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बाल मजदूरी का फैलाव और सघनता

खेती

देहातों में काम करने वालों की कुल संख्या 93 प्रतिशत कही जाती है, उनमें से अधिकाश (42.7 प्रतिशत) खेतिहर श्रमिक हैं। उनमें निजी खेती करने वाले, पशु, चराने वाले या जंगलात के काम में लगे हाथ भी शामिल हैं जैसा ऊपर कहा गया है, इसमें लड़कों से ज्यादा संख्या लड़कियों की है।

खेतों में काम करने वाले बच्चों का विशलेषण करने पर ये बातें सामने आती हैं: 1950-51 में कुल खेतिहर श्रमिकों का 4.9 प्रतिशत बच्चों का था, वह 1971 तक बढ़कर 9.7 प्रतिशत हो गया। बागान क्षेत्र में तो 1968 और 1971 के बीच  केवल चार साल की अवधि में बाल श्रमिकों का प्रतिशत 68 तक बढ़ गया। (इसमें असम और बंगाल में सबसे अधिक बढ़ा है। )

इस प्रकार भारत में, कृषि क्षेत्र में 1951-71 के बीच बाल श्रमिकों की संख्यां में बढ़ोत्तरी देखने में आती है। कारखानों और संगठित उद्योगों के क्षेत्र की हालत इससे उल्टी है। हाँ उद्योगों के कई प्रकार हैं और उनके अनुसार वहाँ बाल मजदूरों की स्थिति भी अलग-अलग है। इस पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करें।

उद्योग

राष्ट्रीय श्रम आयोग (1969) के अनुसार यद्यपि स्वतन्त्रता के बाद बाल श्रमिकों की संख्या क्रमशः घटती गयी है और संगठित उद्योगों में लगभग ख़त्म ही हो गया है, फिर भी ‘असंगठित’ उद्योगों में, जैसे-छोटे बगान, होटल, रुई की धुनाई और सड़क निर्माण आदि में बाल श्रमिक अब भी काफी संख्या में है। ( भारत में बाल श्रम पर राष्ट्रीय श्रम आयोग (1969) की रिपोर्ट, 1979 (47) संक्षेप  में ये निष्कर्ष निकले गए है;-

  1. स्वतंत्रता के बाद श्रमिकों की संख्या काफी बढ़ी है।
  2. संगठित उद्योगों में इतनी घटी है कि लगभग नहीं ही है।
  3. तथाकथित “असंगठित क्षेत्र’ में अब भी बड़ी संख्या है।

संगठित क्षेत्र

यहाँ उन्हीं संस्थानों को हम लेंगे जो 1948 के फैक्टरी एक्ट के अंतर्गत आते है: (अ) जो बिजली का उपयोग करते हैं और 10 या अधिक लोगों को काम देते हैं, तथा (आ) जो बिजली का उपयोग करते और 20 या अधिक लोगों को काम देते हैं। उनमें  बाल श्रम की आय की स्थिति इस प्रकार है:

1950 में इस क्षेत्र में कुल श्रमिकों का 0.31 प्रतिशत बच्चों का था, वह 1969 तक घटकर 0.04 रह गया  इसके आधार पर ही श्रम आयोग ने उपर्युक्त बात कही थी। फिर भी, उसके बाद स्थिति कुछ उलट गयी, वह प्रतिशत 1972 तक बढ़कर 0.14 हो गया (कुलश्रेष्ठ 1978:95, ग्राफ-1) उद्योगवार विभाजन करने पर विचित्र चित्र सामने आता है 193 में बच्चों को काम पर लगाने वाले उद्योगों की संख्या 18 थी, जो 1972 तक घटकर-11 रह गयी। ये उद्योग मुख्यतः अन्न, रसायन, धातु तथा अधातु वस्तुओं के उत्पादन तथा यंत्रोत्पादन के थे। चमड़ा उद्योग, सिले वस्त्र उद्योग, चर्मोद्योग आदि उद्योगों ने बाल श्रम को बिलकुल बंद कर दिया या न के बराबर घटा दिया। (कुलश्रेष्ठ 1978, 116-119) । इसका क्या कारण हो सकता  है? यहाँ इस छोटे निबंध में उसकी विस्तृत चर्चा करना संभव नहीं है। फिर भी इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि तथाकथित “असंगठित क्षेत्र” में नाना प्रकार के उद्योगों की छोटी-छोटी इकाइयां बहुत बन गयी इसलिए संगठित क्षेत्र में बच्चों से काम लेना ख़त्म हो गया और इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि उन लघु उत्पादन इकाईयों में बाल मजदूरों की संख्या बढ़ती चली गयी। पिछले तीन दशकों में असंगठित क्षेत्र में बहुत विस्तार हुआ लेकिन 1995 के बाद से उदारीकरण एवं भूमंडलीय की प्रक्रिया के चलते अनेक घरेलू इकाइयां जो असंगठित क्षेत्र में आती है बंद हो रही हैं।

