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बिहार अनुदानित शिक्षण संस्थान प्राधिकार नियमावली

बिहार अनुदानित शिक्षण संस्थान प्राधिकार नियमावली

  1. परिचय
  2. प्रस्तावना
  3. संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारंभ
  4. परिभाषाएँ
  5. प्राधिकार की स्थापना
  6. प्राधिकार एवं उसके न्यायपीठों का गठन
  7. अध्यक्ष एवं सदस्य की नियुक्ति
  8. अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन भत्ते
  9. प्राधिकार का कार्य संचालन
  10. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियाँ
  11. प्राधिकार के स्टाफ
  12. प्राधिकार की अधिकारिता एवं शक्तियाँ
  13. प्राधिकार के समक्ष में आवेदन
  14. प्राधिकार की प्रक्रिया और शक्ति
  15. प्राधिकार के आदेश के पुनर्विलोकन की शक्ति
  16. अधिवक्ता की सहायता लेने का आवेदन का तथा प्रस्तूतिकरण पदाधिकारियों की नियुक्ति करने का विश्वविद्यालय आदि का अधिकार
  17. अंतरिम आदेश करने के संबंध में
  18. एक पीठ से दूसरे पीठ में मामला अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति
  19. बहुमत से विनिश्चय किया जाना
  20. प्राधिकार के आदेशों का निष्पादन
  21. प्राधिकार के सदस्य और कर्मचारी लोक सेवक माना जाना
  22. सदभावपूर्वक की गई करवाई का संरक्षण
  23. कठिनाइयाँ दूर करने की शक्ति
  24. विनियमावली बनाने के राज्य सरकार की शक्ति
  25. नियमावली का पटल पर रखा जाना

परिचय

राज्य में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय से संबंधन प्राप्त महाविद्यालय, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा प्रस्विकृत माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थापित है। तीनों स्तर के शिक्षण संस्थान की संख्या 1000 से भी अधिक है। उपरोक्त कोटि के शिक्षण संस्थान वित्त रहित संस्थान की श्रेणी में थे। समय-समय पर, उनको वित्तीय सहायता देने की मांग होती रहती थी और साथ ही साथ जन प्रतिनिधियों के द्वारा भी इस प्रकार की मांग की जाती थी। राज्य सरकार ने, सम्यक विचारोपरांत, ऐसे संस्थानों को परफोर्मेंस वेस्ड अनुदान दिए जाने का नीतिगत फैसला लिया। अनुदान दिए जाने का आधार उन संस्थान से उत्तीर्ण विद्यार्थीयों की संख्या पर आधारित है। राज्य सरकार का यह भी फैसला है कि अनुदान की राशि से सर्वप्रथम शिक्षक एवं शिक्षेकत्तर कर्मियों को वेतन दिया जाए।

प्रस्तावना

अनुदान उपलब्ध कराए जाने के उपरांत उपरोक्त कोटि के शिक्षण संस्थानों में विभिन्न प्रकार के विवाद उत्पन्न हुए हैं। किसी संस्थान में प्रबंध समिति गठन को लेकर विवाद है, किसी में शिक्षक अथवा शिक्षकेत्तर कर्मियों की नियुक्ति को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष भी बड़ी संख्या में बाद विचारार्थ लाए गए हैं, जिनका या तो निष्पादन हो चुका है या विचारार्थ लंबित है। माननीय उच्च न्यायालय ने भी यह आदेश पारित किया है की अनुदान की राशि का वितरण युक्तियुक्त ढंग से किया जाना चाहिए जिससे कि वह राशि लाभूकों तक उपयुक्त ढंग से वितरित किया जा सके।

राज्य सरकार के विश्वविद्यालयों, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति  एवं साथ ही साथ माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष बड़ी संख्या में विवाद लाए जाते हैं और इस कारण अनुदान वितरण किए जाने में विलंब होता है। साथ ही साथ अनुदान वितरित किए जाने के बाद भी विभिन्न प्रकार की शिकायतें प्राप्त होती हैं। उपर्युक्त समस्या का निवारण करने हेतु यह आवश्यकता महसूस है की इसके लिए निष्पक्ष एवं स्वतंत्र व्यवस्था स्थापित किया जाए।

उपरोक्त के आलोक में राज्य सरकार का यह समाधान हो गया है कि अनुदानित महाविद्यालयों, उच्च माध्यमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों (अल्पसंख्यक सहित) में विवाद के निवारण एवं निराकरण हेतु एक स्वतंत्र प्राधिकार का गठन किया जाए।

