অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

परा-शिक्षकों का प्राथमिक शिक्षा में प्रभावशाली योगदान

प्रतिक्रियाओं का संक्षिप्‍त विवरण

परा-शिक्षकों द्वारा किए कार्य, सामुदायिक धारणाओं, भर्ती की नीतियों तथा जीवन गुणवत्ता से जुड़े एक सवाल के जवाब में, प्रतिवादी ने इन विषयों पर चर्चाएं कीं और हालात बेहतर कैसे बनाए जाएं इसका सुझाव भी दिया।

छात्रों की सफलता में परा-शिक्षकों की भूमिका

कुल मिलाकर, सदस्‍यों ने यह महसूस किया कि बच्‍चों की शैक्षणिक सफलता, पंजीकरण में प्रोत्‍साहन, उपस्थिति और इनके आपसी संबंधों आदि में परा-शिक्षकों को एक सकारात्‍मक अंतर लाने की जरूरत है।

इनकी जरूरत खासतौर से त‍ब होती है, जब शिक्षक उपस्थित न हों, इनकी कमी हो या वैसी स्थितियों में जिनमें शिक्षक-छात्र अनुपात अधिक हो। परा-शिक्षक आधारभूत ग्रहण क्षमता में कमजोर छात्रों की मदद कर सकते हैं, ताकि उन्हें छात्राओं (यदि परा-शिक्षक महिला हो) के साथ काम करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। इसके लिए क्रियाकलाप आधारिक शिक्षण का प्रयोग किया जा सकता है, जो गहन तो होता ही है, साथ ही इसे अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत होती है। उदाहरण के लिए, परा-शिक्षकों ने हरियाणा, उत्तरप्रदेश और गुजरात की परियोजनाओं का उपयोग, पंजीकरण में वृद्धि‍ करने, इसे बनाए रखने, और छात्राओं की सफलता ‍में किया। परिचर्चाकर्ताओं ने कई अध्‍ययन सामग्रियों का हवाला देते हुए बताया कि परा-शिक्षक इनकी मदद से मिले-जुले परिणाम लाए हैं। ऐसे मामले सामने गए, जिनमें परा-शिक्षक द्वारा संतोषजनक परिणाम लाने वाले छात्रों से लेकर, परा शिक्षकों के निम्‍नस्‍तरीय परिणाम (सेवाकालीन निवेशों के बावजूद) वाले छात्र थे। अन्‍य अध्‍ययनों से यह पता चला कि शिक्षकों और परा-शिक्षकों की सफलताओं के स्‍तरों में कोई अंतर नहीं रहा, ज‍बकि दूसरे अध्‍ययन ने बुरे नतीजे लाने वाले ग्रेड 1-3 के छात्रों की व्‍यापक सफलता की ओर इंगित किया। प्रतिवादियों ने यह भी पाया कि राज्‍य प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP) के प्रकरण में वे परा-शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के प्रति जागरूक थे, परंतु सर्वशिक्षा अभियान (SSA) के संदर्भ में ऐसा नहीं था। साझा अध्‍ययनों के साथ-साथ सदस्‍यों ने तमिलनाडु, और उत्तरप्रदेश में, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए काम कर रहे परा-शिक्षकों के संगठनों, और छात्रों की दक्षता के स्‍तर को सुधारने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति करने वाली अखिल भारतीय पहल के प्रयासों पर भी प्रकाश डाला है।

हलांकि प्रतिवादियों ने उस समय यह भी खुलासा किया कि, परा-शिक्षक के अंतर्गत छात्रों की दीर्घकालीन सफलता केवल संतोषजनक या खराब प्रदर्शन की ओर प्रवृत रही, क्‍योंकि परा-शिक्षकों को जैसे-तैसे भुगतान प्रशिक्षित किया जाता है और इसके अलावा, चूंकि ‘’परा-शिक्षकों’’ की स्थिति अनुबंधपूर्ण होती है, इसलिए यहां व्‍यावसायिक या भविष्‍य निर्माण का कोई रास्‍ता नहीं होता। इसके अतिरिक्‍त, हालांकि समाज में आम तौर पर इनका महत्‍व समझा जाता है, परंतु इन्‍हें ‘अस्थायी’/असली शिक्षक नहीं’’ कहा जाता है। इन मसलों को रखने से परिचर्चाकर्ताओं ने यह माना कि नियमित शिक्षकों को आधार प्रदान करने के लिए परा-शिक्षक सबसे उपयुक्‍त हैं, परंतु अच्‍छी तरह से प्रशिक्षित शिक्षक वर्गों के विकल्‍प के रूप में ये कार्य नहीं करते।

