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मानसिक रूप से बीमार और मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए विधिक सेवाऐं

पृष्ठभूमि

अशक्ता से ग्रस्त व्यक्यिों को विशेषतः मानसिक बीमारी और मनोबधिता  जैसे अन्य अवरोधें से जूझने वालों को प्राधिकरण द्वारा वह देखरेख नहीं मिल पाती जो कि उन्हें मिलनी चाहिए। उन्हें अलग रखा जाता हैं और उनको केवल समाज कल्याण के पितृ सुलभ नजरिये से देखा जाता है जो उन्हें केवल उन लोगों के रूप में दर्शाता है जिन्हें राज्य एवं समाज द्वारा विशेष सुरक्षा की आवश्यकता है। अशक्त व्यक्यिों के अधिकार  (सी.आर.पी.डी) 2008 के सयुंक्त राष्ट्र करार पर भारत एक हस्ताक्षरी है और तबसे हमारा देश इस करार के अनुसमर्थन में है, यह हमारे विधिक  तंत्र के लिए अनिवार्य है कि वह सुनिश्चित करे कि अशक्ताग्रस्त व्यक्यिों (मानसिक रूप से अस्वस्थ एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों सहित) अपने मानव अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता को अन्य लोगों के साथ समानता के आधार  पर उपभोग कर पा रहे हैं और यह भी सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें विधि के समक्ष समान मान्यता और विधि से समान रक्षा मिले। इसके आगे यह करार हमसे यह भी चाहता है कि अशक्त व्यक्तियों को अन्य लोगों के साथ बराबरी के आधार  पर न्याय तक प्रभावशाली अभिगमन मिलें।

विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत वह व्यक्ति जिन्हें अशक्त व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों की रक्षा और पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995 के तहत परिभाषित किया गया है और जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 की धारा 2 के खंड (फ) के अर्थ में मनोचिकित्सक अस्पताल अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम में रखा गया है, विधिक  सेवाओं के हकदार हैं। इसलिए नालसा (NALSA) ने विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम, 1987 की धारा 4(b) के अंर्तगत सशक्त अपने अधिकार  से मानसिक रोगी और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को प्रभावशाली विधिक  सेवाएं प्रदान करने के लिए वर्ष 2010 में एक योजना बनाई थी।

हालाँकि, योजना सबसे पहले 2010 में शुरू हुई थी, परन्तु सभी राज्यों द्वारा प्राप्त कार्यान्वयन रिपोर्टों से यह लगता है कि इन उपेक्षित व्यक्यिों को न्याय तक पहुँचने के लिए सक्षम करने वाले राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण/विधिक सेवा संस्थाओं द्वारा प्रदान करने वाली सेवाओं को मजबूत करने के लिए उनका पुनरावलोकन करने की आवश्यकता है। यहाँ इन लोगों तक पहुँचने के लिए अग्र सक्रिय रूप से अभिगमन की अत्यंत आवश्यकता है। अब तक विधिक सेवा संस्थान सिर्फ उन तक पहचे मामलों में ही सहायता प्रदान कर रही है फिर  भी, न्यायालय संबंधी गतिविधियाँ  में अब भी बहुत कुछ करना बाकी है। इसी पृष्ठभूमि में मानसिक रूप से अस्वस्थ एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों के लिए विधिक सेवा की नई योजना नालसा मानसिक रूप से बीमार और मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों के लिए विधिक सेवाऐं योजना, 2015 बनाई गई है।

योजना के उद्देश्य

इस योजना में वें नये मार्गदर्शन सम्मिलित है जिनका पालन विधिक सेवा संस्थानों (राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, तालुक विधिक सेवा समितियों, उच्च न्यायालय विधिक सेवा समितियों, उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति) द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ तथा मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों को विधिक  सेवाएं देते समय किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मानसिक रूप से अस्वस्थ अथवा मानसिक अशक्ता से ग्रस्त व्यक्ति कलंकित लोग नहीं है और उनके साथ ऐसा ही व्यवहार  किया जाएगा जैसा किसी अन्य व्यक्ति से, जिसे उसके हक के सभी अधिकारों को प्रवृत करने में सहायता मिलती है और जैसा कि उन्हें विधि द्वारा आश्वासित किया गया है।

अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवी, विधिक सेवा क्लीनिक, फ्रंट  ऑफिस, पैनल अधिवक्ता और प्रतिधारक  अधिवक्ता जैसे शब्दों का अर्थ वही रहेगा जैसा कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण  निःशुल्क और सक्षम विनिमयन, 2010 और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण  (विधिक  सहायता क्लिनिक) विनिमयन, 2011 नालसा की पैरा लीगल वालंटियर्स (संशोधित) योजना- पैरा लीगल वालंटियर्स प्रशिक्षण मॅाडयूल के तहत परिभाषित हैं।

भाग - 1

सिद्धांत

मानसिक रूप से अस्वस्थ अथवा मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों के साथ व्यवहार करते हुए, विधिक सेवा संस्थानों को निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखना चाहिए -

