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सतत और समग्र मूल्यांकन को लागू करने के लिए जरुरी बातें

सतत और समग्र मूल्यांकन को लागू करने के लिए जरुरी बातें

कक्षा में सी. सी.ई. को लागू करने के लिए जरूरी चरण क्या हैं?

 

सीखने के अपेक्षित संकेतकों की पहचान

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया को शुरू करने से पहले पढ़ाये जाने वाले पाठ को ध्यान से पढ़ें तथा बच्चों की सीखने की आवश्यकता के संदर्भ में पाठ को समझें। आमतौर पर शिक्षक यही सोचते हैं कि पाठ बच्चों के लिए विकसित किये गये हैं। यही सही नहीं है। प्रत्येक पाठ्यपुस्तक के सभी पाठों को कुछ इस तरह प्रस्तुत करें कि शिक्षकों तथा बच्चों द्वारा संयूक्त रूप से सीखने की स्थितियां निर्मित हो।

इस प्रकार, आपके सीखने – सिखाने की योजना का पहला चरण (जैसा कि अपने चित्र. 1 में देखा) सीखने के अपेक्षित बिन्दुओं/उद्देश्यों की पहचान है। सीखने के अपेक्षित बिन्दु/उद्देश्य प्राप्त हुए हैं या नहीं इसकी जाँच सीखने के संकेतिक से की जा सकती है। प्रत्येक विषय के संकेतक संलग्नक 1 में दिए जा रहे हैं। यह संकेतक पूर्णरूप से सुझाव मात्र हैं। संकेतकों का विकास अपने संदर्भ तथा स्थिति के अनुसार किया जा सकता है। संकेतक कई तरह से आपके सहायक होते हैं –

  • बच्चों का सीखना एक सतत प्रक्रिया है। इस तथ्य को समझना और इस पर ध्यान केन्द्रित करना।
  • अभिभावक, बच्चों तथा अन्य लोगों के लिए बच्चों की प्रगति को सरलतापूर्वक समझने के लिए एक संदर्भ बिन्दु प्रदान करना।
  • प्रत्येक बच्चे की प्रगति की मॉनिटरिंग तथा रिपोर्टिंग के लिए एक रूपरेखा प्रदान करना।

बच्चों के वर्तमान सीखने के स्तर को जानने के लिए प्रत्येक विषय क्षेत्र में सीखने की स्थितियों का निर्माण

हमें प्रत्येक पाठ्यचर्या के विषय से जुड़े बच्चों के सीखने संबंधी अनुभवों को आधार बनाकर शिक्षण – अधिगम प्रक्रिया आरंभ करनी चाहिए। जैसा कि हमने उदाहरणों में देखा, शिक्षक बच्चों से सीधे प्रश्न पूछने या सीधे जानकारी देने से पहले स्थितियों की कल्पना कर सीखने की स्थितियों का निर्माण करते हैं। बच्चों के सन्दर्भ को दृष्टिगत रखते हुए आप सीखने की स्थितियां पैदा कर सकते हैं। बच्चों से बातचीत/चर्चा द्वारा सीखने की परिस्थितियाँ बनाते समय आप बच्चों की सहभागिता भी जाँच सकते हैं। इस जाँच से प्राप्त आंकड़े बच्चों के पूर्व अनुभव को नए तरीके से सीखने से जोड़ने और आगे बढ़ने में मदद करेंगे।

सीखने –सिखाने की प्रक्रिया की शुरूआत करना

बच्चों के सीखने के मौजूद स्तर को जानने के बाद ही आप सुनिश्चित करें कि इस पाठ को पढ़ाने के लिए कौन - सी शिक्षण विधि अपनायी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी पाठ को पढ़ाने के लिए आप पहले समूह कार्य करवा सकते हैं, इसके बाद व्यक्तिगत कार्य करवाया जा सकता है। इस प्रकार एक ही पाठ को पढ़ाने के दौरान बच्चों को ज्ञान – सृजन तथा विभिन्न कौशलों के विकास के लिए कई विधियाँ अपनानी होंगी। शिक्षण – विधि चयन बच्चे की आवश्यकता, विषय की प्रकृति तथा सुविधाओं की उपलब्धता के अनुसार आपको ही करना है। कक्षा में बच्चों के साथ बातचीत, चर्चाम अनुभवों को बाँटना आदि गतिविधियाँ न केवल बच्चों को ज्ञान सृजन के अवसर देती हैं बल्कि शिक्षकों को भी बच्चों के सीखने के स्तर के आकलन में सहायता करती हैं। आप स्वयं यह महसूस करेंगे कि अवलोकन करना, बच्चों की बातों को सुनना, उनसे अनौपचारिक बातचीत, सवाल पूछना, उनके बारे में कितना कुछ समझा जा सकता है। उसी के अनुसार, आप बच्चों के सीखने में सुधार के लिए उन्हें नियमित रूप से फीडबैक समर्थन दे सकते हैं। आप पाएंगे कि कक्षा में बच्चे समूह में, व्यक्तिगत रूप से तथा शिक्षक और साथियों की मदद से सीखते हैं। बच्चे के सीखने का आकलन व्यक्तिगत रूप से एक बच्चे पर केंद्रित रहता है, जब वह कोई गतिविधियाँ अथवा कार्य स्वतंत्र रूप से कर रही होती/रहा होता है। यह वर्कशीट, पेपर - पेन्सिल टेस्ट, प्रदर्शन करने वाली वाली गतिविधियाँ, चित्र – पठन, कक्षा – कार्य, प्रोजेक्ट आदि कुछ भी हो सकता है। यहाँ हम एक अकेले बच्चे का आकलन कर रहे हैं। सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान यह बच्चे के स्वयं करके सीखने में सुधार के लिए किया जाता है। यह जरूरी नहीं है कि आप प्रत्येक बच्चे का प्रतिदिन आकलन करें। व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला आकलन दो या तीन दिन में पूर्ण किया जा सकता है लेकिन बच्चे को समय – समय पर फीडबैक जरूर दिया जाना चाहिए। जैसा कि आप उदाहरणों के अंतर्गत देख चुके हैं।