ग्रामीण लड़कियाँ एवं मजदूरी

परिवार के भरण-पोषण वाली कई गतिविधियों में ग्रामीण लड़कियों की हिस्सेदारी होती है हालांकि इसे मजदूरी नहीं माना जाता है। शहरी या उपभोग वस्तुओं के उत्पादन की तरह इनका मूल्य नहीं चुकाया जाता है। उन्हें अक्सर भुला दिया जाता है। अतः बाल मजदूरी की परिभाषा के दयारे में रहकर अनेक अध्ययन लड़कियों के पारिवारिक कामों को बाल मजदूरी से अलग रखते हैं। फिर भी कई अर्थों में ऐसा विभाजन इन कामों के सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं को नजरअंदाज करता है। इसका एक कारण यह है कि आर्थिक सिद्धांतों में ऐसे कामों की कोई गिनती नहीं की जाती है हालंकि गरीब परिवारों की अर्थव्यवस्था की यह गतिविधियां  प्रभावित करती है। यह सामाजिक धारणा भी है कि ये सब कार्य बालिकाओं के स्वस्थ विकास में सहायक होते हैं। इसके विपरीत बाल-मजदूरी को बच्चे का शोषण एवं हानि करने वाली गतिविधि माना जाता है। कई मामलों में माँ –बाप स्वयं अपने बच्चों  को थका देने वाले कामों से दूर रखते है/एवं अक्सर गरीब बच्चे अपने काम की गतिविधियों के साथ-साथ अपनी पढ़ाई जारी रखने में कामयाब हो जाते हैं (बोधिव 19८२:17, विकेले एवं बोयडन 1988:२: फिफे 1989:3) इसके पीछे विरोध नहीं तो अर्थशास्त्र एवं राजनीति के विद्वानों  की चुप्पी भी शामिल है जो ऐसे कामों में टिपण्णी नहीं करते हैं जिन्हें शोषण से जोड़ा जाता है। (मौरिस 1981: 1३२)

लड़कियों के मामले में यह चुप्पी और भी रहस्यमयी होती है क्योंकि उनके द्वारा किये जाने वाले कार्यों को स्त्री-सुलभ कार्यों की श्रेणी में शामिल किया जाता है। ग्रामीण समुदायों में लड़कियों के कार्यों के अध्ययन अक्सर उनके काम की संरचना अथवा उनसे जुड़े मतलबों को नजरअंदाज करते हैं। ऐसे कार्यों का अर्थव्यवस्था से क्या सम्बन्ध है और वे शिक्षा और खेलकूद कैसे प्रभावित करते हैं। इस विषय में भी जानकारी बहुत कम है। यह आम धारणा है कि ऐसे कार्य बिना झंझट वाले हैं अतः उनके सिद्धांत भी सर्वमान्य है। यहाँ सर्वप्रथम में परिवार एवं ग्रामीण परिवेश में बच्चों द्वारा काम करने वाली भूमिका पर आधुनिक विचारों पर प्रभाव डालूँगा सामाजिक सोच के आधार पर बाल मजदूरी किसे कहा जाता है इस विषय पर चर्चा करते हुए मैं उस प्रक्रिया की ओर ध्यान दिलाना चाहूँगा जो किसी काम को ‘मजदूरी’ की श्रेणी में रखता है।

पिछले चार दशकों में बाल मजदूरी पर सामाजिक शोध एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं में बहस बढ़ी है। जहाँ इसके पूर्व में बहसों का दयारा भौतिकता पर आधारित होता हैं वहीं अब अन्य धारणाओं पर भी विचार किया जा रहा है। तीन विन्दुओं से इस समस्या पर विचार किया जा रहा है। क़ानूनी, जनसंख्या एवं बृहत अर्थव्यवस्था हलांकि अब इन तत्वों का महत्व घट गया है लेकिन संक्षिप्त में यह जानना आवश्यक है कि कैसे इन तत्वों ने सामाजिक अवधारणा को प्रभावित किया।