  1. मानसिक बीमारी साध्य है- विधिक सेवा संस्थानों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मानसिक बीमारी उचित दवाई एवं देखरेख के साथ साध्य है।
  2. मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्ति, मानसिक बीमार व्यक्ति नहीं हैं- मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्ति, मानसिक अशक्तता के विकासात्मक विकारों के कारण पीड़ित है। मानसिक विकास में कमी (एम.आर) की प्रकृति स्थाई होती है और यह साध्य नहीं है। ठीक इसी तरह स्वलीनता (आटिज्म) और दिमागी पक्षाघात। यह सब, इसीलिए अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों की रक्षा एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995 (अशक्तताग्रस्त व्यक्ति अधिनियम) धारा 2 के तहत अशक्तताग्रस्त व्यक्ति माने जाते हैं। मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण हेतु संवैधानिक प्रावधान  हैं (i) अशक्तताग्रस्त व्यक्ति अधिनियम, 1995 और (ii)  स्वपरायणता (आटिज्म),प्रमस्तिक घात, मानसिक मन्दता और बहु-विकलांगताग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999
  3. मानसिक रूप से बीमार और मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्ति सभी मानवीय अधिकार  और मौलिक स्वतंत्रता के हकदार हैं -मानसिक रूप से बीमार और मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों को विधिक  सेवाएं देते समय, विधिक सेवा संस्थान का यह मुख्य  सरोकार होना चाहिए कि इन व्यक्तियों के मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित एवं रक्षित किया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि वह अपने मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता का पूर्ण और समान आनंद ले सके।
  4. मानसिक रूप से बीमार और मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों की जन्मसिद्ध गरिमा के लिए सम्मान -विधिक सेवा संस्थान को मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों की जन्मसिद्ध गरिमा, वैयक्तिक स्वायत्तता सहित स्वतंत्रता के सम्मान को बढ़ावा  देना चाहिए।
  5. गैर पक्षपात- विधिक सेवा संस्थानों को मानसिक रूप से बीमार तथा मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों के साथ मात्रा उनकी मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के कारण भेद-भाव नहीं करना चाहिए,  बल्कि उनके साथ अत्यंत संवेदनशीलता और देखभाल के साथ व्यवहार करना चाहिए।
  6. पर्याप्त आवास -विधिक सेवा संस्थानों को ऐसे प्रावधानों  को बनाना चाहिए जो मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के लिए पर्याप्त आवास और उनको प्रदत्त किसी भी योजना, कार्यक्रम, सुविधा अथवा सेवा तक समान अभिगमन को सुनिश्चित करें।
  7. मानसिक बीमार व्यक्तियों का उपचार प्राप्त करने का अधिकार  भारतीय संविधान  के अनुछेद 21 से उत्पन्न उपचार एवं उचित स्वाथ्य की देखरेख का अधिकार  सभी मानसिक बीमार व्यक्तियों पर समान रूप से लागू होता है। मानसिक बीमार व्यक्तियों तो जानकारी के अभाव के कारण या अंधविश्वास अथवा साधनों के अभाव अथवा कलंक इत्यादि से उपजे अवैध  परिरोध के कारण उपचार प्राप्त करने में वंचित रह जाते हैं। इसलिए विधिक सेवा संस्थानों को सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति, मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अध्याय-iv में लागू प्रावधानों के माध्यम से मनोचिकित्सक अस्पतालों अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम में उपचार की उपलब्ध  सुविधाओं तक सुगमतापूर्वक अभिगमन कर सकें।
  8. उपचार हेतु संसूचित सहमति -विधिक सेवा संस्थानों को सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जब कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी के उपचार के अध्याधीन हो, तो उसकी संसूचित सहमति प्राप्त कर लें। यदि कोई व्यक्ति ऐसी सहमति देने में असक्षम है तो उसके रिश्तेदारों या मित्रों की संसूचित सहमति होनी चाहिए और इनकी अनुपस्थिति में, मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के अध्याय v के भाग-ii के तहत न्यायालय की संतुष्टि को सुनिश्चित कर लेना चाहिए।
  9. मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के शोषण और उत्पीड़न की रोकथाम -मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्तियों में खास तौर पर मानसिक अशक्तता से ग्रस्त महिलायें ऐसे अति संवेदनशील समूह है जिनका शोषण संभवतः अधिक  होता है। इसलिए विधिक सेवा संस्थानों को मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को उनके यौन उत्पीड़न सहित शोषण की रोकथाम करने में सहायता करनी चाहिए और दुर्व्यव्हारियों एवं शोषकों के विरुद्ध  कानूनी कार्यवाही भी करनी चाहिए।

मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्ति और मानसिक बीमार व्यक्ति सामान्यतः अपनी मानसिक दशा की चुनौती के कारण सूचना का लाभकारी ढंग से उपयोग नहीं कर पाते। इसलिए उन्हें सर्वोत्कृष्ट विधिक  साक्षरता प्रदान नहीं की जा सकती जो उन्हें न्याय प्राप्त करने में सशक्त बनाये। इसलिए, विधिक सेवा संस्थानों को विधि के संबंध में, उनकी क्षमताओं और आवश्यकताओं को, सामूहिकता के साथ-साथ वैयक्तिक आधार  पर मूल्यांकन तथा परीक्षण करना चाहिए और ऐसी जरुरतों को विधिक सेवा देकर पूरा करना चाहिए।

