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गन्ने के प्रमुख खरपतवार एवं उनकी रोकथाम

परिचय

हमारे देश में उगाई जाने वाली नकदी फसलों में गन्ने का प्रमुख स्थान। यह एक बहुवर्षीय फसल है जो शरद (अक्टूबर), बसंत (फरवरी-मार्च), तथा अधसाली (जुलाई) में बोई जाती है। अधसाली गन्ने की बुवाई मुख्यत: महाराष्ट्र में की जाती है, जबकि भारत में ज्यादातर गन्ने की बुवाई बसंत ऋतु (फरवरी-मार्च) में की जाती है। इसकी बुवाई 75-90 सेमी. की दूरी पर कतारों में की जाती है। गन्ना बुवाई के लगभग 3-4 सप्ताह बाद उगता है परन्तु प्रारम्भिक अवस्था में इसकी बढ़वार अत्यंत धीमी होती है। पंक्तियों के बीच पर्याप्त दूरी एवं धीमी प्रारम्भिक बढ़वार खरपतवारों को बढ़ने तथा फैलने में अत्यधिक सहायक होती है। इसलिए इन खरपतवारों का यदि समय पर नियंत्रण न किया गया तो गन्ने की पैदावार एवं गुणवत्ता में कमी आती है।

प्रमुख खरपतवार

गन्ना पूरे वर्ष भर की फसल है इसलिए इसमें रबी, खरीफ तथा जायद मौसमों के खरपतवार उगते हैं। सितम्बर-अक्टूबर में बोये गए गन्ने की प्रारम्भिक अवस्था में चौड़ी पत्ती के खरपतवार ज्यादा उगते हैं तथा बाद में फरवरी-मार्च में बोये गए गन्ने में खरीफ मौसम के खरपतवार उगने लगते हैं। गन्ने की फसल में उगने वाले खरपतवारों को मुख्यत: तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

सारणी 1. गन्ने में उगने वाले प्रमुख खरपतवार

खरपतवार का प्रकार

शरदकालीन गन्ना

बसंतकालीन गन्ना

  1. चौड़ी पत्ती वाले

बथुआ (चिनोपोडियम एल्बम)

पत्थरचटा (ट्राइन्थमा मोनोगाइना)

 

मटरी (लेथाइरस अफाका)

अगेव (स्ट्रइगा प्रजाति)

 

अंकरी (विसिया सेटाइवा/हिरसुटा)

कनकवा (क्मेलिना बेंधालेन्सिस)

 

कृष्णनील (एनागेलिस आरवेन्सिस)

मकोय (सोलेनम नाइग्रम)

 

सोया (फ्यूमेरिया पारवीफ्लोरा)

हजारदाना (फाइलेन्थस निरुरी)

 

हिरनखुरी (कानवावुलस आरवेन्सिस)

सफेद मुर्ग (सिलोसिया आर्जेन्सिया)

 

भांग (केनाबैन्सिस सेटाइवा)

गोखरू (जैन्थियम स्टुमेरियम)

 

सेंजी (मेलिलोटस प्रजाति )

जंगली जूट (कोरकोरस प्रजाति)

 

सत्यनाशी (आर्जेमोन मैक्सिकाना)

जंगली चौलाई (अमरेन्थस विरिडिस)

 

कासनी (चिकोरियम इन्टाइवस)

महकुआ (ऐजेरेटम प्रजाति)

 

 

दुद्दी (यूफोरबिया प्रजाति )

 

 

कालादाना (आइपोमिया हेडेरिसिया)

  1. संकरी पत्ती वाले

दूबघास (साइनोडान डैकटीलाना)

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संवा (इकानोक्लोआ प्रजाति)

 

 

मकरा (डेक्टीलोक्टेनियम इजिपटियम)

 

 

बनचरी (सोरघम हेलेपेन्स)

 

 

डिजिटैरिया प्रजाति

 

 

कोदों (इल्यूसिन इंडिका)

 

 

दूबघास (साइनोडान डैक्टीलान)

  1. मोथाकुल

मोथा (साइप्रेरस रोटन्ड्स)

मोथा (साइप्रस रोटन्ड्स)

 

 

(साइप्रस इरिया) आदि

 

खरपतवारों से हानियाँ

गन्ने की फसल खेत में 12 से 18 महीने तक रहती है। इसके साथ ही इसे अत्यधिक खाद एवं पानी की आवश्यकता होती है। ये परिस्थितियाँ खरपतवारों की वृद्धि एवं विकास में सहायक होती हैं। गन्ने की फसल में खरपतवार फसल की तुलना में 5.8 गुना नाइट्रोजन, 7.8 गुना फास्फोरस एवं तीन गुना पोटाश उपयोग करते हैं, इसके अतिरिक्त खरपतवार नमी का एक बड़ा हिस्सा शोषित कर लेते हैं तथा फसल को आवश्यक प्रकाश एवं स्थान से भी वंचित रखते हैं। इसके अतिरिक्त खरपतवार फसलों में लगने वाले कीटों एवं रोगों के जीवाणुओं को भी आश्रय देते है। खरपतवारों की संख्या एवं प्रजाति के अनुसार गन्ने की पैदावार में 14 से 75 प्रतिशत तक की कमी आंकी गई है तथा साथ ही साथ चीनी की मात्रा एवं गुणवत्ता में भी कमी आती है।