इसलिए अब भारक संविधान के अनुच्छेद 162 के प्रदत्त शक्तियों को प्रयोग करते हुए राज्य, सरकार, बिहार एतद द्वारा, विश्वविद्यालयों से संबद्धता प्राप्त महाविद्यालय (इंटर स्तर सहित), बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से प्रस्विकृत इंटर महाविद्यालय (उच्च माध्यामिक विद्यालय), शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्विकृत/स्थापना अनुमित प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों, जो अनुदान प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं, के प्रबंध समिति से संबंधित सभी विवादों और इन संस्थानों के शिक्षक/शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की सेवा-शर्तों से संबंधित सभी विषयों और सम्बंद्ध विषयों और इससे जुड़े अन्य सभी प्रकार के विवादों के निवारण एवं निराकरण हेतु, स्वतंत्र प्राधिकार के गठन एवं स्थापना, उसके कार्य संचालन एवं प्रक्रिया के अवधारणा हेतु निम्नलिखित नियमावली बनाती है :-

संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारंभ

  1. यह नियमावली “बिहार अनुदानित शिक्षण संस्थान प्राधिकार नियमावली 2015” कही जा सकेगी।
  2. इसका विस्तार सम्पूर्ण बिहार में होगा।
  3. यह राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से प्रवृत्त होगी।

परिभाषाएँ

जब तक संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो, इस नियमावली में :-

I. “राज्य सरकार’ से अभिप्रेत है बिहार राज्य सरकार,

II. “विभाग” से अभिप्रेत है शिक्षा विभाग,

III. “प्राधिकार” से अभिप्रेत है इस नियमावली के नियम (4) के अधीन गठित बिहार अनुदानित शिक्षक संस्थान प्राधिकार,

IV.“ न्यायपीठ” से अभिप्रेत है प्राधिकार का न्यायपीठ,

V.“अध्यक्ष” से अभिप्रेत है प्राधिकार का अध्यक्ष,

VI.“न्यायिक सदस्य” से अभिप्रेत है इस नियमावली के अधीन इस रूप में नियुक्त प्राधिकार का सदस्य जो नियम (6) के उप नियम (3) में विनिद्रिष्ट आर्हत्ता रखता हो.

VII. अनुदानित महाविद्यालय से अभिप्रेत है बिहार राज्य में स्थापित इंटर स्तर तक संस्थान सहित जिसे रही के किसी विश्वविद्यालय से संबंद्धता प्राप्त है एवं अनुदान की पात्रता रखते हैं;

VIII. “प्रशासनिक सदस्य” से अभिप्रेत है बिहार राज्य में स्थापित इंटर स्तर तक संस्थान सहित जिसे राज्य के किसी विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त है एवं अनुदान की पात्रता रखते हैं;

IX. इंटर या उच्च माध्यमिक विद्यालय से अभिप्रेत है वैसे सभी विद्यालय जो इंटर या +2 स्तर तक की शिक्षा देने के लिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा विधिवत प्रस्विकृत/स्थापना अनुमति प्राप्त है एवं अनुदान की पात्रता रखता हों;

X. माध्यमिक विद्यालय से अभिप्रेत है राज्य के वैसे सभी माध्यमिक विद्यालयों जो 10वीं तक की शिक्षा विभाग से प्रस्विकृत/स्थापना अनुमति प्राप्त है एवं अनुदान की पात्रता रखते हों;

XI. प्रबंध समिति से अभिप्रेत है महविद्यालयों के संचालन हेतु संबंद्ध विश्वविद्यालय द्वारा विधिमान्य रूप से गठित प्रबंध समिति एवं उच्च माध्यमिक विद्यालय (इंटर महाविद्यालय)/माध्यमिक विद्यालय में बिहार परीक्षा समिति द्वारा विधिवत रूप से गठित प्रबंध समिति, शासी निकाय, तदर्थ समिति;

XII. प्रबंध समिति के अध्यक्ष से अभिप्रेत है अनुदान की पात्रता रखने वाले विद्यालय या महाविद्यालय के संचालन हेतु विधिमान्य रूप से गठित प्रबंध समिति का अध्यक्ष अथवा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में विहित रीति से निर्वाचित अध्यक्ष;