भाग-II

मनोचिकित्सक भवनों, अस्पतालों एवं अन्य ऐसे ही समान जगहों और कारागारों में मानसिक बीमार तथा मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को विधिक सेवा -

मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्यिों को गैर-अपराधी पागलों के शीर्ष के तहत कारागारों में रखा जाता था। माननीय भारतीय उच्चतम न्यायालय ने (फौजदारी  याचिका सं.237/1989) शीर्षक शीला बरसे बनाम भारत सरकार एवं अन्य में अपने निर्देशों द्वारा इस प्रथा को अवमानित किया और आदेश सुनाया कि गैर-अपराधी मानसिक बीमार व्यक्तियों को कारागारों में कैद करना अवैध  और असंवैधानिक है। माननीय भारतीय उच्चतम न्यायालय ने यह भी घोषणा की कि अबसे केवल न्यायिक दंडाधिकारी ही किसी व्यक्ति को, जो मानसिक बीमार है, उपचार हेतु सुरक्षित अभिरक्षा में भेज सकेंगे, कोई कार्यपालक दंडाधिकारी नहीं।  न्यायिक दंडाधिकारी को ऐसा करने के लिए सबसे पहले किसी व्यासायिक अथवा मनोचिकित्सक से सलाह मांगनी पड़ेगी। न्यायिक दंडाधिकारी को यह भी चाहिए कि वह माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, माननीय उच्च न्यायालय को उन मामलों के संबंध मे त्रौमासिक रिपोर्ट भेजें जिनमे जाँच पश्चात्‌ ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षित अभिरक्षा की जगहों पर भेजने तथा उसके बाद आगे पहल करने संबंधी कार्यवाही की गयी हो।

भारत के उच्चतम न्यायालय ने प्रकरणों के अभिलेखों को प्रत्येक उच्च न्यायालय मे इस अनुरोध के  साथ स्थानांतरित कर दिया है कि उच्च न्यायालय अभिलेखों को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करेंगे, जिसमें  उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति को याचिकाकर्ता के रूप में मानेंगे, जिससे उच्च न्यायालय को भारत के उच्चतम न्यायालय के निर्देशों और आदेशों एवं उच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर पारित आदेशों के मामलों में अनुवीक्षण एवं अनुपालन में सहायता होगी।

आवश्यक कदम

भारत के उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन करने हेतु, निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता हैं -

कारागारों में

  1. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  को सबसे पहले सुनिश्चित करना चाहिए कि जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दर्ज हो और एक माननीय न्यायाधीश  को मामले के निपटान के लिए मनोनीत करना चाहिए, जैसे कि भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्देशित है।
  2. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  सभी कारागारों में राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण  (एस.एम.एच.ए) अथवा उच्च न्यायालय द्वारा गठित कोई भी अन्य दल की सहायता के साथ निरीक्षण करेंगे अथवा उच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत यह भी सुनिश्चित करेंगे कि क्या कारागारों में कोई मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्ति है और यदि हैं, तो उनके स्थानांतरण और उनके उपचार से संबंधित उच्च न्यायालय से तत्काल उचित निर्देश लेंगे।
  3. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण  (एस.एम.एच.ए) के साथ समन्वय करके मनोवैज्ञानिकों/मनोचिकित्सकों/परामर्शदाताओं का एक दल गठित कर कारागारों में दौरा करेंगे और कैदियों की मानसिक स्वास्थ्य की हालत की जाँच करेंगे। दल द्वारा आवश्यक जाँच के आधार  पर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, कैदियों के मनोवैज्ञानिकों अथवा मनोचिकित्सकों द्वारा उपचार को सुगम करने हेतु आवश्यक संशोधनात्मक  कदम उठाएंगे।
  4. न्यायिक दंडाधिकारी को यह भी चाहिए कि वह माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, माननीय उच्च न्यायालय को उन मामलों के संबंध मे त्रौमासिक रिपोर्ट भेजें जिनमे जाँच पश्चात्‌ ऐसे व्यक्तियों को सुरक्षित अभिरक्षा की जगहों पर भेजने तथा उसके बाद आगे पहल करने संबंधी कार्यवाही की गयी हो। ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  को दी जायेगी, तब उस पर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  द्वारा यह सुनिश्चित किया जायेगा कि कथित त्रौमासिक रिपोर्ट, माननीय उच्च न्यायालय के मनोनीत न्यायाधीश  के ध्यान मे लायी जाये और इस तरह उनसे सामान्य प्रक्रृति के मामलों मे अथवा किसी विशिष्ट व्यक्ति के मामले में अथवा विवादों के सम्बन्ध  मे यथावश्यक निर्देश तथा आदेश प्राप्त किया जाये। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  ऐसा कोई भी आदेश अथवा निर्देश जारी होने की स्थिति में, संबंधित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण /तालुका विधिक सेवा प्राधिकरण  को आवश्यक सहायता प्रदाय हेतु व उसके परिपालन का अनुवीक्षण सुनिश्चित करने हेतु अधिसूचित  करेगा, और ऐसे किसी भी आदेश या निर्देश के परिपालन में होने वाली अवमानना को मनोनीत न्यायाधीश  के ध्यान में लाएगा।