खरपतवारों की रोकथाम का समय

गन्ने में खरपतवारों की मुख्य समस्या बोने से लेकर मानसून शुरू होने तक रहती है। इस समय गन्ने के पौधे छोटे होते हैं तथा खरपतवारों से मुकाबला नहीं कर पाते हैं। अत: गन्ने की फसल को शुरू से खरपतवार रहित रखना आवश्यक होता है। चूँकि फसल को शुरू से खरपतवार रहित रखना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक नहीं होता इसलिए खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवस्था में इनकी रोकथाम जरूरी होती है। गन्ने में यह अवस्था बुवाई के बाद 40-70 दिन के बीच होती है।

नियंत्रण के उपाय

गन्ने की फसल में खरपतवार नियंत्रण की विधियां निम्न हैं।

  1. यांत्रिक विधि – जहां पर कृषि कार्य करने वाले श्रमिक सरलता एवं कम लागत में मिलते हैं वहां पर गन्ने की फसल में उगने वाले खरपतवारों को खरपी, हो अथवा कुदाली से नष्ट किया जा सकता है। फसल बोने से पूर्व की जुताई भी खरपतवारों की संख्या में कमी लाती है, चूँकि गन्ने की फसल का जमाव बुवाई के 25-30 दिन बाद होता है तथा तब तक खरपतवार काफी संख्या में उग आते हैं इसलिए फसल बोने के एक-दो सप्ताह बाद गुड़ाई करने से खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है। इसे अंधी गुड़ाई कहते हैं। इसके अलावा बैलों द्वारा चलाए जाने वाले कल्टीवेटर से गन्ने की पंक्तियों के बीच के खरपतवार पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।
  2. ट्रैश मल्चिंग (सूखी पत्ती बिछाकर) – गन्ने की पंक्तियों के बीच खाली स्थान में गन्ने की सूखी पत्तियों या पुवाल की 7-12 सेंमी. मोटी तह इस प्रकार से बिछा दी जाए की गन्ने का अंकुर न ढकने पाए तथा केवल खाली स्थान ढका रहे। ऐसा करने पर खरपतवार ढक जाते हैं तथा प्रकाश न मिलने के कारण पीली पड़कर सूख जाते हैं। इससे खेत में नमी भी सुरक्षित रहती है।
  3. अर्न्तवर्ती फसलों की बुवाई – चूँकि गन्ने की कतारों के बीच खाली जगह ज्यादा होती है तथा इसी खाली स्थान में खरपतवार अधिक उगते हैं, इसलिए इस खाली स्थान में कम अवधि वाली तथा तेज बढ़ने वाली फसलें उगाने से न केवल खरपतवारों पर काफी हद तक काबू पाया जाता है बल्कि प्रति हेक्टेयर पैदावार आमदनी में भी बढ़ोत्तरी की जा सकती है। शरद कालीन गन्ने के साथ आलू, गेहूं, लाही (तोरिया) एवं मसूर आदि को बोया जा सकता है तथा बसंत कालीन गन्ने के साथ मूंग एवं उर्द की फसल ली जा सकती है। इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि इन फसलों की कम अवधि वाली तथा तेज बढ़ने वाली प्रजातियों का ही चुनाव करें।
  4. गन्ने के अच्छे बीज का चुनाव, बीजोपचार, भूमि में कीटनाशक दवाओं का प्रयोग एवं खाद एवं उर्वरक तथा सिंचाई की उचित मात्रा इनके प्रयोग से जहां एक ओर फसल का अंकुरण एवं वृद्धि अच्छी होती है तथा फसल की बढ़वार अधिक होती है वही दूसरी ओर स्वस्थ पौधे खरपतवारों से प्रतियोगिता करने की क्षमता रखते हैं।
  5. शाकनाशी के प्रयोग द्वारा – यांत्रिक विधि से गन्ने की फसल में खरपतवार नियंत्रण में कुछ कठिनाईयां आती है जैसे –
    1. यांत्रिक विधि से निराई-गुड़ाई वर्षा ऋतु से पहले ही संभव है क्योंकि वर्षा ऋतु में खेत में हमेशा नमी रहने से निकाई-गुड़ाई यंत्रों का चलाना संभव नहीं होता।
    2. यांत्रिक विधि से निकाई-गुड़ाई काफी खर्चीली एवं इसमें समय बहुत लगता है। इसलिए खरपतवारों को क्रांतिक अवस्था में नियंत्रित करने में कठिनाई आती है।
    3. कतारों में उगे खरपतवारों का नियंत्रण नहीं हो पाता है।

