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मछलियों के उत्पादन के लिए खाद की आवश्यकता

परिचय

आप अवगत है की  खेतों में फसल की उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद की आवश्यकता होती है। फसलों को पोषक तत्व जमीन से प्राप्त होता है। इसी पराक्र मछलियों की वृद्धि के लिए भी पोषक तत्व भूमि से उपलब्ध होते है। पानी तो सिर्फ  मछलियों के रहने को माध्यम है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मछली भी अन्य फसलों के समान जमीन में उपजाई जाने वाली फसल है। मछलियों का मुख्य भोजन प्लवक (प्लांकटन ) है जिनकी मात्रा बनाये रखने के लिए उर्वरक का प्रयोग अनिवार्य है। आपने यह अनुभव किया होगा है कि जिन तालाबों में मेवेशियों  को धोया जाता है, उसमें मछलियों की वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक होती है क्योंकि उनके मल मूत्र स्वतः आते रहते है। इसी प्रकार तैरते बत्तख भी बीट त्याग कर तालाब की उत्पादकता बढ़ाते  है। सड़ी गली पत्तियां भी हरी खाद के रूप में तालाब की उर्वरकता को बढ़ाते हैं।

मछली पालन के लिए आवश्यक उर्वरक

मछलीपालन जलीय खेती है जिन उर्वरकों का प्रयोग खेतों में किया जाता है, उन उर्वरकों को ही  मोटे तौर पर मछलीपालन के लिए आवश्यकता होती है। इन उर्वरकों को दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है।

कार्बनिक खाद/जैविक खाद जो निम्नलिखित है

क.    भेड़, बकरी, सूअर का मल-मूत्र

ख.    बत्तख.मुर्गी का मल-मूत्र

ग.     मवेशियों को गोबर

घ.     हरी खाद

अकार्बनिक खाद.रासायनिक खाद

इसमें यूरिया/सिंगर सुपर फास्फेट/डी.ए.पी. आदि शामिल है।

चूना

चूने का प्रयोग तालाब में किया जाना अनिवार्य है अतः इसे भी हम खाद की ही श्रेणी में रखते हैं। इसके प्रयोग से मिट्टी में वर्तमान पोषक तत्व पानी में उपलब्ध हो पाते हैं। कली चूने को बुझा आकर पानी में घोल का तालाब में इनका छिड़काव् किया जाता है। चूने के प्रयोग से निम्नांकित लाभ है।

  1. पानी के पी.एच. को 7.50 से 8.50 के बीच संतुलित रखता है अर्थात हल्का क्षारीय बनाये रखता है।
  2. पाने को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यप्रद रखते हुए इसमें घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है।
  3. मछलियों को रोगमुक्त रखने में सहायता करता है।
  4. मछलियों की वृद्धि तथा प्रजनकों को समय पर परिपक्व होने में सहायक है।
  5. जब कई दिनों से बादल के कारण सूर्य नहीं निकला हो या मछलियां सूर्योदय के पूर्व सतह पर आकर असमय व्यवहार करती हो तो मछलियों को आकस्मिक मृत्यु से बचाता है।
  6. तालाब में प्रयोग किये जाएं वाले गोबर आदि को तीब्रता से विघटित करता है। चूने का प्रयोग खाद डालने के एक सप्ताह पर्व किया जाता है।

खाद का प्रयोग

  • खाद का प्रयोग जीरा डालने के पूर्व तथा चूना डालने के बाद किया जाता है।
  • गोबर को तालाब के किनारे पर पानी के भीतर डाल दिया जाता है, ताकि धीरे-धीरे रिसकर तालाब के जल में घुलते रहे।
  • गोबर डालने के दो सप्ताह बाद जीरा का संचय किया जाता है, ताकि इस अवधि में प्लवकों की मात्रा के अनुसार खाद को प्रयोग किया जाता है। जैविक एवं रासायनिक खाद का प्रयोग 15 दिनों के अंतराल पर किया जाना चाहिए।
  • मुर्गी के बीट में कार्बनिक तथा अकार्बिनक दोनों तत्व उपलब्ध रहते हैं। अतः यह मत्स्यपालन के लिए विशेष लाभदायक है।
  • अगर तालाब में पानी की गहराई कम हो अथवा पानी का रंग काला,भूरा या गहरा हरा दिखाई दे तो खाद का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।