परा-शिक्षकों की सामाजिक धारणा

परिचर्चा के दौरान इन बातों पर भी प्रकाश डाला गया कि समाज क्‍यों परा-शिक्षक की भूमिका को महत्‍व देना चाहता है। सदस्‍यों ने ईमानदारी, सामयिकता, उत्‍साह, वचनबद्धता के स्‍तर, साथ ही यह सच्‍चाई कि ये समाज के अंग हैं, आदि बातों को सामने लाया। फिर यह भी एक तथ्य है कि प्राय׃ समाज यह जानता है कि अपनी नौकरी के उद्देश्‍य से काम करने के अलावा परा-शिक्षकों के पास कोई अन्‍य विकल्‍प नहीं होता।

परा-शिक्षकों के लिए बनाई गई नियुक्ति नीतियां

प्रतिवादियों ने यह पाया कि औपचारिक और अनौपचारिक विद्यालयों दोनों में परा-शिक्षकों की नियुक्ति होती है। औपचारिक व्‍यवस्‍था से नियुक्‍त परा-शिक्षक, नियमित शिक्षकों से बहुत कम वेतन पाते हैं और इनकी नियुक्ति, (उम्र को ध्‍यान में रखकर, शिक्षा स्‍तर, स्‍थान इत्‍यादि) भुगतान, अनुबंध की कार्यअवधि, और कार्य प्रदर्शन के संचालन इत्यादि के लिए नियम बनाए गए हैं। हालांकि व्‍यवहार में परा-शिक्षकों की बड़े पैमाने पर नियुक्ति पंचायत सरपंच के द्वारा होती है। सदस्‍यों ने परा-शिक्षक की अवधारणा पर ऐसे भी उदाहरण प्रस्तुत किए जिसमें विद्यालयों में शिक्षकों को एक ‘’मेहमान शिक्षक’’ के रूप में प्रति व्‍याख्‍यान के आधार पर रखा जाता हो।

परा-शिक्षकों का जीवन

परिचर्चाकर्ताओं ने बताया कि ज्‍यादातर परा शिक्षक यह स्थिति इसलिए स्‍वीकार करते हैं, क्‍योंकि वहां स्‍थानीय रूप से उपलब्‍ध कोई अन्‍य नौकरी नहीं होती है। उन्‍होंने यह भी जाना कि परा-शिक्षक संगठित नहीं होते हैं और उनकी समस्‍याओं को व्‍यक्‍त करने के लिए कोई प्रतिनिधित्‍व निकाय नहीं होता।

परा-शिक्षकों के अनुभवों के अध्‍ययन से यह पता चलता है कि इनमें से कई के साथ वेतन के मामले में भेदभाव किया जाता है और इन्‍हें अपनी नौकरी की सुरक्षा की चिंता लगी रहती है। यह भी बताया गया कि परा-शिक्षकों के लिए किसी प्रकार की व्‍यावसायिक विकास या सामंजस्‍य की नीति, जो उन्‍हें व्‍यवस्थि‍त ढंग से चला सके, उपलब्‍ध नहीं है।

इसी कारण कई परा-शिक्षक सरकारी विद्यालयों में अनुभव लेने के पश्‍चात निजी विद्यालयों की ओर पलायन कर जाते हैं।

सदस्‍यों ने राजस्‍थान में चलाई जा रही शिक्षा कर्मी परियोजना पर प्रकाश डाला, जिसमें परा शिक्षकों के विकास के लिए व्‍यवस्थित और गहन क्षमता वाली निर्माण योजना शामिल है।

हालांकि उत्तरदाताओं ने ध्‍यान दिया कि परा-शिक्षकों की क्षमता को बढ़ाने के लिए कुछ योजनाएं, सही योजनाबद्ध और आवश्‍यकता-आधारित तरीके से चलाई गई हैं।

अंत में, परिचर्चाकर्ताओं ने बताया कि परा-शिक्षकों की अनिश्चित कार्यअवधि के कारण प्रशिक्षित शिक्षकों को तैयार करने वाली दीर्घकालीन प्रणाली की विकासशीलता और इसी प्रकार परा-शिक्षकों के अभ्‍यास का स्‍थायित्‍व समाप्‍त हो जाता है।



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate