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धार्मिक एवं संस्कृतिक मान्यताएं

धार्मिक एवं संस्कृतिक मान्यताएं

परिचय

संसार की सभी जातियों में कुछ न कुछ विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं होती हैं। सृष्टि के प्रारंभिक काल में ही मानव ने अपनी सृष्टि को एक अलौकिक घटना समझा होगा और उसी समय से उनमें किसी अलौकिक शक्ति पर विश्वास उत्पन्न हुआ होगा। धीरे – धीरे जब मानव के ज्ञान में वृद्धि हुई होगी और उन्होंने सृष्टि की वैज्ञानिक व्याख्या की होगी तब इस अलौकिक शक्ति पर से उनका विश्वास धीरे – धीरे कम होने लगा होगा। संसार में आज जितनी भी जनजातियाँ है उनमें इस अलौकिक शक्ति पर विश्वास का तथ्य विकसित जातियों की अपेक्षा अधिक है और जाति तथा जनजाति में एक प्रमुख विभेदक तत्व है।

संसार की अन्य जनजातियों की तरह उराँव जनजाति में भी अलौकिक शक्ति की स्वीकृति प्राप्त होती है। अब इसी के आधार  पर इनकी धार्मिक मान्यता दृष्टिगत होती है। संस्कृति में यद्यपि कुछ अन्य तत्व भी आते हैं, परंतु किसी भी जनजाति की संस्कृति के विषय पर विचार करने पर हम पाते हैं कि उस जनजाति की संस्कृति उसकी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। उराँव जनजाति में भी हम सांस्कृतिक तथा धार्मिक मान्यताओं को एक - दुसरे से अलग कर के नहीं देख सकते हैं।

उराँव जनजाति में हम जिस टोटमवाद को पाते हैं। वह उनकी विशिष्टिता को अभिव्यक्त करता है। इस जनजाति में 20 से भी अधिक टोटम होते है और इन टोटमों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उराँव जनजाति को लोग प्राकृतिक शक्तियों पर अत्यधिक विश्वास करते हैं। विभिन्न पशुओं – पक्षियों तथा वनस्पतियों को टोटम के रूप में स्वीकार किया जाता है और उनको अपना पूर्वज मानते हुए पूज्य माना है। उराँवों को यह विश्वास है कि उनके दुर्दिन में यह टोटेम उनकी रक्षा करते हैं। किसी भी उत्सव के समय गीत आदि के माध्यम से अपने टोटेम को उराँव लोग स्मरण करते हैं और ऐसा मानते हैं कि उनके स्मरण मात्र से ही उनका वह उत्सव सफल हुआ।

उराँव जनजाति आत्मा, जीवात्मा, परमात्मा और दुष्टात्मा सबों पर विश्वास करती हैं। आत्मा स्वीकार करने के कारण ये लोग पुनर्जन्म को भी स्वीकार करते हैं। जीवन में सदाचरण पर विशेष बल दिया जाता है और यह माना जाता है कि जो व्यक्ति इस संसार में अच्छा आचरण करेगा। झूठ नहीं बोलेगा, पाप नहीं करेगा, वह स्वर्ग जायेगा और उसका अगला जन्म सुखमय होगा। इससे विपरीत जो व्यक्ति अच्छा आचरण नहीं करेगा उसे नर्क जाना होगा और उसका अगला जन्म दु:खमय होगा। ऐसा मानते हैं कि कोई भी लड़का किसी परिवार में जन्म लेता है तो वह अपने परिवार के पूर्वजों की आत्मा को लेकर ही उत्पन्न होता है। इसी कारण बच्चों के नामकरण के समय उसका नाम उसके दादा के नाम से रखा जाता है।

