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बच्चों को मैत्रीपूर्ण विधिक सेवाऐं और उनके संरक्षण के लिए विधिक सेवाऐं

बच्चों को मैत्रीपूर्ण विधिक सेवाऐं और उनके संरक्षण के लिए विधिक सेवाऐं

परिचय तथा पृष्ठभूमि

यह कभी भी प्रश्नगत नही किया जा सकता कि बच्चे किसी समाज का सबसे असुरक्षित हिस्सा होते हैं। वे विश्व जनसंख्या के लगभग एक तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा यदि उन्हें पर्याप्त अवसर प्रदान नहीं किये जाता, उन्हें भविष्य का जिम्मेदार नागरिक बनाने का अवसर वर्तमान पीढ़ी के हाथ से निकल जायेगा..। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सलिल बाली बनाम भारतीय संघ (यू.ओ.आई.) तथा अन्य, 2013, vii ए.डी.(एस.सी.) मामले में व्यक्त उपरोक्त सम्प्रेद्गण दर्शाता है कि युवा पीढ़ी के प्रति हमारा यह दायित्व है कि प्रत्येक बच्चे के लिए विधिक सेवा सहित सभी अवसर खोले जाएँ ताकि उनके व्यक्तित्व का समग्र विकास हो तथा उनकी क्षमता का शारीरिक, मानसिक, नैतिक व आघ्यात्मिक विकास हो।

अन्तर्राष्ट्रीय वचनबद्धताएँ

  1. 20 नवम्बर, 1959 को बालकों के अधिकारों की घोषणा को स्वीकार करते हुए, संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने जाति, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, अथवा वंश का भेद भाव किये बिना बच्चों को स्वस्थ एवं सामान्य ढंग से तथा स्वतन्त्रा व गौरवपूर्ण परिस्थिति में उनका शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक विकास करने के योग्य बनाने के लिए दस सिद्धांतों को अधिकथित किया है।
  2. बाल न्याय प्रदान करने हेतु संयुक्त राष्ट्र आदर्श न्यूनतम नियम (पेइचिंगनियम, 1985) ने राष्ट्रों से यह सुनिश्चित करने का आहृवान किया है कि कार्यवाही के दौरान बालक को विधिक  सलाहकार के माघ्यम से प्रतिनिधित्व का अधिकार  प्राप्त होगा अथवा यदि उस देश में ऐसा प्रावधान  हो तो उसे मुफ्त  विधिक  सहायता के लिए आवेदन करने का भी अधिकार होगा।
  3. बालकों के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यू.एन.सी.आर.सी.) बालकों के अधिकार हेतु एक विस्तृत, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का बाध्यकारी समझौता है जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1989 में स्वीकार किया है।  यू.एन.सी.आर.सी. का उद्देश्य बच्चों को प्रदान किये जाने वाले मूलभूत मानवाधिकारों  की रूपरेखा तैयार करना है। इन अधिकारों को चार मुख्य  वर्गों में बांटा जा सकता है। इन चार वर्गों में बालकों केस भी नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक अधिकार  आते हैं जो निम्नलिखित हैं :-
  • न जीने का अधिकार - इसमें बालक को जीवन का अधिकार  तथा जीवित रहने के लिए आवश्यक मूलभूत जरूरतें जैसे पोषण, आवास, उपयुक्त जीवनस्तर तथा चिकित्सीय सेवाओं का लाभ उठाना शामिल है।
  • न विकास का अधिकार  - इसमें बालक को शिक्षा, खेलकूद, मनोरंजन, सांस्कृतिक गतिविधियाँ , सूचना प्राप्त करना तथा विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता, विवेक तथा धर्म  की स्वतंत्रता का अधिकार  शामिल है।
  • न संरक्षण का अधिकार - बच्चों को सभी प्रकार के दुर्व्यवहार, उपेक्षा व शोषण से संरक्षित करना। साथ ही शरणार्थी बच्चो की विशेष देख-रेख करना, अपराध  न्याय व्यवस्था में बच्चो का संरक्षण, रोजगार में बच्चो का संरक्षण करना, उन बच्चो का संरक्षण व पुर्नवास करना, जिन्होंने किसी प्रकार के शोषण अथवा दुर्व्यवहार का सामना किया हो।
  • न भागीदारी का अधिकार  - इसमें बच्चों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उनके जीवन से संबंधित मामलों में अपनी बात रखने का अधिकार, शान्तिपूर्वक सभा करने व किसी संगठन में शामिल होने का अधिकार  शामिल है। ज्योंही उनकी क्षमता का विकास होता है, बच्चों को समाज की गतिविधियों में हिस्सा लेने के तथा जिम्मेदार युवा बनने के अधिक  अवसर मिलते रहे।

संवैधानिक आश्वासन

  1. हमारे संविधान के निर्माता इस तथ्य के प्रति अच्छी तरह जागरूक थे कि राष्ट्र का विकास, उस राष्ट्र के बच्चों के विकास से ही संभव है तथा बच्चों को शोषण से बचाना भी आवश्यक है। भारतीय संविधान  बच्चों को देश के नागरिक की तरह अधिकार प्रदान करता है तथा उनका विशेष स्तर बनाये रखते हुए राज्य ने विशेष कानून भी बनाये हैं। संविधान 1950 में लागू हुआ और इसमें बालको के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन सहित मौलिक अधिकारों व राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को शामिल किया गया है।
  2. भारत के संविधान  के अनुच्छेद 22 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार  है कि उनकी इच्छानुसार विधि व्यवसायी (लीगल पक्टिशनर) द्वारा उनका बचाव हो। बाल न्याय प्रदान करने के लिए अपनाये जाने वाले मौलिक सिद्धांतों में से एक यह भी है कि राज्य के खर्च पर विधिक सेवा प्रदान करना सुनिश्चित किया जाये। विधिक सेवा प्राधिकरण  का यह आवश्यक कर्तव्य है कि प्रत्येक बालक को मुफ्त  विधिक  सहायता उपलब्ध  कराई जाये।

