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केस अध्ययन: मुद्दे एवं हस्तक्षेप

केस अध्ययन: मुद्दे एवं हस्तक्षेप

जिम्मेदारियाँ

  • जागरूकता पैदा करना
  • बाल उत्पीड़न व दुरुपयोग के मामलों को लोगों तक पहुँचाना
  • संवेदनशील मुद्दों पर लोगों की राय बनाना यह भाग समस्या के परिप्रेक्ष्य के केस अध्ययनों व मुद्दों व हस्तक्षेपों  पर नजर डालता है।

पहले दो (1) बाल मजदूरी एवं (2) संस्था में बाल उत्पीड़न के मामले, क्या किया जाना चाहिए इसपर विस्तार व दिशानिर्देश देते है। इन केस अध्ययनों के आधार पर अन्य सुरक्षित समूहों के मामले निपटाते हुए ऐसे ही हस्तक्षेपों के ध्यान में रखा जा सकता है।

बाल देखरेख संस्थाओं में यौन उत्पीड़न

बाल देखरेख संस्थाओं में बच्चों के संस्थागत उत्पीड़न को बड़ी गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि यह माना जाता है, और ऐसा होना बिडम्बनापूर्ण और बहुत ही परेशान करने वाला है, यदि सुरक्षा के बजाए उन्हें उत्पीड़न झेलना पड़े।

रणजीत व असलम 10 व 12 वर्ष के लड़के है जो किसी बाल बच्चे के परमहित के लिए सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं की सहभागिता बहुत महत्वपूर्ण है। सहभागिता व सहप्रबंधन के विचार में कार्य का बंटवारा शामिल है, जब कि प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की है, पर गैर सरकारी संगठनों द्वारा सहयोग प्राप्त और प्रदान किया जा सकता है।

बच्चों के वे अधिकार जिनपर हमला हुआ है:

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन

अनुच्छेद 34-हर प्रकार के यौन शौषण एवं उत्पीड़न से सुरक्षा:

राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है हर प्रकार यौन शौषण एवं उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना। इस कार्य के लिए राज्य सरकारों को सभी सही राष्ट्रीय द्विआयामी और बहुआयामी  कदम उठाने होंगे ताकि निम्नलिखित चीजें रोकी जा सकें:

  • बच्चों को गैर क़ानूनी यौन कार्यों में शामिल करना या धमकाना
  • वेश्यावृत्ति या अन्य गैर क़ानूनी यौन कार्यों में बच्चों का शोषणात्मक प्रयोग
  • अश्लील प्रदर्शनों व सामग्रियों में बच्चों का शोषणात्मक प्रयोग

भारतीय संविधान

यह सुनिश्चित करना राज्य की प्रमुख जिम्मेदारी है की बच्चों के सभी जरूरतें पूरी हो और उनके बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा पूरी तरह से निम्नलिखित अनुच्छेदों के माध्यम से हो:

  • अनुच्छेद 39 का क्लॉज (3)
  • अनुच्छेद 45 एवं (e) और (f)
  • अनुच्छेद 47

हस्तक्षेप

बाल कल्याण समिति/किशोर न्याय बोर्ड द्वारा बाल देखरेख संस्थाओं में हिरासत में उत्पीड़न के मामलों की ली जाने वाली

प्रक्रिया:

यदि किसी आवासीय देखभाल की संस्था में उत्पीड़न की कोई घटना होती है तो या हिरासत में किसी बच्चे के शोषण का मामला है, और संज्ञेय अपराध है।

हिरासत में बलात्कार या यौन उत्पीड़न की घटनाओं में निम्नलिखित कदम उठाने है:

  • यदि कोई रहने वाला शिकायत करता है या ऐसी कोई घटना जिम्मेदारी अधिकारी के नजर में आती है तो बाल कल्याण समिति के समक्ष रिपोर्ट दर्ज की जाएगी जो विशेष जाँच के आदेश देगी।
  • बाल कल्याण समिति स्थानीय पुलिस थाने में दोषी व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 1860 (1860 का 45) के उपयुक्त प्रावधानों के अंतर्गत मामला दर्ज करने के आदेश देगी।
  • विशेष किशोर पुलिस इकाई इस मामले के पूरी जानकारी हासिल करेगी और जरुरी जाँच करेगी।

 

बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश करने की प्रक्रिया

यदि समिति चिकित्सकीय अधिकारी, निगरानी, अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्त्ता या जिम्मेदार अधिकारी के रिपोर्ट के आधार पर इस नतीजे पर पहुँचती है कि बच्चे का उत्पीड़न हुआ है तो वह सम्बन्धित व्यक्तियों को निश्चित तिथि पर अपने सामने पेश होने का समन जारी कर सकती है।

यदि समिति किसी जाँच के बाद किसी नतीजे पर पहुँचती है या उन्हें कुछ ऐसे तत्काल सबूत मिलते हों जिनसे या साबित हो कि बच्चे का शारीरिक या यौन शोषण हुआ है तो एवं बाल विकास विभाग को देंगे ताकि योग्य कदम उठाए जाए।