XIII. बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से अभिप्रेत है राज्य सरकार द्वारा स्थापित बिहार विद्यालय परीक्षा समिति;

XIV. विश्वविद्यालय से अभिप्रेत है राज्य के ऐसे सभी विश्वविद्यालय जिन्हें महाविद्यालयों को संबद्धता प्रदान करने का अधिकार प्राप्त हो;

XV. अनुदान से अभिप्रेत है राज्य सरकार द्वारा अनुदानित शिक्षण संस्थान को उपलब्ध करायी गया आर्थिक सहायता;

XVI. संस्थान से अभिप्रेत है राज्य के सभी विश्वविद्यालयों से संबद्धता प्राप्त इंटर स्तर सहित महाविद्यालय , बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से प्रस्विकृति प्राप्त इंटर या उच्च माध्यमिक विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालय जो अनुदान प्राप्त करने की पात्रता रखते हों, के प्रबंध समिति से संबंधित सभी विवाद और इन शिक्षण संस्थानों के शिक्षक/शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की सेवा-शर्त से संबंधित सभी विषय यथा, पारिश्रमिक एवं अन्य सेवा – लाभ, नियुक्ति, प्रोन्नति, सेवाशर्त, किसी प्रकार के अवकाश, अनूशासनिक विषय और संबद्ध विषयों और इससे जुड़े अन्य सभी प्रकार के विवाद;

XVII.महाविद्यालय, उच्च माध्यमिक विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालय कोष से अभिप्रेत है संस्थान को अनुदान सहित सभी मदों से प्राप्त होने वाली राशि;

XVIII. किसी विवाद से अभिप्रेत है विश्वविद्यालयों से संबद्धता प्राप्त इंटर स्तर सहित महाविद्यालय, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से प्रस्विकृति प्राप्त इंटर या उच्च माध्यमिक विद्यालय एवं माध्यमिक विद्यालय जो अनुदान प्राप्त करने की पात्रता रखते हों, के प्रबंध समिति से संबंधित सभी विवाद और इन शिक्षण संस्थानों के शिक्षक/शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की सेवा-शर्त से संबंधित सभी विषय यथा, पारिश्रमिक एवं अन्य सेवा-लाभ, नियुक्ति, प्रोन्नति, सेवा शर्त, किसी प्रकार के अवकाश, अनूशासनिक विषय और संबंद्ध विषयों और इससे जुड़े अन्य सभी प्रकार के विवाद;

XIX. विनियमावली से अभिप्रेत है इस नियमावली के अधीन विहित प्रक्रिया द्वारा गठित विनियमावली।

प्राधिकार की स्थापना

(1) राज्य सरकार अनुदानित शिक्षण संस्थानों के सभी प्रकार के विवादों के निवारण एवं निराकरण हेतु एक प्राधिकार की स्थापना कर सकेगी तथा प्राधिकार इस नियमावली के अधीन प्रदत्त अधिकारिता एवं शक्तियों का प्रयोग करेगा।

(2) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा आवश्यकतानुसार प्राधिकार के एक अथवा एक से अधिक न्यायपीठों की स्थापना कर सकेगी, जो प्राधिकार को प्रदत्त अधिकारता एवं शक्तियों का प्रयोग करेगा।

प्राधिकार एवं उसके न्यायपीठों का गठन

(1) प्राधिकार में एक अध्यक्ष एवं एक से अधिक न्यायायिक एवं प्रशासनिक सदस्य की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा विधिमान्य प्रक्रिया के अधीन की जाएगी।

(2) प्राधिकार के न्यायपीठ एक न्यायिक सदस्य एवं एक प्रशासनिक सदस्य को मिलकर गठित होगी।

(3) उप नियम (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अध्यक्ष, जिस न्यायपीठ के लिए न्यायिक सदस्य अथवा प्रशासनिक सदस्य नियुक्त हुआ हो, उसके कार्यों को निष्पादन करने के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायपीठ के यथास्थिति, न्यायिक से किस अन्य न्यायपीठ में स्थानांतरित कर सकेंगे, एक न्यायपीठ के लिए नियुक्त यथाशक्ति न्यायिक सदस्य अथवा प्रशासिनक सदस्य को, किसी अन्य न्यायपीठ के न्यायिक सदस्य अथवा प्रशासिनक सदस्य के कृत्यों को भी निर्वहन करने के लिए प्राधिकृत कर सकेंगे, और किसी मामला या, मामलों को जिसमें अंतर्गतस्त प्रश्नों की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उनकी राय में अथवा इस निमित राज्य सरकार द्वारा बनाई गई विनियमावली के अधीन दो से अधिक सदस्यों वाली न्यायपीठ द्वारा निर्णय लिए जाने की अपेक्षा हो, सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ ऐसा सामान्य अथवा विशेष आदेश, जैसा वह उचित समझे, निर्गत कर सकेंगे।