बच्चों से संबंधित भारतीय संविधान  के प्रावधान  निम्नलिखित है -

  • अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र  में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों  के सामान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 15 (3) के अनुसार इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रिायों और बालकों के लिये कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
  • अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा, अन्यथा नहीं।
  • अनुच्छेद 21(A) के अनुसार राज्य, छः वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले सभी बालकों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का ऐसी रीति में, जो राज्य विधि द्वारा, अवधरित करे, उपबंध करेगा।
  • अनुच्छेद 23 (1) के अनुसार मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा अन्य इसी प्रकार की बंधुआ  मजदूरी प्रतिबंधित है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध  होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा।
  • अनुच्छेद 24 के अनुसार चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखाने या खान में काम करने के लिये नियोजित नहीं किया जायेगा या किसी अन्य खतरनाक कार्य में नहीं लगाया जायगा।
  • अनुच्छेद 29 (2) के अनुसार राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म , मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार  पर वंचित नहीं किया जायेगा।
  • अनुच्छेद 39( ई) के अनुसार राज्य, विशिष्टतया, अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि पुरूष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरूपयोग न हो और आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिक, से रोजगार की ओर उन्मुख न हों जो उनकी आयु या शक्ति के प्रतिकूल हो।
  • अनुच्छेद 39 (एफ) के अनुसार राज्य, विशिष्टतया, अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधाएं  मिले और बालकों और नवयुवकों की शोषण से तथा नैतिक और आर्थिक परित्याग से रक्षा की जाय।
  • अनुच्छेद 45  के अनुसार राज्य, सभी बालकों के लिये छः वर्ष की आयु पूरी करने तक, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा देने के लिये उपबंध करने का प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य, अपने लोगों के पोषण स्तर व जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा।
  • अनुच्छेद 51 ए (क) के अनुसार, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बच्चे या प्रतिपाल्य के लिये शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

अन्य विधान

संविधान के अलावा ऐसे कई कानून हैं जो बालकों से जुड़े हैं। इनमे से कुछ निम्निलिखित

हैं :-

1.  संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 - यह अधिनियम  न्यायालय द्वारा बालकों के संरक्षकों की योग्यताओं, नियुक्तियों और निष्कासन की चर्चा करता है और यह धर्म  पर ध्यान दिये बिना सभी बालकों पर लागू हैं।

2.  बाल श्रम (प्रति निषेध  और विनियमन) अधिनियम, 1986 - यह अधिनियम  विशिष्ट कार्यों में बालकों के नियोजन के निषेध  तथा अन्य विशिष्ट नियोजनों में बालकों की कार्य-दशा को उत्कृष्ट बनाने हेतु प्रवृत्त हुआ है। अधिनियम  के अंतर्गत बालक से अर्थ वह व्यक्ति है जिसने अपनी 14 वर्ष की आयु को प्राप्त नहीं किया है। यह अधिनियम  बाल रोजगार (अर्थात जिसने अपनी 14 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं की है के नियोजन) पर प्रतिबंध लगाने हेतु आशयित है।

3.  प्रसव-पूर्व निदान तकनीक लिंग चयन प्रतिबंध्द्ध अधिनियम, 1994 (पी. सी. पी. एन. डी. टी. एक्ट) यह अधिनियम  अनुवांशिक अथवा चयापचयी अथवा गुण-सूत्रा संबंधी असमानता का पता लगाने के उद्देश्य हेतुद्ध प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का प्रयोगों के विनियमनों और कन्या भ्रूण-हत्या के लिये जिम्मेदार प्रसव-पूर्व लिंग निर्धरण के उद्देश्य हेतु ऐसी तकनीकों का गलत प्रयोग करने की रोकथाम करता है।

4.  किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम  2000 -यह अधिनियम  उन किशोरों और बालकों से संबंधित है जो कानून से संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें संरक्षण कि आवश्कता है। यह अधिनियम  उनके विकास और आवश्यकताओं का प्रबंध  करते हुए उन्हें उचित देख-रेख, संरक्षण एवं चिकित्सा को, बाल संबंधी मामलों में उनके सर्वश्रेष्ठ लाभ की प्रकृति में अधिनिर्णय करने में बाल-अनुकूल दृष्टिकोण अपनाते हुए एवं स्थापित अधिनियम  के तहत विभिन्न संस्थागतों द्वारा आधारभूत पुनर्वास प्रदान करता है।

5.  शिशु संरक्षण अधिकार  अधिनियम, 2005 हेतु आयोग - यह अधिनियम  बाल अधिकारों के संरक्षण एवं बच्चों के विरुद्ध  अपराधें अथवा बाल अधिकारों के उल्लंघन और उनसे संबंधित अथवा उनसे निकले हुए मामलों की बाल न्यायालयों में शीघ्र सुनवाई हेतु राष्ट्रीय आयोग एवं राज्य आयोगों की स्थापना करता है।

6.   बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 - यह अधिनियम लड़के एवं लड़कियों दोनों पर न्यूनतम आयु निर्धारित  किये जाने के द्वारा बाल विवाह करने पर अंकुश लगाता है। बाल विवाह निषेध  अधिनियम, 2006 की धारा 2(ए) के अंतर्गत बालक का अर्थ है कि जो व्यक्ति, यदि वह पुरुष है जिसने अपनी आयु 21 वर्ष पूर्ण न की हो और यदि वह महिला है तो उसने अपनी उम्र के 18 वर्ष पूर्ण न किए हो।

7.  बच्चों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार  अधिनियम, 2009 -संविधान  का अनुच्छेद 21-ए यह प्रावधान  करता है कि राज्य छः से चौदह वर्ष के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करवाएगा, इस प्रकार, जैसाकि राज्य, विधि द्वारा निश्चित करे। संसद ने बच्चों की निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार  अधिनियम, 2009 को लागू कर अनुच्छेद 21 ए द्वारा अपेक्षित अधिनियम  बनाया है। यह अधिनियम  छः वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध  कराता है।

8.   यौन अपराधें से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 - यह अधिनियम  बच्चों को यौन उत्पीड़न के अपराधें, यौन शोषण एवं अश्लील साहित्य से संरक्षण प्रदान करता है और ऐसे अपराधें के विचारण हेतु तथा उनसे संबंधित अथवा उनसे निकले हुए मामलों के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना करता है।