यदि उत्पीड़न हुआ है तो बच्चे को सदमा-काउंसलिंग के लिए भेजा जायेगा।

जिम्मेदार अधिकारी के कर्तव्य

सुपरीटेंडेंट निम्न बातों के लिए जिम्मेदार होंगे:

  • बच्चों का प्यार, लगाव, देखभाल, विकास एवं कल्याण से भरपूर घरेलू वातावरण मुहैया करवाना और नियम व कानूनों के अन्दर बच्चों या किशोरों के अधिकारों को हर संभव प्रकार से सुनिश्चित तथा सुरक्षित करना।

पुलिस की भूमिका

बच्चे/किशोर से जुड़े सभी मामलों में पुलिस भारतीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के दिशानिर्देशों का कठोरता से पालन करेगी।

पुलिस यह भी सुनिश्चित करेगी कि बाल अधिकारी कन्वेंशन के तमाम प्रावधानों का कठोरता से पालन हो रहा है और उठाये गए सभी कदम बच्चों के सर्वोपरि हित में है।

अन्य उठाये जाने वाले कदम

(अभ्यास के आधार पर सुझाए गये)

निम्नलिखित लोगों की लिखा जाना:

  • जिला महिला एवं बाल विकास दफ्तर या अन्य सम्बन्धित दफ्तर
  • महिला एवं बाल विकास विभाग या अन्य सम्बन्धित विभाग निदेशालय या आयोग
  • सचिव, महिला एंव बाल विकास विभाग या अन्य सम्बन्धित विभाग
  • नियंत्रण बोर्ड ( OCH Act 1960)
  • जाँच समितियां
  • राज्य सलाहकार बोर्ड (किशोर न्याय संशोधन अधिनियम 2006)
  • राज्य महिला आयोग (लड़कियों की संस्थाओं के मामले में)
  • मुख्य सचिव
  • राज्य मानवधिकार आयोग
  • उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त निगरानी समिति
  • राष्ट्रीय/राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग

मामले में शामिल स्वंयसेवी संस्था लोगों द्वारा स्थानीय फॉलो-अप:

  • जहाँ मामला दर्ज है, उस पुलिस थाने के साथ
  • बाल कल्याण समिति के साथ
  • संस्था व संस्था के बच्चों के साथ
  • जरूरत पड़ने पर स्थानीय समुदाय व सामुदायिक समूहों के साथ दबाव बनाने के लिए
  • स्थानीय और इलाके के प्रेस व जरूरत पड़ने पर राज्यीय/राष्ट्रीय प्रेस के साथ
  • दूसरी संस्थाओं व जहाँ भी मौजूद हों QIC&AC  के सदस्य

दोषियों  पर लागू होने वाली अनुच्छेद/धाराएँ

धारा 23, किशोर न्याय अधिनियम 2000: बच्चे/किशोर पर क्रूरता की सजा

जो भी व्यक्ति किशोर या बच्चे का नियंत्रक या जिम्मेदारी में है यदि उसके द्वारा हमला, उसका त्याग, उसे खतरों के सामने या फिर जानबूझ कर अवहेलित करता है है। उसे हमले, छोड़े जाने खतरों के सामने करने या अवहेलना के लिए कुछ ऐसे तैयार करता है जिससे उस किशोर या बच्चे को गैर जरुरी ढंग से मानसिक या शारीरिक तकलीफ झेलनी पड़ती है तो व व्यक्ति ऐसे कैदी की सजा का हकदार है जिसकी अवधि 6 महीने या दंड या दोनों हो सकती है।

धारा 27, किशोर न्याय अधिनियम 2000: विशेष अपराध

धारा 23, 24, 25, व 26 के अंतर्गत सजा के योग्य अपराध संज्ञेय है

धारा 28.  किशोर न्याय अधिनियम 2000: वैकल्पिक सजा

जहाँ किसी क्रिया या हटाए जाने में कोई ऐसा अपराध हो जो इस अधिनियम या किसी और केन्द्रीय या राज्य अधिनियम के अतर्गत सजा के योग्य है तो दोषी पाए जाने पर किसी भी अन्य कानून के बजाए उस व्यक्ति की उस कानून के अंतर्गत सजा मिलेगी जिसकी अवधि ज्यादा होगी।

ध्यान के रखे जाने वाले महत्वपूर्ण बिंदु:

  • मामले के अनुसार बलात्कार या छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज की गई है।
  • सारी प्रक्रियाएं व्यवस्थित ढंग से पूरी की गई है।
  • आरोपी जमानत पर रिहा नहीं हुआ है।
  • उत्पीड़ित बच्चे के मुद्दे पर चर्चा और बातचीत हुई है।
  • संस्था के कर्मचारियों को प्रक्रिया में शामिल किया गया है।
  • संस्था के प्रबंधन से सवाल जबाव हुए हैं व संस्था का लाइसेंस जाँच के अनुसार ख़ारिज किया गया है।
  • लड़कियों की संस्था में कोई पुरुष सुपरिटेन्डेन्ट नहीं है।
  • संस्था पर स्थानीय दबाव बनाये गए है।
  • उत्पीड़ित बच्चे की पहचान नहीं खोली गई है।
  • एवं सारे कदम बच्चे के सर्वोपरि हित में उठाये गए हैं।
  • उत्पीड़न के हर मामले को वकालत के लिए प्रयोग करें, मामले व संस्था से जुडी हर संभव बात का दस्तावेजीकरण करें सम्बन्धित आधिकारियों से पत्राचार करें व सभी का रिकोर्ड रखें विस्तृत केस फाइल बनाएँ पर मामले की सनसनी न बनाएं।

