।

सीमान्त ताप (टर्मिनल हीट) प्रभाव

मृदा की सतह पर अवशेषों को रखने से मिट्टी में नमी का संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण तथा मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है। अवशेषों को मिट्टी पर बनाए रखने से न केवल मृदा सुधार होगा बल्कि सूक्ष्म वातावरण भी फसल के अनुकूल होगा। गेहूँ की फसल में प्रकाश संशलेषण की दर 20–25 डिग्री सैल्सियस पर अधिकतम होती है तथा यह 30 डिग्री सेल्सियस के बाद तेजी से गिरने लगती है। गेहूँ की फसल में मार्च के महीने में तापमान के 35 डिग्री सैल्सियस से अधिक होने पर इसका सीधा प्रभाव गेहूँ की उत्पादकता पर पड़ता है जिसे हम सीमान्त ताप प्रभाव के नाम से जानते हैं। इस तापक्रम के बाद प्रत्येक डिग्री सेल्सियस की बढोत्तरी पर 4–5 प्रतिशत उपज में कमी आती है । संरक्षण आधारित खेती करने से सीमान्त ताप प्रभाव को नियंत्रित किया जा सकता है एवं इसकी वजह से गेहूँ की फसल में होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। मृदा सतह पर उपस्थित फसल अवशेष तापमान को 1–3 डिग्री सैल्सियस तक कम करने में सक्षम होते हैं जिससे फसल के सूक्ष्म पर्यावरण में तापमान गेहूँ की जरुरत के अनुसार बना रहता है। फसल अवशेषों की वजह से कम होने वाला तापमान मृदा सतह पर उपस्थित अवशेष भार पर निर्भर करता है। सीमान्त ताप की वजह से समय पूर्व परिपक्वता के कारण गेहूँ के दाने सिकुड़ जाते है जिसकी वजह से कम उत्पादन प्राप्त होता है। दानों की गुणवत्ता एवं आकार खराब होने से अच्छे बाजार भाव नहीं मिलते हैं जिसकी वजह से किसान को भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है।

स्त्रोत : केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान(भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद),करनाल,हरियाणा।



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