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भारत में बाल सुरक्षा: एक दृष्टि

परिचय

जरुरतमंद बच्चों की देखरेख बच्चे समाज के सबसे तबके में शामिल होते हैं, और राष्ट्र सबसे महत्वपूर्ण सम्पत्ति समझे जाते हैं। विशेष तौर पर वंचित बच्चों के लिए बने सुरक्षा और विकास कार्यक्रमों को सभी बच्चों के लिए एक समान अवसर सुनिश्चित करना चाहिए ताकि उनका सर्वोकृष्ट व्यक्तिगत विकास हो सके। एक परिवार की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियाँ अक्सर पारिवारिक कुंठा विखराव और बच्चों के बेसहरापन का घोत्तक होती है। विशेष कार्यक्रमों को संकट में फंसे परिवारों की जरूरत के लिए विकसित किया गया है। असुरक्षित बच्चों के कल्याण को बढ़ावा देकर, उनकी उपेक्षा, शोषण एवं दुरुपयोग से बचाव करके तथा वंचित बच्चों को देखरेख एवं आश्रय प्रदान करके ये विशिष्ट सेवाएं अभिभावकीय देखरेख और निरीक्षण की पूरक या अतिरिक्त विकल्प होती है।

गंभीर चिंता के विषय

दुनिया का हर पांचवा बच्चा भारत में रहता है
दुनिया का हर तीसरा कुपोषित  ब्च्चा भारत में रहता है
हर दूसरा भारतीय बच्चा कम वजन का है।
भारत में हर चार बच्चों में से तीन में खून की कमी (रक्त अल्पता) होती है
हर दूसरे नवजात शिशु में आयोडीन की कमी के कारण उनके सीखने की क्षमता का ह्रास होता है।
0 से 6 वर्ष में, स्त्री-पुरुष के अनुपात में सर्वाधिक गिरावट है: 1000 पुरुषों पर 927 महिलाएं
जन्म का पंजीकरण सिर्फ 62% है।
प्राथमिक स्तर पर शिक्षा जारी रखने का प्रतिशत 71.1% है।
प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के दाखिल का प्रतिशत 47.79% है।
देश में 1104 लाख बाल मजदूर है।
शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जन्म पर
बाल मृत्यु दर भी इतनी ही ज्यादा है, प्रति 1,00,000 जन्म पर 301 मृत्यु
46 बच्चे निम्न दर के साथ पैदा होते हैं।
3 वर्ष से कम उम्र के 79% बच्चों में खून की कमी होती है। टीकाकरण का पहुँच बहुत कम है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देखने पर ये लगता है कि बाल सुरक्षा का अभ्यास एक अर्थपूर्ण बदलाव से गुजरा है। बच्चे के आधारभूत अधिकारों में से एक अधिकार परिवार का अधिकार है, के प्रति पुरजोर यकीन के कारण अब संस्थागत देखरेख के परम्परागत तरीकों में बदलाव आ रहा है। एक बच्चे के लिए परिवार का अधिकार की बात को मानते हुए उनके लिए हो रहे तमाम कार्यवाहियों में अवश्य ये कोशिश और सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चों की शारीरिक, सामाजिक, भावनात्मक और शैक्षणिक आवश्यकताएँ एक सुरक्षित और पोषक माहौल में ही पूरी हो। सामाजिक कार्य की पहलकदमियों में प्रधान है, परिवार को मजबूत करना, पारिवारिक बिखरावों व बाल परित्याग पर अकुंश लगाना।
पारम्परिक तौर पर भारत में एक अनाथ बच्चे की देखभाल संयुक्त या विस्तृत परिवारों में होती थी। पर ये व्यवस्थाएं धीरे-धीरे बिखरने लगी और बच्चों के बेसहारापन में इजाफा होता रहा, जबकि संस्थागत देखभाल कुछ विकल्पों में से एक रही है, तब भी सबसे अच्छी संस्था भी उस व्यक्तिगत देखभाल का विकल्प नहीं हो सकती है जिसे एक परिवार ही प्रदान कर सकता है।
लम्बी अवधि तक बच्चों को संस्थागत देखरेख में रखने के पारम्परिक रवैये का परिणाम हुआ कि बच्चे पारिवारिक माहौल से अलग हो गए। संस्थागत देखरेख की बहुलता संकट की स्थितियों में फंसे परिवारों को अपने बच्चे की देखरेख के लिए संस्थागकरण  को एक विकल्प की तरह देखने का खर्च उसमें मिल रही सुविधाओं से बहुत ज्यादा है और यहाँ तक कि सबसे अच्छी संस्थाएं भी परिवार में मिल रही देखरेख की जगह नहीं ले सकती। इसलिए यह बेहतर होगा कि गैर-संस्थागत परिवार आधारित सामुदायिक सेवाओं के द्वारा संकट में फंसे परिवारों की मदद हो सके ताकि बच्चे अपने परिवारों के भीतर पल बढ़ सकें।