बाल मजदूरी

बाल मजदूरी की कार्यकारी परिभाषा है, “हर वह बच्चा जो 14 वर्ष से कम आयु का है और स्कूल नहीं जाता एक संभावित बाल मजदूर है” बच्चे गंभीर व खतरनाक और अपनी वृद्धि के लिए नुकसानदेह परिस्थितियों में काम करते हैं। हमारे लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हर 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे को उत्पीड़क/शोषक परिस्थितियों से बाहर निकाला जाए और सही ढंग से पुनर्वासित करके शैक्षणिक व्यवस्था के भीतर लाया जाये।

बाल कल्याण समिति का हस्तक्षेप

  • जब बच्चों को “बाल मजदूरी” की परिस्थितियों से बचाया जाता है तो से सम्बन्धित पुलिस थाने द्वारा करीबी राज्य सरकार के बाल गृह में सुरक्षित हिरासत के लिए लाया जाता है।
  • बच्चों को बचाव अभियान के बाद बाल कल्याण समिति की पहली बैठक में समिति के समक्ष पेश किया जाता है और बाल गृह में दाखिल किया जाता है।
  • जब दाखिल बच्चे ‘स्वागत इकाई’ के इकाई के कार्य के रूप में सुपरिटेन्डेन्ट व निगरानी अधिकारी से मिलते हैं, तो उन्हें संस्था में रहने से सम्बन्धित दिशानिर्देश दिए जाते हैं, यह दाखिले के वक्त बाल सुलभ समझ का एक बहुत बड़ा पहलू है।
  • बाल कल्याण समिति बच्चे से मिलती है और उसका इतिहास, पारिवारिक पृष्ठभूमि, व परिस्थितियों को, जिनके कारण वह काम करने लगा, काम की परस्थितियाँ व मालिक के व्यवहार के बारे में सुनती है। बच्चे को आरामदेह व भरोसेमंद परिस्थितियों में लाने के लिए बहुत भावनात्मक सहयोग व संवेदना देने को जरूरत है।
  • बाल कल्याण समिति जानकारियों को स्वीकृति देती है और पुलिस विभाग, सामाजिक बाल कल्याण कार्यकर्ताओं या निगरानी अधिकारी को सही कदम उठाने का निर्देश देती है।
  • एक सम्पूर्ण चिकित्सकीय जाँच व उम्र की जाँच करना तत्काल आवश्यक है।
  • निगरानी अधिकारी व्यक्तिगत व सामूहिक काउंसलिंग के साथ अपनी अलग जाँच करता है। बच्चे के परिवार को पत्र भेजता है और अपनी जाँच की रिपोर्ट बाल कल्याण समिति को भेजता है।
  • बाल कल्याण समिति बच्चों के लिए वांछनीय तौर पर हर हफ्ते या दो हफ्तों  में सुनवाई रखता है और हर मीटिंग की कार्यवाहियों पर स्वीकृति रखता है।
  • जब सभी जाँच व प्रक्रियाएं समाप्त हो जाती हैं तो बच्चों के आगामी पुनर्वास की योजनाओं  पर बाल कल्याण समिति द्वारा अंतिम फैसला पारित किया जाता है।

 

बच्चों के लिए पुनर्वास योजना में निम्न शामिल है:

  • बाल मजदूरी पर काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों द्वारा रिपोर्ट बनाने, बच्चे से बातचीत व काउंसलिंग में मदद पहुँचाया जाना चाहिए। सिर्फ कुछ मामलों में ही बच्चे को ले जाने, आने और घरेलू राज्य में वापस पहुंचाने में पुलिस की मदद की जानी चाहिए।
  • विशेष किशोर पुलिस इकाई एवं सम्बन्धित पुलिस बच्चे को चिकित्सकीय जाँच करने में, ले जाने, आने व वापस पहुँचाने में मदद करेंगे। वे सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं की भारतीय दंड संहिता, बाल मजदूरी अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम व अन्य सम्बन्धित कानूनों की सही धाराएँ सही ढंग से कार्य करवाने वालों पर लागू हो रही है।
  • मजदूर विभाग/बाल मजदूरी आयोग इस प्रक्रिया की महत्वपूर्ण कड़ी हैं और वह राज्य स्तर पर बच्चे को मुआवजा दिलवाने को उपयुक्त होने वाले सभी दस्तावेज व रिपोर्ट तैयार करते हैं।
  • बाल कल्याण समिति/राज्य सरकार/गैर सरकारी संगठन के बीच कार्यतंत्र बनाना, जहाँ बच्चों को भेजा जा सकता है ताकि उन्हें शिक्षा व सही पुनर्वास मिल सके और फॉलोअप हो सके।