 

उपरोक्त कठिनाईयों को देखते हुए गन्ने की फसल में शाकनाशियों का प्रयोग जहां एक तरफ कम खर्चीला है वहीं दूसरी तरफ इससे खरपतवारों का समय से नियंत्रण हो जाता है तथा समय की बचत भी होती है।

गन्ने की फसल में खरपतवारों को नष्ट करने के लिए बहुत से शाकनाशी उपलब्ध हैं जिनका प्रयोग अंकुरण के पूर्व व बाद में किया जा सकता है इनमें प्रमुख हैं –

एट्राजिन (एट्राटाफ, धानुजीन, सोलारो) – गन्ने में एक वर्षीय चौड़ी पत्ती वाले, घास कुल के खरपतवारों तथा मोथा को नष्ट करने के लिए यह एक प्रभावी शाकनाशी है। इनका प्रयोग गन्ने की बुवाई के बाद परन्तु उगने के पहले किया जाता है। भारी भूमियों में 2.0-2.5 किग्रा. सक्रिय तत्व/हेक्टेयर तथा हल्की भूमियों में 1.0-1.5 किग्रा./हेक्टेयर मात्रा पर्याप्त होती है।

मेट्रीब्यूजिन (सेंकार, टाटा मेट्री, लेक्सोन) – यह एक अत्यंत प्रभावशाली शाकनाशी है। इसका प्रयोग बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व किया जाता है। इसका प्रयोग 5-10 प्रतिशत गन्ना उगने पर भी किया जा सकता है। इस शाकनाशी की 1.0-1.5 किग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। इसके प्रयोग से प्रमुख खरपतवार जैसे मोथा, कोदों, डिजिट्रैरिया, पत्थरचटा आदि का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

2,4-डी (2,4-डी, एग्रोडोन-48, वीडमार, टेफासाइड, इर्विटाक्स)- चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों तथा मोथा के नियंत्रण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी 1.5-2.5 किग्रा. सक्रिय तत्व/हेक्टेयर मात्रा बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण के पूर्व करने से संतोषजनक परिणाम प्राप्त हुए है। गन्ने की फसल में अंकुरण के बाद इस रसायन की 1.0 किग्रा./हेक्टेयर मात्रा प्रयोग करने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे पथरचटा, नूनिया, छोटा गोखरु आदि का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

डाइयूरान (एग्रोमेक्स, कारमेक्स, क्लास) – इस खरपतवार नाशी की 2.5-3.0 किग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा प्रति हेक्टेयर बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण के पूर्व प्रयोग करने से खरपतवारों का अच्छी तरह से नियंत्रण हो जाता है तथा गन्ने की फसल पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।

पैराक्वाट (ग्रेमेक्सोन) – इस खरपतवार नाशी रसायन की 0.5-1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा को 5-10 प्रतिशत गन्ना उगने पर प्रयोग करने से सभी प्रकार के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण हो जाता है। छिड़काव करते समय हुड का प्रयोग करें।

एलाक्लोर (लासो) – घास कुल के खरपतवारों तथा मोथा को नष्ट करने के लिए इस शाकनाशी रसायन की 2-3 किग्रा. मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद तुरंत अंकुरण से पूर्व प्रयोग करना चाहिए।

व्यापारिक नाम

नोट: खरपतवारनाशी रसायनों की आवश्यक मात्रा को 600 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से घोल बनाकर समान रूप से करना चाहिए।

एकीकृत खरपतवार प्रबंधन

गन्ने की कतारों के बीच अधिक दूरी होने के कारण यांत्रिक विधि, मल्चिंग एवं रासायनिक विधि, आदि तरीकों का प्रयोग साथ-साथ किया जा सकता है। ऐसा करने से जहां केवल एक विधि से खरपतवार नियंत्रण पर निर्भरता कम होती है बल्कि खरपतवारों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण भी होता है। उदाहरण के तौर पर गन्ने में बुवाई के बाद सूखी पत्तियों की मल्चिंग करने तथा उसके बाद फसल उगने पर किसी भी शाकनाशी का प्रयोग करने से खरपतवारों का नियंत्रण ज्यादा कारगर होता है तथा गन्ने की पैदावार भी बढ़ जाती है। एट्राजीन 1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व/हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व प्रयोग करने तथा उसके बाद हाथ से एक बार निराई करे पर गन्ने की पैदावार में अधिक वृद्धि होती है। इसी प्रकार एट्राजिन 1.0 किग्रा. सक्रिय तत्व/हेक्टेयर की दर से लाइनों के बीच (डायरेक्टेड स्प्रे) करने से गन्ने की फसल को खरपतवारों से सम्पूर्ण छुटकारा मिल जाता है तथा पैदावार में भी बढ़ोत्तरी होती है।

स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार



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