बाल सुरक्षा एक अधिकार आधारित सोच

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन एवं बाल सुरक्षा
बाल अधिकार कन्वेंशन ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे बाल अधिकार आन्दोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयोग द्वारा बाल अधिकार कान्वेंशन का मसौदा तैयार किया गया, जिसे संयुक्त राष्ट्र आम सभा द्वारा 20 नवम्बर 1989 को अंगीकृत किया गया और 12 दिसम्बर 1992 को भारत द्वारा अनुसमर्थित किया गया। इस समग्र दस्तावेज़ में बच्चों की सुरक्षा और बेहतरी के लिए वैश्विक , वैधानिक मानदंडों का एक समुच्चय है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन सरकारों के द्वारा इस पर अधिकारिक स्वीकृति से मजबूती ग्रहण करता है। जिसका अर्थ है कि सरकार इसके सिद्धांतों को मानती है और बच्चों के लिए निश्चित मानकों के प्रति समर्पित है। यह इस सिद्धांत से निर्देशित होता है कि संसाधनों के आबंटन में बच्चों की सबसे जरुरी आवश्यकताओं को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाये। बाल अधिकार कन्वेंशन बच्चों को उनके बुनियादी अधिकार मसलन: नागरिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनितिक अधिकार देती है, जो बच्चो को पूर्ण क्षमताओं को विकसित करने योग्य बनाती है।
सभी राष्ट्रों को जिन्होंने इस कन्वेंशन को अनुसमर्थन दिया है, को अपने राष्ट्र में एक प्रणाली विकसित करनी पड़ेगी, जो बच्चों के अधिकारों का पहरेदार होगा और इन बच्चों को स्थिति पर नजर रखता है।
यह विचार की बच्चों के पास अधिकार है, उनके पने अधिकार जो परिवार के स्वरुप से भी महत्वपूर्ण है, एक ऐसी संकल्पना है जिसे वैश्विक तौर पर स्वीकार किये जाने की आवश्यकता है।
समाज की बच्चों के प्रति एक विशेष जिम्मेदारी होती है, जिनकी असुरक्षा और निर्भरता माता-पिता, वयस्कों व पूरे समाज के लिए यह आवश्यक कर दाता है कि वे कानून एवं अमल में लाने की विशेष सहयोग दें परिवार, विद्यालय व समुदाय में बाल अधिकार सुरक्षित करने हेतु सूक्ष्म से स्थूल स्तर तक सर्वंगीण प्रयास करने की जरूरत है। बाल अधिकार कन्वेंशन का प्रमुख सिद्धांत है बच्चे का सर्वोत्तम हित, जो बच्चों से जुडी सभी क्रियाओं में अपनाई जाने वाली सोच की प्रक्रिया सुझाता है, कन्वेंशन ऐसा कोई अनुच्छेद एवं अधिकार नहीं है, जिससे यह सिद्धांत न जुड़ता हो। अधिकार समझ मुख्यतः सामाजिक न्याय, गैर-भेदभाव व समता के मुद्दों से सम्बन्धित है। विकाशील देशों के लिए मुख्य चुनौती है बच्चों के अधिकारों की प्रभावशाली पूर्ति के लिए। आवश्यक मानव एवं वस्तुगत संसाधन जुटाना, बाल अधिकार कन्वेंशन यह मानता है कि कुछ बदलाव धीरे-धीरे ही होंगे, पर प्रक्रियाओं को शुरू करना आवश्यक है, खासतौर पर सुरक्षा, स्वास्थ्य देखरेख शिक्षा के अधिकारों से जुड़ें।
कम से कम एक परिभाषित न्यूनतम कर्तव्यों की पूर्ति करने और न्यूनतम संसाधनों से बच्चों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करने की हमारी कोशिश होनी चाहिए।
परिवार, विद्यालय एवं समुदाय में बाल अधिकार
अधिकार आधारित समझ सरकार व उसके संस्थानों की बच्चों के प्रति उनकी जिम्मेदारी व कर्तव्यों की कानूनी व नैतिक प्रतिबद्धता की स्वीकृति है। अतीत में बच्चों को अधिकार सम्पन्न नहीं माना जाता था- उन्हें वयस्कों की सम्पत्ति माना जाता था जिनके पास अधिकार होते थे।