परित्यक्त बच्चा

यह एक परित्यक बच्चे का मामला है, जिसे उसके माता पिता/अभिभावकों ने मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक परिवेश जैसे अविवाहित मातृत्व, चरम दरिद्रता, परित्याग, अवांछित लड़की का जन्म या मानसिक शारीरिक बीमारी के कारण छोड़ दिया है।

हस्तक्षेप

  • 0-3 वर्ष के शिशु/बच्चे, बाल देखरेख संस्था में रखे जाते हैं जिनमें एक बाल गृह, एक पोषण देखरेख गृह या विशेषकृत दत्तक ग्रहण शामिल है।
  • बा.क.स. आदेश पारित करके, बच्चे की सुरक्षा के लिए उसे किसी भी मान्यता प्राप्त बाल संरक्षण संस्थान में रखवा सकती है।
  • प्रकिया के अनुसरण हेतु-दत्तक ग्रहण का अनुच्छेद देखें।
  • बच्चे के सर्वोपरि हित में बाल कल्याण समिति की जाँच 4 महीने की अवधि के भीतर ख़त्म हो जानी चाहिए।

व्यावसायिक यौन शोषण एवं बाल व्यापार

यह व्यावसायिक यौन शोषण एवं उत्पीड़न के लिए बच्चों के व्यापर का एक बहुत प्रचलित मामला है। सीमा पार व अन्तर्राजीय स्तर पर नवयुवतियों का व्यापार बाल समिति के सामने के बड़ा मुद्दा है क्योंकि ऐसे मामलों में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि बचाए गये बच्चे वापस उन्हीं परिस्थितियों में न पहुँच जाएं और उनका सही पुनर्वास हो सके।

हस्तक्षेप

कोई भी हस्तक्षेप असुरक्षित बच्चों के लिए काम कर ही तमाम सहयोगी व्यवस्थाओं का संयुक्त प्रयास होना चाहिए। रोकथाम, पुनर्वास एवं सशक्तिकरण की बहुआयामी समझ होनी चाहिए।

  • छापा, बचाव, राहत, पुनर्वास, समाज में वापस पंहुचाना व पुनर्स्थापन बचाए गए बच्चों से सम्बन्धित प्रक्रिया के चरण
  • गैर सरकारी संगठन की भूमिका: बचाए गए बच्चों से पूछताछ करने, काउंसलिंग व आवास मुहैया करवाने और दलालों, वेश्यालय मालिकों और व्यापारियों के ध्रुव को तोड़ने में कानूनी सहायता मुहैया करवाने में बाल कल्याण समिति में मदद करना। काम से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने में मदद करना ताकि लड़कियां स्वनिर्भर तथा जीविकोपार्जन को लिए सशक्त हों।
  • पुलिस की भूमिका भी बा.क.स. को वेश्यालय मालिकों को खिलाफ सही चार्जशीट दायर करवाने व पुनःव्यापर की रोकथाम पर नजर रखने में मदद करना है। मामले से सम्बन्धित सभी बातों का दस्तावेजीकरण करें, सम्बन्धित अधिकारियों से पत्राचार करें व सभी रिकोर्ड रखें, विस्तृत केस फाइल बनाएं, मिडिया को जागरूक करने तथा मामले की वकालत के लिए खबर करें पर मुद्दे का सनसनीकरण न करें।

