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किशोर न्याय अधिनियम 2000 व 2006 पर तुलनात्मक दृष्टि

भूमिका

किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत किशोर न्याय संशोधन का तुलनात्मक विवरण दिया गया है। यह अधिनियम जो कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों और देखभाल व सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों से सम्बन्धित कानूनों को मजूबत और संशोधित करने और इस कानून के अंतर्गत (विभिन्न संस्थाओं द्वारा) उनके सही पुनर्वास के लिए बना है। इस कानून के अंतर्गत विभिन्न संस्थाओं द्वारा” को बदल कर एवं उससे जुड़े हुए मामलों और घटनाओं से सम्बन्धित  किया जायेगा। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी चल रही सुनवाई में शामिल कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों तथा देखभाल एवं सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के नाम आदि के प्रकाशन पर रोक (5) किसी बी अखबार, पत्रिका, खबर-पत्र या दृश्य माध्यम से इस अधिनियम के अंतर्गत चल रही है।

किशोर न्याय अधिनियम 2000 व किशोर न्याय संशोधन अधिनियम 2006 पर तुलनात्मक दृष्टि

किशोर न्याय अधिनियम 2000

किशोर न्याय संशोधन अधिनियम 2006

संक्षिप्त शीर्षक- किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल व सुरक्षा) अधिनियम, 2000

संक्षिप्त शीर्षक- किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल व सुरक्षा) अधिनियम, 2006 कहा जा सकता है।

बड़ा शीर्षक-एक अधिनियम जो कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों और देखभाल व सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों से सम्बन्धित कानूनों को मजूबत और संशोधित करने--- और इस कानून के अंतर्गत (विभिन्न संस्थाओं द्वारा) उनके सही पुनर्वास के लिए बना है।

बड़े शीर्षक का संशोधन-किशोर न्याय अधिनियम 2000 (अब से मुख्य अधिनियम के रूप में उल्लेखित) के लंबे शीर्षक में उपयुक्त शब्द “इस कानून के अंतर्गत विभिन्न संस्थाओं द्वारा” को बदल कर “एवं उससे जुड़े हुए मामलों और घटनाओं से सम्बन्धित’  किया जायेगा।

3. धारा 1

छोटा शीर्षक हद (एवं प्रांरभ)

धारा 1 का संशोधन- मुख्य अधिनियम की धारा 1 में,

 

छोटा शीर्षक में, “एवं प्रांरभ” के स्थान पर “प्रारंभ एवं उपयोग” किया गया जायेगा।

 

उपधारा 3 के बाद यह उपधारा शामिल की जायेगी: 4 किसी भी मौजूदा कानून के बजाय इस अधिनियम के प्रावधान कानून का उल्लंघन करनेवाली सजा, कानूनी प्रक्रिया, जुर्माना या कैद के मामले में लागू होंगे।

धारा 2

धारा 2 का संशोधन - मुख्य अधिनियम की धारा 2 में,

क्लॉज a के बाद निम्नलिखित क्लॉज डाला जायेगा: a “दत्तक ग्रहण” का तात्पर्य वह प्रक्रिया है जिससे दत्तक बच्चे अपने जैविक माता-पिता से स्थायी रूप से अलग होकर इस रिश्ते से जुड़े तमाम अधिकारों सहित दत्तक ग्रहणकर्त्ता माता-पिता की क़ानूनी संतान बन जाते है।

क्लॉज h  “सही संस्था” का अर्थ है ऐसी सरकारी या दर्ज गैर सरकारी संस्था या स्वयसेवी संगठन जो बच्चे की सारी जिम्मेदारी उठाने को तैयार है, और ऐसी संस्था जिसे सम्बन्धित प्राधिकरण द्वारा उपयुक्त माना गया है।

क्लॉज d – (iii)  में उप  क्लॉज (i)  के बाद निम्नलिखित उप क्लॉज को जोड़ा जायेगा अर्थात जो या तो सड़क पर रहने वाला या फिर कामकाजी बच्चा हो”

क्लॉज (1) (कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोर” का अर्थ है एक ऐसा किशोर जिस पर किसी अपराध का आरोप लगा हो)

क्लॉज h  में इन शब्दों “सम्बन्धित प्राधिकरण” की जगह सम्बन्धित प्राधिकरणों की सुझाव पर राज्य सरकार” में लिखा जायेगा।