बाल मजदूरी में क़ानूनी दृष्टिकोण का विकास 19वीं सदी के प्रारंभ में यूरोप में विकसित हुआ। इसका मुख्य कारण वहाँ की फैक्ट्री में बच्चों द्वारा अत्यंत खतरनाक हालातों में काम करना था। जिसका वर्णन हेमन डेनियल डिफो एवं चार्ल्स डिकन्स के उपन्यासों में मिलता है। उस समय की कार्यनीति में मुख्य बिन्दु थे एक ओर बच्चों को फैक्ट्रियों/वर्कशाप में काम करने से रोकना एवं दूसरी ओर उन्हें स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करना। (फिफे 1989) लेकिन वहाँ भी कई तरह के कार्य जप बच्चो द्वारा किये जाते थे कानून की परिधि से बाहर रखे गए थे। इनमें वे गतिविधियाँ या कार्य शामिल हैं जो सदियों से बच्चों की स्वाभिक गतिविधियों का हिस्सा रही हैं मसलन घर की साफ-सफाई, छोटे बच्चे की देखभाल, घर की खेती में बिना मजदूरी लिए मदद करना यह घर की दुकान में काम आदि। बच्चों द्वारा इन कार्यों के किये जाने पर कोई नैतिक प्रश्न नहीं उठाए जाते हैं। बाल मजदूरी से इन्हें अलग दिखाने हेतु इन्हें सहायता, प्रशिक्षण या सामाजिकीकरण कहा जाता है। विक्टोरिया काल में इंगलैंड में गृह्सहायिका (आया) के काम को लड़कियों के लिए भावी जीवन की ट्रेनिंग माना जाता था। यह स्थिति आज भी तीसरी दुनिया के देशों और कमोवेश विकसित देशों में पाई जाती है। अमेरिका में कृषि क्षेत्र में कुल मजदूरों का 25 प्रतिशत बच्चे है और उनका कार्य कानून की सीमा में नहीं आता है। नीदरलैंड में 12 से 18 उम्र वाले 74 प्रतिशत बच्चे कृषि, दुकानों या घरेलू कामों में लिप्त रहते हैं। इनके पीछे यही धारणा प्रबल है कि ‘करने से सीखना’ बच्चे की सामाजिकीकरण प्रक्रिया का हिस्सा है।

कुल मिला कर औद्योगिक देशों में बच्चे को शोषण से बचाने से निति पर जोर दिया गया जबकि ऐसी कोई सोच औपनिवेशिक देशों के लिए नहीं थी।

द्वितीय हायुद्ध के बाद तीसरी दुनिया के देशों में जनसंख्या वृद्धि के दृष्टिकोण से बाल मजदूरों का अध्ययन किया जाने लगा। अर्थशास्त्रियों ने यह कहना प्रारंभ कर दिया ‘घर’ में कमाने वाला एक और उस पर निर्भर करने वाले अनेक अतः विकास अवरुद्ध हो रहा है। साठ एवं सत्तर के दशक में जनसंख्या विस्फोट जैसे नारों से अर्थशास्त्र की किताबें भरी पड़ी थी। यह भी कहा जा रहा था कि गरीब देशो में बच्चों की बहुतायत उनके शिक्षा एवं अन्य स्रोतों पर दबाव डाल रहे हैं।

अतः जनसंख्या नियन्त्रण के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये गए जिनमें परिवार नियोजन भी एक था। ऐसे कार्यक्रमों में कैसे भोले-भाले अनपढ़ ग्रामीणों को बेवकूफ बनाया गया, इसके किस्से जगजाहिर है। नब्बे के मध्य तक आते-आते जनसंख्या विस्फोट का सिद्धांत अपनी चमक खोने लगा। विश्व बैंक तक मानने लगा कि गरीब परिवारों में अधिक बच्चे उनकी आर्थिक आवश्यकता है। इसी सन्दर्भ में ममदानी का शोध अध्ययन महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने लड़के-लड़कियाँ द्वारा किये जाने वाले कार्यों की सूची बनाकर यह सिद्ध करने की कोशिश भी की है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवार क्यों आवश्यक है। इससे बाल  मजदूरी पर नये ढंग से शोध प्रारंभ हुए जिसमें प्रज्न्नता को लागत-लाभ दृष्टिकोण से जांचा जाने लगा। पांच साल की बच्ची भी कैसे खेत पर अपने छोटे-भाई बहिन को संभालते हुए पक्षी भगाने का काम करती है या पानी लाती है। यह दृश्य गाँवों में आम है। आठ साल की आयु में लड़की का योगदान औरत के बराबर पहुँच जाता है। लेकिन इन अध्ययनों में कुछ कमियां थी। प्रथम परिवार की परिकल्पना में झंझट था तो साथ ही परिवार की अर्थव्यवस्था को अत्यंत छोटे स्तर पर परखा जा रहा था। साथ ही इनमें व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णयों को सही ठहराया गया था हालाँकि समाज के लिए वे घातक सिद्ध हो रहे थे।

इन कारणों से ग्रामीण बच्चो की भूमिका पर पुनः विचार होने लगा। नये अध्ययनों में इन बच्चों के सामाजीकरण प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया गया। (चेलिस एवं हलीमान  1979, रिमबुड 1980, रोजर्स एवं स्टैंडिंग 1981 एवं बाईट 198२) बच्चों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष 1979 से 1989 में राष्ट्र संघ बाल अधिकार संधि पारित होने तक के बीच के काल में तीसरी दुनिया के देशों विशेषकर दक्षिणी एशियाई देशों में बच्चों की समस्या पर काफी प्रकाशन हुए। (इन लेखन में राव 197२, खांडेकर एवं नायक 1972 , डिसूजा 1979 . कुलकर्णी 1983. मेहता 1983, कोठारी 1983, खाटू 1983, गंगराडे एंव गाथिया 1983, जुयाल 1985, बुर्रा 1986, न्यूवाइहेन्स 1989 प्रमुख हैं)