विधिक सेवाओं का अधिकार

  1. विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 के अंतर्गत बच्चे विधिक  सेवाओं के लाभार्थी हैं। यह अधिनियम  विधिक सेवा प्राधिकरण  का गठन करने के लिए, अधिनियमित  किया गया ताकि कोई भी नागरिक आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय प्राप्ति के अवसर से वंचित न रहे। साथ ही समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को निःशुल्क एवं उचित विधिक सेवा प्रदान किया जाना सुनिश्चित किया जा सके।
  2. विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 की धारा 12 सीद्ध के अंतर्गत एक बालक जिसे मुकदमा दायर अथवा प्रतिरक्षा करना है, विधिक  सेवाओं का हकदार है। इसलिये, यह विभिन्न विधिक सेवा संस्थानों का कर्तव्य है कि वह विधि के साथ संघर्ष मे बालक को निःशुल्क विधिक  सहायता प्रदान करें और उनके मामलों का त्वरित निपटान करें।
  3. इस पृष्ठभूमि में, योजना विधिक सेवा संस्थानों (राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, तालुक विधिक सेवा समिति, उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति) के लिए तैयार की गई है कि इसका पालन बच्चों को विधिक सेवा देते समय किया जाए।

परियोजना का नाम

यह योजना नालसा बच्चों को मैत्रीपूर्ण विधिक  सेवाएं और उनके संरक्षण के लिए विधिक सेवाऐं योजना, 2015 कही जाएगी।

परिभाषाएँ

इस योजना में जबतक कि अन्यथा अपेक्षित न हो

  1. अधिनियम  अर्थात विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 (1987 का 39)
  2. जे. जे. अधिनियम  अर्थात किशोर न्याय (देख-भाल एवं बच्चों का संरक्षण) अधिनियम 2000 (2000 का 56)
  3. जे. जे. नियम अर्थात किशोर न्याय नियम देख-भाल एवं बच्चों का संरक्षणद्ध नियम,2007
  4. विधिक सेवा का वही अर्थ है जो विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 की धारा 2 (सी) के अंतर्गत बताया गया है।
  5. विधिक  सहायता क्लिनिक अर्थात जैसा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण  (विधिक  सहायता क्लिनिक) विनियम  2011 के अंतर्गत विनियम 2 (सी) में बताया गया है।
  6. विधिक सेवा संस्थान का अर्थ है राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति, उच्च न्यायालय विधिक सेवा न्यायालय समिति, जिला विधिक  प्राधिकरण, तालुक विधिक सेवा समिति, जैसा भी मामला हो।
  7. पैनल अधिवक्ता अर्थात पैनल अधिवक्ता जो राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (निःशुल्क एवं उपयुक्त विधिक सेवा) विनियम, 2010 के विनियम 8 के अंतर्गत चुने जाते हैं।
  8. अर्धविधिक स्वयंसेवी अर्थात जैसा कि विधिक सेवा संस्थान के द्वारा अर्धविधिक स्वयंसेवी को प्रशिक्षित एवं नियुक्त किया गया है।
  9. अन्य समस्त शब्द एवं भाव जो प्रयोग किये गये हैं परंतु इस योजना में परिभाषित नहीं किये गये हैं और विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम , 1987 (1987 का (39) अथवा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण  नियम, 1995 में परिभाषित अर्थ क्रमशः एक ही होगा जो उपरोक्त अधिनियम  अथवा नियम में नियत है।

योजना का उद्देश्य

दिल्ली में, 16 वर्ष का बच्चा एक्स मोबाइल फोन चुराने का अभियुक्त है। मुम्बई में, 12 वर्ष का बच्चा वाई यौन दुर्वव्यवहार से पीड़ित है।    कलकत्ता में जेड  के माता-पिता उसकी अभिरक्षा हेतु संघर्ष कर रहे हैं । चेन्नई में 13 वर्षीय बच्चा एस एक फैक्ट्री से छुड़ाया गया जो तस्करी का शिकार है। प्रत्येक दिन बच्चे इसी तरह न्याय प्रणाली के संपर्क में आते हैं, जहाँ औपचारिक एवं अनौपचारिक न्याय प्रदाता निर्णय देते हैं जो उनके भविष्य को प्रभावित करने की क्षमता रखते है। इन बच्चों के क्या अधिकार  हैं जब वे विधि के संपर्क में आते हैं? क्या वे किसी भी प्रकार की कानूनी सहायता के हकदार हैं? यदि ऐसा है तो वह सेवाएँ कैसे उपलब्ध  कराई जाएंगी और आवश्यक्ता एवं आपदा की परिस्थिति में क्या बच्चों तक पहुँच सकेंगी? कैसे विधि क सेवाएँ शिशु अनुकूल बनाई जायेंगी जब तक तर्कगत एवं आर्थिक रूप से इतनी बाधएं हैं? कैसे शिशु अनुकूल न्याय की परिकल्पना अनौपचारिक न्याय व्यवस्था में भूमिका अदा करती है? इस योजना का प्रयोजन इन समस्यायों को सुलझाने हेतु एक परिकल्पित एवं कार्यशील पद्धति का सुझाव देना है जिसका अंतिम लक्ष्य जमीनी स्तर पर बच्चों को सार्थक, प्रभावी, उपयोगी एवं आयु संगत विधिक  सहायता प्रदान करना है।