उराँव जीवात्माओं पर विश्वास करते हैं। जीवात्माओं का स्वामी पाट या पाट राजा कहलाता है जो बीमारी अथवा अन्य आपदाओं से लोगों की रक्षा करता है। कुछ गांवों में इनका निवास स्थान गाँव के बाहर पहाड़ी पर होते हैं और कुछ गाँव में किसी वृक्ष के नीचे होता है। सभी लोग पाट की पूजा करते है और उसे अपना देवता मानते हैं। समय – समय पर भी पाहन पाट राजा को बलि भी प्रदान करता है।

उराँव जनजाति में दरहा देशवाली सबसे भयानक जीवात्मा होता है। वह गाँव का दरवान होता है और उसका स्थान गाँव की सीमा पर होता है। किसी – किसी गाँव में इसकी एक संगिनी होती है जिसे देशवाली कहते हैं। इसका स्थान एक अलग झाड़ी में होता है। जब गाँव में किसी प्रकार की भयंकर महामारी ये विपत्ति आ जाती है तो दरहा देशवाली को भैंस की बलि दी जाती है।

जीवात्मा की अतिरिक्त उराँव जनजाति परमात्मा के रूप में विभिन्न प्राकृतिक पदार्थों को स्वीकार करती है। ऐसा माना जाता है कि ऐसी जीवात्मायें किसी पशु, पेड़, पर्वत या झरनों में निवास करती है। अपने दिवंगत पूर्वजों को भी ये हितैषी परमात्मा के रूप में मानते हैं। आज जनजाति को लोग हिन्दूओं के सभी देवी – देवताओं को भी मानते हैं और विपत्ति के समय इनकी पूजा करते हैं। इनमें काली और महावीर की पूजा अधिक होती है।

भूत, पिसाच, चेचक, बुखार तथा गर्भ नष्ट करने वाली आत्माओं को ये लोग दुष्टात्मा मानते हैं। इन दुष्ट आत्माओं से बचाव के लिए वे उपर्युक्त विभिन्न देवी देवताओं तथा पूर्वजों की पूजा करते हैं। जिन व्यक्तियों की अकाल मृत्यु हो जाती है उसकी आत्माओं को भी ये लोग दुष्ट आत्मा का प्रकोप समझते हैं। यदि किसी गर्भवती स्त्री की मृत्यु हो जाती है तो ऐसा माना जाता कि वह चुड़ैल हो जाती है। ऐसा विश्वास है कि यदि गर्भवती स्त्री की मृत्यु हो जाने पर उसे गाड़ दिया जाय तो वह निश्चित रूप से चुड़ैल हो जाती है।

जैसा की पहले कहा जा चुका है उराँव जनजाति के परिप्रेक्ष्य में धर्म और संस्कृति को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। इस कारण उराँव पर प्राय: जितने भी संस्कृति हैं वे सभी किसी न किसी रूप में धर्म से जुड़े हुए हैं। उराँव जनजाति में हम जिन सांस्कृतिक कृत्यों को पाते हैं। उनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं।