लेकिन इनमें स्थिति पूरक सामग्री ज्यादा है एवं ‘बचपन’ की परिकल्पना का सामाजिक निर्माण करने की प्रकियाओं का विशलेषण कम है। अभी भी शोध अध्ययनों का केंद्र विन्दु बाल मजदूरी के एतिहासिक विशलेषण एवं सामाजिक ढांचे को उसके आथिक योगदान ही हैं। इसके पीछे सम्भवतः यह कारण छिपा है कि अभी भी नौकरशाही बाल मजदूरी को क़ानूनी समस्या ही मानकर चल रही है। इसी दृष्टिकोण के कारण तीसरी दुनिया के गरीब देशों में सरकारी आंकड़ों में तो बाल मजदूरों की संख्या कम दिखाई पड़ती है वहीँ वास्तव में कहीं अधिक संख्या में बच्चे अपने पारिवारिक धंधों में अपने माँ-बाप की मदद में लगे हुए हैं। भारत का ही उदाहरण लें। देशभर में 5-14 वर्ष की आयु समूह के लगभग 10 करोड़ ग्रामीण बच्चे अपने घर की आमदनी में किसी न किसी प्रकार योगदान करते हैं ताकि परिवार की गाड़ी आगे चल सके। लेकिन ग्रामीण इलाके के महज 5.9 प्रतिशत बच्चे ही सरकारी आंकड़ों में बाल मजदूरी माने जाते हैं। जैसा कि स्ट्रेडिंग ने अपने अध्ययन में बताया कि बाल मजदूरी  की समस्या को महज क़ानूनी दृष्टिकोण से देखने का ही  यह नतीजा है कि राष्ट्रीय उत्पाद में बच्चों के योगदान को नजरअंदाज किया जाता है।

मेर मानना है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देशों में बाल मजदूर की वर्तमान परिभाषा के आधार पर बच्चों के आर्थिक योगदान का सही मूल्यांकन नहीं हो रहा है। वर्तमान परिभाषा में अपरिपक्व मानव के अनपेक्षित गतिविधियों में धकेले जाने का अभ्यास होता है जबकि वास्तिवक जीवन में अलग-अलग समुदायों में अलग-अलग आयु समूह के बच्चों के अलग-अलग काम बंटे होते हैं। यहाँ तक की लिंग के आधार पर भी काम का बंटवारा किया जाता है। इसके अलावा समाजशास्त्रियों की माँ-बाप की परिकल्पना भी इसे प्रभावित करती है। उदारहण के लिए एक भारतीय अर्थशास्त्री के लेख का शीर्षक देखिये बाल मजदूरी क्या माता-पिता इसे आर्थिक योगधन मानते है? (दांडेकर 1979) दांडेकर जैसे अर्थशास्त्री भी इस धारणा में विश्वास रखते थे कि बच्चो के काम आर्थिक योगदान नहीं हैं।

कुछ विद्वानों के अध्ययन से झलकती दुविधा को दूर करने हेतु यह आवश्यक है कि हम कुछ मूल प्रश्नों पर मनन करे। बच्चो के द्वारा किये जाने वाले कार्यों को तीन श्रेणियों में रखा जा सकता है।

  1. वे गतिविधियों हो भौतिक एवं सामाजिक वातावरण से संसाधन प्राप्त हैं।
  2. गतिविधियों जो ‘बिना मजदूरी’ के की जाती हैं या जो उपरोक्त संसाधनों को तैयार करने या उसके वितरण से जुडी हैं।
  3. गतिविधियों जो मानव देखभाल से जुडी है।

इनमें  से कई  गतिविधियाँ हालाँकि उत्पादन से जुडी होती हैं लेकिन उन्हें मान्य आर्थिक गतिविधि नहीं माना जाता है। विशेषकर अंतिम दो श्रेणियों वाली गतिविधियों को। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ये गतिविधियाँ सीधे-सीधे उत्पादन के अर्थशास्त्र या लागत-लाभ से नहीं जुड़ी  है। यह भी कहा जाता है कि यह तो प्रतिदिन का काम है । यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि जब वह गतिविधियाँ बाजार से जोड़कर देखी जाती है। तब उन्हें आर्थिक गतिविधियों में शामिल कर लिया जाता हैं। मान लीजिये यदि घर में कोई बच्ची छोटे शिशु की देखभाल के लिए उपलब्ध नहीं है तो क्या डे केयर सेंटर की सेवाओं के लिए पैसा नहीं खर्च करना पड़ता है।