बाल कल्याण समिति के समक्ष चुनौतियाँ

  • सुनिश्चित करना कि बच्चे के बचाव के तुरंत बाद बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया गया हो और पुलिस थाने में ना रखा गया हो।
  • सुनिश्चित करना कि बचाए गए बच्चों को पुलिस थाने में वेश्यालय मालिकों के साथ रखा गया हो।
  • उम्र की जाँच तुरंत करना ताकि बच्चों को बाल संस्थाओं में जगह मिल सके और उन्हें आगे शोषण न झेलना पड़े।
  • दलालों/वेश्यालय मालिकों द्वारा व्यापार किये जा रहे बच्चों की उम्र धोखे से अधिक बताने पर काफी दबाव होता है जिससे उन्हें वयस्क बता सकें।
  • बड़े बचाव अभियान चलाये जाने से पहले पर्याप्त पूर्व तैयारी करना बहुत आवश्यक है ताकि बचाए गये बच्चों को रखने के लिए संस्थाओं में पर्याप्त सुविधाएँ मौजूद हों।
  • बाल कल्याण समिति को पूछताछ, गृह विजिट, वापस पहुँचाने की प्रक्रियाओं को तेज करना है, और कम में खत्म करने के दबाव में काम करना है, पर साथ ही पूछताछ की गहराई से कोई समझौता नहीं करना है।
  • बाल कल्याण समिति को माता-पिता, रिश्तेदारों और व्यापर में शामिल लोगों की ओर से तत्काल छोड़े जाने और वापस सौंपने के प्रत्यक्ष या परोक्ष दबावों को झेलना पड़ता है।
  • व्यापार के पीड़ितों की ओर एक संवेदनशील देखभाल और सहानुभूति पूर्ण रवैया होना चाहिए ताकि उनका और उत्पीड़न न हो।
  • सही रिकोर्ड रखना, दस्तावेजीकरण और आंकड़े रखना भी बाल कल्याण समिति के काम एक महत्वपूर्ण पहलू है क्योंकि इससे रोकथाम से जुड़े बड़े पहलुओं की समझने और श्रोत जिलों की पहचान में मदद मिलती है व्यवस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय तथा सहयोग।
  • व्यवहार के तौर तरीके स्थापित करने के स्तर पर लगभग एक जैसी समझ और एकरूपता हो।
  • व्यावसायिक यौन शोषण के लिए बच्चों के व्यापार को रोकना, उन्हें सुरक्षा व पुनर्वास मुहैया कराने के एकमात्र केन्द्रित लक्ष्य के लिए गैर सरकारी संगठनों व सरकार की साझेदारी।
  • नागरिक समाज में जागरूकता पैदा करने के लिए वकालत की रणनीति तैयार करना और यौन शोषण के लिए व्यापार के मुद्दे पर समुदाय आधारित पुनर्वास योजना बनाना।
  • विभिन्न इलाकों के बीच सीमा के व्यापर को रोकने के लिए द्विपक्षीय समझौते को संयोजित करना।
  • व्यावसायिक यौन शोषण के पीड़ितों के पुनर्वास सुरक्षा व रोकथाम में, “अधिकार आधारित नजरिया” रखना जरुरी है।

ध्यान में रखने योग्य एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इन मामलों में पूरा ओपरेशन गिरफ्तारी से लेकर सजा मिलने तक की उम्र की जाँच पुलिस द्वारा सबूत रिकोर्ड करना, व्यापारी की पहचान, सुनवाई, घरेलू देखभाल व वापस भेजना जैसे तमाम स्तरों पर अंततः पीड़ितों की सुरक्षा।

  • कानूनों और उत्पीड़न और शोषण के पीड़ितों के साथ व्यवहार में एक मानवीय तत्व जोड़ने की जरूरत है।
  • व्यावसायिक यौन शोषण एवं व्यापार के पीड़ितों तक एवं पारिवारिक सहयोग, सेवाओं की बेहतर पहुँच बनाना, काउंसलिंग व बाल उत्पीड़न/शोषण पर सामुदायिक सेवा के विकास के जरिये।
  • पर्यटन उद्योग को यौन पर्यटन एवं बच्चों के व्यावसायिक यौन शोषण के खिलाफ काम करने के लिए एकजुट करना।
  • व्यावसायिक यौन शोषण एवं व्यापार के बाल पीड़ितों पर सामाजिक दोषारोपण एक उन्मूलन एंव रोकथाम के लिए उपयुक्त कदम उठाना।
  • बच्चों की भागीदारी को प्रोत्साहन देना ताकि वे अपने पुनर्वास पर अपना कदम उठाना।
  • महिलाओं में आर्थिक आत्मनिर्भरता विकसित करने के लिए क्षमता निर्माण, हुनर का विकास तथा आय निर्माण से सम्बन्धित कार्यक्रम मुहैया करवाना
  • बाल अधिकार कन्वेंशन तथा बाल उत्पीड़न से जुड़े मुद्दों को शैक्षणिक संस्थानों व प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल करना।
  • व्यापार के खिलाफ लड़ाई में शामिल सम्बन्धित बचाव
  • सभी सम्बन्धित व्यवस्थाओं द्वारा की गई तमाम पूछताछ एक “बाल सुलभ” वातावरण में होनी चाहिए।

बच्चों का व्यापार : उठाये जाने वाले महत्वपूर्ण मुद्दे

  • बच्चों के व्यापार के कारक तत्वों को समझना और श्रोत पर ही उनकी रोकथाम करना।
  • मौजूदा कानूनों को प्रभावशाली ढंग से लागू करवाना
  • मौजूदा कानूनों पर पुनर्द्रिष्टि डालना ताकि पीड़ितों की “सुरक्षा सुनिश्चित हो सके न कि उनका और उत्पीड़न हो।
  • दोषियों की खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही हो न कि यौन शोषण के पीड़ितों पर।
  • बाल व्यापार में काम कर रहे समूहों को पनपने से रोकना और वेश्यालयों के मालिकों को दर्ज करना, दोष साबित करने और सजा दिलाने में मदद करेगा।
  • बच्चों के बयान, पुलिस की रिपोर्ट, बाल कल्याण समिति के सामने दर्ज सबूत, निगरानी अधिकारियों व सामाजिक कार्य कर्त्ताओं के रिपोर्ट, गृह विजिट रिपोर्ट सभी बाल कल्याण समिति की जिम्मेदारियों के बहुत महत्वपूर्ण पहलू हैं।
  • बाल कल्याण समिति को यहाँ सुनिश्चित करना है कि यह प्रक्रिया गहरी और विस्तृत हो, जो व्यापर करने लोगों को दोषी सिद्ध कर सके और सजा सुनिश्चित करने में मदद करें।
  • हर बच्चे के लिए एक बहुत योजनाबद्ध पुनर्वास प्रक्रिया तैयार करनी जरुरी है ताकि समाज की मुख्य धारा में जोड़ना और पुनःस्थापन हो सके और वे कभी समान स्थितियों में न लौटें।
  • गैर सरकारी संगठनों/कार्यतंत्रों द्वारा फॉलोअप का सही फैसला सुनाना बाल कल्याण समिति के सामने बड़ी चुनौती है।