नृत्य और संगीत

नृत्य और संगीत जीवन को आनंदित, उल्लास एवं सुखमय जैसे श्रृंगार रस से भर देती है। ये कुडूख जीवन के प्रमुख दैनिक कार्य से जुड़े हुए हैं। ये अपने नृत्य और संगीत को सामूहिक रूप से प्रदर्शित करते हैं। आज भी प्रत्येक कुडूख गाँव के बीच एक अखड़ा होता है जिसका आकर गोल होता है। जहाँ गाँव के युवक – युवतियां रात को गाना बजाना करते हैं। दिन भर दैनिक कार्यों से अस्त – व्यस्त थके – मांदे उराँव लोगों के पास मनोरंजन के लिए कोई आधुनिक साधन नहीं होता है। रात्री भोजन के बाद युवक – युवतियां तथा अधेड़ भी परंपरागत ढंग से अपने – अपने मांदर, नगाड़े तथा घंट – झंझर आदि के साथ आखाड़े में आ जुटते हैं। वे प्राय: 10 – 11 बजे तक ताल मृदंग के साथ नाचते गाते संसार के सारी चिंताओं तथा झंझटों को भूल कर मस्त एवं आनन्द विभोर रहते हैं। पर्व त्योहारों तो ये लोग ताल सूर के साथ नाच करते हैं ऐसे अवसर पर बड़े – बड़े लड़के और लड़कियाँ अलग – अलग कतारें बना कर नाचते हैं। प्राकृति के गोद में पले, उराँव के गोद में पले उराँव के नृत्य के ताल - सुर ऋतू के अनुसार होता है। जिस प्रकार प्रत्येक ऋतू में काम धंधे अलग - अलग होते हैं। उसी प्रकार के हर ऋतू के पर्व एवं उत्सवों के भिन्न – भिन्न खेल, गीत एवं राग होते हैं। उराँव लोगों का विश्वास है मौसम के अनुकूल नृत्य संगीत एवं राग से प्राकृति देवी खुश होती हैं। वर्षा अच्छी, पेड़ पौधे हरे भरे रहते हैं। उन्हें शक्ति मिलती हैं वे नृत्य संगीत का आनंद का हिलोरे लेते तथा झूमते है और वे फल फूलों से लद जाते हैं यहाँ तक जानवर भी उनके नृत्य संगीत में आकर्षित होते हैं।

उराँव आदिवासी का अधिकतर गीत उनके दैनिक जीवन का प्राकृतिक वर्णन, अतीत के घटनाओं, सामाजिक एवं धार्मिक बंधनों से संबंधित है। इन के नृत्य और संगीत मुख्यतः खद्दी, युड़िया, खड़िया, पनाड़ी, अषाड़ी, करम, माठा, शादी तथा जदूरा जैसे महत्वपूर्ण नामों से जाने जाते हैं।

यह पर्व (त्यौहार) फागुन से प्रांरभ होता है और वैशाख तक चलता है। इस समय का मौसम बहुत ही सुखद और स्वस्थ्यकर होता है। रात को न तो अधिक जाड़ा और न ही दिन को गर्मी। पेड़ पौधा अपने पुराने वस्त्रों (पत्तों) का परित्याग कर नए परिधानों से सुसज्जित हो जाते हैं। इस हर्ष और उल्लास के अवसर पर भी अपने अभिन्न दोस्त को याद करते हैं, मेहमान बुलाते हैं। वृक्ष एवं फूल – पत्ते मधुमक्खियों एवं तितलियों को आमंत्रित करते है और अपने गोद में बैठा कर अनुपम रस से स्वागत करते हैं। वे रसावादन कर मस्ती में मधुरगान से वातावरण को गूंजित कर देते हैं। कोयल भी रसपान करके मस्ती में आ जाती है। अपने मधुर स्वादों में गूनगुनाती बाग - बगीचे की शोभा बढ़ा देती है। इसके युगल जोड़ी एक दुसरे के लिए व्यग्र होती है और क्षणिक अलगाव भी इन्हें असहाय हो जाता है। सरहुल के त्यौहार के समय प्रत्येक जनजातियों के मन में एक अजीब सा उल्लास का वातावरण देखने को मिलता है। उस त्यौहार को मानने के लिए गाँव को लोग की एक बैठक होती है। गाँव का कोटवार सभी को इकट्ठा होने के उद्देश्य से अवगत कराता है, आपस में सलाह करते हैं की कौन दिन ये त्यौहार मनाया जाए। दिन जब निश्चित हो जाता है तो पहले सभी लोग विशेष आकर औरतें घर की सफाई एवं दीवालों की लिपाई - पुताई करती हैं। उन सभी गंदगियों को घर से किसी कोने पर इकट्ठा करती है। इस क्रम में एक बहुत बड़ी घटना है जिसे आप लोगों को भी जानना चाहिए।