बच्चों द्वारा घरों में की गयी गतिविधियों को उस समय आर्थिक मूल्य से जोड़ा जा सकता है जब परिवार एवं वृहतर समाज का पस्पर आदान-प्रदान चला रहा हो। हालाँकि इन कार्यों में एक-दूसरे के दायरे में घुसपैठ की बहुत संभावनाएं शामिल हैं फिर भी यह तथ्य गौरे काबिल है कि अधिकतर मामलों में बच्चे की गतिविधि चुनने के लिए माँ-बाप स्वंतंत्र नही होते है। जब छोटे किसान अपनी फसलों के उत्पादन की कीमतों को नीचे रखना चाहते हैं तो वे घर के बच्चों से काम लेते हैं। विकसित देशों में यह प्रतिशत कम है लेकिन तीसरी दुनिया के देशों में ऐसे बच्चों का प्रतिशत काफी है।

यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि अभी भी कई इलाकों में मजदूरी नगद न देकर वस्तुओं के रूप में दी जाती है। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की गतिबिधियाँ फैक्टरीनुमा न होने पर भी अर्थव्यवस्था से जुड़ी  है। अतः यह जरुरी नहीं है कि बच्चे की हर गतिविधि बाल-मजदूरी की कानूनी परिभाषा से जोड़कर देखी जाये। अतः ऐसी परिस्थतियों में भी बच्चे अपनी गतिविधियाँ जारी रखने हुए स्कूल जाते देखे गए हैं।

अधिकतर नारीवादी शोधकर्ताओं का मत है कि बच्चों के अधिकतर काम महिलाओं के संरक्षण या देखरेख में किये जाते हैं अतः उन्हें महत्व देने की आवश्यकता नहीं है (स्कीलराइट 1980, एलसान 198२, बियर्स 1986 नीरा बुर्री 1986) इस मामले में एलसान के विचार ज्यादा परिपक्व लगते हैं क्योंकि वह बच्चों के कार्यों को कम आँका जाता है क्योंकि वह बच्चों द्वारा किया गया है। लड़कियों के काम को और भी कम करके आँका जाता है लिंग भेद पर आधारित घर की दिनचर्या से लड़कियाँ बचपन में ही रूबरू हो जाती हैं। वे इसे अपनी नियति मान लेती हैं। और इसी परिणामस्वरूप उन्हें समाज के आर्थिक कार्यो से काटकर रखा जाता है और उनके पारिवारिक कार्यों को बच्चे पालना या घर की देखभाल को निचले दर्जे का स्थान दिया जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लड़कियों का काम इतना कम दृश्य है कि अक्सर उसका अस्तित्व ही भुला दिया जाता है।

इन्हीं परिकल्पनाओं से यह धारणा बलबती होती है कि वेतन वाले काम में शोषण का तत्व हो सकता है घरेलू कार्यों में नहीं क्योंकि शोषण में तीसरे व्यक्ति की मौजदूगी अनिवार्य मानी जाती है। और यह भी कि शोषण कार्य में किसी वस्तु का उत्पादन आवश्यक अंग है। अक्सर बच्चों विशेषकर लड़कियों को ऐसे कार्यों में लगाया जाता है जिनमें सीधे-सीधे सामने किसी वस्तु का उत्पादन नहीं होता है। अतः सर्वप्रथम यह विचार सामने लाने की आवश्यकता है कि परिवार के लिए की जाने वाली गतिविधियों में भी शोषण हो सकता है। साथ ही कार्य ही नही बच्चे की सामाजिक परिकल्पना पर भी विचार आवश्यक है। अक्सर बच्चे की पहचान उसकी उम्र से की जाती है।

सत्रहवीं शताब्दी में जब बचपन को शिक्षा से जोड़कर देखा जाने लगा तो बाल मजदूरी की धारणाओं को बल मिला। वैसे भारतीय समाज में वर्ग के बच्चों का बचपन शिक्षा ग्रहण करने से जुड़ा था। लेकिन शुद्ध एवं अन्य वर्ग के बच्चों के लिए उपनयन संस्कार की व्यवस्था नहीं थी। उनके लिए मजदूरी ही बचपन थी। इसी स्थिति में परिवर्तन आ रहा है। उनके लिए मजदूरी वर्ग  के बच्चे को भारतीय संविधान समान विकास के अवसर देता है जिसमें शिक्षा भी शामिल है।

यदि हम कार्य की परिभाषा कुछ इस तरह करे:

“बच्चों की ऐसी कोई भी गतिविधि को कार्य माना जाए जो उत्पादन में योगदान करती है, बड़ों की फ्री टाईम मुहैया कराती है, दूसरों को अपना कार्य करने में सहायक होती है दूसरों के रोजगार के बदले में की जाती है”

यदि इस परिभाषा के दायरे में लड़कियों में कार्यों को देखा जाये तो यह आभास हो जायेगा कि बालिका का कार्य मजदूरी के कितना नजदीक है।

भारतीय परिस्थिति में कुछ लड़कियाँ पारिवारिक इकाइयों में काम करती हैं जबकि अन्य दिहाड़ी पर काम करती हैं। उन्हें उनके काम  की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग वर्गीकृत किया जा सकता है। जो इस प्रकार है (क) घरेलू कार्य (ख) अनुबंधित कार्य (ग) वैतनिक श्रम और (घ) गैर घरेलू तथा गैर मौद्रिक कार्य।