मनोचिकित्सक अस्पताल, भवन और सुविधाएँ -

  1. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  अधिनियम  की धारा 37 के तहत, उच्च न्यायालय को, राज्य सरकार अथवा निजी संस्था द्वारा चालित, सभी मनोचिकित्सक अस्पतालों, भवनों एवं ऐसे ही सुविधा  केन्द्रों में, आगुन्तक बोर्ड का गठन करने के लिए अनुरोध करेंगा जिसमें  राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण /जिला विधिक सेवा प्राधिकरण  के सदस्य सचिव/पूर्णकालिक सचिव भी सदस्य होंगे। आगुन्तक बोर्ड को इन जगहों का नियमित दौरा कर के इन सुविधा  केन्द्रों, भवनों या अस्पतालों में रहने वाले व्यक्तियों के जीवन परिस्थितियों का मूल्यांकन करना होगा।
  2. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण /आगन्तुक बोर्ड को इन अस्पतालों, भवनों एवं सुविधा  केन्द्रों के रोगियों का पुनर्विलोकन करना चाहिए कि क्या यहाँ ऐसे उपचारित व्यक्ति हैं, जिन्हें उनके परिवार वाले वापस घर ले जाने के अनिच्छुक हैं अथवा वह खुद अपने परिवार से संपर्क नहीं कर पा रहे है। जब भी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण /जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अथवा आगुन्तक बोर्ड ऐसे रोगियों का पता लगाएं, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण /जिला विधिक सेवा प्राधिकरण  को इनके प्रत्यावर्तन हेतु सभी कदम उठाने चाहिए, जिसमें  उपचारित व्यक्ति का अपने परिवार के साथ प्रत्यावर्तन हेतु न्यायालय से आदेश लेने में विधिक  प्रतिनिधित्व प्रदान करना भी शामिल होगा।
  3. विधिक सेवा संस्थान, ऐसे मनोचिकित्सक अस्पतालों, भवनों या सुविधा  केन्द्रों का दौरा करते समय रोगियों, चिकित्सकों और स्टापफ के साथ बातचीत करते हुए सुनिश्चित करेंगे कि क्या यहाँ पर कोई ऐसे व्यक्ति भी है जो बल पूर्ण दाखिले के पीड़ित है। ऐसे मामलों में, ऐसे व्यक्तियों को मनोचिकित्सक अस्पतालों या भवनों या सुविधा  केन्द्रों से उनकी रिहाई हेतु विधिक  सेवाएँ प्रदान की जायेगी।
  4. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण/जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को मनोचिकित्सक अस्पतालों, भवनों और सुविधा केन्द्रों में, मानसिक बीमार/मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों और उनके परिवार वालों को मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों से संबंधित विधिक  विषयों पर विधिक  सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से विधिक सेवा क्लीनिक को स्थापित करना चाहिए।
  5. ऐसे विधिक सेवा क्लीनिक को अर्द्धविधिक  स्वयंसेवकों एवं पैनल अधिवक्ताओं द्वारा संचालित किया जाना चाहिए जो ऐसे विषयों तथा व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील हो।
  6. मानसिक स्वास्थय सुविधा  केन्द्रों में चिकित्सको, नर्सो एवं अन्य अर्द्ध( चिकित्सा कर्मिर्यो/प्रशासनिक स्टापफ को अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवी के रूप में प्रशिक्षित करना उचित रहेगा ताकि मानसिक बीमार, मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए बेहतर विधिक  सेवाएँ प्रदान की जा सकें।
  7. क्लिनिकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के लिए निर्मित भवनों में उनको अपने जीवन-यापन तथा धनार्जन  में सहायता या खुद को आत्मनिर्भर बनाने हेतु उचित कौशलो को सिखने के उचित सुविधाएँ मिलें। विधिक  सेवासंस्थान, यथावश्यक, सरकार अथवा उच्च न्यायालय के पास भी, ऐसी सुविधाओं की उपलब्ध्ता को सुनिश्चित कराने हेतु उचित निर्देशों के लिए जा सकते हैं।
  8. विधिक सेवा संस्थानों को चाहिये कि वह मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को स्वलीनता, दिमागी पक्षाघात, मानसिक गति में कमी और बहु अशक्तताग्रस्त व्यक्ति के संबंध मे गठित राष्ट्रीय कल्याण ट्रस्ट के साथ जोड़ें ताकि स्वलीनता, दिमागी पक्षाघात, मानसिक गति में कमी और बहु अशक्तताग्रस्त व्यक्ति के लिए, राष्ट्रीय कल्याण ट्रस्ट अधिनियम, 1999 के तहत मिलने वाली सुविधाएँ, इन व्यक्तियों तथा इनके परिवार जनों को मिल सकें। विधिक सेवा संस्थान को मानसिक स्वास्थ्य सुविधा  केंद्र के अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवकों और अर्द्ध(-चिकित्साकर्मी/प्रशासनिक स्टाफ और चिकित्सकों के माध्यम से रोगियों के रिश्तेदारों तथा घर की पहचान करने में संलिप्त होना चाहिए, जिसके संबंध में तत्प्रकार के रिकार्ड में उपलब्ध  नहीं है और विभिन्न विधिक सेवा संस्थानों द्वारा ऐसे रोगियों के रिश्तेदारों से सम्पर्क स्थापित कर ऐसे रोगियों को उनके अपने लोगों तक पहुँचाने की सुविधा  दिलाने हेतु उचित कदम उठाये जाने चाहिए।
  9. वह रोगी जो मानसिक स्वास्थ्य केन्द्रों, भवनों और सुविधा  केन्द्रों में रहते हैं, जो अपने मूल निवास एवं घर से दूर है, को उनके मूल निवास के निकट मानसिक स्वास्थ्य केन्द्रों, भवनों और सुविधा केन्द्रों में स्थानांतरण हेतु विधिक  सहायता प्रदान करानी चाहिए। यह कार्य राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण  और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण  की संलिप्तता के साथ होना चाहिए। बेसहारा, बेघर और निःसहाय मानसिक बीमार तथा मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को विधिक  सहायता मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987, की धारा 23 के तहत किसी पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी  अपने थाने की सीमा के भीतर किसी भी आवारा मानसिक बीमार व्यक्ति अथवा किसी भी खतरनाक मानसिक बीमार व्यक्ति को पकड़ अथवा पकड़वा सकते है और तब ऐसे व्यक्ति धारा 24 के तहत दंडाधिकारी के समक्ष कथित व्यक्ति की कैद को प्राध्किृत करने हेतु ग्रहण आदेश प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत किये जायेंगे ताकि उसे किसी मनोचिकित्सक अस्पताल अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम में उपचार हेतु दाखिला मिल सके।