क्लॉज m  “स्थानीय प्राधिकरण” का अर्थ ही ग्राम पंचायत, जिला परिषद या समिति या फिर छावनी बोर्ड या फिर ऐसी अन्य कोई ईकाई जिसे कानूनी तौर पर सरकार द्वारा स्थानीय प्राधिकरण के रूप में करने की जिम्मेदारी दी गई है।

क्लॉज 1 की जगह निम्नलिखित क्लॉज  लिखा जायेगा: (1)”

 

कानून क उल्लंघन करनेवाले किशोर” का अर्थ है एक ऐसा किशोर जिस पर किसी अपराध का आरोप लगा हो और जिसने उस अपराध को करने की तिथि तक उम्र के अठारह वर्ष  पूरे न किये हो 5 क्लॉज m  को हटा दिया जायेगा।

 

नून क उल्लंघन करनेवाले किशोर” का अर्थ है एक ऐसा किशोर जिस पर किसी अपराध का आरोप लगा हो और जिसने उस अपराध को करने की तिथि तक उम्र के अठारह वर्ष पूरे न किये हो क्लॉज को हटा दिया जायेगा।

धारा 4 1 किसी बात से प्रभावित हुए बिना सरकार, (सरकारी राजपत्र में सूचना द्वारा, एक जिले या जिलों के समूह में जो कि सूचना में उद्धृत हैं,) एक या अधिक इस अधिनियम के द्वारा

धारा 4 का संशोधन-मुख्य कानून में धारा 4 की उपधारा (1) में, प्रयुक्त शब्दों, सरकारी राजपत्र में सूचना द्वारा, एक जिले या जिलों के समूह में जो कि सूचना में उद्धृत हैं की जगह “किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एंव सुरक्षा) संशोधन अधिनियम के लागू होने के एक वर्ष के भीतर सरकारी राजपत्र में सूचना द्वारा सभी जिलों में लाया जायेगा।”

धारा 4 1 जहाँ किसी जिले (अथवा जिलों के समूह) के लिए एक बोर्ड का गठन किया गया हो जो--

धारा 6 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 6 की उपधारा 1 में, प्रयुक्त शब्दों, अथवा जिलों के समूह को हटा दिया जायेगा।

 

जब किसी न्यायालय के समक्ष कैशोर्य का प्रश्न उठाया जायेगा या किसी न्यायालय की यह राय बने कि अपराध के वक्त आरोपी के किशोर था, न्यायालय जाँच करेगी तथा जरुरी सबूत (जिसमें एफिडेविट शामिल नहीं है) एकत्र करेगी ताकि उसकी अनुमानित उम्र तय करके यह निर्धारित किया जाए की वह किशोर या बच्चा है या नहीं: यदि किसी अदालत के समक्ष कैशोर्य पर कोई सवाल उठाया जाये तो उसे किसी भी समय माना जायेगा, और इस कानून में मौजूद मानदंडों के और इस लिहाज से  बने नियमों के अनुसार मामले के ख़त्म होने के बाद भी इन सवालों की सुलझाया जायेगा, यहाँ तक की किशोर अगर वयस्क हो चूका हो या यह मामला इस कानून के बनने के पहले क अहो तब भी।

 

यदि उपधारा 1  के अनुसार न्यायलय अपराध होने की तिथि में व्यक्ति की किशोर पाती है तो सही फैसले के लिए उस किशोर को बोर्ड के समक्ष भेज दिया जायेगा, और कोई सजा, यदि न्यायालय द्वारा की गई ही तो उसे प्रभावहीन माना जायेगा।

धारा 10

धारा 10 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 10 की उपधारा (1) की जगह निम्नलिखित उपधारा होगी:

1        जैसे ही कनून  का उल्लंघन करने वाली किसी किशोर को हिरासत लिया जाये, उसे विशेष किशोर पुलिस इकाई या मनोनित पुलिस अधिकारी के सुपुर्द किया जायेगा जो मामले को तत्काल बोर्ड की किस सदस्य के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

जैसे ही कनून  का उल्लंघन करने वाली किसी किशोर को हिरासत लिया जाये, उसे विशेष किशोर पुलिस इकाई या मनोनित  पुलिस अधिकारी के सुपुर्द किया जायेगा जो गिरफ्तारी के स्थल से यातायात के लिए जरुरी समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर उसे बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करेंगे” किसी भी मामले में कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोर की पुलिस लॉक अप या जेल में नहीं में नहीं रखा जायेगा।”