सड़क पर रहने वाले बच्चे

सड़क पर रहने वाले बच्चों के मुद्दे बड़े महानगरों की परिघटना है। बच्चे गरीबी, उत्पीड़न, मजबूर करनेवाले परिवेश की वजह से घर छोड़ते है जो धकेलने वाले तत्वों का काम करते हैं और वे अक्सर शहरी जीवन के चकाचौंध की ओर आकर्षित होते हैं, जो खींचने वाले तत्वों का काम करते है। हमारे सामने चुनौती है, ऐसे बच्चों को उपयुक्त देखरेख व सुरक्षा मुहैया कराना।

हस्तक्षेप

  • किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत “आवासीय गृहों” के लिए एक प्रावधान है। इनके लिए विकल्प का बेहतरीन रूप हैं ऐसे गृह जो इन बच्चों को सुरक्षित स्थान मुहैया करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी आजादी दिन सके समय की आमदनी बहुत प्रिय है और वे सिर्फ रात को एक सुरक्षित गृह आवास की तरह चाहेंगे।
  • यह महत्वपूर्ण है कि अनौपचारिक कक्षाओं एंव राष्ट्रीय विद्यालय व्यवस्था या शिक्षा के अन्य तरीकों से कम से कम मुख्य शिक्षा के मौके मुहैया कराना और जुड़ा हुआ सम्पूर्ण जीवन शैली कार्यक्रम एवं काम से जुड़े प्रशिक्षण जो उन्हें भविष्य के लिए तैयार करेंगे, मुहैया कराना महत्वपूर्ण है।
  • बंद आवासीय संस्थानों के मुकाबले गैर सरकारी संगठनों द्वारा चलाये जाने वाले आवासीय गृह बेहतर विकल्प होते हैं, सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए, क्योंकि ये आजादी व सुरक्षा के बीच सही संतुलन स्थापित करते हैं।
  • किशोर न्याय अधिनियम के नियमों के अनुसार “आवासीय गृहों” की पहचान और चलाने के लिए कुछ नियम व पैमाने गये हैं और इसे मानना बच्चे के सर्वोपरिहित में हैं।

घरेलू काम करनेवाले बच्चे

“अदृश्य रहने वाले”  घरेलू काम करनेवाले बच्चों की स्थिति सचमुच एक चिंता का विषय हैं क्योंकि अब तक असंगठित क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण बहुत कम, कानून का लागू होना और सुरक्षा प्राप्त होती थी। पर अक्तूबर 2006 में नई सरकारी नियमावली के अनुसार घरेलू काम करने वाले बच्चे अब बाल मजदूरी अधिनियम के अंतर्गत शामिल है।

घरेलू काम करनेवाले बच्चों की रोकथाम और सुरक्षा के किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण है।

हस्तक्षेप

  • जब पुलिस, गैर सरकारी संस्था, बाल समिति के सामने किसी बचाए गए बच्चे को ले आते हैं, तो बच्चे को एक सुरक्षित पर्यावरण में देखरेख के अंदर रखा जाता है।
  • बच्चे का विस्तृत बयान दर्ज करने की जरूरत है, ताकि पुलिस काम देने वालों के खिलाफ कार्यवाही कर सके।
  • घरेलू काम करनेवाले बच्चों के साथ काम करने वाली संस्था के सहयोग से काउंसलिंग एवं अन्य सहयोगी सेवाएं प्रदान करना बाल गृह की जिम्मेदारी है।
  • बच्चों की अपनी इच्छाओं को जानने के बाद उसकी भागीदारी के साथ उपयुक्त और वैकल्पिक पुनर्वास योजना तैयार करना जरूरी है।

सम्भावित विकल्प प्रमुखता के आधार पर

  • यदि बच्चे की इच्छा हो और परिवार उसकी देखभाल करने में सक्षम हो, तो उसे परिवार के पास वापस भेजना
  • 18 वर्ष की उम्र तक बालगृह संस्थान में रखना जहाँ वे काम व जीवन से जुड़े विशेष गुण सीख सकें।

परिवार में बच्चों का यौन उत्पीड़न

पारिवारिक पर्यावरण में व रिश्तेदारों के द्वारा यौन उत्पीड़न बहुत अधिक होने वाली घटना है लेकिन इसका पता लगा पाना मुश्किल है, क्योंकि बच्चे रिपोर्ट करने और उसके अंजाम से डरते है। बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ अपराध को दर्ज करवाना आगे होने वाले उत्पीड़न को रोकने के लिए आवश्यक है। बच्चों को सही और गलत “स्पर्श एवं व्यवहार” के बारे में अवगत कराना आवश्यक है ताकि वे स्वयं  को उत्पीड़न की स्थितियों से बचा सकें।

हस्तक्षेप

  • जब यौन उत्पीड़न भोगने वाले बच्चों को बा.क.स. के समक्ष पेश किया जाता है तो उन्हें संवेदनापूर्ण और विशेष व्यवहार की जरूरत ही ताकि वे अपनी भावनाओं के साथ अपने अनुभवों को व्यक्त कर सकें।
  • बच्चे के बयान को बा.क.स. के समक्ष पूरे विस्तर से दर्ज करने की जरूरत है ताकि जरूरत पड़ने पर इसे अदालत के सामने पेश किया जा सके।
  • बाल मार्गदर्शन काउंसलर और इन कार्यों में सक्षम सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के हस्तक्षेप  की जरूरत है, ताकि बच्चों को भावनात्मक सहारा मिल सके।
  • यदि बच्ची माँ बनने वाली है अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ है तो चिकित्सकीय सलाह व अभिवावक की सहमति से गर्भपात करवाया जा सकता है।
  • यदि गर्भधारण को काफी वक्त हो गया है तो उसे लड़कियों की संस्था में भेजा जाता है जहाँ उसकी काउंसलिंग हो सके और वह बच्चा पैदा करने तक रुक सके।
  • बा.क.स को किसी माने हुए अस्पताल व चिकित्सा केंद्र से चिकित्सकीय एवं स्त्री रोग सम्बन्धित परीक्षाओं के लिए आदेश जारी करने की जरूरत है एवं एन रिपोर्टों को अदालत को सुनवाई में पेश करने की जरूरत है। बलात्कारियों व यौन उत्पीड़न को दोषी साबित करने का दर हो कम है, क्योंकि उनके अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिलते।
  • बच्चे के पैदा होने पर अपराध साबित करने के लिए डी.एन.ए. परीक्षण किया जा सकता है और उचित क़ानूनी कदम उठाया जा सकता है।
  • सही काउंसलिंग  के बाद यदि लड़की या फैसला करती है तो बच्चे  को दत्तक के लिए दिया जा सकत है जिससे उसका उचित पुनर्वास हो सके।

वस्तु दुरुपयोग में शामिल बच्चे

वस्तु दुरुपयोग में शामिल बच्चे ड्रग  बेचने वाले वयस्कों से खतरे में होते हैं जो उन्हें विभिन्न तरह के नशे की लत का शिकार बना देते हैं। बच्चे ड्रग पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाते हैं क्योंकि यह उन्हें सदमें से भागने और दर्द, तनाव. भूख और अन्य भावनात्मक तनावों की ओर असंवेदनशील होने में मदद करते हैं। वे इतने निर्भर हो जाते हैं की इसे छोड़ नहीं पाते जब तक कि उनका विशेष पुनर्वास केन्द्रों में उनका इलाज न हो।

हस्तक्षेप

  • जब ऐसे बच्चों को बा. क. स. के सामने लाया जाता है, तब ध्यान देने वाला प्राथमिकता मुद्दा है, पुनर्वास केन्द्रों में उनकी नशामुक्ति करना ताकि उनका ठीक से इलाज हो सके।
  • पुलिस की जिम्मेदारी है की ड्रग बेचने वाले तथा उत्पीड़न करनेवाले चिन्हित हों ताकि बच्चे उनकी पहंचान करें जिससे उनकी गिरफ्तारी के लिए सही कदम उठाएं जाएँ ।
  • गैर सरकारी संगठन और सरकार द्वारा चलाये जा रहे रहे पुनर्वास केंद्र ऐसे  बच्चों के पुर्नवास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • इलाज के बाद उन्हें स्वयं रोजगार के लिए काम सम्बन्धी प्रशिक्षण और जीवन परिस्थितियों से निपटने के लिए जीवन शैली कार्यक्रम मुहैया करवाना।

प्राकृतिक व मानव/निर्मित आपदा से प्रभावित बच्चे

प्राकृतिक व मानव निर्मित आपदा से प्रभावित बच्चों के पुनर्वास में प्रमुख सिद्धांत है उन्हें अपने परिवार और प्राकृतिक वातावरण से बिना हटाए उनके अपने सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में पुनर्वासित किया जाये चूँकि वे पहले ही एक समदा झेल चुकें हैं उन्हें अनजान वातावरण में भेजकर और तकलीफ में ह्नीं डाला जाना चाहिए।