इसी तरह, धारा 25 के तहत, यदि किसी पुलिस अधिकारी  अथवा किसी निजी व्यक्ति को यह इस बात का पूर्ण विश्वास है कि उसके थाने या निवास की सीमाओं के भीतर किसी मानसिक बीमार व्यक्ति को उचित देखरेख तथा सुरक्षा नहीं मिल पा रही  है अथवा उसे उसके रिश्तेदारों या अन्य व्यक्तियो के द्वारा जिनके पास ऐसे मानसिक बीमार व्यक्ति का प्रभार हो, द्वारा बुरा व्यवहार या उपेक्षा की जा रही है, तो वह इस मामले को दंडाधिकारी के समक्ष रिपोर्ट कर सकते है। दंडाधिकारी ग्रहण आदेश अथवा उस व्यक्ति को दडं देने का आदेश दे सकते है जो मानसिक बीमार व्यक्ति की उपेक्षा के लिए जिम्मेदार है।

बेघर अथवा निःसहाय मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्ति के मामले में सामान्यता, किसी पंजीकृत संगठन जैसा कि स्वपरायणता (आटिज्म),प्रमस्तिक घात, मानसिक मन्दता और बहु-विकलांगताग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 एवं नियम तथा विनियमनों के तहत पंजीकृत संगठन द्वारा विधित  स्थानीय स्तर को द्वारा रिपोर्ट किया जा सकता है। यह स्थानीय स्तर समिति ही है, जो उपेक्षित अथवा निसहाय मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों की देखरेख हेतु उचित निर्देशों को पारित करेगी।

विधिक सेवा संस्थानों द्वारा लिए जाने वाले कदम

  • विधिक सेवा संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 की धारा 24 या 25 के तहत मानसिक बीमार व्यक्ति के सर्वश्रेष्ठ हितों का प्रतिनिधित्व करते हुए उसे पेश करने में सक्षम संवेदक तथा संवेदनशील विधिक सेवा अधिवक्ताओं का पैनल तैयार करना चाहिए जो दंडाधिकारी को मानसिक बीमार व्यक्ति के कल्याण हेतु आदेश देते समय सहायता प्रदान कर सके।
  • विधिक सेवा संस्थानों को पुलिस थानों में नियुक्त अपने अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवकों द्वारा पुलिस को, मानसिक बीमार व्यक्तियों जो उपेक्षित, आवारा या निस्सहाय है, राष्ट्रीय कल्याण ट्रस्ट (स्वलीनता, दिमागी पक्षाघात, मानसिक गति में कमी और बहु विकलांग) अधिनियम, 1999 की धारा 13 के तहत स्थापित स्थानीय स्तर समिति को सुपुर्द करने मे सहायता करनी चाहिए, ताकि मानसिक बीमार व्यक्ति के देखरेख, स्वास्थ्य-लाभ, व्यक्तिगत या संस्थागत संरक्षक की नियुक्ति जैसे इंतजामो को सुनिश्चित किया जा सकें।
  • विधिक सेवा संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य अधिकारियों सहित चिकित्सकों, पुलिस अधिकारियों तथा न्यायिक दंडाधिकारियो के साथ जो कि स्थानीय सहायक प्रकिया को विकसित करने वाली अपेक्षित कार्यवाहियों में काम कर रहे हैं, मिलकर संवेदनशील कार्यकर्मो को तैयार करना चाहिए ताकि आवारा, मानसिक बीमार व्यक्तियों को पहचाना जा सकें और प्रत्येक मामले में उनके मानवीय अधिकारों हेतु उचित न्यायिक आदेशों को यथावश्यक प्राप्त किया जा सके।