धारा 12

धारा 12 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 12 की उपधारा 1 में, “सुनिश्चितता के साथ या बगैर के बाद या किसी निगरानी अधिकारी की देखभाल में या किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति की देखभाल में डाला जायेगा।

धारा 14

धारा 14 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 14 को पुन:क्रमांकित करके  उपधारा 1 किया जायेया तथा उपधारा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अथवा मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट हर छः महीने में बोर्ड के रुके हुए मामलों पर पुनर्दृष्टि  डालेंगें और बोर्ड के बैठकों की बारंबारता बढ़ाने या अतिरिक्त बोर्ड के गठन का आदेश देंगे।

धारा 15 उपधारा 1 क्लॉज g  (किशोर को  अठारह वर्ष पूरे होने तक विशेष गृह में रखने का आदेश देना यदि किशोर 17 वर्ष पूरे कर चूका है पर अठारह वर्ष का नहीं है तो उसे विशेष गृह में कम से कम 2 वर्ष रखा जाना है।)

धारा 15 का संशोधन-मुख्य अधिनियम  की  धारा 15 की उपधारा 1 के क्लॉज g  के स्थान पर निम्नलिखित क्लॉज  डाला जाएगा: g किशोर को विशेष गृह में तीन वर्षों के लिए भेजे जाने का निर्देश देना। बोर्ड इस अवधि को कम कर सकता है यदि उसे लगे कि अपराध की प्रकृति व मामले की परिस्थितियों के हिसाब से या सही है, और इनके कारणों को दर्ज भी करे।

धारा 16

धारा 16 का संशोधन-मुख्य अधिनियम  की  धारा 16

किसी भी किशोर को मृत्युदंड (या आजीवन कारावास) की सजा नहीं दी जाएगी या दंड न चुकाने या सुनिश्चितता न देने के कारण कारावास का दंड नहीं दिया जाएगा।

उपधारा 1 में शब्दों या आजीवन कारावास की जगह या कोई भी ऐसा कारावास का दंड जी जीवन भर के कारावास में परिवर्तित ही सके, डाला जायेगा।

परन्तु इस प्रकार आदिष्ट निरोध की कालावधि कारावास की उस अधिकतम कालवधि  से अधिक न होगी जिसके लिए वह किशोर उस किये गये अपराध के लिए दंडादिष्ट किया जा सकता था।

उपधारा 2 में, दिए क्लॉज की जगह निम्नलिखित क्लॉज डाला जायेगा: इस अनुच्छेद की धारा 15 के अनुसार, दी गई सजा की अवधि किसी भी हाल में उस अपराध के लिए दी जाने वाली अधितकम कारावास की अवधि से अधिक नहीं तो यह सुनिश्चित करना”

धारा 14

14 धारा 20 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 20 में, निम्नलिखित प्रावधान हैं, कि बोर्ड किसी भी उपयुक्त और विशेष कारणों से मामले पर पुनर्विचार कर सकता है और ऐसे किसी किशोर की हित में सही निर्णय दे सकता है।

व्याख्या- कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों से जुड़े सभी मामले जी रुके हुए हैं जिनमें  सुनवाई, पेशी, पुनर्विचार, अपील या कोई भी अन्य आपराधिक प्रक्रिया शामिल है, में, किसी भी न्यायालय में, सम्बन्धित किशोर की आयु निर्धारण धारा 2 की क्लॉज 1 के अनुसार होगा, यदि वह किशोर इस धारा के लागू होने के वक्त या पहले ही अपनी किशोर वय पार कर चूका हो तब भी और इस अधिनियम के प्रावधान सम्बन्धित अपराध के होने के समय इससे जुड़े तमाम मामलों में लागू होंगे।

15. धारा 21

इस अधिनियम के अंतर्गत चल रही किसी भी सुनवाई में शामिल किशोर पर प्रकाशन आदि पर निषेध या अधिनियम किसी भी कानून का उल्लंघन करनेवाले का नाम, पता, विद्यालय का नाम या उससे जुडी कोई भी बात जिससे उसकी पहचान हो सकती हो या उसकी तस्वीर किसी भी अखबार, पत्रिका, खबर-पत्र या दृश्य माध्यम से प्रकाशित करने या रिपोर्ट छापने का निषेध करता है। यदि पूछताछ करनेवाले प्राधिकरण को ऐसा लगता है कि