इस नियम के पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष अथवा इस निमित अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य सदस्य, सदस्यीय न्यायपीठ के रूप में कार्य करने के लिए सक्षम होगा और उन वर्गों के मामलों अथवा मामलों के उन वर्गों से संबंधित उन विषयों के बारे में प्राधिकार की अधिकारिता एवं शक्तियों को प्रयोग करेंगे. जो अध्यक्ष द्वारा, सामान्य अथवा विशेष आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट किये जाए।

परंतु यदि ऐसे किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर, अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत हो कि ऐसा मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि उसकी सुनवाई (दो सदस्यों से) मिलकर बने किसी न्यायपीठ द्वारा की जानी चाहिए यथास्थिति तो ऐसा मामला या विषय, अध्यक्ष द्वारा अंतरित किया जा सकेगा या ऐसी न्यायपीठ को, जो अध्यक्ष ठीक समझे, अंतरित किए जाने के लिए उसको निर्देशित किया जा सकेगा।

अध्यक्ष एवं सदस्य की नियुक्ति

(1) राज्य सरकार प्राधिकार के पीठासीन पदाधिकारी के रूप में अध्यक्ष की नियुक्ति कर सकेगी।

(2) अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हेतु उस व्यक्ति को माननीय उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुभव होना आवश्यक होगा। अध्यक्ष की नियुक्ति पदावधि नियुक्ति का तिथि से 5 वर्षों अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होगी।

(3) प्राधिकार के न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति हेतु संबंधित व्यक्ति को जिला न्यायाधीश अथवा समकक्ष पद पर कार्य करने का अनुभव होना आवश्यक होगा। सदस्य का पदावधि, नियुक्ति की तिथि से 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु जो भी हो पहले तक होगा।

(4) प्रशासनिक सदस्य के रूप में नियुक्ति हेतु कोई भी तबतक अर्हित नहीं होगा, जबतक उसे राज्य अथवा केंद्र सरकार में प्रधान सचिव/ सचिव के पद का कार्यानुभाव नहीं हो अथवा अखिल भारतीय सेवाओं में प्रधान सचिव/सचिव के समकक्ष पद कार्यानुभाव नहीं हो।

प्रशासनिक सदस्य की पदावधि, नियुक्ति की तिथि से 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होगा।

अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन भत्ते

अध्यक्ष एवं सदस्य के रूप में नियुक्त व्यक्ति को, उनके पूर्व धरती पद पर प्राप्त वेतन एवं भत्ते में से प्राप्त पेंशन को घटाकर वेतन- भत्ते देय होगा। उनकी सेवा-शर्त्ते वही होंगी जो राज्य सरकार द्वारा विनिश्चित की जाए।

प्राधिकार का कार्य संचालन

(1) त्याग पत्र और पद से हटाया जाना – अध्यक्ष और अन्य सदस्य, राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्तलिखित नोटिस द्वारा, अपने पद से त्यागपत्र दे सकेंगे।

परन्तु जबतक अध्यक्ष अन्य सदस्य को राज्य सरकार द्वारा अपना पद त्याग करने के लिए अनुज्ञात न कर लिया जाय, वह ऐसी नोटिस देने की तारीख से तीन माह की अवधि के अवसान तक अथवा जब तक सम्यक रूप से नियुक्त उसका उत्तराधिकारी पद धारण न कर ले अथवा अपनी पदावधि की समाप्ति तक, जो भी सबसे पहले हो, अपने पद पर बना रहेगा।

(2) अध्यक्ष अथवा किसी अन्य सदस्य के संबंध में, उच्च न्यायालय के कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की गई जाँच, के पश्चात जिसमें ऐसे अध्यक्ष अथवा अन्य सदस्य को उनके विरूद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दी जा चुकी हो और उन आरोपों के संबंध में उन्हें सुने जाने का समुचित अवसर दिया गया हो, प्रमाणित कदाचार अथवा असमर्थता के आधार पर राज्य सरकार द्वारा दिए गए आदेश के सिवाय, उनके पद से हटाया नहीं जाएगा।