सरहुल (खद्दी) के पहले दिन के औरतें, विशेष कर प्रत्येक घर से एक औरत अपने घर से एक पुराना घड़ा में ये गंदगी, जिसे घर के सभी कोनों से बुहार कर निकालते हैं को भर लेती हैं। उसके बाद सभी औरतें गाँव के किसी खास जगह पर इकट्ठा होती हैं। सामूहिक रूप से उन घड़ों को अपने माथे पर ढोकर, हाथ में एक डंडा लेकर और उसे गाँव के सीमा तक पहुँचाने के लिए चल पड़ती हैं। निश्चित स्थान पर वे सभी औरतें उन घड़ों को फेंक कर नाचती हैं। इसी दौरान वे अपने शरीर को नंगा करती हैं एवं उस कपड़े को झाड़ती हुई बोलती हैं चलो बच्चों (भगवान) तुम हमारे सभी बाल – बच्चों को सूखी संपन्न रखना किसी प्रकार की बीमारी इनको न होवे। ये कहकर वे कपड़े पहनती है और सामूहिक रूप से अपने गाँव चली आती हैं।

खद्दी नृत्य के उपयोग में लाने वाले प्रमुख यंत्रों में मांदर, नगाड़े, घंट तथा झांझ तथा मंजिरें होते हैं। इस नृत्य में लड़के – लड़कियां खड़े चलते हुए नाचते और गाते हैं। इनकी कतारें क्रमानुसार अलग – अलग रहती हैं। संगीत के स्वर तथा नाच की विधि अंत तक एक ही प्रकार नहीं रहती है।

  • घुड़िया - इस नृत्य का मौसम सरहुल का ही है। परंतु गाँव का सरहुल जब तक समाप्त नहीं हो जाता है, उस गाँव में यह नृत्य नगाड़े, घंट, झांझर आदि होते है। युवक हाथ में चादर, मयूर पंख या पल्लव युक्त टहनियों को लेते हैं। युवतियां बालों पर सराई फूल तथा तिलाई फूल खोंसती हैं।
  • ठाड़िया - यह नृत्य संगीत जेठ माह में होता है। धरती माता सूर्य के प्रचंड ताप से झुलस जाती है हरियाली बिलकूल समाप्त हो जाती है। सभी प्राणियों के चेहरे में गमगीनी तथा मायूसी छा जाती है। इस नृत्य में किसी प्रकार का वाद्य यंत्र के ताल नहीं रहते हैं।
  • पनाड़ी – यह नृत्य संगीत जेठ माह के बाद मानसून शुरू होने पूर्व चलता है। इस ऋतू में झिंगुर अपने दीर्घ स्वरों में वर्ष का अह्वान करते हैं। यह देख उराँव जनजाति का मन हर्षित हो उठता है और वह आखाड़ों में उतर पड़ते हैं इस नृत्य चंचलता बरती जाती है।
  • आषाढ़ी – नृत्य संगीत जून (आषाढ़) माह के शुरू से जब वर्षा की बूँदें धरती माता पर टपकने लगती है, यह गाना गया जाता है। जनजातियों में ऐसा विश्वास है कि इस महीने में धरती सो कर जाग जाती है। अपने उपर नये वस्त्र धारण कर लेती है। किसान भी खेती – बारी को जल्दी समाप्त करना चाहते हैं। धरती पुन: खिल उठती है। खेतों में हरियाली छा जाती है। यह देख कर उराँव खेतिहर नए उमंग तथा जोश में आकर कामों में लग जाते हैं। खेत में हरियाली अच्छी फसल की आशा देख गाँव के सभी किसान शाम को अपने गाँव के अखाड़ा में झूम – झूम कर नाचते गाते हैं।
  • करम – इस नृत्य संगीत को जनजाति अपने अन्य त्यौहार के अपेक्षा जोश – खरोश से मानते हैं। इसके काई कारण हो सकते हैं। जैसे यह पर्व आषाढ़ सुदी द्वितीय से शुरू होकर आश्विन तक चलता है। सभी उराँव खेतिहार अपने खेतों में लहलहाती खेत को हरा – भरा देख कर अच्छी फसलों की आशा में प्रसन्नचित दिखते हैं। आहार, बांध, तालाब, कूएँ एवं नदी – नाले, पानी से लबालब रहते हैं। धरती माता सभी जगह परिपूर्ण रहती है। धीरे – धीरे किसानों के घर नया अनाज लाने लगते हैं।