भारत में विश्व के सर्वाधिक बाल श्रमिक विद्यमान है। 1971 की कुल जनसंख्या में लगभग 10.7 मिलियन श्रमिक बच्चों (जिसमें 7.9 मिलियन लड़के तथा २.8 मिलियन लड़कियाँ) का आंकलन किया गया। सं 1981 में यह संख्या कुल जनसंख्या की 5.5 प्रतिशत हो गई जिसमें 14.5 मिलियन बच्चे 14 वर्ष से कम उम्र के थे। 1983 में बाल मजदूरों की संख्या 17.4 मिलियन तक पहुँच गई परन्तु गैर सरकारी आंकड़ों में इस संख्या के 30 मिलीयन होने का अनुमान लगाया गया। उनमें से 93 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों के बाल श्रमिक थे और 7 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में कार्यरत थे। उमके काम के घंटे ज्यादा थे और बहुत कम मजदूर पाते थे। वे साल में औसतन २11 दिन काम करते थे। (पंडित बरुआह 199२:२55)

माता-पिता की निम्न तथा अनियमित आय, परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति बच्चों को काम करने के लिए तथा पारिवारिक आय में पूरक बनने के लिए मजदूर करती है। भारत में सामजिक आर्थिक स्थितियां तथा माता-पिता एवं नियोजकों का रवैया भारत में बालिका मजदूरों की दयनीय दशा की जिम्मेदार हैं। वे दबावपूर्ण स्थितियों में काम करती है जो कई बार जानलेवा भी होता है। 1981 के जनसंख्यकीय आंकड़ों के अनुसार बाल श्रमिकों की संख्या 13.8 मिलीयन थी यानि कुल श्रम शक्ति का 7 प्रतिशत 1983 में नेशनल सेम्पल सर्वे में बाल श्रमिकों की कुल संख्या 17.5 मिलीयन बताई गई जिसमें से 10.33 मिलीयन-अर्थात 59 प्रतिशत लड़के थे और 7.18 मिलीयन-अर्थात् 41 प्रतिशत-लड़कियाँ थी। (मित्तल 1995) लड़कियाँ संगठित तथा असंगठित दोनों ही क्षेत्रों में काम करती है।

1991 के जनसांख्यिकी आंकड़ा के अनुसार 14 साल से कम आयु की 8.35 प्रतिशत लड़कियाँ मुख्य श्रमिक थीं जो पूर्णकालिक आर्थिक गतिविधियों से जुड़ीं थीं। और 9.35 अंशकालिक श्रमिक थीं। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक कोर्पोरेशन एन्ड चाइल्ड डवलप्मेंट (निपसीड) द्वारा जारी एक रिपोर्ट जो जन्म से लेकर 20 वर्ष की आयु तक नारी की स्थिति पर प्रकाश डालती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 5-14 साल की ग्रामीण बालिका मजदूरों का प्रतिशत 1971 में 46 प्रतिशत से बढ़कर 1981 में 78 प्रतिशत तक पहुँच गया। जबकि इसी अवधि में बाल श्रमिकों की संख्या 11.37 प्रतिशत से गिरकर 10.05 प्रतिशत हो गई। आयु वर्ग के हिसाब से लड़कों की अपेक्षा लड़कियाँ श्रम बाजार में कम उम्र में प्रवेश करती हैं। समग्रतः जहाँ 20 वर्ष से कम आयु की 20 प्रतिशत लड़कियाँ मजदूर हैं वहीँ लड़कों में यह प्रतिशत 14 है।

1991 के जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार कुल 31 मिलीयन बच्चों में से 19.8 मिलियन (5-14 आयु वर्ग) बच्चे ऐसे हैं जो गरीब परिवार से सम्बन्ध रखते हैं और आर्थिक कारणों से मजदूरी से जुड़ने पर मजबूर हुए हैं। गरीब परिवारों में माता-पिता अपने बच्चों को परम्परिक व्यवसायों में ही लगा लेते हैं और कुछ मामलों में जब परिवार काम की तलाश में शहरों में प्रवास करते हैं तो उनके बच्चों को घरेलू नौकर या नौकरानी के रूप में मजदूर का हिस्सा बनना पड़ता है। नियोजन बच्चों को काम पर रखना पसंद करते हैं क्योंकि एक तो उनका श्रम सस्ता है, दूसरा, उनमें संगठन का आभाव होने के कारण उनका शोषण आसानी से किया जा सकता है और कई मामलों में वे अपने नियोजकों पर भावात्मक रूप से निर्भर होते हैं।