न्यायालयीन कार्यवाहियों के दौरान मानसिक बीमार और मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों को विधिक सहायता

मानसिक बीमार तथा मानसिक अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों को शासित करने हेतु दो अधिनियम  हैं, मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 और राष्ट्रीय कल्याण ट्रस्ट (स्वलीनता, दिमागी पक्षाघात, मानसिक गति में कमी और बहु अशक्तताग्रस्त व्यक्तियों हेतु) अधिनियम  1999 दोनों अधिनियम  दंडाधिकारी अथवा स्थानीय स्तर समिति, जैसा भी मामला हो, द्वारा उचित आदेशों के पारित होने के पूर्व सुनवाई की अपरिहार्यता निरूपित करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि विधिक सेवा संस्थान इनमें अपने अर्द्ध -विधिक  स्वयंसेवकों अथवा पैनल अधिवक्ताओं के माध्यम से सहभागिता अवश्य करें।

  • यह विधिक सेवा संस्थान का कर्त्‌व्य होगा कि वह न्यायालय में, जहाँ मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम  1987 की धारा 19, 20, 22, 24, 25, 26, 27, या 28 के तहत ग्रहण आदेशों अथवा विचार करने हेतु कोई आवेदन डाला गया हो, में अपना प्रतिधारक / पैनल अधिवक्ता नियुक्त करे।
  • विधिक सेवा संस्थान, सभी मामलों मे ऐसे मानसिक रोगियों के हितों की रक्षा के लिए संबंधित  दंडाधिकारी से आवेदन कर सकते है जिनके संबंध में ग्रहण अथवा उन्मोचन आदेश हेतु आवेदन दिया गया हो और जिस पर दंडाधिकारी, विधिक सेवा संस्थान को नोटिस दिये जाने संबंधी आवेदनों पर कार्यवाही कर रहा हो।
  • प्रतिधारक/पैनल अधिवक्ता, उन कथित मानसिक बीमार व्यक्तियों की दशा को सुनिश्चित करते हुए उसके रिश्तेदारों, मनोचिकित्सक अस्पतालों अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम या किसी अन्य सक्षम व्यक्ति के साथ संपर्क रखते हुए उनकी परिस्थितियों के विवरण को जुटाएंगे, जिनके लिए न्यायालय में ग्रहण / रिहाई आदेश के आवेदन को डाला गया है। ताकि उचित आदेश प्राप्त हो सके।
  • स्थानीय अधिकारिता  रखने वाले विधिक सेवा संस्थान मानसिक बीमार व्यक्तियों की एक सूची रखेंगे जिनके लिए न्यायालयों से ग्रहण आदेश पारित हुए हैं और संस्थान उन मानसिक बीमार व्यक्तियों का उन मनोचिकित्सक अस्पतालों अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम्स जहाँ के लिए उन व्यक्तियों के निरुद्ध आदेश है, में उनके उपचार के विकास का भी अनुवीक्षण करेंगे।
  • विधिक सेवा संस्थान संबंधित दंडाधिकारी का ध्यान, ऐसे मानसिक रोगी की ओर आकर्षित करेंगें  जिसे ग्रहण आदेश के अनुसार मनोचिकित्सक अस्पताला अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम्स में भेजा गया है और जो उपचार पश्चात्‌ भी वहीं निरुद्ध है।
  • विधिक सेवा संस्थान, अपने अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवकों / पैनल / प्रतिधारक  अधिवक्ताओं के माध्यम से, उपचारित स्वैछिक रोगियों की, धारा 18 के तहत अथवा किसी अस्वैछिक रोगी की मदद धारा 19 के तहत रिहाई के मदद आवेदन संस्थित करने मे करेंगे।
  • विधिक सेवा संस्थान, अधिनियम  की धारा 19 (1) के तहत क्लिनिक अथवा आगुन्तक बोर्ड के भाग रूप के माध्यम से मानसिक बीमार व्यक्तियों के दाखिलों का पता लगाते रहेंगे ताकि पता लगाया जा सके कि प्रारंभिक 90 दिनों से अधिक  की रोक केवल न्यायालय के आदेशों के कारण ही हुई हैं।
  • सभी विधिक सेवा संस्थान, अधिनियम  की धारा 20 के तहत, सभी मामलों पर यह भी नजर रखेंगें ताकि कोई भी उपचारित रोगी मनोचिकित्सक अस्पताल, भवन या सुविधा  केन्द्रों में चूक से भी न रह जाए। संस्थान को रोगी के ठीक होते ही उसकी रिहाई के लिए आवेदन डाल देना चाहिए।
  • विधिक सेवा संस्थान, अधिनियम  की धारा 23 सह पठित धारा 25 के तहत, आवारा अथवा निसहाय मानसिक बीमार व्यक्तियों के मामलों पर नजर रखेंगे ताकि अधिनियम  की धारा 28 के तहत दंडाधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति को देखरेख में रखने की आवश्यकता का 10 दिन में पुनर्विलोकन सखती से किया जाए तथा ऐसा कोई भी व्यक्ति समय से ज्यादा निरुद्धन किया जाए जिसे अधिनियम  की धारा 24 (2) (a) के तहत मानसिक बीमारी का प्रमाण-पत्र जारी किया जाना है।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ अपने विधिक सेवा क्लिनिक और अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवी तथा पैनल /प्रतिधारक  अधिवक्ता के माध्यम से रोगियों के डिस्चार्ज का ट्रैक रखेंगी और जब भी आवश्यक हो रोगी की तरफ  से प्रभारी चिकित्सीय अधिकारी अथवा गृहण आदेश पारित करने वाले न्यायलय के समक्ष आवेदन पत्र देने में सहयोग और सहायता करेंगे।