15. धारा 21 के विकल्प में नई धारा- मुख्य अधिनियम की धारा 21 की जगह  निम्नलिखित धारा लिखी जाएगी:

21 इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी चल रही सुनवाई में शामिल कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों तथा देखभाल एवं सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के नाम आदि के प्रकाशन पर रोक (5) किसी बी अखबार, पत्रिका, खबर-पत्र या दृश्य माध्यम से इस अधिनियम के अंतर्गत चल रही पूछताछ में शामिल कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोर या

धारा 14

14 धारा 20 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 20 में, निम्नलिखित प्रावधान हैं, कि बोर्ड किसी भी उपयुक्त और विशेष कारणों से मामले पर पुनर्विचार कर सकता है और ऐसे किसी किशोर की हित में सही निर्णय दे सकता है।

व्याख्या- कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों से जुड़े सभी मामले जी रुके हुए हैं जिनमें  सुनवाई, पेशी, पुनर्विचार, अपील या कोई भी अन्य आपराधिक प्रक्रिया शामिल है, में, किसी भी न्यायालय में, सम्बन्धित किशोर की आयु निर्धारण धारा 2 की क्लॉज (1) के अनुसार होगा, यदि वह किशोर इस धारा के लागू होने के वक्त या पहले ही अपनी किशोर वय पार कर चूका हो तब भी और इस अधिनियम के प्रावधान सम्बन्धित अपराध के होने के समय इससे जुड़े तमाम मामलों में लागू होंगे।

15. धारा 21

इस अधिनियम के अंतर्गत चल रही किसी भी सुनवाई में शामिल किशोर पर प्रकाशन आदि पर निषेध या अधिनियम किसी भी कानून का उल्लंघन करनेवाले का नाम, पता, विद्यालय का नाम या उससे जुडी कोई भी बात जिससे उसकी पहचान हो सकती हो या उसकी तस्वीर किसी भी अखबार, पत्रिका, खबर-पत्र या दृश्य माध्यम से प्रकाशित करने या रिपोर्ट छापने का निषेध करता है। यदि पूछताछ करनेवाले प्राधिकरण को ऐसा लगता है कि

15. धारा 21 के विकल्प में नई धारा- मुख्य अधिनियम की धारा 21 की जगह  निम्नलिखित धारा लिखी जाएगी:

21 इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी चल रही सुनवाई में शामिल कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोरों तथा देखभाल एवं सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के नाम आदि के प्रकाशन पर रोक (5) किसी बी अखबार, पत्रिका, खबर-पत्र या दृश्य माध्यम से इस अधिनियम के अंतर्गत चल रही पूछताछ में शामिल कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोर या

17 धारा 32

17 धारा 32 का संशोधन-मुख्य अधिनियम  की  धारा 32  में

a. उपधारा (1) क्लॉज (iv)  कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता या लोक भावना से प्रेरित नागरिक (राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत)

उपधारा (1) क्लॉज iv  में, शब्दों “राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत” हटा दिए जायेंगे। ii  निम्नलिखित प्रावधान इसके अंत  में जोड़ा जायेगा: “समय की बर्बादी किये बिना और यायातायात के लिए आवश्यक समय काटकर 24 घंटे के भीतर बच्चे को समिति के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रावधान”

  1. उपधारा (2) राज्य सरकार --- रिपोर्ट बनाने (में पुलिस को) एवं समिति को रुके हुए पूछताछ के लिए।

b उपधारा 2, में से निम्नलिखित शब्द पुलिस को एवं हटा जायेंगे।

धारा 33 a उपधारा (1) रिपोर्ट मिलने पर समिति (या कोई पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई या जिम्मेदार पुलिस अधिकारी) पूछताछ करेंगे—या बाल कल्याण अधिकारी।

धारा 33 का संशोधन-मुख्य कानून की  धारा 33, a  उपधारा 1 में से या कोई पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई या जिम्मेदार पुलिस अधिकारी” निकाल दिया जायेगा।

b उपधारा (3) पूछताछ खत्म होने के बाद, यदि समिति को लगता है, कि सम्बन्धित बच्चे का कोई परिवार नहीं ही, या मौजूदा सहारा नहीं है, तो समिति बच्चे को तब तक बाल गृह रहने के इजाजत दे सकती है, जब तक उसके लिए कोई उपयुक्त पुनर्वास नहीं मिलता या वह अठारह वर्ष का नहीं हो जाता।