(3) राज्य सरकार, अध्यक्ष अथवा अन्य सदस्य के कदाचार अथवा असमर्थता की जाँच की प्रक्रिया को, विनियमों द्वारा विनियमित कर सकेगी।

अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियाँ

अध्यक्ष, न्यायपीठों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करा जो, राज्य सरकार द्वारा बनाये गए विनियमों के अधीन, उसमें निहित की जायें।

प्राधिकार के स्टाफ

(1) राज्य सरकार प्राधिकार के कृत्यों के निर्वहन में मदद के लिए अपेक्षित पदाधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का प्रकृति और कोटि अवधारित करेगी और प्राधिकार को ऐसे पदाधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को उपलब्ध कराएगी जिसे वह उचित समझे।

(2) प्राधिकार के पदाधिकारी और अन्य कर्मचारी अध्यक्ष के सामान्य अधीक्षण में अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे।

(3) प्राधिकार के पदाधिकारियों और अन्य कर्मचारीयों के वेतन एवं भत्ते और सेवा-शर्तें वहीं होगी जो राज्य सरकार, विनियमों द्वारा,  विनिद्रिष्ट किए जायें।

प्राधिकार की अधिकारिता एवं शक्तियाँ

प्राधिकार राज्य के विश्वविद्यालयों से संबंद्धता प्राप्त इंटर स्तर सहित महाविद्यालय, बिहार विद्यालय परीक्षा समिति से प्रस्वीकृति/स्थापना अनुमित प्राप्त इंटर विद्यालय या उच्च माध्यमिक विद्यालय, माध्यमिक विद्यालय एवं शिक्षा विभाग द्वारा प्रस्वीकृत/स्थापना अनुमति प्राप्त माध्यमिक विद्यालय, जो अनुदान प्राप्त करने की पात्रता रखते हों की प्रबंध समिति से संबंधित सभी विवाद और इस शिक्षण संस्थानों के शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के सेवा-शर्तों से संबंधित सभी विषय यथा, पारिश्रमिक एवं अन्य सेवा लाभ, नियुक्ति, प्रोन्नति, सेवाशर्त, किसी प्रकार का अवकाश, अनुशासनिक विषय और संबंद्ध विषयों और इससे जुड़े अन्य सभी प्रकार के विवादों अथवा शिकायतों के विचारण और न्याय निर्णयन के संबन्ध में अपनी सभी अधिकारिता एवं शक्तियों का प्रयोग करेगा।

प्राधिकार के समक्ष में आवेदन

(1) इस नियमावली के अन्य उपबंधों के अध्याधीन, प्राधिकार विशेष की अधिकारिता के भीतर किसी विषय से संबंधित किसी आदेश द्वारा व्यथित कोई व्यक्ति अपनी शिकायत के निराकरण लिए प्राधिकार के समक्ष आवेदन कर सकेगा।

(2) प्राधिकार, कोई आवेदन तब तक सामान्यत: स्वीकार नहीं करेगा जबतक उसका समाधान न न हो जाए कि आवेदन शिकायतों के निराकरण के संबंध में सुसंगत प्राधिकार के अधीन, उपलब्ध सभी उपायों का उपयोग कर लिया गया है।

(3) जहाँ आवदेन शिकायतों के संबन्ध में अंतिम आदेश किए जाने की तिथि से एक वर्ष के भीतर न दिया गया वहां उसे ग्रहण नहीं किया जाएगा।

प्राधिकार की प्रक्रिया और शक्ति

(1) प्राधिकार, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में दी गयी प्रक्रिया द्वारा आवद्ध नहीं होगा, किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों और इस नियमावली के अन्य उपबंधो के अध्यधीन तथा राज्य सरकार द्वारा बनाई गई विनियमावली के प्रावधानों का अनुपालन करेगा। प्राधिकार को अपनी जाँच-पड़ताल के स्थान और समय नियत करने और यह निर्णय करने कि वह सार्वजनिक तौर पर हो या निजी तौर परम निर्णय करने सहित अपनी प्रक्रिया विनिश्चित करने की शक्ति होगी।

(2) प्राधिकार दिए गए प्रत्येक आवेदन पर, यथा संभव शीघ्रता से, निर्णय करेगा और द्स्तावेओं तथा लिखित अभ्यावेदन का परिशीलन एवं ऐसे मौखिक तर्क, जो उसे दिए जाए, पर सुनवाई करने के बाद सामान्यता प्रत्येक आवदेन न्यायानिर्णित किया जाएगा।