  • अधिनियम  की धारा 45 और 46 के अंतर्गत किये गये प्रावधान के अनुसार अनुपस्थिति की अनुमति प्राप्त करने में विधिक सेवा क्लिनिक और अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवी तथा पैनल/प्रतिधरण अधिवक्तागण  भर्ती रोगियों को सहायता प्रदान करेंगे। अधिनियम  की धारा 49 के अंतर्गत किये गये प्रावधान  के अनुसार अपील फाइल करने में भी उन्हें सहयोग करना चाहिए।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ मनोबाधित  व्यक्तियों के हितों की सुरक्षा हेतु अधिनियम  की धारा 50 के अंतर्गत न्यायिक जांच कार्यवाही में भी शामिल होंगी। जिला न्यायाधीश  से आवश्यक रूप से अनुरोध करेगी कि जब भी इनके समक्ष धारा 50 के अंतर्गत कोई आवेदन आये तो यह विधिक सेवा संस्थान को नोटिस जारी करें।
  • जब किसी कथित मनोबाधित  व्यक्ति के पास संपत्ति हो और मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम  की धारा 50 की उप-धारा 1द्ध के खंड एद्ध से डीद्ध तक में उल्लिखित कोई भी व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम  के अध्याय टप् के अंतर्गत न्यायिक जांच कराने हेतु आवेदन के साथ आगे नहीं आ रहा हो तो विधिक सेवा संस्थाएँ कथित मनोबाधित  व्यक्तियों की मानसिक स्थिति, उनकी व्यक्तिगत अभिरक्षा और उनकी संपत्ति के प्रबंध  के विषय में न्यायिक जाँच कराने हेतु उचित कदम उठाएंगी। इस प्रयोजन हेतु विधिक सेवा संस्थाएँ मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम  1987 की धारा 50 की उप-धारा (1) के खंड (क) से (घ) में निर्देशित उन लोगो में से किसी एक से लिखित रूप में संबंध स्थापित करेंगी और इस मामले को अधिनियम  की धारा 50 की उप-धारा (1) के खंड (घ) की दृष्टि में संबंधित  जिले के कलक्टर अथवा राज्य के महाधिवक्ता के पास ले जायेंगी। विधिक सेवा संस्थाएँ उपरोक्त प्रकार के मामलों मे संलिप्त ऐसे मनोबाधित  व्यक्तियों को यथोचित प्रभावी सहयोग के माध्यम से विधिक  सहायता प्रदान करेंगी। जिनके संबंध मे संबंधित  कलक्टर द्वारा ऐसी कार्यवाहियों की तैयारी एवं उसे अग्रसारित करने में सहयोग देने हेतु अनुरोध किया गया हो।
  • जब धारा 53 के अंतर्गत व्यक्ति का कोई संरक्षक नियुक्त किया गया हो एवं/अथवा धारा 54 के अंतर्गत संपत्ति का प्रबंधक  नियुक्त किया गया हो अथवा अधिनियम  की धारा 71 एवं धारा 79 के अंतर्गत भरण-पोषण का आदेश पारित किया गया हो तो विधिक  सेवा संस्थाएँ प्रत्येक मुकदमें को पैरवी करेगी एवं मनोबाधित  व्यक्ति के हितों की सुरक्षा हेतु प्रत्येक कार्य करेंगी।
  • अधिनियम  की धारा 76 के अंतर्गत जैसा कि प्रावधान  है विधिक सेवा संस्थाएँ अपील करने में समस्त संभव सहयोग प्रदान करेंगी।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ, विधिक सेवा क्लीनिकों एवं अर्द्ध-विधिक स्वयंसेवकों के द्वारा, एवं विजिटर्स परिषद्‌ के सदस्य को सम्मिलित करते हुए भ्रमण द्वारा यह सुनिश्चित करेंगी कि निवासियों के मानव अधिकारों का उल्लंघन न हो व जब भी ऐसे उल्लंघन सामने आएँ तो ये उच्च न्यायालय के समक्ष लाए जायें।
  • जैसा कि स्वलीनता, सुमस्तिष्क पक्षाघात, मनोबाध्यता एवं बहुल अशक्तता से ग्रस्त लोगों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय न्याय अधिनियम, 1999 एक व्यापक अधिनियम  है जो मानसिक रूप से अशक्त लोगो को देख-रेख प्रदान करता है। इसमें मानसिक रूप से अशक्त लोगों के माता-पिता की देख-रेख में सहयोग को सम्मलित करते हुए और संरक्षक की नियुक्ति द्वारा माता-पिता के देहांत के पश्चात मनोबाधित  व्यक्तियों की देख-रेख एवं आर्थिक स्थिति का प्रबंध  करना शामिल है। यह महत्वपूर्ण है कि विधिक सेवा संस्थाएं अधिनियम  के विषय में लोगो को सूचित करे एवं इस का लाभ उठाने में उनका सहयोग करें। संरक्षक की नियुक्ति के मामले में अर्द्ध-विधिक स्वयं सेवी एवं विधिक सेवा क्लिनिक मनोबाधित  व्यक्तियों एवं उनके परिवार की सहायता करेंगी।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ मानसिक रोगियों एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों को उनके विरासत के अधिकार, संपत्ति रखने एवं आर्थिक अधिकारों का आनंद लेने को सुरक्षित करने में सहयोग करेंगी। मानसिक रोग एवं मानसिक अशक्त्त्ता से ग्रस्त लोग भी अन्य लोगो के जैसे चल एवं अचल सम्पत्ति की विरासत का अधिकार  रखते हैं एवं अपने आर्थिक मामलो पर नियंत्रण  रखने एवं बैंक ऋण, बंधक  एवं अन्य आर्थिक लाभों को लेने का अधिकार  रखते हैं जो उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिया जा सकता है अथवा किसी वैसे सहयोगी व्यक्ति द्वारा जो मानसिक रोग अथवा मानसिक अशक्तता से ग्रस्त व्यक्ति के साथ कोई हित-भेद नहीं रखता हो। इसे साकार करने में विधिक सेवा संस्थाएँ समस्त विधिक  सहायता प्रदान करेंगी।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ अशक्तता वाले (सामान्य अवसर, अधिकार  का संरक्षण एवं पूर्ण शिरकत) अधिनियम, 1995 के अंतर्गत समस्त लाभों को उठाने में मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों की सहायता करेंगी।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों एवं उनके परिवारों हेतु विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का पता लगाएंगी और इन योजनाओ के अंतर्गत लाभों को उठाने में विधिक सेवा संस्थाएँ मानसिक रूप से आशक्त व्यक्तियों एवं उनके परिवारों की सहायता करेंगी।