सामूहिक रूप से सीखने का आकलन

सामूहिक आकलन किसी एक कार्य विशेष पर बच्चों द्वारा समूह में काम करने की प्रगति व सीखने पर केंद्रित होता है सामूहिक रूप से सीखने का मुख्य उद्देश्य बातचीत, चर्चा की शुरूआत करना, कक्षा के अनुभवों को साझा करना तथा बच्चों के अनुभव एवं ज्ञान को एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करना है। सामूहिक रूप से सीखने का आकलन किसी कार्य की पूर्णता पर केंद्रित होना चाहिए। इसमें समूह के प्रत्येक बच्चे के कामों का आकलन न हो। समूह कार्य बच्चों में निहित क्षमताओं व खूबियों की पहचान करने तथा अत: वैयक्तिक विशेषताओं, सहयोग, तदानुभूति, किसी कार्य में पहल करने की क्षमता, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता आदि का आकलन करने में शिक्षक की मदद करता है।

*क्या आप सहारा दिए जाने (स्केफ्फोल्डिंग) के बारे में जानते हैं

  • स्केफ्फोल्डिंग का अर्थ है – जब सीखने – सिखाने की प्रक्रिया हो रही हो तब शिक्षक/सहपाठी और बड़ों द्वारा सहयोग करना है। वास्तव में बच्चे जो जानते हैं और जो कुछ सीख रहे है उसके बीच पुल का निर्माण है।
  • स्केफ्फोल्डिंग (सहारा देने) की प्रक्रिया में शिक्षक/सहपाठी, विद्यार्थी को किसी विषय या विचार को समझने में मदद करते हैं, जिसे प्रारंभिक स्तर पर विद्यार्थी स्वयं नहीं समझ पाते हैं।
  • शिक्षक केवल उन्हीं दक्षताओं/ विचार को समझने में विद्यार्थी की सहायता करते हैं जो उसकी समझ की क्षमताओं से पूर्णता: दूर है। बच्चे गलतियाँ कर सकते हैं, यह अध्यापक का दायित्व है वह उन्हें पृष्ठपोषण (फीडबैक) देकर गलतियों को दूर करने में उनकी मदद करें।
  • जब विद्यार्थी स्वत: ही समझने का उत्तरदायित्व लेने लगते हैं तब शिक्षक धीरे – धीरे स्वयं को इस प्रक्रिया से दूर कर लेते है।
  • शिक्षण – अधिगम के दौरान बच्चे का सीखने का स्तर बढ़ाने की यह बहुत उपयोगी प्रक्रिया है।

अपना तथा साथियों का आकलन

सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान आपने देखा होगा कि कुछ बच्चे ने केवल विषय की अवधारणा को समझ लेते हैं बल्कि उनमें अपने तथा अपने साथियों के काम के आकलन की भी होती है। ऐसे बच्चे शिक्षक के लिए सीखने का एक संसाधन हैं जिनकी सहायता से शिक्षक जब स्वयं कुछ बच्चों को सिखाने में व्यस्त हों तो अन्य बच्चों को सिखाने में इनकी मदद ले सकते हैं। ऐसे बच्चों के सीखने के इस पक्ष की भी रिकार्डिंग तथा रिपोर्टिंग होनी चाहिए।

समूह में बच्चे का व्यक्तिगत रूप से आकलन

आमतौर पर प्राथमिक स्तर की कक्षाओं में, शिक्षक बच्चों के छोटे – छोटे समूह बनाते हैं। शिक्षक द्वारा प्रत्येक बच्चे को समूह में करने के लिए कुछ गतिविधि जाती। इस प्रकार की स्थिति के निर्माण का उद्देश्य बच्चों को आपस में साथियों के साथ कार्य करने और सीखने के अवसर देना है। सभी बच्चों को व्यस्त रखने का यह एक बहुत अच्छा तरीका है जिसमें तीव्र गति से सीखने वाले बच्चों की क्षमता का इस्तेमाल सीखने में पीछे रह गये बच्चों को सिखाने के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार के समूहों में शिक्षक द्वारा प्रत्येक बच्चे के काम का आकलन किया जाना जरूरी है।

इनमें साथी बच्चों से भी मदद ली जा सकती है। समूह ठीक से काम कर रहा है इसके लिए आपका समग्र रूप से अवलोकन आवश्यक है। उनका ध्यान व्यक्तिगत रूप से सीखने के आकलन पर हो न कि समूह कार्य पर।

बच्चे की सीखने के बारे में जानकारी/आंकड़ों एकत्र करने के स्रोत

आपको इस बात का संज्ञान अवश्य होना चाहिए कि आप बच्चों के सीखने के बारे में जानकारी देने वाले एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। आपके अतिरिक्त कुछ और व्यक्ति/स्रोत हैं जिनसे बच्चों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है और इनसे प्राप्त जानकारी आपके सामने बच्चों के सीखने और विकास के संबंध में पूरी जानकारी/चित्र प्रस्तुत करती है।

  • अन्य स्रोत हो सकते हैं

-    अभिभावक    - बच्चों के मित्र/सहपाठी

-    अन्य शिक्षक  - समुदाय के सदस्य

  • पोर्टफोलियो बच्चे के प्रदर्शन का एक समृद्ध स्रोत है। बच्चे की प्रगति के आकलन व रिपोर्टिंग के लिए उसके पोर्टफोलियो का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • आमतौर पर बच्चे के द्वारा किया गया गृह कार्य, परियोजना कार्य तथा कई अन्य कार्यों को बच्चे की प्रगति की जानकारी देते समय गंभीरता से नहीं लिया जाता है। बच्चे का पोर्टफोलियो लिखते समय बच्चों द्वारा किये जाने वाले इन सभी कार्यों को ध्यान में रखना चाहिए।
  • बच्चों के व्यवहार के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए अभिभावक – शिक्षक बैठक एक प्रभावशाली स्रोत है।

चरण 5 – सूचनाओं का अभिलेखन

जैसा कि अपने दिए गये उदाहरणों से समझा, दर्ज की जाने वाली जानकारियां/सूचनाएं दो प्रकार की हो सकती हैं –

  • सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान बच्चे के बारे में एकत्र की गई जानकारी/आंकड़े शिक्षक के स्वयं के रिकॉर्ड के लिए है जिनका इस्तेमाल करते हुए शिक्षक बच्चे के सीखने में सुधार ला सकते हैं और फीडबैक दे सकते हैं। इस प्रकार के आकलन का उद्देश्य बच्चे के स्वयं के सीखने में सुधार लाना है। इसमें शिक्षक बच्चे की प्रगति की तुलना उसके स्वयं की पिछली प्रगति से करते हैं। इसे कक्षा कार्य की पुस्तकों के माध्यम से भी समझा जा सकता है।
  • बच्चे के बारे में अन्य दुसरे प्रकार की जानकारी सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान किसी भी पाठ/थीम/इकाई की समाप्ति के बाद से संबंधित है। इसे शिक्षक प्रत्येक तिमाही के अंत से रिपोर्ट करें। इस सीखने के आकलन को संक्रियात्मक आकलन कहते हैं जो कि शिक्षक द्वारा निर्धारित संकेतकों के आधार पर किया जाता है।

रिकोर्डिंग और रिपोर्टिंग के संबंध में ध्यान रखने वाली बातें

  • एक निश्चित अवधि बाद बच्चे के कार्य का आकलन करें।
  • बच्चे सीखने के स्तर के साथ उसके कार्य के बारे में विवरणात्मक टिप्पणी लिखें।
  • पोर्टफोलियो में बच्चे के कार्य के नमूने रखें और उनका आकलन करें।
  • बच्चे के संदर्भ में किये गये महत्वपूर्ण अवलोकनों, उनकी खूबियों, कमजोरियों को दर्ज करने के लिए विशेष समय दें।

इन साक्ष्यों के आधार पर बच्चों का पोर्टफोलियो तैयार करें।

 

पोर्टफोलियो

पोर्टफोलियो में बच्चे के केवल कार्यों के नमूनों को ही न रखें बल्कि सभी तरह के कार्यों के नमूने रखें ताकि प्रत्येक तिमाही तथा पूरे वर्ष भर में बच्चे के विकास और प्रगति को दिखाया जा सके। बच्चे के इस प्रकार के नमूने शिक्षक और अभिभावकों दोनों को ही यह जानने में मदद करते है कि बच्चे ने कितना सीखा है और यह बच्चे के द्वारा वास्तव में किये गये कार्यों का एक रिकार्ड है न कि केवल परीक्षा में प्राप्त अंकों का रिकार्ड। प्रत्येक तिमाही के अंत में शिक्षक प्रत्येक बच्चे की प्रगति के आकलन के लिए उसके पोर्टफोलियो अभिभावकों को विशेष फीडबैक दे सकती है। पोर्टफोलियो अभिभावकों को अपने बच्चे के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने में मदद करते हैं साथ ही बच्चे की रुचि के क्षेत्र, उसकी व्यक्तिगत विशेषताएं तथा सामाजिक गुण जिन पर कि घर में उनका ध्यान नहीं गया होगा। अभिभावक पोर्टफोलियो के आधार पर अध्यापक से अपने बच्चे की उपलब्धियों व प्रगति की चर्चा कर सकते हैं।


रिपोर्टिंग की प्रक्रिया

एक शिक्षक होने के नाते आपने यह अनुभव किया होगा कि आप अपना अधिकतर समय बच्चों की प्रगति की एक तयशुदा ढाँचे में रिपोर्टिंग के लिए उनके संबंध में प्राप्त जानकारियों को एकत्र करने में लगाते हैं। इस कार्य के लिए रिकोर्डिंग और रिपोर्टिंग के कई प्रपत्र आपको मिलते हैं। इस प्रकार से बच्चों के सीखने में सुधार और सीखने – सिखाने की प्रक्रिया पर कम बल दिया जाता है। यदि आप सीखने – सिखाने की प्रक्रिया पर कम बल दिया जाता है। यदि आप सीखने – सिखाने की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान केंद्रित करें और साथ ही साथ बच्चे में सीखने के सुधार के लिए आकलन का प्रयोग करें, बजाए इसके कि खानापूर्ति के लिए आंकड़ों का संग्रहण, तो बच्चों को सीखने के लिए अधिक समय मिलेगा।

  • आपके लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि सीखने की प्रक्रिया में रिपोर्टिंग अपने आप में एक गतिविधि है। किसी भी पोर्टफोलियो/इकाई/थीम की समाप्ति पर सीखने के संकेतकों के आधार पर आप बच्चों का आकलन जरूर करें। इस आकलन से प्राप्त आंकड़ों को आप रिकार्ड के तौर पर रखें। आमतौर पर विद्यालयों में तिमाही अथवा छमाही में सीखने का आकलन किया जाता है जो कि पेपर – पेन्सिल टेस्ट के द्वारा किया जाता है। बच्चों की प्रगति के आकलन का यह तरीका सही नहीं है। बच्चों की प्रगति के आकलन के लिए विभिन्न तरीके अपनाये जाने चाहिए जो कि बच्चे के सीखने का आकलन किया जाता है जो कि पेपर – पेंसिल टेस्ट के द्वारा किया जाता है। बच्चों की प्रगति के आकलन का यह तरीका सही नहीं है। बच्चों की प्रगति के आकलन के लिए विभिन्न तरीके अपनाए जाने चाहिए जो कि बच्चे के सीखने की समग्र तस्वीर दें।
  • विद्यालयों में बच्चे की प्रगति की रिपोर्ट बिना कोई विवरणात्मक व्याख्या के केवल ग्रेड दर्शाती हैं जैसे A, B, C । इस प्रकार के ग्रेड देने का कोई औचित्य अभिभावकों तथा किसी भी बड़े की समझ में नहीं आता। इस प्रकार की रिपोर्टिंग न तो बच्चे को उसकी खूबियों और कमियों के बारे में कुछ बता पाती है और न अभिभावकों/बड़ों को।
  • रिपोर्ट बनाते समय शिक्षक को बच्चे तथा उसके अभिभावकों से फीडबैक लेना चाहिए। आकलन का यह पक्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं और इसे सावधानी से सकारात्मक तथा रचनात्मक रूप में किया जाना चाहिए। अच्छा होगा कि शिक्षक आकलन के मापदंड आधारित आंकड़ों की रिपोर्ट तीन तिमाहियों में दे।

व्यक्तिगत – सामाजिक विशेषताओं का आकलन कैसे करें?