इन नृत्य में यंत्र के ताल रहते हैं। गीत के स्वर, नाच के तरीके, मांदर के ताल अपनी जवानी के उन्माद में हिचकोले ले रही होती है। इसी अवसर पर सामाजिक उत्सव जतरा भी शुरू होने लगता है।

गाना – एक्का कुककोस कड़खापदस,

एक्का कुककोस कडरूखापदस।।

कल्ला जु क्ली रैइया हों।

चिओस वाच बाच जिया एंगैह साती।

कुल्ला नु किला टेइया हाँ।।

हिंदी अनुवाद

कौन लड़का भैंस काड़ा चराता है

कौन लड़का भैंस काड़ा चराता है

उसके छाते में बहुत से पंख हैं।

उसे देगा, ऐसा सोच कर मैं दिल

में आशा लगायी हुई हूँ।

  • शादी – शादी गाना और नृत्य अगहन से फाल्गुन तक खूब चलता है। उराँव इन्हीं महीनों को शादी के अच्छे अवसर समझते हैं। इन दिनों छोटे – बड़े सभी के यहाँ खाने के लिए अनाज रहते हैं। सभी खुशी और खुशहाल रहते हैं। अन्य नाच – गान के तरह ही इसमें गाना में साथ – साथ बाजा होता है। शादी के दिन लड़कियां भी रात भर गाती हैं और लड़के भी रात भर नाचते हैं। इसमें विभिन्न प्रकार के गाने होते हैं। वाद्य यंत्रों में ढोलक, नगाड़े, शहनाई, भेर, नरसिंघा, कर्णानात, तथा संज आदि विशेष हैं। शादी के विभिन्न रश्मों को अदा करने के लिए अलग – अलग ताल बजते हैं।

गाना – पोसो वीरी पोसो की, पलो वीरी पलकी

हरे आओ एंग्स आइय पालोकी

हरे आओ एंग्स आइय पालो

मुंद दिप्पा सिंदरी – मुंद जज वाले कागे

दरे आओं नम्बर वाली नंजाकी

बरे बाबा नन्नर वाली नजाक्य

हे माँ पोसने – पालने के समय तो मुझे पोसी – पाली लेकिन दुख ई कि हमें तु रख नहीं सकी। हे पिता दु:ख है कि तुम हमें रख नहीं सका।

हे माँ दु:ख है कि तुम मुझे तीन टीपा सेंदूर एवं तीन डाल हल्दी के चलते पराये के आंगन कर दी। हे पिता दु:ख है कि तुम मुझे पराये के घर कर दिया।

  • जदूरा – यह नृत्य संगीत जब खलिहान में धान मिसनी समाप्त हो जाती है तब माघ से वैशाख तक चलता है। उराँव लोग इसे माघ ही तक सीमित रखते हैं। इसमें ताल मांदर, नगाड़े तथा घंट आदि हैं।

गाना – कहाँ से उड़लारे गुडरी, कहाँ जबे रे सून गुडरी,

पतेरा से उड़लारे गुडरी कहाँ जबे रे सुन गुडरी।

इस प्रकार से उराँव जनजाति के जीवन को यद्यपि आर्थिक कठिनाइयों पूर्ण रूप से जकड़े हुए है तब भी ये लोग हंसी – खुशी के साथ अपना जीवन व्यतीत करते हैं। यदि दिन भर इन्हें अपने खेतों पर या दूसरे की मजदूरी करते बीतता है तो रात को उतना ही सरल बन कर अखड़ा में आते हैं, नाचते हैं, गाते हैं।