परियोजना के मुख्य उद्देश्य हैं

  • बच्चों तक पहुँचाने के लिए मूल अधिकारों एवं लाभों की रूपरेखा बनाना।
  • बच्चों की देख-भाल एवं संरक्षण और सभी स्तरों पर बच्चों के कानूनी झगड़ो के लिए विधिक  प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना।
  • विधिक  सेवाएँ, संस्थागत देखभाल, परामर्श एवं राष्ट्रीय, राज्य, जिला एवं तालुका के स्तरों पर सहयोग सेवाओं को दृढ़ करना।
  • किशोर न्याय प्रणाली में एक माहौल तैयार करना जिसमें बच्चों को महत्त्व दिया जाए, उन्हें प्रोत्साहित किया जाए, उन्हें मान्यता दी जाए और उनके अधिकारों को सम्मान दिया जाए और उनसे एक वैयक्तिक विशिष्टता के साथ व्यवहार किया जाए।
  • समस्त पदाधिकारियों जिनमें अर्धविधिक स्वयंसेवी, पैनल अधिवक्ता परामर्शकर्ता, सेवा प्रदाताओं, गैर सरकारी संगठन, स्थानीय निकाय, पुलिस, न्याय विभाग एवं राज्य सरकार के अन्य संबंधित  विभाग शामिल होंगे, की सभी स्तरों पर क्षमताओं का संवर्धन  करना ताकि वे बाल मित्रवत विधिक  सेवायें उपलब्ध  कराने का उत्तरदायित्व लें।
  • यह सुनिश्चित करना कि अनिवार्य प्राधिकरणों  एवं संस्थानों जैसे कि किशोर न्याय परिषदों, बाल कल्याण समितियों, अन्य कल्याणकारी समितियों, अवलोकन तथा आश्रयग्रह, मनोचिकित्सक अस्पताल अथवा नर्सिंगहोम, आयोगों, परिषदों, परिवीक्षा अधिकारियों के कार्यालय आदि, विभिन्न बाल मित्र  विधानों  के अंतर्गत स्थापित हों।
  • बाल कल्याण एवं सुरक्षा के लिए उपलब्ध  वर्तमान केन्द्रीय तथा राज्य परियोजनायें नीतियां, विनियम, एस.ओ. पी. स., पुलिस निदेशों, सम्मेलनों, नियमों, घोषणाओं, टिप्पणियों और रिपोर्टों आदि आंकड़ो का संचय करना।
  • बाल अधिकारों एवं उनकी सुरक्षा पर उपलब्ध  बाल सुरक्षा सेवाओं, परियोजनाओं और सभी स्तरों पर ढांचों के बारे मे बड़े पैमाने पर जनता को शिक्षित करने के लिए सभी हितधारकों अर्थात अर्धविधिक स्वयंसेवी, किशोर न्याय परिषद्‌ के सदस्य एवं बाल कल्याण समिति, कल्याण अधिकारियों, पुलिस, लोक अभियोजकों, न्यायिक अधिकारियों, विभिन्न घरों  के देखरेख करने वाले, शैक्षणिक एवं चिकित्सक संस्थानों आदि के लिए जागरूकता कार्यकम आयोजित करना।
  • वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, एस.जे.पी.यूं., जे.डब्ल्यु.ओ.एस., पैनल अधिवक्तागण, अर्ध् विधिक  स्वयंसेवी, किशोर न्याय परिषद्‌ के सदस्यों, कल्याण अधिकारियों, सलाहकारों, परिवीक्षा अधिकारियों, लोक अभियोजकों, न्यायिक अधिकारियों, विभिन्न घरों के देख-रेख करने वालों के लिए कौशल विकास तथा उनमें उत्तरदायित्व का अहसास जगाने के लिए प्रशिक्षण, अभिविन्यास और संवेदीकरण हेतु कार्यक्रमों का आयोजन तथा व्यवस्था करना।
  • विधिक तथा बाल अधिकारों एवं सम्बन्ध क्षेत्रों के बारे में सम्मेलनों, औपचारिक वार्तालाप, कार्यशालाओं एवं सभाओं का आयोजन करना।
  • सभी सरकारी निकायों या पदाधिकारियों, संस्थानों, प्राधिकरणों, गैर सरकारी संगठनों और अन्य संबंधित संगठनों या जिन्हें बाल अधिकारों से संबंधित जिम्मेदारियां सौंपी गयी हैं, के बीच में प्रभावी समन्वय और संपर्क विकसित करना।
  • विभिन्न परियोजनाओं, कानूनों आदि पर अघ्ययन कर अनुसंधन और प्रलेखन करना, उनमें कमियाँ खोजना तत्पश्चात उपयुक्त प्राधिकरणों को सुझाव देना।

प्रमुख सिद्धांत जिन्हें विधिक सेवा संस्थानों को सभी स्तरों पर अपने ध्यान में रखना चाहिए -

  1. बालक के सर्वोत्तम हित-यह प्रत्येक ऐसे बालक, जिसे देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है तथा जो कानून के साथ संघर्ष में हैं का अधिकार  है कि विधिक  सेवाएं प्रदान करते समय, उसके अधिकारों को सर्वोत्तम महत्व दिया जाए।
  2. बाल कल्याण -अन्य सभी बातों के बावजूद बाल कल्याण हमेशा प्राथमिक होगा। बाल कल्याण को प्रोत्साहन देने के लिए त्वरित हस्तक्षेप तथा सहायता उपलब्ध  होनी चाहिए।
  3. सम्मान का अधिकार  - प्रत्येक बालक को यह अधिकार  है कि उसके साथ सम्मान एवं दया तथा करुणा का व्यवहार किया जाए एवं वह इसके योग्य है कि उसका सम्मान तथा सुरक्षा की जाए।
  4. समानता एवं पक्षपात न किये जाने का अधिकार - बालक की जाति, वंश, धर्म , विश्वास, आयु, परिवार स्तर, संस्कृति, भाषा, नस्ल, अशक्ताओं यदि कोई हो अथवा जन्म स्थान को ध्यान में रखे बिना प्रत्येक बालक के साथ किसी भी पक्षपात का व्यवहार नहीं किया जाएगा।
  5. सुनवाई के अधिकार  का सिद्धांत -प्रत्येक बालक सूचित किये जाने, सुने जाने का अधिकार  रखता है एवं अपने विचार एवं चिंताओं को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता के साथ व्यक्त करने का अधिकार  रखता है।
  6. सुरक्षा के अधिकार  का सिद्धांत - प्रत्येक बालक समस्त स्तरों पर सुरक्षा का अधिकार  रखता है एवं वह किसी हानि, शोषण, उपेक्षा आदि से ग्रस्त नहीं किया जा सकता।
  7. गोपनीयता का सिद्धांत - किसी बालक की गोपनीयता विधिक सेवा संस्थानों के समस्त स्तरों पर सुरक्षित की जायेगी।