  • सतत और समग्र मूल्यांकन में व्यक्तिगत तथा समाजिक विशेषताओं के आकलन का उद्देश्य यह बताना है कि व्यक्तिगत/सामाजिक विशेषताओं में बच्चे की प्रगति किस प्रकार हो रही है। व्यक्तिगत – सामाजिक विशेषताओं का आकलन बच्चे की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे लाभ की बजाय नुकसान हो सकता है। इसके बदले यह महत्वपूर्ण है कि बच्चे अपने कौन – कौन से गुण का किस स्तर तक प्रदर्शन करते हैं।
  • बच्चे की व्यक्तिगत – सामाजिक योग्यताओं के आकलन के लिए आवश्यक है कि शिक्षक बच्चे की व्यक्तिगत – सामाजिक योग्यताओं का तब अवलोकन करे/देखे जब विभिन्न पाठ्यक्रम/विषय क्षेत्रों में कक्षा में सीखने –सिखाने की प्रक्रिया हो रही हो।
  • बच्चे के मुख्य व्यक्तिगत – सामाजिक योग्यताओं का तब अवलोकन करने के लिए साल भर अवलोकन करें और तिमाही में एक बार उसकी रिपोर्टिंग/ रिकॉर्डिंग करें।
  • रिपोर्टिंग करते समय शिक्षक बच्चे के व्यक्तिगत – सामाजिक गुणों का अवलोकन कर उनके बारे में विवरणात्मक कथन, टिप्पणी लिखें जो उसने बच्चे में देखी हैं।
  • बिना सुझाव के केवल स्थिति बताने की जगह बच्चे की प्रगति के लिए सुझाव देना आधिक उपयोगी है इसलिए, रिपोर्ट बच्चे के सशक्त पक्ष की ओर होनी चाहिए ना कि उसकी कमजोरियों पर।

व्यक्तिगत – सामाजिक विशेषताओं की रिपोर्टिंग का एक उदाहरण – कक्षा 2 का छात्र

पहल करना –

पहल करना – अमन कक्षा की गतिविधियों में भाग लेने के लिए उत्साहित रहता है। वह  वह ब्लैकबोर्ड साफ करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। तथा अगर जरूरत हो तो किसी काम से अन्य शिक्षकों के पास भी जाता है। विद्यालय के खेल के मैदान को साफ़ करने के लिए स्वेच्छा से आगे आने वाले बच्चों में वह सबसे पहले स्थान पर था। उसने पर्यवारण प्रोजेक्ट के लिए पत्ते, प्लास्टिक, पेपर, बोतलें इकट्ठी करने में सहायता की।

भावनात्मक नियंत्रण – अमन में अपनी भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रण में रखने की क्षमता है, उदहारण के लिए खेल के दौरान वह अपनी बारे की प्रतीक्षा करता है तथा सभा कक्षा में जाने के लिए भी धैर्य से कतार में खड़ा रहता है। कक्षा में जब उसका पेन्सिल का डिब्बा खोया तो भी उसने धैर्य नहीं छोड़ा और चुपचाप शांति से शिक्षक की प्रतीक्षा करता रहा।

 

बच्चे की प्रगति की रिपोर्ट कैसे करें?

1)  रिपोर्ट – वर्ष में तीन बार बच्चे की प्रगति का ब्यौरा लेना

  • विभिन्न विषय क्षेत्रों में प्रथम, द्वितीय, तृतीय, एवं, चतुर्थ चार स्तर निर्धारित कर दिए जाएँ। यह निर्धारण उस व्यापकता को प्रदर्शित करेगा जिसके अंतर्गत बच्चों के अधिगम एवं प्रदर्शन का इन चार स्तरों पर आकलन किया जा सकेगा।

सीखने का पहला स्तर – शिक्षक के सहयोग के बावजूद बच्चे का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर के अनुसार नहीं हुआ है।

सीखने का दूसरा स्तर – अपेक्षित स्तर तक पहुँचने के लिए बच्चे को बड़ों के सहयोग की आवश्यकता है।

सीखने के तीसरा स्तर – बच्चे के प्रदर्शन का स्तर के अनुसार है।

सीखने का चौथा स्तर – बच्चे का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर से कहाँ आगे है।

  • बच्चे के लिए गये कार्य का संकलन यह समझने में मदद करेगा कि वह सीखने के किस स्तर पर है।
  • बच्चे के व्यक्तिगत के विभिन्न पहलुओं का लिखित विवरण आप एक तिमाही में बच्चे के अवलोकन के आधार पर तैयार करें।
  • बच्चे क्या और कैसे सीख रहे हैं, इसके बारे में विस्तार से गुणात्मक टिप्पणी लिखें।
  • बच्चे द्वारा किये गये कार्य के नूमने भी दें।
  • बच्चे द्वारा किये गये सराहनीय कार्य को उजागर करें तथा उन पक्षों के बारे में भी बताएं जहाँ सुधार की आवश्यकता है।

एक तिमाही में बच्चों की प्रगति रिपोर्ट का एक प्रारूप नीचे दिया जा रहा है।

प्रगति रिपोर्ट

बच्चे का नाम ...........................................................कक्षा ....................................

तिमाही का स्तर *- I/II/III

पाठ्यचर्या क्षेत्र/विषय

विस्तृत संकेतक **

सीखने का स्तर ***

बच्चे की प्रोफाइल /विवरण

हिंदी

 

 

 

अंग्रेजी

 

 

 

गणित

 

 

 

पर्यावरण अध्ययन

 

 

 

कला शिक्षा

 

 

 

 

*प्रत्येक तिमाही की प्रगति रिपोर्ट ऊपर सुझाये गये प्रपत्र के अनुसार विकसित करें और तीनों तिमाहियों की संकलित रिपोर्ट प्रत्येक बच्चे के संचित रिकार्ड में रखनी चाहिए।

**यदि आवश्यकता हो तो विस्तृत संकेतक दिए जाएँ।

सीखने का पहला स्तर – बच्चा प्रदर्शन के अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचा है।

सीखने का दूसरा स्तर – बच्चे को अपेक्षित स्तर तक पहुँचने के लिए बड़ों के सहयोग की आवश्यकता है।