b उपधारा 3, की जगह, निम्न उपधाराएं डाली जाएगी: (३) राज्य सरकार हर छः महीने में समिति के पास रुके हुए मामलों की संख्या पर पुर्नदृष्टि डालेगी और समिति को अपने बैठकों की बारंबारता बढ़ाने या अतिरिक्त बोर्ड के गठन का निर्देश देगी। 4 पूछताछ ख़त्म होने के बाद, यदि समिति को लगता ही कि सम्बन्धित बच्चे का कोई परिवार नहीं है, या उसे अभी भी सुरक्षा व देखभाल की जरूरत है, तो उसके लिए कोई उपयुक्त पुनर्वास नहीं मिलता या वह अठारह वर्ष का नहीं हो जाता।

धारा 34

धारा 34 का संशोधन –मुख्य अधिनियम की धारा 34, की उपधारा (2), के बाद निम्नलिखित  उपधारा जोड़ी जायेगी : 3 किसी भी मौजूदा कानून से प्रभावित हुए बिना, चाहे सरकारी हो या देखभाल एवं सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के लिए स्वयंसेवी संस्थाएं, सभी को किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं सुरक्षा) संशोधन अधिनियम, 2006, के अंतर्गत छः महीने के भीतर खुदको दर्ज करवाने के जरूरत है।”

धारा 39 व्याख्या इस धारा में बच्चे को वापस पहुँचाने का अर्थ है उसे निम्नलिखित लोगों तक पहुँचाना –

माता-पिता

दत्तक ग्रहणकर्त्ता माता-पिता

पालने वाले माता-पिता

 

धारा 39 का संशोधन –मुख्य अधिनियम की धारा 39 में, व्याख्या की जगह, निम्नलिखित डाली जायेगी: व्याख्या – इस धारा की वजहों के लिए बच्चे को वापस पहुँचाने व सुरक्षा का अर्थ है उसे निम्नलिखित लोगों तक पहुँचाना –

माता-पिता

दत्तक ग्रहणकर्त्ता माता-पिता

पालने वाले माता-पिता

अभिभावक

उचित व्यक्ति

उचित संस्था

धारा 41

धारा 41 का संशोधन –मुख्य अधिनियम की धारा 41 में. (i)  उपधारा (2) (३) एवं (4) की जगह निम्न उपधाराएं डाली जायेंगी ।

i उपधारा 2 दत्तक ग्रहण से दत्तक ग्रहण अनाथ, परित्यक्त, अवहेलित व पीड़ित बच्चों को संस्थागत तथा असंस्थागत तरीके से पुनर्वासित किया जायेगा।

(2) दत्तक ग्रहण से अनाथ, परित्यक्त या समर्पित बच्चों की मौजूदा उपकरणों से पुनर्वास किया जायेगा।

उपधारा 3 समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा दिए गये दत्तक ग्रहण से सम्बन्धित दिशा निर्देश में मौजूद प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बोर्ड के पास यह अधिकार होगा कि बच्चों को दत्तक ग्रहण में दे सके और इससे सम्बन्धित जरुरी जाँच कर सके।

  1. समय-समय पर राज्य सरकार या केंद्रीय अधिग्रहण संसाधन संस्था दिए गए व केंद्र सरकार द्वारा सूचित दत्तक ग्रहण से सम्बन्धित दिशानिर्देशों में मौजूदा प्रावधानों को ध्यान ग्रहण में दिया जा सकता है जब वह संतुष्ट हो की इससे सम्बन्धित जरुरी जाँच हो चुकी है।

उपधारा 4 सरकारी बाल गृहों और अनाथ बच्चों  की संस्थाओं को दत्तक ग्रहण की संस्था के दिशानिर्देशों के अनुसार इन बच्चों के दत्तक ग्रहण से जुडी पूछताछ व स्थान ढूंढना शामिल है।

4 राज्य सरकार उपधारा (3) में दिए गये दिशानिर्देशों के अनुसार हर राज्य में एक या अधिक सरकारी संस्थाओं या स्वयंसेवी संगठनों को अनाथ, परित्यक्त और समर्पित बच्चों के दत्तक ग्रहण के लिए विशेष संस्था के रूप में चिहिन्त करेंगी।

उपधारा 6 न्यायालय निम्नलिखित लोगों को बाल दत्तक ग्रहण की अनुमति दे सकती है-

ii उपधारा (6) न्यायालय  निम्नलिखित लोगों को बाल दत्तक ग्रहण की अनुमति दे सकती है:

d एकल अभिभावक, और

 