कार्ययोजना

परिषदों, समितियों, आयोगों आदि का गठन

  1. किशोर न्याय अधिनियम  की धारा 4 के अंतर्गत राज्य सरकार को अधिकृत  किया गया है कि वह प्रत्येक जिले में बाल न्याय परिषद्‌ का गठन प्रत्येक जिला में करे।  राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  इसे सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक जिले में बाल न्याय परिषदि्‌य निमित न्यायालय से पृथक रूप से स्थापित किया जाए और जहां ऐसा कोई परिषद्‌ स्थापित न हो राज्य विधिक सेवा परिषद्‌ इसे अति आवश्यक आधार  पर राज्य सरकार तक ले जाएगा ताकि बाल परिषद् प्रत्येक जिले में स्थापित हो सके।
  2. किशोर न्याय अधिनियम  की धारा 29राज्य सरकारों को यह अनुमति देती है कि वह बाल कल्याण समितियां सभी जिलों मे उन बच्चों के लिए बनाए जिन्हें संरक्षण की जरूरत है। ऐसी समितियों में राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक अघ्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य होंगे। जिनमें एक महिला होगी। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक जिले में बाल कल्याण समितियां स्थापित की जाएँ तथा जहां ऐसी समितियां गठित नहीं हैं वहां राज्य सेवा विधिक  प्राधिकरण  यह मामला राज्य सरकार के समक्ष अविलम्ब उठाएगा ताकि प्रत्येक जिले में समिति का गठन हो सके।
  3. किशोर न्याय अधिनियम  में यह अनुज्ञात है कि विधि के विरोध में किशोरों से व्यवहार करने के लिए विशेष किशोर पुलिस इकाई का गठन किया जाये। प्रत्येक पुलिस थाने में कम से कम एक पुलिस अधिकारी  जिसे विशेष रूप से निर्देश तथा प्रशिक्षण दिया गया है, को किशोर/बालक कल्याण अधिकारी  से पद नामित किया जाए जो किशोरों से व्यवहार करेगा (धारा 63, जे. जे. अधिनियम  एवं जे. जे. नियमो का नियम 11) राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी विशेष किशोर पुलिस इकाइयाँ स्थापित हों।
  4. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  यह सुनिश्चित करेगा कि पद नामित किशोर कल्याण अधिकारियों तथा राज्य किशोर पुलिस इकाइयों के सदस्यों के नामों तथा संपर्क विवरणों की सूची राज्य के प्रत्येक पुलिस थाने में मुख्य  रूप से दर्शित हो।
  5. किशोर न्याय अधिनियम  की धारा 62 ऐ के अंतर्गत प्रत्येक राज्य सरकार एक बाल सुरक्षा इकाई का गठन प्रत्येक राज्य के लिए करेगी तथा प्रत्येक जिले के लिए संरक्षण अथवा देखभाल की आवश्यकता के लिए बालकों से संबंधित मामले प्रत्येक जिले में देखेगी। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे बाल संरक्षण इकाई की स्थापना हो जाये।
  6. बाल अधिकार  संरक्षण हेतु आयोग अधिनियम, 2005 की धारा 17 के अंतर्गत राज्य का यह दायित्व है कि वह राज्य आयोग का गठन करे। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  इसे सुनिश्चित करेगा कि ऐसे आयोग धारा 17 के बाल अधिकार  सरंक्षण अधिनियम, 2005 के अंदर गठित हो तथा प्रभावी रूप से कार्य करें। तमिलनाडू राज्य के अनाथालयों में बच्चों का शोषण बनाम भारत संघ (यूओआई) तथा अन्य, (2014) 25 सीसी 180)
  7. बाल विवाह निषेध  अधिनियम, 2006 की धारा 16 के अंतर्गत राज्य सरकार सम्पूर्ण राज्य अथवा उसके किसी भाग जैसा भी हो, हेतु बाल विवाह रोकने एवं इससे जुड़े मामलों को देखने हेतु एक प्राधिकारी  अथवा प्राधिकारी  गण जो बाल विवाह निषेध  प्राधिकारी  कहलायेंगें को नियुक्त करने हेतु अधिकृत  की गई है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  यदि बाल विवाह निषेध  प्राधिकारी  नियुक्त नहीं किया गया हो तो बाल विवाह निषेध  प्राधिकारी  की नियुक्ति के लिए सभी जरूरी कार्यवाही होगी।