सीखने के तीसरा स्तर – बच्चे अपेक्षित पर है।

सीखने का चौथा स्तर – बच्चे का स्तर अपेक्षित स्तर से बेहतर है।

रिपोर्ट को बच्चे के साथ नियमित रूप से साझा करना –

कक्षा में सीखने – सिखाने के दौरान बच्चे गतिविधियाँ कार्य कर रहे हैं तो बच्चों को उनके द्वारा की जा रही गतिविधि तथा कार्य के संबंध में नियमित रूप से अनौपचारिक फीडबैक देना जरूरी है। इस फीडबैक आधार पर बच्चे जो समूह में/जोड़े में/व्यक्तिगत रूप से कार्य कर रहे हों, अपने कार्य में सुधार ला सकते हैं। सीखने – सिखाने की प्रक्रिया दौरान दिया गया इस तरह का फीडबैक बच्चे के सीखने की मॉनिटरिंग कर उसमें सुधार ला सकता है सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान दिया गया इस तरह का फीडबैक बच्चे के सीखने की मॉनिटरिंग कर उसमें सुधार ला सकता है। इसे रिपोर्ट कार्ड में रिपोर्ट करने की जरूरत नहीं है।

मासिक बैठकों में अभिभावकों/ बड़ों के साथ रिपोर्ट साझा करना

अभिभावक यह जानने के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं कि उनका बच्चा विद्यालय में कैसा प्रदर्शन कर रहा हैं। उसने क्या सीख लिया हैं? उनके बच्चे का प्रदर्शन कैसा है और एक निश्चित समय में उनके बच्चे की प्रगति कैसी है? अधिकतर होता यह है कि शिक्षक यह सोचते हैं कि बच्चों की कॉपी या रिपोर्ट में बच्चे के बारे में उनके द्वारा लिखी गई  टिप्पणी जैसे – हमसे बेहतर कर सकते हैं, अच्छा, कमजोर, अधिक प्रयास की टिप्पणी क्या मायने रखती है? क्या इस प्रकार की टिप्पणी बच्चे में कोई स्पष्ट जानकारी देती है कि उनका बच्चा क्या कर सकता है? उनकी बच्ची क्या कर सकती है और उसने कितना सीखा है? अभिभावकों को बच्चे के सीखने के प्रगति के बारे में जानकारी देने के लिए सरल और आसानी से समझने वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाए जो निम्न बिन्दुओं पर केंद्रित हो –

  • बच्चे क्या कर सकते हैं? बच्चे की क्या खूबियाँ है? जैसे – मौखिक अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास का स्तर, सहयोग की भावना, साथियों के साथ सीखने की सामग्री/भोजन आदि को बाँटना।
  • बच्चे को क्या पसंद है और क्या नापसंद है?
  • बच्चे के द्वारा अन्य गतिविधि जिसका अपने अवलोकन किया हो, के बारे में नमूने के साथ विस्तार से लिखें। अभिभावक हमेशा यह देखना चाहते हैं। कि उनके बच्चे स्कूल में क्या करते हैं?
  • बच्चे ने क्या सीखा है और कहाँ पर उसे सीखने में कठिनाई आ रही है? अभिभावकों के साथ इस बात की साझेदारी शिक्षकों के लिए सहायक होगी क्योंकि बच्चे की कठिनाई को जानने के बाद अभिभावक भी कठिनाइयों का हल करने में मदद करेंगे।
  • बच्चे के व्यक्तित्व के कुछ पहलू जैसे – सहयोग, समूह कार्य में दायित्व की भावना लाने, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता, रुचि आदि बच्चे और अभिभावक दोनों के साथ ही साझा करें।
  • अभिभावकों के साथ इस बात की चर्चा करें की बच्चे घर में क्या करते हैं और उन्होंने  बच्चे के बारे में क्या अवलोकन किया है?
  • निरंतर प्रयास के बाद भी कुछ बच्चे अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाते हैं। अभिभावकों से यह जानने की कोशिश करें कि बाकी घर में किस प्रकार के व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं? बच्चे की व्यक्तिगत समस्याओं की पहचान करने में मदद करेगा और आप और अभिभावक संयुक्त रूप से मिलकर इसे हल कर पाएंगे।

 

शिक्षकों की भूमिका क्या हो?

 

शिक्षकों के लिए विस्तृत दिशा – निर्देश

ए) सतत मूल्यांकन के जरूरी तत्व (सीखने के लिए आकलन)