  • भाख कट्टी - भाख कट्टी का शाब्दिक अर्थ डंडा काटना होता है हर उराँव परिवार में किसी शुभ कार्य इष्टकुल के लिए समय – समय पर पुरखे तथा परमेश्वर से शुभकामना करते हुऐ भाख कट्टी कराया जाता है। यह कार्य किसी मती या जानकार व्यक्ति करता है। इसके कुछ मुख्य अवसर होते हैं, जो निम्नलिखित है –

क.    आषाढ़  के महीने में जब खेती का काम समाप्त हो फसल के पौधे उग कर लहलहाने लगते हैं।

ख.    भादो – कुआर के महीने में जब खेती का काम समाप्त हो जाता है।

ग.     कार्तिक – अगहन के महीने में जब खेतों की फसल काट कर खलिहान लाने पर।

घ.     नव निर्माण, गृह प्रवेश के शुभ अवसर पर।

ङ.      नये  कुएं की शादी पर।

च.     नव विवाहित वधू के गृह प्रवेश पर।

इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य है बुरे लोगों की नजरों से, भूत – प्रेत की बुरी भावनाओं के दरसे जनजातियों में ऐसा विश्वास है कि वे भाख कटने से बचते हैं। इस प्रथा के द्वारा जानवरों, गायों तथा फसलों को बचाना है।

भाख कट्टी के विधि

भाख कट्टी के करने के दो दिन पहले से ही एक उराँव परिवार मन में सोचता है कि मुझे अमुक समय में यह कार्य करना चाहिए। भाख कट्टी करने का स्थान को वह व्यक्ति जो इस कार्य (पूजा) को करते है, गोबर से लीप कर पवित्र करता है। इसके पश्चात उस स्थान पर किसी आदमी, जानवर या कुत्ता, मुर्गी पास एक सूप में अरवा चावल, भेलवा, करियागुरिया (मुर्गा), एक अंडा (मुर्गी का), अर्पण, धूली तथा चूल्हा मिट्टी, लोटा में शुद्ध जल (पानी) रख दिया जाता है। मती सूप को पकड़ता है और अपने जंघा के उपर रख कर निम्न प्रकार सुमिरन करता है –

हे भगवान, हे पुरखों, आप लोगों का रास्ता दिखाया हुअ है। हम आज यह काम के लिए भाख कट्टी करने को बैठे हैं। यदि हम से कोई भूल हो जाए तो उसे आप सम्भालेंगे, सही रास्ता दिखायेंगे।

इंतना कर कर मती उस लिपी हुई जगह पर, जहाँ वह बैठा है, के सामने हि एक वृत्ताकार चित्र अर्पण से खींचता है। परिधि के बीचोबीच से ये लकीरें आदि तथा पड़ी व्यास के रूप में बनते हैं। यह व्यास एक - दुसरे को जहाँ काटता है। इसके बाद इन सभी लकीरों पर करियाम गुरिया रंग देता है। अब केंद्र पर बी इन तीनों रंगों से एक गोलाकार चित्र चित्रित करता है और उसमें एक मुट्ठी अरवा चावल रखा करउसके उपर एक अंडा रख देता है। अब भेलवा की डाली को एक बड़ा, एक छोटा, दो अलग – अलग टुकड़ा करता है। छोटे टुकड़े को चार भागों में बांटता है और बड़े टुकड़े के चौथाई भाग को दो भागों में। तदनुसार छोटे टुकड़े को चार भाग फलियों में से एक फली देखर बड़े टुकड़े के दो भागों के बीच डाल कर उसका मुंह खुला हुआ बना देता है। उसके बाद अंडा को पूरब मुंह खड़ा रख देता है। उसके बाद बाद बची हुई तीन फलियों के साथ कुछ चावल दोनों मुट्ठी के एक साथ लेकर सगुन करता है। शगुन का अर्थ है दोनों मुट्ठियों में चावल और भेलवा के फलियों को सूप में ही चित – पट करना। जब दो फलियाँ एक बार में चित पड़ जाती है तो सगुन मान लिया जाता है।

स्त्रोत: कल्याण विभाग, झारखण्ड सरकार


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