5-14 साल के बीच की भारतीय लड़कियाँ श्रमशक्ति में बड़े पैमाने पर विद्यमान है। उनमें से कुछ मजबूर है या अनुबंधित है तथा यहाँ तक कि कुछ को चकलाघरों में बेच दिया जाता है। भिन्न-भिन्न आर्थिक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अंतर्गत लड़की को वस्तु के रूप में देखा जाता है उसे सस्ते श्रम का स्रोत तथा समाज पर बोझ समझा जाता है। अन्तराष्ट्रीय श्रम संगठन, रेडक्रॉस, भारत सरकार का जनसांख्यिकी विभाग, नेशनल सेम्पल सर्वे, योजना आयोग आदि के अनेक प्रयासों के बावजूद कृषि, व्यापार तथा उद्योग में बालिका मजदूरों सम्बन्धी के प्रमाणिक तथा विस्तृत आंकड़े प्राप्त करना अत्यंत कठिन है।

श्रमिक बालिकाओं के आंकड़े समस्त अनुबधित मजदूर निर्माण मजदूर, घरेलू नौकरानी, बागान मजदूर और अन्य अपरिचित क्षेत्रों के श्रमिकों का व्यापक प्रतिविम्ब है। सन 1991 के जनसांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में बालिका मजदूरों की संख्या अधिक है। कुल श्रमिक बालिकाओं का 90 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है जबकि सिर्फ 10प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में विद्यमान है। शहरी क्षेत्रों में कार्यरत बालिकाएँ समान्यतः स्लम बस्तियों तथा झोपड़ी पट्टी इलाकों में रहती हैं और ऐसे परिवारों से सम्बन्ध रखती है जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब होती है । असंगठित क्षेत्रों में वे बड़ी संख्या में काम करती हैं । नेशनल कमीशन ऑन लेबर के अनुसार बच्चों का रोजगार विशेषकर लड़कियों का रोजगार संगठित क्षेत्रों ,जैसे सूत कातना, बुनना, पत्थर तोड़ना, गारमेंट सिलाई, हेन्डीक्राप्ट पेंट बनाना और सड़क निर्माण के कार्यों में भिन्न-भिन्न में  दिखाई देता है। देह व्यापार में बालिकाओं का शोषण सर्वज्ञात है। भारत में बाल वेश्यावृत्ति तेजी बढ़ रही है और यहाँ कम उम्र की लड़कियों की मांग बढ़ रही है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में 4 लाख वेश्याएं हैं या फिर इससे भी अधिक, जिसमें 30 प्रतिशत नाबालिग हैं। गाथिया 1999)

इन बाल वेश्याओं का जमाव मुख्यतः शहरों में है अनुमान है की सिर्फ मुम्बई में ही 20,000 बाल वेश्याएं हैं (चन्द्रा माओली 199२:68) देवी के नाम पर एक अन्य प्रकार की वेश्यावृत्ति   भी देश में पायी जाती है जैसे की आंध्र प्रदेश में जोगिन प्रथा तथा तमिलनाडु कर्नाटका एवं महाराष्ट्र में देवदासी प्रथा भारत में, खासकर धार्मिक स्थलों पर बलिका भिखारिनें बड़ी संख्या पायी जाती है। भिखारियों के परिवार में बच्चे आय का सबसे बड़ा स्रोत होते हैं भारत के सात बड़े शहरों में फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की संख्या काफी है। एवं उनमें से बहुत सी निराश्रित तथा अनाथ लड़कियाँ है जो बालिका मजदूरों का अन्य समूह बनाती है जिसके बारे में बहुत कम जाना जाता है। उन्हें या तो गैंग के सदस्यों द्वारा काम पर लगाया जाता है या फिर कुछ समाज-विरोधी समूह सामान छीनने, जेब काटने आदि कार्यों में उनका उपयोग करते हैं। इस रूप में उनका श्रम गैंग के नेता अथवा मालिकों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। यूनिसेफ के एक अध्ययन (1996) के अनुसार कलकत्ता के फुटपाथी बच्चों में 47 प्रतिशत लकड़ियाँ थीं जबकि बंगलोर, मुम्बई तथा चेन्नई में 33 प्रतिशत थी। उनकी संख्या बढ़कर 100, 000 हो गी। उनमें से 61 प्रतिशत से ज्यादा कौमार्यता पर हुए हमले से पीड़ित थी। (चटर्जी 1977)

भारत सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा एक शोध अध्ययन के अनुसार (जोशी 1986) देश में अनुमानतः 10२.3 मिलियन परिवारों के 34.7 प्रतिशत बच्चे काम करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 79 प्रतिशत कार्यरत बच्चे हैं। दो तिहाई कार्यरत बच्चे 12-15 आयु वर्ग के हैं तथा बाकी 12 साल से कम उम्र के बच्चे हैं। इन  समस्त कार्यरत बच्चों में 50 प्रतिशत से ज्यादा लड़कियाँ है जो लड़कों के मुकाबले अधिक काम करती है पर कम मजदूरी पाती हैं। कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त अनौपचारिक क्षेत्रों  में लड़कियाँ बड़ी संख्या में कार्यरत है। बड़ी संख्या में लड़कियाँ घरेलू कामगार के रूप मेंकार्यरत हैं जिसे जनसांख्यिकी आंकड़ों में नहीं दिखाया जाता। हालाँकि बालिका मजदूर हर जगह मौजूद है तब भी ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में इसकी व्यापकता को सूचित करने वाले सही आंकड़े विद्यमान नहीं है। अतः बालिका मजदूर सम्बन्धी अधिक आंकड़ों की आवश्यकता है। श्रमिक बालिका मूलतः सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की प्रबलता का परिणाम है जिससे वे उनके अधिकारों तथा आवश्यकताओं से वंचित हो जाती हैं।