संप्रेक्षण एवं आश्रय गृह

  1. विधि के साथ संघर्ष मे बालक गृह में बंद किये जाते हैं जेल अथवा हवालात में नहीं। ऐसे बालकों हेतु गृहों की दो श्रेणियां होती है अर्थात सम्प्रेक्षण गृह एवं विशेष गृह। ऐसे बालकों के विरुद्ध  परिषद द्वारा अन्वेषण विलंबित होने पर वह सम्प्रेक्षण गृह में रखे जातें हैं और इस प्रकार के गृह प्रत्येक जिला अथवा जिला समूह हेतु राज्य सरकार द्वारा स्थापित किये जाते हैं (जे. जे. अधिनियम  की धारा सह पठित जे. जे. नियम 16 (1)।
  2. इसी प्रकार, प्रत्येक जिला अथवा जिला समूह में किशोरों को रखने हेतु जांच की समाप्ति के पश्चात दोषी पाए जाने पर बालक एवं बालिकाओं को रखने हेतु विशेष घर बनाए जाएंगे (जे. जे. अधिनियम  की धारा 9 सह पठित जे. जे. नियम का नियम 16 (1)।
  3. जे.जे. अधिनियम  धारा 34 के अंतर्गत, राज्य सरकारें सशक्त बनाई गई हैं कि चाहे वह स्वयं अथवा स्वयंसेवी संस्थाओं के सहयोग से प्रयेक जिला अथवा जिला समूह में किशोर गृह बनाए एवं उसकी देखरेख करें जिसमें विलंबित जांच के दौरान देखरेख एवं सुरक्षा की आवश्यकता वाले किशोरों को रखा जाए और जाँच  के बाद उनकी देख-रेख, ख्याल, शिक्षा, प्रशिक्षण, विकास एवं पुनर्वास किया जाए।
  4. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, राज्य सरकार अथवा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा कितनी संस्थाएं अर्थात किशोर घर, आश्रय गृह एवं सम्प्रेक्ष गृह राज्य में अपराधी किशोरों की देखरेख एवं सुरक्षा हेतु चलाए जा रहे हैं का अद्यतन अभिलेख रखेगा।
  5. देख-रेख एवं सुरक्षा की आवश्यकता वाले बच्चों हेतु राज्य सरकार अथवा स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले ऐसे समस्त घर एवं संस्थाए जे.जे. अधिनियम  की धारा 34 के प्रावधानों  सह पठित उपरोक्त अधिनियम  की धारा 71 के द्वारा पंजीकृत की जायेंगी।
  6. यदि कोई देखरेख एवं सुरक्षा वाले बच्चों हेतु संस्थाएं यदि पंजीकृत नहीं हो तो वह बंद कर दी जायेंगी अथवा राज्य सरकार द्वारा ले ली जायेंगी। तमिलनाडू राज्य के अनाथ आश्रमों में बच्चों का शोषण बनाम भारत संघ एवं अन्य (2014) 2 SCC 180)। इस सन्दर्भ में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  राज्य सरकार तक मामले को ले जायेगा ताकि अपंजीकृत संस्थाओं के विषय में आवश्यक कार्य किया जा सके।
  7. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  इसे सुनिश्चित करेगा कि राज्य सरकार द्वारा पंजीकृत संप्रेक्षण गृह, आश्रय गृह एवं किशोर देखरेख गृह पर्याप्त संख्या  में उपलब्ध  हों ताकि विधि के साथ संघर्ष मे बालकों तथा देखरेख एवं सुरक्षा की आवश्यकता वाले बालकों को उनमें रखा जा सके।
  8. प्रत्येक राज्य विधिक  प्राधिकरण  संप्रेक्षण एवं किशोर गृह समिति का गठन करेंगे। राज्य के प्रत्येक जिले के पूर्णकालिक सचिव अघ्यक्ष के रूप में होंगे तथा एक पैनल अधिवक्ता और परिवीक्षा अधिकारी  सदस्य के रूप में होंगे।  गठित समिति, जिले में स्थित प्रत्येक घर में माह में कम से कम एक बार अपना भ्रमण करने के बारे में समयावली बनायेगी।
  9. मुख्य  रूप से समिति का कार्य यह देखना होगा कि संप्रेक्षण गृह, विशेष गृह और बाल गृह बाल मित्रतापूर्ण हैं और यह कारागार या हवालात की तरह नहीं हैं और इनमें बेहतर किस्म की देखरेख व सुविधाएँ मौजूद हैं। इनमें स्वच्छता और कपड़े और बिस्तर, भोजन और आहार,  चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल, स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के साथ समन्वय व स्वास्थ्य संबंधी अभिलेख संधरण इत्यादि की समस्त सुविधा यें मौजूद हैं। यदि समिति द्वारा कुछ भी कमी पाई जाती है तो राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण आवश्यक कार्यवाही हेतु संबंधित पदाध्किारी के समक्ष उनकी ओर से मामला उठाएगा और आगे की कार्यवाही करेगा।

विधिक सेवा क्लिनिक

  1. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  राज्य के प्रत्येक जिले में विधिक सेवा क्लिनिक प्रत्येक किशोर न्याय बोर्ड तथा बाल कल्याण समिति में स्थापित करेगा।
  2. विधिक सेवा क्लिनिक के खुलने के बारे में तथा संबंधित दूरभाष एवं क्लीनिकों के पतों के बारे में समस्त सरकारी निकायों, विभागों जिनमें, पुलिस गैर सरकारी संस्थाएं सम्मिल्लित हैं, को सूचित किया जायेगा।
  3. ऐसे विधिक सेवा क्लीनिकों मे पी.एल.वी. संलग्न किये जायेंगे।
  4. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  राज्य, जिला तथा तालुका सेवा स्तर पर अपने सभी कार्यालयों में दूरभाष नंबर एवं क्लिीनिक की अन्य सूचना प्रदर्शित करेगा।
  5. स्थापित विधिक सेवा क्लिनिक, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (विधिक  सहायता क्लिनिक) विनियमन, 2011 में दिए गए उनके कार्यों, आधारभूत सुविधा ओं, रिकार्ड और रजिस्टर का रख-रखाव, पैनल अधिवक्तागण  का दौरा, अर्धविधिक स्वयंसेवी की प्रतिनियुक्ति तथा ऐसे क्लिनिको पर नियंत्रण  द्वारा शासित किये जायेंगे।
  6. समस्त जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, प्राचार्य के समन्वय से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण  के नियंत्रण  में जिले के प्रत्येक विद्यालय में विधिक  साक्षरता क्लब की स्थापना करेगा।

विधिक  प्रस्तुतिकरण

विधिक  प्रावधान

  1. अधिनियम  की धारा 12 1( सी) के तहत प्रत्येक बालक जिसे कोई मुकदमा दायर या प्रतिरक्षा करना हो वह निःशुल्क विधिक  सेवाओं का हकदार है।
  2. परिषद्‌ यह सुनिश्चित करेगा कि समस्त को निःशुल्क विधिक सहायता, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण अथवा मान्यता प्राप्त विधिक सेवा संस्थाओं अथवा विश्वविद्यालय विधिक सेवा क्लिनिक द्वारा प्राप्त हैं। नियम 3 (डी) सहपठित जे जे नियम का 14 (2)
  3. जिला बाल संरक्षण इकाई तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में विधिक अधिकारी  समस्त किशोरों  को निःशुल्क विधिक सेवा प्रदान करेंगें । जे जे नियम का नियम 14 (3)
  4. यौन अपराधें से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2005 के अंतर्गत, विधिक सेवा प्राधिकरण बच्चे के परिवार अथवा अभिभावक को अधिवक्ता प्रदान करेंगे यदि वे विधिक  सलाहकार वहन करने में असमर्थ हैं।

राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका

  1. कानून की आवश्यकता को पूरा करने के लिए, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिवक्तागण का एक प्रशिक्षित  और प्रतिबद्व पैनल गठित करेगा जो कि बच्चों/किशोरों  को समस्त मंचो अर्थात किशोर न्याय परिषदों, बाल कल्याण समितियों में उनका प्रतिनिधित्व करें ताकि उन्हें जमीनी स्तर पर सार्थक तथा प्रभावी विधिक  सेवाएँ प्राप्त हो सकें।
  2. राज्य सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि बच्चों अथवा किशोरों  को दी गई विविध सेवाएँ उच्च कोटि की हों और प्रभावी हों जिसके लिए किशोर न्याय परिषद्‌ एवं बाल कल्याण समिति में सक्षम और समर्पित अधिवक्तागण का पैनल हो ।
  3. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  पैनल अधिवक्तागण  के कार्यो की निगरानी एवं निरीक्षण करेगा और आकस्मिक निरीक्षण का तंत्रा तैयार करेगा।
  4. पैनल अधिवक्ता को उनका पारिश्रमिक, किये गये कार्य की रिपोर्ट जो किशोर न्याय परिषद अथवा बाल कल्याण समिति जहाँ  पर पैनल अधिवक्ता तैनात किया गया हो, द्वारा प्रति हस्ताक्षर के आधार  पर दिया जाएगा।
  5. राज्य विधिक सेवा परिषद, विधिक  अधिकारी, पैनल अधिवक्ता तथा किशोर न्याय परिषदों तथा बाल कल्याण समितियों में स्थापित विधिक सेवा क्लीनिक के मध्य प्रभावी समन्वय को सुनिश्चित करेगा ताकि प्रत्येक बालक का कानूनी रूप से प्रतिनिधित्व हो और निःशुल्क विधिक  सहायता एवं अन्य आवश्यक समर्थन प्राप्त हो।

प्रशिक्षण और अभिविन्यास कार्यक्रम

  1. समस्त राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका (सी) सं. 473/2005 शीर्षक  सम्पूर्णा बहरूआ बनाम भारत संघ व अन्य में पारित आदेश  दिनांकित 12.10.2011 एवं 19.08.2011 के अनुसरण में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रत्येक पुलिस थाने से जुड़े पदनामित किशोर/बाल कल्याण अधिकारियों तथा विशेष  किशोर पुलिस इकाई के सदस्यों तथा किशोर न्यायिक संस्थानों की विधिक सेवा के प्रशिक्षण के बारे में पहले से जारी किए गए दिशा निर्देशों  कड़ाई से पालन करेंगे।
  2. प्रत्येक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  संबंधित  पुलिस विभाग के प्रमुख से समन्वय बनाकर यह सुनिश्चित करेगा कि विशेष  किशोर पुलिस इकाईयों तथा किशोर/बाल कल्याण अधिकारियों की भूमिकाओं, दायित्वों और कार्यो की रूप-रेखा पर निरंतर आदेश  जारी किये जाएं। ऐसे निरंतर आदेश  किशोर न्याय अधिनियम, किशोर न्याय नियम/उपयुक्त नियम (यदि राज्य सरकार ने अपने किशोर न्याय नियम अधिसूचित  किये हैं) तथा शीला  बरसे बनाम भारत संघ 1986 स्केल (2) 230 : (1987) 35 SC 50 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर आधरित होंगे। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  ऐसे निरंतर आदेशों  के आलेखन तथा रचना मे सहायता प्रदान करेंगे। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण यह भी सुनिश्चित करेगा कि ऐसे निरंतर आदेश  स्थानीय भाषाओं में अनुवादित की जाएं तथा समस्त पुलिस थानों में उपलब्ध  हो।
  3. बच्चों की सेवा करने के लिये कानूनी सेवा की क्षमता और अवधरणों को प्रभावी बनाने के लिये यह आवश्यक है कि विधिक सेवा प्रदाताओं चाहे वह अधिवक्तागण, अर्धविधिक स्वंय सेवी, पुलिस अधिकारी  अथवा न्यायिक अधिकारी  हों, प्रभावी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वह बच्चों के साथ कैसे संवाद और व्यवहार करे।
  4. बाल विधिक सेवा प्रादाताओं, न्यायिक अधिकारी गण, पैनल अधिवक्तागण, पुलिस अधिकारी गण, किशोर न्याय परिषदों, बाल कल्याण समितियों चाहे वह औपचारिक रूप से विधि में प्रशिक्षित  हो या ना हो उन्हें बच्चो के अधिकारों के लिये प्रसांगिक क्षेत्रों  में निरंतर प्रशिक्षण प्राप्त होना चाहिए।
  5. जहाँ तक कि संभव हो, मूल विधिक  अवधरणाओं तथा उपयुक्त कानूनों, विनयमन एवं नियमों में प्रशिक्षण तथा वकालत में कौशल  प्रशिक्षण समस्या आधरित तथा संवादात्मक होनी चाहिए।
  6. किशोरों  से संबंधित कानून में संवैधानिक प्रावधान, विधान, परियोजना, रिपोर्ट, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन नियम समाविष्ट होने चाहिए। चुनौती यह है कि हम किस प्रकार से यह सूचना सार्थक रूप से उन व्यक्तियों को पहुँचाएं जो कि जमीनी स्तर पर बच्चों के लिये काम कर रहे हैं इसलिय ऐसे कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण में सभी मुख्य  सूचना हो जो कि बच्चों की समस्याओं का समाधन करने के लिए आवश्यक हो।