(3) इस नियमावली के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन करने के प्रयोजनार्थ, निम्नलिखित विषयों से संबंधित वाद का विचरण करते समय प्राधिकार को वही शक्तियाँ होगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित है; यथा –

क) किसी व्यक्ति को समन जारी करना और हाजिर कराने और शपथ पर उसकी परीक्षा करने;

ख) दस्तावेज की खोज और प्रस्तुत करने की अपेक्षा करने;

ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करने,

घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 एवं 124 के उपबंधो के अध्यधीन किसी कार्यालय से लोक अभिलेख अथवा दस्तावेज अथवा ऐसे अभिलेख अथवा दस्तावेज की छाया प्रति की अपेक्षा करने;

ङ) साक्ष्यों अथवा दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमिशन जारी करने;

च) अभ्यावेदन में पाई गई त्रुटि के लिए अभ्यावेदन को ख़ारिज करने अथवा एकपक्षीय निर्णय करने;

छ) अभ्यावेदन में पाई गई त्रुटियों के कारण किसी अभ्यावेदन को ख़ारिज करने के किसी आदेश को अथवा एकपक्षीय पारित किसी आदेश को अपास्त करना, और

ज) कोई अन्य विषय जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए।

प्राधिकार के आदेश के पुनर्विलोकन की शक्ति

प्राधिकार अपने आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और उसमें पाई गई किसी त्रुटि का सुधार कर सकेगा।

अधिवक्ता की सहायता लेने का आवेदन का तथा प्रस्तूतिकरण पदाधिकारियों की नियुक्ति करने का विश्वविद्यालय आदि का अधिकार

1) इस नियमावली के अधीन प्राधिकार के समक्ष आवेदन करने वाला प्राधिकार के समक्ष अप मामला प्रस्तुत करने के लिए या तो स्वयं उपस्थित हो सकेगा या अपनी पसंद के अधिवक्ता की सहायता ले सकेगा।

2) विश्वविद्यालय/अंगीभूत/संबंद्ध महाविद्यालय, प्रस्तूतिकरण पदाधिकारी के रूप में काम करने के लिए, एक या अधिक अधिवक्ताओं को अथवा अपने पदाधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगा और इसके द्वारा इस रूप में प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति प्राधिकार के समक्ष, किसी आवेदन के संबंध में, उनका मामला प्रस्तुत कर सकेगा।

अंतरिम आदेश करने के संबंध में

इस नियमावली के किसी अन्य उपबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी आवेदन पर अथवा इससे संबंधित किसी कार्यवाही में कोई अंतरिम आदेश (छह वह व्यादेश या किसी अन्य रीति से) स्थगन के माध्यम से तबतक नहीं किया जा सकेगा जबतक कि

क) ऐसे आवेदन तथा ऐसा आदेश के समर्थन में दिए गए तर्क से संबंधित सभी दस्तावेज की प्रतियाँ उस पक्षकार को न दे दी गई हो जिसके विरूद्ध ऐसा आवेदन किया गया हो या करने के लिए प्रस्तावित हो; और

ख) ऐसे पक्षकार को उस मामले में सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो;परन्तु प्राधिकार, विशेष परिस्थिति में, अंतरिम आदेश करने के लिए खंड (क) और (ख) की अपेक्षाओं का त्याग कर सकेगा, यदि लिखित रूप में अभिलिखित किए जाने वाले वैसा कारणों से उसका समाधान हो जाए कि आवेदक को ऐसी किसी हानि, जिसकी प्रतिपूर्ति धन से पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती, से बचाने के लिए वैसा करना आवश्यक है।

एक पीठ से दूसरे पीठ में मामला अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति

किसी पक्षकार के आवेदन पर तथा पक्षकारों को नोटिस देकर और उसकी सुनवाई के पश्चात अथवा स्वप्रेरणा से, अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामलों को किसी दुसरे न्यायपीठ में अंतरित कर सकेंगे।