परिवार

परिवार समाज की केंन्द्रीय इकाई है और यह बच्चों के विकास का सबसे बड़ा स्रोत है। यह बच्चों को पोषण, भावनात्मक बंधन और सामाजिकता प्रदान करता है। एक समृद्ध और पोषक पारिवारिक जीवन बच्चों की संभावनाओं और व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है पारिवारिक संरचना, बनावट, अभ्यास, अंतर्क्रियाएं, सम्बन्ध और वातावरण सभी बच्चों के विकास में योगदान देती है।
बाल अधिकार कन्वेंशन इस बात पर बल देता है कि बच्चे एक पारिवारिक माहौल में पले बढ़े हों और जहाँ तक संभव हो उनके अपने माता-पिता उनकी देखरेख करें। अगर परिस्थितयों के कारण यह संभव नहीं हो, तब सारे प्रयास एक अच्छे वैकल्पिक पारिवारिक देखरेख के लिए किये जाने चाहिए। लम्बी अवधि की की संस्थागत निगरानी को बिना परिवार के बच्चे की देखभाल का सबसे आखिरी उपाय समझा जाना चाहिए।
परिवार को एक इकाई की तरह मजूबत करने के लिए विभिन्न नीतियों को एकसूत्र में बांधने, परिवार में बच्चों के विकास और बच्चों के बेसहारापन पर रोकथाम लगाने की जरुरत है।
परिवारों में लोकतान्त्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने की जरूरत है, बिना लिंग और उम्र की परवाह किये हुए।
परिवार के भीतर संसाधनों का बराबर वितरण किये जाने की जरूरत है।
बच्चों के अधिकारों को परिवार के भीतर सुरक्षित करने की जरूरत है।
कमजोर और संकटों में फंसे परिवारों के लिए वैकल्पिक सुरक्षा की जरूरत है।

विद्यालय

संविधान और बाल अधिकार कन्वेंशन के प्रति प्रतिवद्धता पूरी करने के लिए राज्य को निम्नलिखित प्रयास करने होंगे।
सार्वभौमिक नामांकन, उसे बनाये रखना एवं न्यूनतम स्तर का अधिगम 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क आवश्यक सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाए।
शैक्षणिक व्यवस्था को लोगों के विकास और सशक्तिकरण की तरफ केन्द्रित होना चाहिए और समानता व सामाजिक न्याय की तरफ लक्षित होना चाहिए।
विद्यालय पद्धति, अनौपचारिक शिक्षापद्धति व राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय पद्धति को मजबूती प्रदान करना और इन्हें समुदाय के साथ जोड़ना होगा।
जमीनी सच्चाईयों और जीवन जीने की निपुणता से जुडी प्रासंगिक, अर्थपूर्ण एवं रुचिकर पाठ्यक्रम बनाना।
बालिकाओं और दूसरे असुरक्षित वर्ग पर विशेष बल।

समुदाय

बाल अधिकार कन्वेंशन बाल अधिकार सुरक्षा आन्दोलन को समुदाय में आगे रखने की जबर्दस्त योग्यता रखता है। यह बच्चों के साथ काम करने वाले समूहों को जो बाल अधिकार कन्वेंशन के देश के भीतर क्रियान्वयन प्रक्रिया की सामूहिक निगरानी करते है फैलाने, जागरूकता पैदा करने, प्रशिक्षण, दस्तावेजीकरण, प्रकाशन, लॉबी बनाने, नीतियों के विकास, संसाधनों को इकट्ठा करने और प्रक्रियाओं, निगरानी करने से किया जा सकता है। बच्चों को उनके अधिकारों को पूरा करने की मांग करने के लिए सशक्त करने में बच्चों के क्षेत्र में कार्य करनेवाले गैर सरकारी संगठनों की एक बड़ी भूमिका है।
जागरूकता:
निति निर्माताओं, नौकरशाहों, पुलिस, अभिभावकों, शिक्षकों और बड़े स्तर पर संदाय में मिडिया के द्वारा बाल अधिकार कन्वेंशन के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
वकालत:
नीतियों और कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए बाजार के नियमों का उपयोग करना और बाल अधिकार के लिए परिवार और समुदाय का सहयोग उत्पन्न करना।
सामाजिक गौलबंदी:
विकास कार्य को बनाये रखने के लिए सम्बन्धित क्षेत्रों को एक साथ लाने की प्रक्रिया की पहल करना।
नेटवर्किंग:
बच्चों के मुद्दों पर प्रक्रिया सामूहिक ढंग से कार्य के करने के लिए  सरकार और सरकारी संगठनों की बीच गठजोड़ और एकसूत्रीकरण करना।
लौबिंग:
सामजिक बदलावों और सुधारों की जानकारी देने के लिए राजनेताओं, नौकरशाहों और कानून निर्माताओं के साथ लाबींग करना।
नीतिगत विकास:
राष्ट्रीय और स्तर पर प्रक्रिया समीक्षा और सुधारों को प्रभावित करना।
अभियान चलाना:
विभिन्न माध्यमों के उपयोग से बाल अधिकार पर अभियान का आयोजन करना।
प्रशिक्षण” बाल कल्याण के क्षेत्र में कार्यशालाओं, सेमिनारों और उन्मुखीकरण के लिए कार्याधिकारियों को संवेदनशील बनाना।
दस्तावेजीकरण व अनुसन्धान:
लेख प्रकशित करना, बाल अधिकार कन्वेंशन के विषयवस्तु का प्रसार करना और बाल अधिकार के हनन की सूचना ।
निगरनी:
गैर सरकारी संगठनों को बाल अधिकार कन्वेंशन।