  • सतत आकलन को एक अलग गतिविधि की तरह नहीं किया जाये। यह सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान शिक्षण के अभिन्न अंग के बारे में हो। यहाँ, आकलन शिक्षिका के शिक्षण और शिक्षार्थी के अधिगम का हो।
  • जब आप आकलन को सीखने – सिखाने की अंतर्निहित प्रक्रिया की तरह प्रयोग में लाते हैं तब यह बच्चों के अधिगम को बढ़ाता है। जैसे कि उदहारण में अपने आकलन की विभिन्न पद्धतियों को देखा, जैसे – प्रश्न पूछना, संवाद के लिए स्थितियों का निर्माण, सहपाठियों से चर्चा, लिखित कार्य, मौखिक गतिविधियाँ और गृह कार्य अदि को सीखने – सिखाने की प्रक्रिया में शिक्षक द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है। यह आकलन बच्चे की सीखने की प्रक्रिया में शिक्षक द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है। यह आकलन बच्चे की सीखने की प्रगति के बारे में डाटा/सूचना प्रदान करने में सहायता करेगा।
  • सतत आकलन का उपयोग बच्चों की प्रगति के बारे में किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए नहीं करनी चाहिए। सतत आकलन का उद्देश्य बच्चों की प्रगति का आकलन उसके अपने पिछले प्रदर्शन के परिप्रेक्ष्य में करना है और उसके सशक्त पक्ष को उजागर करना है तथा कमियों की पहचान करना है।
  • यह आकलन आपको बच्चे की समझ से समयानुसार प्रतिपूष्टि (फीडबैक) देने में मदद करेगा तथा बच्चे की आवश्यकतानुसार सीखने – सिखाने की पद्धति में सुधार करने में भी सहायक होगा।
  • सतत आकलन बेहतर रूप से सीखने के लिए शिक्षिका और बच्चों के द्वारा मिलकर काम करने की मांग करता है। इसका अर्थ यह है कि उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाई जाए तो बच्चे स्वाभाविक रूप से सीख लेंगे क्योंकि उनमें स्वभावतः सीखने की  प्रवृति और क्षमता होती है। यदि बच्चे सीखने के दौरान प्रगति नहीं कर पाता है तो इसके लिए बच्चे को दोषी न ठहराया जाए बल्कि शिक्षक को अपने सिखाने के तरीके में बदलाव लाना चाहिए। बच्चों को उपर्युक्त परिस्थितियां दी जाएँ जिससे उनके लगातार सीखने में प्रगति हो क्योंकि उनमें सीखने में प्रगति हो क्योंकि उनमें सीखने की स्वाभाविक प्रगति का विकास होता है।
  • सतत आकलन वहीं हो सकता है जहाँ पर बच्चा भयमुक्त जो, और अपनी स्वयं की प्रगति के बारे में रिपोर्ट करें तथा उसे अपने बारे में किसी प्रकार की टिप्पणी का भय न हो, अपनी शंकाओं और समस्याओं को व्यक्त कर सके, प्रश्न कर सके ताकि शिक्षिका को अपनी प्रगति का विकास होता है।
  • सतत आकलन वहीँ हो सकता है जहाँ पर बच्चा भयमुक्त हो, और अपनी स्वयं की प्रगति के बारे में रिपोर्ट करें तथा उसे अपने बारे में किसी प्रकार की टिप्पणी का भय न हो, अपनी शंकाओं और समस्याओं को व्यक्त कर सके, प्रश्न कर सके ताकि शिक्षिका को अपनी प्रगति का साक्ष्य दें सके कि उन्होंने क्या सीखा है और उन्हें सीखने में कहाँ कठिनाई हुई है। किसी सीमा तक वे स्वयं के साथ – साथ साथी बच्चों के सीखने का आकलन कर सकें और यहाँ तक कि दुसरे बच्चों को सीखने में मदद भी कर सके।
  • कक्षा में सीखने – सिखाने की प्रक्रिया बच्चों को प्रोत्साहित करें और यह अवसर दें कि वे अपने सीखने की मॉनिटरिंग स्वयं करे तथा अपने कार्य की समीक्षा करते हुए उसका विश्लेषण कर सके। यहाँ यह जानने की आवश्यकता है कि इस प्रकार से सीखने की प्रक्रिया में समय अधिक लगता है और शिक्षिका को धैर्य रखना है। यही बच्चे के सीखने का अंतिम लक्ष्य है।

सारगर्भित आकलन के आवश्यक तत्व (सीखने का आकलन)

  • किसी पाठ/यूनिट/विषय की समझ के बाद यह जानने के लिए कि बच्चे ने क्या और कहाँ तक सीखा हैं? आपको आकलन की विभिन्न विधियों/तकनीक द्वारा आंकड़े एकत्र करने की जरूरत है। यह केवल पेपर – पेन्सिल टेस्ट दे द्वारा नहीं किया जाना चाहिए जो कि अधिकतर शिक्षक करते है इसमें सीखने के विभिन्न तरीकों को शामिल करने की जरूरत है जैसे प्रदर्शन आधारित गतिविधियाँ, मौखिक परीक्षा, समूह कार्य आदि, जैसा कि उदाहरणों में देखा गया है।
  • सीखने का आकलन शिक्षक द्वारा प्रतिदिन, सप्ताह में अथवा किसी पहले से निश्चित समय में नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार का आकलन शिक्षक तब करें जब पाठ्यपुस्तक के किसी अध्याय, इकाई या थीम के पूरा होने पर निश्चित मानकों/उद्देश्य के परिपेक्ष्य में बच्चों की प्रगति को जानना चाहते हैं।
  • एक तिमाही में लगभग 3 से 5 पाठों/इकाई थीम से संबंधित आंकड़ों पेपर – पेंसिल टेस्ट, प्रोजेक्ट, समूह कार्य, मौखिक कार्य से प्राप्त किए होंगे और आंकड़े बच्चे के पोर्टफोलियो में भी रखे होंगे। प्रत्येक तिमाही में रिपोर्टिंग करने के उद्देश्य से इस प्रकार के आंकड़े बहुत उपयोगी हैं।
  • संक्रियात्मक आकलन (सीखने का आकलन) ज्ञान/सूचना आधारित प्रश्नों/गतिविधियों पर ही आधारित नहीं होना चाहिए। अन्यथा इसका उद्देश्य बच्चों को केवल सूचनाएँ याद करवा देना होगा जिसको कि बाद में वे भूल जाएँगे। इसका प्रयोग व्यापक समझ के लिए हो जिसमें कि उन्हें अपने शब्दों में उत्तर देने का अवसर मिले। इसके साथ ही बच्चों से ऐसे प्रश्न पूछने चाहिए जिनके उत्तर वे सोच – समझकर अपने शब्दों में दे सकें।