 

e किसी अभिभावक को इस बात की परवाह किये बिना कि उनकी कितनी जैविक संतानें  हैं

देखभाल और सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के लिए राज्य सरकार या स्वयंसेवी संगठनों द्वारा संचालित बाल गृह और संस्थाएं सुनिश्चित करें कि इनमें मौजूद अनाथ, परित्यक्त और समर्पित बच्चों को समिति द्वारा  दत्तक ग्रहण के लिए उपयुक्त घोषित किया जाये और उस जिले की दत्तक ग्रहण संस्था में उनका नाम प्रस्तावित किया जाए ताकि उन बच्चों को उपधारा 3 के अंतर्गत सूचित दिशानिर्देशों के अनुसार दत्तक ग्रहण में दिया जाए।

ii  उपधारा 6 न्यायालय निम्नलिखित उपधारा का प्रयोग किया जाएगाः

“6 न्यायालय निम्नलिखित लोगों को बाल दत्तक ग्रहण की अनुमति दे सकती है:

  1. किसी भी व्यक्ति को उसकी वैवाहिक स्थिति की परवाह किये बिना या
  2. किसी भी व्यक्ति को इस बात की परवाह किये बिना कि उसकी कितनी  जैविक संतानें हैं या
  3. सन्तानहीन दम्पति को

धारा 57 इस अधिनियम के तहत, पुरे भारत में बाल गृहों एक जैसी प्रकृति के किशोर गृहों के बीच स्थानातंरण (राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकरण, स्थानीय समिति या बोर्ड को सूचित करने के बाद राज्य के बाहर किसी गृह या संस्था में भेजने का आदेश दे सकते हैं)

धारा 57 की जगह नई धारा का प्रयोग- धारा 57 की जगह निम्नलिखित धारा डाली जायगी: 57 इस अधिनियम के तहत पुरे भारत में बाल गृहों व एक जैसी  प्रकृति के किशोर गृहों के बीच स्थानान्तरण। राज्य सरकार किसी किशोर विशेषगृह, बालगृह या सम्बन्धित संस्थाओं में भेजने का आदेश दे सकती है। सलाह लेने व स्थानीय समिति या बोर्ड को सूचना देने के बाद क्योंकि इस आदेश के प्रयोग में लाने की जिम्मेदारी उस स्थानीय प्राधिकरण को होगी जहाँ उस बच्चे या किशोर को भेजा जा रहा है।

धारा 59 का संशोधन

उपधारा 2 –उपयुक्त प्राधिकरण किसी बच्चे को निगरानी रखते हुए छुट्टी दे सकता है (अधिकतम 7 दिनों के लिए) जिसमें यातायात के लिए जरूरी समय शामिल नहीं, परीक्षा, पारिवारिक शादी, रिश्तेदार की मृत्यु, दुर्घटना, माता-पिता में से किसी की गंभीर बीमारी या अन्य आपातकालीन स्थितियों में।

धारा 59 का संशोधन- मुख्य अधिनियम की धारा 59 की, उपधारा (2), में प्रयुक्त शब्दों “अधिकतम 7 दिनों के लिए” की जगह “एक ऐसी अवधि जो आमतौर पर 7 दिनों से अधिक नहीं डाले जायेंगे।

 

धारा 62

नई धारा 62 A-  इस अधिनियम की धारा 62 के बाद निम्नलिखित धारा जोड़ी जाएगी।

 

धारा 62 A-  इस अधिनियम को लागू करने के लिए जिम्मेदार बाल सुरक्षा इकाई का गठन। हर राज्य सरकार को एक बाल सुरक्षा इकाई और जिले के लिए ऐसी इकाई का गठन करना है, जिसमें सरकार द्वारा अधिकारी एवं अन्य कर्मचारी नियुक्त किये जायेंगे, जो इस कानून के लागू होने को सुनिश्चित करने के नजरिये से सुरक्षा एवं देखभाल के जरूरतमंद बच्चों और कानून का उल्लंघन करने वाले किशोरों के मामलों को उठाएंगे, जिसमें गृहों की स्थापना व रखरखाव इन बच्चों से सम्बन्धित प्राधिकरणों को सूचनाएं व इनका पुनर्वास और विभिन्न सम्बन्धित सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं के साथ तालमेल बिठाना शामिल है।