बहुमत से विनिश्चय किया जाना

यदि किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी बिन्दु पर मतभिन्नता हो तो, उस बिन्दु पर निर्णय, यदि बहुमत हो तो, बहुमत से लिया जाएगा, किन्तु यदि सदस्य बराबर-बराबर हो तो वे उस बिन्दु या बिन्दुओं को बताएँगे जिस पर उनकी मत भिन्नता हो और अध्यक्ष को निर्देश करेंग, जो उस बिन्दु या उन बिन्दुओं की या तो स्वयं सुनवाई करेंगें अथवा प्राधिकार के एक या अधिक अन्य सदस्यों द्वारा ऐसे बिन्दुओं  को सुनवाई के लिए निर्देश करेंगे और ऐसे बिन्दुओं पर निर्णय प्राधिकार के सदस्यों, जिसमें वे भी शामिल होंगे जिन्होंने प्रथमत: उसकी सुनवाई की थी, की बहुमत की राय से किया जाएगा अर्थात मतभिन्नता की स्थिति में अध्यक्ष द्वारा वाद का निष्पादन अथवा विशेष पीठ का गठन किया जाएगा।

प्राधिकार के आदेशों का निष्पादन

इस नियमावली और इसके अधीन बनायी गयी नियमावली के अन्य उपबंधों के अध्यधीन, किसी आवेदन या अपील को अंतिम रूप से निपटाने वाले प्राधिकार का आदेश अंतिम होगा

प्राधिकार के सदस्य और कर्मचारी लोक सेवक माना जाना

अध्यक्ष, अन्य सदस्य तथा नियम- 10 के अधिन उपलब्ध कराये गए पदाधिकारी और कर्मचारी भारतीय दंड सहिंता 1860 (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अंतर्गत लोक सेवक माने जायेंगे।

सदभावपूर्वक की गई करवाई का संरक्षण

इस नियमावली या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सदभावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए, राज्य सरकार या विश्वविद्यालय या अध्यक्ष अथवा प्राधिकार के अन्य सदस्य या ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरूद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं चलायी जाएगी।

कठिनाइयाँ दूर करने की शक्ति

(1) इस नियमावली के उपबन्धों के प्रभावी करने में यदि कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो राज्य सरकार, राजपत्र के प्रकाशित आदेश द्वारा, उस कठिनाई को दूर करने के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगी जो यथावश्यक एवं समीचीन प्रतीत हो और इस नियमावली के उपबन्धों के असंगत न हो;

(2) इन नियम के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के बाद यथाशीघ्र, विधान मंडल के समक्ष रखा जाएगा।

विनियमावली बनाने के राज्य सरकार की शक्ति

(1) राज्य सरकार इस नियमावली के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा. विनियमावली बना सकेगी।

(2) पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसी विनियमावली, में निम्नलिखित सभी या किसी विषय से संबंधित उपबंध होंगे. यथा –

क) दो या अधिक सदस्यों वाले न्यायपीठ द्वारा निर्णय लिया जाने वाला मामला या मामले;

ख) अध्यक्ष अथवा अन्य सदस्यों के कदाचार या असमर्थता की जाँच –पड़ताल के लिए नियम – 8 के उपनियम (3) के अधीन प्रक्रिया,

ग) अध्यक्ष तथा अन्य सदस्यों को भुगतेय वेतन भत्ते, तथा अन्य निर्बन्धन एवं शर्ते,

घ) नियम – 12 के अधीन आवदेन देने हेतु विहित प्रपत्र एवं आवेदन के साथ संलग्न किये जाने वाले, दस्तावेज एवं अन्य कागजात और विहित फ़ीस;

ङ) इस नियमावली अध्यधीन,म नियम – 15 के उपनियम (1) के अधीन अपनी प्रक्रिया विनिश्चित करने हेतु अध्यक्ष की शक्ति;

च) नियम – 9 के अधीन प्राधिकार के न्यायपीठों पर प्राधिकार के अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियाँ,

छ) नियम – 10 के उपनियम (3) के अधीन प्राधिकार के पदाधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवाशर्तें, और

ज) कोई अन्य विषय, जिसके संबंध में राज्य सरकार द्वारा नियमावली बनाने की अपेक्षा हो।

नियमावली का पटल पर रखा जाना

यह नियमावली को बनाए जाने या अधिसूचित किया जाने के बाद यथा शीघ्र विधान मंडल के पटल पर 15 दिनों तक रखा जाएगा। परन्तु, नियमावली में कोई संशोधन स्वीकृत होने की स्थिति में उस हद तक यह संशोधित मानी जाएगी अन्यथा अपने मूल रूप में यथावत प्रवृत्त रहेगा।

 

स्रोत: शिक्षा विभाग, बिहार सरकार



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