जागरूकता एवं संवेदनशीलकर्ता कार्यक्रम

  • विधिक सेवा संस्थाएँ जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करेंगी विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों  में ताकि लोगो को शिक्षित किया जा सके कि मानसिक रोग उपचार योग्य है और मानसिक रोग अथवा मानसिक अशक्तता से कोई कलंक जुड़ा हुआ नहीं है।
  • विधिक सेवा संस्थाएँ समाज में मानसिक रोगियों के साथ भी अन्य लोगों के जैसे सामान्य व्यवहार की आवश्यकता बतायगीं। ऐसे विशेष विधिक  जागरूकता शिविरों म मनोचिकित्सकों, अधिवक्तागण  एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति, शिविर में आए लोगों की मानसिक रोग एवं मानसिक अशक्तता के विषय में भ्रम व भ्रांतियों को दूर करने में सहायक होंगी।
  • विधिक सेवा संस्थायें ऐसे शिविरों में जनता-जनार्दन को एवं उनके परिवार वालों को मानसिक रोगियों एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों से संबंधित संपत्ति एवं उनके अन्य विधिक  अधिकार  तथा विधि के अन्य प्रावधानों  के विषय में शिक्षित करेंगे।
  • राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, ज्यूडिसियल अकादमी के सहयोग से प्रशिक्षण कार्यक्रम संयोजित कर सकते हैं ताकि न्यायिक अधिकारियों को मानसिक रोगियों एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों एवं उनके माता-पिता, रिश्तेदारों एवं परिवार सदस्यों द्वारा झेले गये सामाजिक एवं विधिक  समस्याओं के संबंध में संवेदनशील बनाया जा सके।
  • ऐसे ही कार्यक्रम विधिज्ञ  परिषदों के सहयोग से भी संयोजित किये जा सकते हैं ताकि पैनल अधिवक्तागण  एवं विधिक  व्यवसाय के अन्य सदस्य को संवेदनशील बनाया जा सके।
  • विधिक सेवा संस्थाएं स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य स्वयंसेवी सामाजिक संस्थाओं से मानसिक रोगियों एवं मानसिक रूप से अशक्त व्यक्तियों से जुड़ी समस्याओं के समाधान हेतु संपर्क स्थापित करेंगी।
स्रोत: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नालसा, भारत सरकार

 



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