बच्चे की प्रगति के मूल्यांकन के लिए आवश्यक तत्व

  • यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे के सीखने का मूल्यांकन किन्हीं निश्चित मानकों जो पाठ्यक्रम या उस चरण से अपेक्षित स्तर या अधिगम के अधर पर तय किए जाते हैं। यहाँ पर बच्चे की उपलब्धि को एक निश्चित स्तर/श्रेणी के अंतर्गत रखा जाता है जिसे बाद में एक रिपोर्ट कार्ड के माध्यम से बच्चे, उसके अभिभावक तथा स्कूल को संप्रेषित किया जाता है। परंपारिक रूप से इस प्रकार के मूल्यांकन के नाम पर टेस्ट तथा परीक्षाएं ही होती चली आ रही हैं। सतत और समग्र आकलन इस प्रकार के मूल्यांकन के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव की मांग करता है।
  • यह सुझाव दिया जाता है कि प्रगति का मूल्यांकन वर्ष में 2 – 3 बार किया जाए। प्रत्येक चार और छः माह में) इस संबंध में अंतिम निर्णय विद्यालय लें। लेकिन बहुत जल्दी – जल्दी मूल्यांकन करने को निश्चित रूप से हतोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि सतत आकलन स्वतंत्र रूप से बच्चे के सीखने तथा उसमें सुधार की संभवनाओं के बारे में हैं।
  • अंक देने के बदले ग्रेड/स्तर दिए जाएँ। अक्सर अंक बच्चों में तुलना करते हैं तथा गलत निर्णय को भी पुष्ट करते हैं। यदि किसी बच्चे ने 70 अंक प्राप्त किये हैं और किसी ने 77 अंक प्राप्त किये हैं, इसके आधार पर दोनों की श्रेणियों में बहुत बाधा अंतर होगा पर अंकों के आधार पर दोनों की श्रेणियों में बहुत बड़ा अंतर दिखाई पड़ेगा।
  • रिपोर्ट कार्ड पर बच्चे के सीखने के स्तर को दर्शाने मात्र से बच्चे की रुचि के क्षेत्रों, उसकी खूबियों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। इन स्तरों के माध्यम से विवरणात्मक कथन/टिप्पणी देकर बच्चे के व्यक्तित्व के बहुत से पहलुओं के बारे में बताया जा सकता है।
  • यह आवश्यक है कि आकलन की रिपोर्ट अगले स्तर के अधिगम के विषय में सूचना दे और सुधार लाने में सहायक हो। आकलन को स्तर के अंत या अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अध्यापक शिक्षक तथा ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर/कलस्टर रिसोर्स कोऑर्डिनेटर की भूमिकाएं

 

शिक्षकों के व्यवसायिक विकास में अध्यापक शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सतत और समग्र मूल्यांकन को लागू करने के दौरान अध्यापक शिक्षकों तथा ब्लॉक रिसोर्स कोऑर्डिनेटर/क्लस्टर रिसोर्स कोऑर्डिनेटर के लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है। क्योंकि यही शिक्षकों को प्रशिक्षण देते हैं और कक्षा में सीखने – सिखाने की प्रक्रिया की मॉनिटरिंग करते हैं। शिक्षकों और अध्यापक शिक्षकों के व्यवासायिक विकास को प्रशिक्षण कार्यक्रम के एक सतत तथा अभिन्न अंग के रूप में समझे जाने की जरूरत है। इससे शिक्षकों को स्व आकलन करने की जरूरत व महत्व का पता चलेगा और वे बच्चों के अधिगम में सुधार लाने के लिए बदलाव का वाहक बनेंगे। शिक्षकों के लिए सेवारत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करते समय निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान रखें –

  • प्रशिक्षण की पद्धति संदर्भ व्यक्ति के व्याख्यान के आधार पर नहीं होना चाहिए। प्रशिक्षण को केवल अध्यापकों के लिए प्रशिक्षकों द्वारा सुझाये गये सी. सी. ई.  को लागू करने के तरीके या नीति को बताकर अव्यवस्थित ढंग से आयोजित नहीं किया जाए बल्कि कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जाएँ ताकि उन्हें विचार – विमर्श करने के अवसर मिलें और वे उस पर अपनी प्रतिक्रिया दें, साथ ही अपनी समस्याएँ भी रख सकें।
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम में सीखने सिखाने की विधि ऐसी हो जहाँ सतत और समग्र मूल्यांकन को कक्षा में लागू करने के तरीकों पर शिक्षकों को परस्पर बातचीत का अवसर मिलें। अपने विद्यालयों में कक्षाओं में वे सतत और समग्र मूल्यांकन किस प्रकार से कर रहे हैं, इन पर बातचीत से उन्हें एक - दुसरे से अपनी विधियाँ साझा करने और सीखने के अवसर मिलेंगे।
  • किसी भी विषय क्षेत्र में सतत और समग्र मूल्यांकन लागू करने के लिए उस विषय की प्रकृति की समझ, उसकी स्थिति तथा उस विषय की दृष्टि (जैसा कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा – 2005 में बताया गया है) बहुत मायने रखती है। इन सभी पक्षों पर समझ बनाए बगैर प्रशिक्षण कार्यक्रम का कोई औचित्य नहीं है।
  • विभिन्न राज्यों तथा केंद्र प्रशासित राज्यों में, उनके शिक्षा विभाग द्वारा सतत और समग्र मूल्यांकन के अंतर्गत बच्चे की प्रगति की रिकार्डिंग तथा रिपोर्टिंग के लिए कई तरह के प्रपत्रों विकसित किये गये हैं। शिक्षकों के अनुभव यह दर्शाते हैं कि इस प्रक्रिया में इन प्रपत्रों से कोई मदद नहीं मिलती है बल्कि उन प्रपत्रों को भरने में बहुत  समय लग जाता है। इसलिए, ऐसे प्रपत्रों को भरे जाने की निरुत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।
  • सतत और समग्र मूल्यांकन पर विकसित सामग्री शिक्षकों को देने के साथ उनसे साझा करते हुए उस पर चर्चा हो। सतत और समग्र मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों पर समझ का होना जरूरी है।
  • शिक्षक विभिन्न  स्थितियों में कार्य करते हैं जैसे – बहुसंख्य विद्यार्थी कक्षा, बहुश्रेणी कक्षा, दुर्गम स्थानों में विद्यालय का होना आदि। इसलिए एक ही तरह के रिकार्डिंग तथा रिपोर्टिंग के प्रपत्र से हमारा मकसद पूरा नहीं होगा। विद्यालयों तथा कक्षाओं की विभिन्न स्थितियों में क्या रिकॉर्ड करें, क्यों रिकॉर्ड करें तथा कैसे रिकॉर्ड करने के निर्धारित प्रपत्र, सतत और समग्र मूल्यांकन को सच्चे अर्थों में लागू करने में सहायक नहीं होंगे।
  • यह भी सुझाव दिया जाता है। कि विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों का आकलन करने के लिए छोटे क्विज, अतिरिक्त समय, विषय साधन निर्देशों का सरल होना ताकि ऐसे बच्चे उन्हें समझा सकें, उनके उत्तरों की ऑडियो रिकॉर्डिंग, विशेष प्रकार की चुनौती वाले बच्चों के आकलन में विशेषज्ञ तथा अभिभावकों की सहायता/प्रशासकों के लिए मार्गदर्शक बिन्दु हैं।
  • जब हम कक्षा में सीखना – सिखाना प्रारंभ करते है, हमें बच्चे के पूर्व में सीखे गये अनुभवों से जोड़ना चाहिए। शिक्षक को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ बच्चे भाषाओँ के संदर्भ में अल्पसंख्यक समूह में आये है जिन्हें जवाब देने में कठिनाई हो सकती है, ज्यादातर बार ऐसी स्थिति बच्चे की मातृभाषा और स्कूल की भाषा के अलग होने पर होती है।

प्रशासकों के लिए विस्तृत निर्देश क्या है?