निष्कर्ष

जैसा कि बच्चों के लिए राष्ट्रीय नीतियों में कहा गया है कि बच्चे हमारे राष्ट्र की एक सर्वोपरि महत्वपूर्ण सम्पत्ति है, इसलिए यह सभी को जिम्मेदारी है कि
बच्चों की भागीदारी के अधिकारों का सम्मान करना।
विशेष रूप से असुरक्षित समूहों की रक्षा करना।
स्वास्थ्य और शैक्षिक संसाधनों तक समान और प्रभावी पंहुच को आसान बनाना।
सभी बच्चों की न्यूनतम देखभाल को जरूरत को पूरा करना।
बाल अधिकार कन्वेंशन की क्रियान्वयन रणनीति को विकसित करने के लिए एक व्यवस्थित समझ पैदा किये जाने की जरूरत है।
एक अधिकार उन्मुख स्थितिजन्य विशलेषण
एक समय विशेष के भीतर लक्ष्य और मानकों को निर्धारित करना।
योजनाओं, कार्यक्रमों, नीतियों के स्तर पर विकास और संसाधन इकट्ठा करना।
मशीनरी की निगरानी व प्रक्रिया तेज करना ताकि यह सुनिश्चित हो कि लक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं और बाल कल्याण से विकास, जरूरतों से अधिकार, और संस्थागत देखभाल से गैर-संस्थागत देखभाल के बदले हुए रूप संकटग्रस्त परिवारों और सुरक्षा और देखभाल की जरूरतमंद बच्चों के लिए हो रहे हस्तक्षेपों में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। परित्यक्त और बेसहारा बच्चों का संस्थागत देखभाल के द्वारा पुनर्वास ही अबतक का व्यवहार रहा है। भविष्य में बच्चों की आवासीय संस्थाओं की गुणवत्ता में सुधार प्रक्रिया पर जोर होना चाहिए। बच्चों की सहभागिता और साथ ही साथ समुदाय प्रधान और परिवार आधारित विकल्पों को विकसित किया जाना चाहिए। यह महत्वपूर्ण है कि संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन एक उद्देश्य की घोषणा से बाल अधिकार को सुनिश्चित करने के एक प्रभावी औजार में बदल गया है।

बाल सुरक्षा की समझ में परिवर्तन

पूर्व

वर्तमान

जरूरत आधारित  समझ

अधिकार आधारित  समझ

बाल कल्याण

बाल विकास

बच्चो के लिए संस्थागत एवं आवासीय

गैर-संस्थागत एवं परिवार आधारित वैकल्पिक कार्यक्रम

संस्थाओं में हिरासती देखरेख

संस्थाओं में उत्तम बाल देखरेख के जरिये सर्वंगीण विकास

समाज से अलगाव एवं पृथक्कीरण

समाज में शामिल करना एवं प्रभावित से जोड़ना

बच्चा सेवाओं का लाभ लेने वाला होता है

बच्चा अपने विकास एवं जीवन को प्रभावित करने वाले फैसलों में भागीदारी होता है

स्त्रोत: चाईल्डलाईन इंडिया फाउंडेशन

 

 



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