धारा 64 किसी भी ऐसे इलाके में जहाँ यह कानून लागू किया गया है राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन या (निर्देशित कर सकती है) कि किसी किशोर इस कानून में।

धारा 64 का संशोधन- मुख्य अधिनियम की धारा 64 में, i  शब्दों “निर्देशित कर सकती है” की जगह निर्देशित करेगी” डाले जायेंगे” ii  निम्नलिखित वाक्य व व्याख्या भी जोड़ें जायेंगे: “यह प्रावधान है कि राज्य सरकार या मामले के अनुसार बोर्ड किसी भी पर्याप्त या विशेष कारणों जिन्हें लिखित रूप से दर्ज किया गया है हो के मद्देनजर किसी कानून का उल्लंघन करनेवाले किशोर की मामले पर पुनर्विचार  कर सकता है, और ऐसे किशोर के हित में सही निर्णय ले सकता है, यहाँ तक कि यदि वह इस कानून के लागू होने के वक्त या उससे पहले ही किशोर की उम्र पार कर चूका हो तब भी।

 

व्याख्या- ऐसे सभी मामलों में जहाँ कोई कानून का उल्लंघन करनेवाला किशोर किसी भी सजा के तहत जेल में हो, इस कानून के लागू होने के बाद उनका मामला जिसमें किशोर होने का मुद्दा शामिल है इस अधिनियम की धारा 2 क्लॉज 1  व इस कानून में मौजूदा अन्य प्रावधानों व नियमों के अनुसार निर्धारित किया जायेगा, बिना इस बात की परवाह किये कि वह किशोर उस तिथि से पहले ही अपनी किशोर की उम्र पार कर चूका है और उसे मामले  की जरूरत के अनुसार अपनी सजा जो कि इस कानून की धारा 15 में दी गई अधिकतम अवधि से ज्यादा नहीं होनी चाहिए के बाकी दिनों के लिए किसी विशेष गृह या सही संस्था में भेजा जायेगा।

धारा 68

धारा 68 का संशोधन- मुख्य अधिनियम की धारा 68 में,

 

a उपधारा 1 में निम्नलिखित प्रावधान जोड़ा जाएगाः यह प्रावधान है कि ऐसे किसी या सभी मामलों में जिन पर इस धारा के तहत राज्य सरकार नियम बना सकती है केंद्र  सरकार मानक नियम तैयार कर सकती है, और जब भी ऐसे किसी मामले से सम्बन्धित ऐसा कोई भी मानक नियम बनाया गया हो, वह नियम राज्यों में तब तक लागू रहेगा जबतक राज्य सरकार उस मामले से सम्बन्धित नियम न बना ले और ऐसे नियम को बनाते हुए जहाँ तक संभव हो उनका तालमेल मानक नियमों  से होना चाहिए।”

 

(b)उपधारा 2 – i क्लॉज X   में उपधारा 2 के बाद निम्नलिखित शब्द डाले जायेंगे” एवं उपधारा 3 के अंतर्गत संस्थाओं के पंजीकरण का तरीका” (ii) क्लॉज xii   के बाद निम्नलिखित क्लॉज xii-a डाला जाएगाः उपधारा (2) के अंतर्गत सूचनाओं के दिशानिर्देशों और धारा 41 की उपधारा 40 के अंतर्गत विशेष अधिग्रहण संस्थाओं के पहचान के तरीकों का पुनर्वास प्रक्रिया में उपयोग किया जाएगा।

 

c उपधारा 3 को उपधारा 4 के रूप में पुनःअंकित किया जाएगा व उपधारा 4 से पहले निम्नलिखित उपधारा को जोड़ा जाएगाः

 

3 इस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए हर नियम को संसद की दोनों सदनों के समक्ष उनके सत्र के दौरान कुल 30 दिनों में जो कि एक या अधिक लगातार सत्र के दौरान हो सकते हैं पेश किया जायेगा, और यदि, दोनों में सहमति कायम होती है कि इन नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए या इन नियमों को लागू नहीं किया जाना चाहिए, तो उनके बाद ये नियम मामले के अनुसार संशोधित रूप में लागू या लागू नहीं किये जाएँगे, हालांकि, ऐसा कोई भी संशोधन या रोक उस नियम के अंतर्गत पहले किये गये किसी कार्य की वैधता से प्रभावित नहीं होगा।

 

स्त्रोत: चाईल्डलाईन इंडिया फाउंडेशन



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