विधिक जागरूकता

  1. समस्त राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, छोटी पुस्तके/पर्चे/बच्चों के अधिकारों  से संबंधित  उपलब्ध योजनाओ की जानकारी युक्त कानूनी सेवा पुस्तिका छापेगा/ छोटी पुस्तिकाएं/पर्चे/ विधिक सेवा पुस्तिका की प्रतियाँ सभी स्वागत कक्षो, विधिक सेवा किलनिको, किशोर न्याय परिषदों, बाल कल्याण समितियों पुलिस थानों आदि में उपलब्ध  कराई जाएगी।
  2. उपरोक्त विवरण से संबंधित जानकारी दूरदर्शन, आकाशवाणी, समुदाय रेडियो द्वारा फैलाई जाए।
  3. समस्त राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  शिक्षा  संस्थानो, बाल सरंक्षण अधिकार  के लिये राज्य आयोग, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि के सहयोग से बाल अधिकारों  तथा उनके संरक्षण के बारे में लोगो में जागरूकता फैलाएंगे।
  4. स्कूल तथा कालेज के छात्रों  में बाल अधिकारों के लिए जागरूकता फैलाने  के अन्य साधनों में निबंध् प्रतियोगिताऍं, नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिताऍं, पोस्टर बनाने की प्रतियोगिताएं, चित्राकला प्रतियोगिताएं तथा वाद-विवाद प्रतियोगिताएं है।
  5. अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवक को बाल उपयुक्त संदेशों का प्रयोग करते हुए पोस्टरों के वितरण द्वारा एक प्रभावकारी सुगम्य अभियान बनाने के लिए कहा जाएगा।
  6. प्रत्येक बालक को उसके विधिक  सहायता के अधिकार  के बारे में सूचित करने के अतिरिक्त, विधिक  सशक्तिकरण के लिए सहयोग एवं सहायता पैदा करना तथा विधिक सेवा प्रदाताओं के साथ असरदायक कार्यकारी संबंध बनाने के लिए समुदायों,  जनता और निजी अभिकरणों तक पहुँचाना और इन्हें जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।
  7. विधिक सेवा के जरूरतमंद कई बच्चे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रो में रहते हैं। परिणाम स्वरूप बच्चों का, जहाँ वह रहते हैं, विधिक  सेवाओं तक शारीरिक रूप से पहुँचना अक्सर असंभव लगता है । इस बाधा को दूर करने के लिए, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  उसी जगह पर बच्चों को कई विधिक  सेवाएँ प्रदान करने हेतु मोबाइल क्लिनिक और एकल केंद्र कार्यक्रम सहित कुछ कदम उठाएगा।
  8. बचपन बचाओ आन्दोलन बनाम भारत सरकार के निर्देशों के अनुसरण में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण,  शुरुआती साक्षात्कार एवं जांचों को संचालित करने हेतु, परामर्श देने और बच्चों एवं उनके परिवार के बीच मे कड़ी के रूप में काम करने हेतु प्रत्येक पुलिस स्टेशन में नियुक्त अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवकों की सेवाएँ लेंगे।
  9. प्रत्येक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  राज्य सरकार के साथ मामलें पर चर्चा करेगी ताकि सभी स्कूलों के पाठक्रम में बाल अधिकारों को सम्मिलित किया जा सके, जिससे बच्चे अपने अधिकारों को जान सकेंगे।
  10. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, दण्ड प्रक्रिया सहिंता की धारा 357। एवं राज्य की कोई भी पीड़ित मुआवजा योजना में जुड़ गए नए प्रावधानों  की जानकारी की जागरूकता का प्रसार करेगी ताकि बच्चों को तत्काल मुआवजा उपलब्ध  हो सके।
  11. प्रत्येक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  विधिक  सेवाओं पर निर्देशिका विकसित करेगी जो सभी मुख्य  हिस्सेदारों पर तुरंत उपलब्ध  होगी।
  12. प्रत्येक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  बच्चों के शिक्षा अधिकारों सहित अभिवावकों द्वारा अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के मौलिक कर्तव्यों के विषय में सभी स्तरों पर गहन विधिक  जागरूकता अभियानों को आयोजित करेगी।
  13. बच्चों हेतु गैर-संस्थागत सेवाएँ जैसे गोद लेना, आर्थिक सरंक्षण एवं पालन-पोषण आदि की उपलब्धता के बारे में जागरूकता फैलाने  की आवश्यकता है।
  14. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  उन स्वयंसेवी संस्थाओं को आधिकारिक  मान्यता प्रदान करने का प्रयत्न करेगा, जिनके पास विश्वसनीय प्रत्यय-पत्र होंगे एवं वह उन मामलों में लिप्त होंगे जिनमें बच्चों को देखभाल और संरक्षण की जरुरत हैं।
  15. बाल श्रम की समस्या को खत्म एवं संविधान  के जनादेश की प्रभावोत्पादकता हेतु, भारतीय उच्चतम न्यायालय ने एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडू राज्य प्रतिवेदित (1996) 6 SCC 756 में अत्यधिक  संख्या  में आवश्यक निर्देश प्रदान किये हैं। उन निर्देशों में से एक महत्वपूर्ण निर्देश था जिसके अंर्तगत नियोजक को बालश्रम (निषेध एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1986 के उल्लंघन में 14 वर्ष से कम के बालक को खतरनाक कार्य में लगाने पर रु. 20,000/- का मुआवजा देना है। समुचित सरकार को ऐसे प्रत्येक बच्चे को जो खतरनाक काम में कार्यरत है, रू. 5,000/- अनुदान के रूप में देने के निर्देश दिये गये थे। उपरोक्त कथित रकम रू.25,000/- को कोष में जमा करना होगा जो कि बालश्रम-पुनर्वास सह-कल्याण कोष के नाम से जाना जाता है और ऐसे कोष की राशि, मुक्त कराएगा ये बच्चों के पुनर्वास में प्रयोग होगी। सभी विधिक सेवा प्राधिकरण, पुलिस, श्रम विभाग एवं अन्य संबंधित प्राधिकरणों  से उपरोक्त निर्देशों के पालन एवं मामले की आगे की कार्यवाहियों हेतु समन्वय करेंगे।

आंकड़ा संचय

समस्त राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  के पास बाल कल्याण एवं संरक्षण के लिए मौजूद केंद्रीय अथवा राज्य परियोजनाएं, नीतियां, विनियमन, एस.ओ.पी, पुलिस निर्देशिका, सम्मलेन, नियम, घोषणाएँ, टिप्पणियों एवं रिपोर्ट आदि का आंकड़ा संचय होगा ताकि इसको जब भी अपेक्षित हो, विधिक  जागरूकता एवं किशोरों को विधिक  सहायता प्रदान करने हेतु उपयोग मे लाया जा सके।

 

स्रोत: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नालसा, भारत सरकार

 



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