एक एकड़ तालाब में खाद की आवश्यकता

खाद का नाम

खाद की मात्रा

गोबर

10,000 किलो प्रतिवर्ष

चूना

200 किलो प्रतिवर्ष

चूरिया

150 किलो प्रतिवर्ष

सिंगल सुपर फास्फेट

150 किलो प्रतिवर्ष

म्यूरेट और पोटाश

25 किलो प्रतिवर्ष


मत्स्यपालन में ध्यान देने वाली बातें

  • मत्स्य बीज संचयन के कम कम दस दिन पूर्व तालाब में जाल चलाने के बाद 200 कि.ग्रा. प्रति एकड़ की दर से बुझा हुआ चूना का प्रयोग करें।
  • तालाब में मत्स्य बीज छोड़ने के पहले मत्स्य बीज के पोलीथिन पैक या हांडी को तालाब के पानी में 10 मिनट रहने दें ताकि मत्स्य बीज वाले पानी और तालाब के पानी के तापमान एक हो जाए। उसके उपरात ही मत्स्य बीज को धीरे-धीरे तालाब के पानी में जाने दें।
  • तालाब में जानवरों को प्रवेश करने से तालाब के तल का पानी एवं सतह का पानी मिलता रहता है जो मत्स्य पालन के लिए लाभदायक है।
  • तालाब के आर-पार खड़े होकर तालाब के पानी पर रस्सी पीटने से/तालाब में जाल चलाने से/लोगों के तैरने से तालाब के पानी में ऑक्सीजन ज्यादा घुलता है तथा मछली का अच्छा व्यायाम होता है जो मछली की वृद्धि के लिए लाभदायक है।
  • दिसम्बर माह के मध्य में तालाब में चूना का एक बार फिर प्रयोग करने से मछलियों में जाड़े में होने वाली लाल चकते की बिमारी से बचा जा सकता है।
  • तालाब में जाल डालने के पहले जाल को नमक के पानी से अच्छी तरह धो लें इससे मछली में संक्रमण वाली बीमारी को प्रकोप नहीं होगा।
  • तालाब में मछली की शिकार माही करते समय पकड़ी गई मछलियों को बिक्री हेतु ले जाने तक हप्पा में या जल में समेट का तालाब में जिन्दा रखने की कोशिश करें। इससे मछली बाजार में ताज़ी पहुंचेगी और उसका अच्छा मूल्य प्राप्त होगा।
  • सुबह में तालाब के चारों ओर घूमें । तालाब के किनारे मिट्टी में बने पद चिन्हों या यहाँ वहां गिरे मछली या घास फूस से आपको तालाब में मछली की चोरी की जानकारी मिल सकती है। साथ ही साथ मछली की सुबह की गतिविधियों/तैरने की स्थिति से भी मछली के स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त होती है।
  • तालाब का पानी यदि गहरा हरा हो जाए या उससे किसी तरह की दुर्गन्ध आती महसूस हो तो अविलम्ब तालाब में बाहर से ताजा पानी डालें तथा किसी भी तरह का भोजन या खाद तालाब में डालना बंद कर दें।
  • यदि सदाबहार तालाब है तो प्रयत्न करें कि आधे किलो से ऊपर की मछली ही निकाली जाए।
  • यदि आसपास मौसमी तालाब है तो उससे छोटे बच्चे 100-150 ग्राम का क्रय का अपने तालाब संचयन करें।
  • मत्स्यपालन के कार्यकलाप के लिए एक डायरी संघारित करे जिससे इस पर होने वाले खर्च तथा आय एवं मछली के उत्पादन का ब्योरा लिखते रहे जो भविष्य में काम आएगा।
  • आपात स्थिति में मत्स्य विशेषज्ञ से संपर्क करें।

स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार

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