हस्तक्षेप

  • प्राकृतिक आपदा में अनाथ हुए बच्चों के ऐसे उपयुक्त बाल गृह संस्था जो आवास मुहैया करवा सके में भेजने के लिए बाल कल्याण समिति में पेश करना।
  • बा. क. स. गैर सरकारी संगठनों के सहभागिता में बच्चों के लिए दत्तक के जरिये स्थायी नियोजन या इच्छुक रिश्तेदारों के जरिये बच्चों की लम्बावधि घरनुमा देखभाल।
  • लम्बावधि स्न्स्थागतिकरण पुनर्वास का अंतिम तरीका होना चाहिए और सिर्फ तभी जब परिवार आधारित पुनर्वास सफल न हो।
  • परिवार, एकल माता-पिता, अभिभावकों को प्रयोजकीय सहायता मुहैया करवाना पुनर्वास सेवाओं का हिस्सा है।
  • सदमें के बाद मृत्यु नुकसान दुःख एवं धक्के से निपटने के लिए काउंसलिंग पुनर्वास का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।

एच.आई.वी./एड्स से पीड़ित व प्रभावित

एच.आई.वी./एड्स से पीड़ित व प्रभावित बच्चे अब सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के लिए गंभीर विषय बन चुका है। इस बीमारी के बारे में फैली अपूर्ण व गलत जानकारी बच्चों और उनके परिवारों पर दोषारोपण का कारण बनता है।

हस्तक्षेप

  • जब संस्थागतिकरण के लिए कोई भी बच्चा बा.क.स. के समक्ष लाया जाता है तो पहला प्रयास इस बात का होना चाहिए कि परिवार ऐसे बच्चों को पालने के लिए तैयार हों और यह समझाया जाना चाहिए कि देखरेख करने वाला पारिवारिक वातावरण बच्चों के विकास के लिए कितना महत्वपूर्ण है। अपनों लोगों द्वारा देखभाल इन बच्चों के लिए बेहतरीन विकल्प है।
  • गैर सरकारी संगठन जो गैरसंस्थागत सेवाएं प्रदान करते हैं बच्चों को वैकल्पिक सेवाओं जैसे प्रयोजन और घरनुमा देखरेख के जरिये बच्चों को संस्थाओं में दाखिल करने से रोकने में बा.क. स. की सहायता कर सकते हैं।
  • संस्थागतिकरण देखरेख और सुरक्षा के जरूरतमंद बच्चों के लिए अंतिम विकल्प होना चाहिए।

मानसिक रोग

बच्चे बेहद असुरक्षित होते हैं और इसलिए सदमा देने वाली घटनाओं और किसी भी प्रकार के  उत्पीड़न के गंभीर परिणाम झेलने है। गहरे सदमे या उत्पीड़क डरावने और भावनात्मक रूप से तकलीफदेह माहौल में बच्चों में अचानक मानसिक रोग पैदा होते हैं।

हस्तक्षेप

  • बा.क.स. के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, बाल गृहों में मानसिक रोग के मामलों से निपटना क्योंकि देखभाल, प्यार, सहारा देने वाले बाल देखरेख कार्याधिकारियों को ढूंढना बहुत कठिन है जो ऐसे बच्चों को धैर्य व संवेदनापूर्वक तरीके से संभाल सकें।
  • बा.क.स. को संस्था में मनोचिकित्सक के दौरे से या बच्चे को पुलिस के साथ अस्पताल भेजकर, बच्चे के नियमित इलाज को सुनिश्चित करना चाहिए।
  • बच्चों के मानसिक रोगों की जाँच एवं इलाज हेतु मनोचिकित्सकों, कांउसलर के दौरों की व्यवस्था की जा सकती है।
  • ऐसे बच्चों के उचित पुनर्वास के लिए गैर सरकारी संगठनों से सहायता ली जा सकती है।

कानून का उल्लंघन करनेवाले बच्चे

कानून का उल्लंघन करनेवाले बच्चे वे है, जिन्होंने छोटे अपराध जैसे डाका, चोरी, जेब कतरना, बिना टिकट यात्रा, रास्तों पर झुण्डों में लड़ाई या आंतकवादी गतिविधियाँ, हिंसक गतिविधियाँ, हत्या के प्रयास या कभी- कभी हत्या जैसे गंभीर अपराध किये हैं।

हस्तक्षेप

  • पुलिस कानून का उल्लंघन करनेवाले बच्चों को कि नया. बो. के समक्ष पेश करती है। बचे से मजिस्ट्रेट व दो सामाजिक कार्यकर्ताओं जो एक पीठ की तरह काम करते हैं की द्वारा ओर फिर निगरानी बाल कल्याण अधिकारी द्वारा पूछताछ की जाती है।
  • बच्चे को चेतावनी के साथ छोड़ा जा सकता है या फिर गंभीर अपराधों के लिए सुनवाई तक उन्हें निगरानी गृहों में रखा जा सकता है या माता-पिता के साथ अनुबंध पर दस्तखत के बाद जमानत पर छोड़ा जा सकता है।
  • सुनवाई खत्म होने के कैद न्यायाधीश को ऐसा लगता है कि कि बच्चे को आवासीय देखरेख की आवश्यकता है तो वे उसे 18 वर्ष की उम्र तक विशेष गृह में भेज सकता है।
  • बच्चे को निगरानी के तहत सामुदायिक सेवा और नियमित काउंसलिंग व फॉलोअप के आदेश के साथ गृहों में रखा जा सकता है।

स्त्रोत: चाईल्डलाईन इंडिया फाउंडेशन



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