1971 के जनसांख्यिकी आंकड़ों दर्शाते हैं की ग्रामीण हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 5-14 आयु वर्ग के 11.5 प्रतिशत पुरुष तथा 4.6 प्रतिशत महिलाएं पूर्णकालिक श्रमिक थे। ग्रामीण भारत में पुरुष और महिलाओं का काम में सहभागिता दर क्रमशः13.3 प्रतिशत और 22.4 प्रतिशत थी। अतः ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का काम में योगदान अधिक होता है। 1980-८१ के दौरान केरल, गोआ, दमन और लक्षद्वीप, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, मेघालय, नागालैण्ड, मिज़ोरम, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश ऐसे क्षेत्र थे जहाँ अंतराज्जीय बाल मजदूर प्रवासियों में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक थी। अंतराज्जीय प्रवासी बाल मजदूरों के सन्दर्भ में त्रिपुरा, तथा पांडेचेरी में बालिका मजदूरों की संख्या प्रवासी बाल मजदूरों से अधिक है। (त्रिपाठी, 1997:34)

यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा की यद्यपि 1971 से 1981 के बीच कार्य सहभागिता दर से बाल मजदूरों की संख्या में कमी आई है वहीँ इसी अवधि में बालिकाओं की कार्य सहभागिता में वृद्धि हुई है। 1971 में यह दर 4.57 प्रतिशत थी जो 1981 में 7.79 प्रतिशत हो गई, बाल मजदूरों के समग्र आंकड़ों को देखने से ज्ञात होता ही की 1971 से बालिका मजदूरों की संख्या २.39 प्रतिशत से लगभग चार गुना बढ़कर 1981 में 8.65 प्रतिशत हो गई है, वहीं लड़कों की संख्या लगभग स्थिर है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को लघु कार्यों में संलग्न दिखाया जाता है। लड़कियों के लिए काम का चयन करते समय परिवार के सदस्य, रिस्तेदार, दोस्त तथा परिचितों द्वारा विशेष ध्यान रखा जाता है। (एन.सी. पी. सी.सी.डी. रिपोर्ट 1978) मालिकों द्वारा लड़कियों का अत्यधिक शोषण किया जाता है जो उन्हें घर अथवा कार्यस्थल से बाहर काम करने पर बहुत कम पैसे देते हैं।

1981 के जनसांख्यिकी आंकड़े दर्शाते हैं की लगभग 15 साल की उम्र की 100में से एक लड़की शहरी क्षेत्रों में मजदूरों का कार्य करती है। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में सौ में से चार लड़कियाँ मजदूरी का काम करती है। (निपसीड, 199२: 189) भारत में 5-14 वर्ष की 5.527 मिलियन लड़कियाँ बाल मजदूर की भांति काम कर रहीं थी। इनमें 3.78 मिलियन मुख्य कामगार थी तथा 1.769 मिलियन सीमांत कामगार थी। इनमें से 5.227 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों की थी और सिर्फ 0.300 मिलियन शहरी क्षेत्रों में काम करती थी।

तालिका 1 मुख्य कामगार/सीमांत कामगार/बेरोजगार/उपलब्ध रोजगार के आधार पर वर्गीकृत बाल मजदूर

 

कामगार

ग्रामीण/शहरी   रहन- सहन

व्यक्ति की (बच्चे)

प्रतिशत

बच्चों का प्रतिशत

 

 

 

 

पुरुष

महिलाएं

मुख्य कामगार

कुल

1195546

(100.00)

66.43.

33.57

 

ग्रामीण

10203928

(19.14)

65.65

34.35

 

शहरी

991618

(8.86)

74.53

25.47

सीमांत  कामगार

कुल

2445325

(100.00)

27.63

72.37

 

ग्रामीण

2365041

(96.75)

27.22

72.78

 

शहरी

79384

(3.25)

39.74

60.25

बेरोजगार/उपलब्ध

कुल

2672319

(100.00)

56.28

43.72

कामगार

ग्रामीण

2028227

(75.90)

54.39

45.61

 

शहरी

644092

(24.10)

62.61

37.79

कुल काम कामगार

कुल

16313190

(100.00)

58.95

41.05

 

ग्रामीण

1459809

(89.49)

57.86

42.14

 

शहरी

1715094

(10.51)

68.30

31.70

स्रोत:- जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची



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