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उपसंहार

भूमिका

भारत का मूल निवासी द्रविड़ कुडूख जिनकी एक समय भारत में तूती बोलती थी, जिनका व्यापारिक संबंध देश विदेशों में पूर्व में तम्रलिप्ति, पश्चिम में भड़ौच आदि बन्दरगाहों में थी, जिनका निवास स्थान हिन्दुस्तान के स्वर्ण भूमि में था, जिनका पत्थल से बने सुदृढ़ किले थे। ये विदेशियों से हार खा गये। इनका सभी पूर्व संपति विजेताओं द्वारा अधिकृत कर ली गई। इनके धर्म एवं संस्कृति पर आघात पहुँचने लगी। ये विवश हो कर अपने मूल स्थान छोड़ अमन चैन की जिन्दगी एवं जीविका की खोज में इधर – उधर भटकते रहे।

अंत में चारों तरफ से जंगल पहाड़ों से घिरा दुर्गम छोटानागपुर के वन प्रदेश को अपने के लिए सुरक्षित समझ कर इसमें बस गये। जीविका उपार्जन के लिए इन लोगों ने जंगल साफ किया, नदी नाले को बांध कर कृषि योग्य जमीन बनाई। जीवन की हर आवश्यक वस्तु खुद पैदा करते तथा अभाव की पूर्ति जंगलों से करते थे। केवल कमी थी नमक की, जो सूदूर दक्षिण के प्रदेशों से उपलब्ध होता था। अपने ज़माने में यह भी बड़ा दुर्लभ था। यातायात के कोई साधन नहीं थे। रास्ते भी खरतनाक थे एवं आने जाने में महीनों दिन लगते थे। अत: आने वाली व्यक्ति की इंतजारी, घर परिवार के लोग बड़ी से उत्सुकता से करते थे। इस संबंध में उराँव परिवार में एक मूहावरा अभी प्रचलित है। शायद यह मुहावरा उसी समय का और इसी कारण से प्रचलित हुआ, ऐसा लगता है। जब किसी परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, ऐसी स्थिति में घर के अबोध बच्चे बच्चियां मृत व्यक्ति की खोज खबर में जिद्द मचा देते है  तो उन्हें संत्वना के लिए कहा जाता है कि बेक खेंदा केरस केरा बेर ओस वर, औ अर्थात नमक खरीदने गई है/ गया है, आएगा। कुछ दिनों के बाद उनके दिमाग से खोज खबर करने का ख्याल उतर जाता है।

विश्लेषण

इस छोटानागपुर क्षेत्र में उराँव जनजाति के आने के पहले मुंडा जनजाति के लोग निवास करते थे। कई ज़माने तक उराँव, मुंडा दोनों जातियां घूल मिलकर स्वतंत्रता पूर्वक चैन से रहने लगे। वे खुद जमीन के मालिक थे। किसी प्रकार की मालगुजारी न थी। इनके लिए कमाओ – खाओ और आनंद मनाओ का जमाना था। इनके बीच में एक मूहाबरा आज भी प्रचलित है राज धरै ना साह जिन्दगी रे चिकन परवाह का समय था। धीरे – धीरे राजा जमींदारी की प्रथा शुरू हुई। इनके साथ बाहर से कई प्रकार की जातियां इस प्रदेश में बसे। अब उराँव, मुंडा के आनंदमय जीवन में विभिन्न प्रकार की विघ्न - बाधाएं आने लगी। इनकी जमीन - जायदाद अन्य जातियों द्वारा छीनी जाने लगी। भूस्वामित छीन लिया गया। अब इन पर सब प्रकार से अन्याय तथा जुल्म हो चले। कितने अत्याचार के विरूद्ध जूझ पड़े, कितने बेजमीन होकर छोटानागपुर छोड़ कर आसाम, भूटान का शरण लिए। उत्तरोतर गरीबी का दल - दल में फंसते गए और वर्तमान में इनका सब कुछ बिक गया। इनकी आन – शान, मान – सम्मान खत्म हो गया।परंतु जनजातियों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा काफी प्रयास किये जा रहे हैं। इनके विकास की समुचित देख - रेख के लिए सरकार के द्वारा छोटानागपुर एवं संथाल परगना स्वशासी विकास प्राधिकार का गठन किया गया, जिसे अब तीन भागों उतरी छोटानागपुर, एवं दक्षिणी छोटानागपुर एवं संथाल परगना स्वशासी प्राधिकार के रूप में विभाजित कर दिया गया है। जनजातीय क्षेत्रों के त्वरित विकास के लिए जनजाति उप - योजना की अलग से व्यवस्था है क्योंकि धनराशी की कमी से जनजातियों का समुचित विकास संभव नहीं है।

जनजातियों के विकास के लिए सरकार का कल्याण विभाग भी है। हालाँकि दुसरे राज्यों की तरह जनजातियों की आबादी अधिक होते हुए भी बिहार में अलग से जनजाति विकास विभाग नहीं हैं। इसी कारण जनजाति कल्याण भी कल्याण विभाग के साथ संलग्न है। आदिवासी कल्याण आयुक्त के अतिरिक्त राज्य के विभिन्न जिलों में जिला कल्याण पदाधिकारियों, अनुमंडल कल्याण पदाधिकारियों तथा प्रखंड कल्याण पदाधिकारियों द्वारा अनूसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण योजनाओं की देख - रेख की जाती है। इसके अतिरिक्त जनजाति सहकारिता निगम तथा बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान भी इनके चंहुमूखी विकास के लिए कार्यरत है। सरकार एवं विभिन्न सरकारी एजेंसियां उराँव जनजाति के साथ – साथ सभी जनजातियों के सम्पूर्ण विकास के लिए प्रयत्न शील है। परिणाम स्वरुप इन जनजातियों की स्थिति पहले से काफी सुधरी है तथापि अभी भी काफी सुधार एवं सहयोग की आवश्यकता है।

स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार



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