 

सतत व सारगर्भित मूल्यांकन इस मान्यता पर आधारित है कि सीखना – सिखाना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो कि बच्चे और उसके सहपाठी तथा शिक्षक के बीच बातचीत/चर्चा पर निर्भर करती है। शिक्षक ही व व्यक्ति है जो कक्षा में बच्चों के साथ सबसे अधिक समय व्यतीत करते हैं। इसलिए बच्चे के सीखने की जरूरत, स्तर तथा प्रगति को आंकने के लिए शिक्षक ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति है। यदि रचनात्मक आकलन संबंधी कोई रिकॉर्ड रखना है, तो शिक्षिका को केवल सूचित कर दिया जाए, उसके बाद यह उन पर निर्भर करता है कि वह कौन – सा रिकॉर्ड रखना चाहते हैं। प्रत्येक कक्षा की हर गतिविधि का रिकॉर्ड रखना अव्यवहारिक और कठिन कार्य है, इससे सीखने – सिखाने में भी कोई मदद नहीं मिलेगी। कक्षा संचालन की अच्छी अवधि बच्चों के कुछ कार्यों का रिकॉर्ड (जैसे – लेखन कार्य, चार्ट्स, ग्राफ्स, मॉडल्स, प्रोजेक्ट्स, पोर्टफोलियो, रिपोर्ट्स, चित्रकारी इत्यादि) दुसरे लोगों जैसे अभिभावकों आदि के साथ यदि जरूरत पड़े तो साझा किया जाये। विद्यालय की एक  नीति हो कि शिक्षक क्या रिपोर्ट करें? लेकिन शिक्षक पर इस बात के लिए दबाव न डाला जाए कि वह अपनी प्रत्येक कक्षा तथा प्रत्येक गतिविधियों की निरंतर रिकार्डिंग तथा रिपोर्टिंग करें।

इसके लिए शिक्षा अधिकारीयों तथा विद्यालय निरीक्षकों द्वारा शिक्षक की स्वायत्तता को सम्मान दिया जाना जरूरी है। शिक्षक को सतत और समग्र मूल्यांकन के लिए जरूरी है कि कक्षा का वातावरण शिक्षक तथा बच्चों दोनों के लिए भयरहित हो। प्रशासक शिक्षकों को कक्षा में सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के दौरान बच्चों से बातचीत और आकलन के लिए उत्साहित करें न कि सबकुछ सिखाने के बाद। वे कक्षा में चल रही सीखने – सिखाने की प्रक्रिया के लिए शिक्षकों को अपना फीडबैक दें, जिसके लिए कुछ उदहारण पूर्व में दिए जा चुके हैं।

  1. प्रशासकों के लिए यह जानना जरूरी है कि विद्यालय में बच्चे के सीखने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षकों के साथ उनकी लगातार/नियमित बातचीत से ही अनेक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
  2. समय- सारिणी में लचीलापन बहूत जरूरी है। शिक्षकों ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में जो सीखा है, उन सभी विचारों को कक्षा में करने, देखने में समय सारिणी का लचीलापन सहायक होगा। यह लचीलापन पूरे स्कूल समय के भीतर ही होना चाहिए।
  3. शिक्षकों को सरलता से उपलब्ध स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल, बच्चों को कक्षा के बाहर जाकर सीखने के लिए प्रोत्साहित करें, जो कि कई बार प्रधानाध्यापकों द्वारा नहीं किया जाता है।
  4. शिक्षकों द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्राप्त जानकारी प्रधानाध्यापक तथा अन्य शैक्षिक अधिकारीयों जैसे – बी. आर. सी. के साथ  बांटीजानी चाहिए। इसमें सभी को अपने विभिन्न विषय क्षेत्रों में समय – समय पर शिक्षण शास्त्रीय अवधारणाओं में आए बदलावों के प्रति समझ  बनाने तथा अपने ज्ञान और जानकारी को समृद्ध करने में मदद मिलेगी।
  5. शिक्षकों को यह आजादी हो कि वे बच्चों की जरूरत के अनुसार पाठ्यक्रम का इस्तेमाल करें। उदहारण के लिए अधिकांश विद्यालयों में शिक्षकों पाठ एक निश्चित क्रम से पढ़ने होते हैं जो स्कूल सूझाता है। इस संबंध में शिक्षकों को स्वतंत्रता हो कि वे बच्चों की जरूरतों के अनुसार लचीलापन ला सकें।
  6. प्रशासकों तथा योजना निर्माताओं के लिए सतत और समग्र मूल्यांकन में प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन जरूरी है। इससे प्रशासकों तथा शिक्षकों के सीखने – सिखाने को लेकर विचारों में समानता आएगी।
  7. प्रशासकों की भूमिका सुपरवाइजर अथवा रिपोर्टिंग ऑफिसर तक ही सीमित नहीं है। वह विद्यालय में सीखने का वातावरण बनाए तथा एक मार्गदर्शक तथा सह्जकर्ता की भूमिका अदा करें।
  8. आकलन तथा मूल्यांकन से संबंधित सेमिनार तथा बैठकों में मुख्य – अध्यापकों तथा अध्यापकों को भाग लेने के अवसर दियें जाएँ।
  9. मूल्यांकन के लिए प्रपत्र का विकास विद्यालयी स्तर पर हो तथा प्रपत्र सरल हो।

इस प्रकार सतत और समग्र मूल्यांकन की प्रक्रिया प्रशासकों, अभिभावकों, शिक्षकों तथा बच्चों सभी के बीच उत्तरदायित्वों को साझा करने की मांग करती है।

स्त्रोत: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद्



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