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महिलाओं के ख़राब स्वास्थ्य के कारण

महिलाओं के ख़राब स्वास्थ्य के कारण

परिचय

महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं के प्रत्येक्ष कारणों को बताना काफी सरल है। जैसे कि हम कह सकते हैं कि यौन संचारित रोग विभिन्न कीटाणुओं द्वारा होते हैं ; उचित मात्र में अच्छा भोजन न खाने से कुपोषण हो जाता है तथा गर्भावस्था में होने वाली समस्यायें अकसर गर्भावस्था में उचित देख-भाल न होने से होती हैं परन्तु इन प्रत्यक्ष कारणों के तह में दो मूल कारण हैं – गरीबी तथा महिला का निम्न स्तर – जिनके कारण महिलाओं की स्वास्थ्य समस्यायें उत्पन्न होती हैं।

गरीबी

भारत में अभी भी एक तिहाई जन संख्या गरीबी रेखा से नीचे रहती है। इनमे भी महिलाओं तथा लड़कियों को गरीबी के दुष्प्रभावों को अधिकतम झेलना पड़ता है।लाखों करोड़ों महिलाएं गरीबी के भावर जाल में फंस जाती हैं जिसकी शुरुआत उनके जन्म लेने से पहले ही हो जाती है। जो बच्चे ऐसी महिला के गर्भ से जन्म लेते हैं जिन्हें गर्भावस्था में पर्याप्त भोजन नहीं मिला, अक्सर ही जन्म के समय कम वजन के और आकार में छोटे होते हैं तथा उनकी शारीरिक वृद्धि भी मंद गति से होती है। गरीब परिवारों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को पर्याप्त भोजन मिलने की सम्भावना काफी कम रहती है जिसके कारण उनकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है । आमतौर पर स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्रों में लड़कियाँ व महिलाएं उपेक्षित ही रहती हैं । कार्य क्षेत्र में भी उन्हें दक्षहीन कार्य ही करने पड़ते हैं और पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी मिलती है। घर पर भी उन्हें (बिना मजदूरी का!) कार्य करना पड़ता है परिणामस्वरूप थकावट, कुपोषण तथा गर्भावस्था में देखभाल की कमी के कारण महिला और उनके बच्चों के लिए ख़राब स्वास्थ्य का खतरा बढ़ जाता है।

  • गरीबी के कारण उसे ऐसी परिस्थिति में रहने के लिए विवश होना पड़ता है जिनसे अनके शारीरिक तथा मानसिक समस्यायें हो सकती हैं। उदहारणतया गरीब महिलाएं अकसर : अत्यंत ख़राब आवास में रहती है जहाँ स्वच्छता का नमो निशान या स्वच्छ जल नहीं होता। ये तथा एकान्तता की कमी, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के लिए अधिक नुकसानदेह होती है।
  • पर्याप्त  व अच्छे भोजन से वंचित रहती है और उन्हें काफी कीमती समय व शक्ति ऐसा भोजन ढूंढने में लगानी पड़ती है जिसे वह वहन कर सकती हैं ।
  • ऐसा कार्य करने के लिए विवश हो जाती है जो खतरनाक होते हैं या फिर जिनमें अधिक समय तक कार्य करना पड़ता है । यौन उत्पीड़न की सम्भावना भी हो सकती है।
  • भारी कार्य करने के लिए दैनिक वेतन भोगी की तरह नियुक्त की जाती है परन्तु इस प्रकार के कार्य करने के लिए आवश्यक अधिक शक्ति उन्हें नहीं मिलती है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध होने के बावजूद भी उन तक पहुंचा नहीं कर पाती हैं । इसका कारण है कि वे घर के कार्यों में अथवा मजदूरी छोड़ कर नहीं जा सकती हैं।
  • जीवित रहने के संघर्ष में इतनी व्यस्त हो जाती हैं की उन्हें न तो समय मिलता है और न ही उनमे इतनी शक्ति बचती है कि वे अपने स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति के ओर ध्यान दे सकें। अपने भविष्य की योजनायें  बना सकें नई दक्षताएं सीख सकें या अपने बच्चों को बेहतर देखभाल कर सकें।
  • उन्हें अक्सर मजबूर कर दिया जाता है कि वे इंधन, चारा तथा पानी जैसी वस्तुओं का परिवार के जीवित रहने के लिए प्रबन्ध करे तथा खेतों पर भी काम करें जिसके लिए उसे न कोई पैसा मिलाता है और न कोई श्रेय ।
  • अपनी गरीबी के लिए जिम्मेवार ठहराई जाती है तथा उन्हें पैसे वालों की तुलना में कम महत्वपूर्ण और तुच्छ महसूस करने के लिए किया जाता है ।

गरीबी ऐसे रिश्ते बनाने के लिए मजबूर कर देती है जिसमें जीवित रहने के लिए उन्हें पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है यदि कोई महिला अपने तथा अपने बच्चों के सहारे के लिए किसी पुरुष पर निर्भर है तो उसे पुरुष को खुश करने के लिए ऐसे कुछ कार्य करने पड़ सकते हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं । उदहारणतया वह निर्मुख रूप से पारिवारिक हिंसा से पीड़ित रह सकती है या फिर असुरक्षित यौन संबंधों को न नहीं कह सकती है क्योंकि उसे आर्थिक सहारे तथा सामाजिक स्वीकृति खोने का भय होता है।

महिलाओं का समाज में निम्न स्तर

स्तर का अर्थ है कि समाज या परिवार में किसी व्यक्ति का कितना महत्व है। स्तर प्रभाव पड़ता है, महिला के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर; किस प्रकार महिला अपना मुल्यांकन करती है और अपने को स्वीकार करती है किस प्रकार की गतिविधियां करने, किस प्रकार के निर्णय लेने की उसे छूट है । भारत में अधिकतर समुदायों में महिला का स्तर पुरुषों के अपेक्षा कम हैं। सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रथाएं इस निम्न स्तर को प्रगाढ़ करती हैं महिलाओं का सामाजिक स्तर नीचा होने से भेद-भाव को बढ़ावा मिलता है अर्थात उनके साथ ख़राब व्यवहार किया जाता है या उन्हें किसी चीज से वंचित रखा जाता है क्योंकि वे महिलायें हैं । इस भेद-भाव का, विभिन्न समुदायों में , विभिन्न रूप हो सकता है परन्तु इसका दुस्प्रभाव हमेशा ही महिला के स्वास्थ्य पर पड़ता है ।

लड़कियों की नहीं लड़कों की चाहत

अनेक परिवार लड़किओं के अपेक्षा लड़कों को अधिक महत्त्व देते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि लड़के घर की सम्पति/ दौलत में अधिक योगदान कर सकते हैं, बुढ़ापे में मां बाप का सहारा बन सकते हैं, मां बाप के मृत्यु के बाद के क्रियाक्रम सम्पन्न कर सकते हैं तथा वंश का नाम आगे बढ़ा सकते हैं । इसके परिणामस्वरूप लड़किओं के जन्म पर खुशियाँ नहीं मनाई जाती है, क्योंकि उनके लिये दहेज़ की व्यवस्था करनी होगी व, शादी के बाद घर से चली जायेगी तथा घर पर एक बोझ मानी जाती हैं। इसलिए उसमें निवेश, केवल उसे एक अच्छी वधु तथा गृहणी बनाने में ही सीमित रखा जाता है इसके कारण ही, लड़किओं को अकसर कम समय के लिए स्तनपान कराया जाता है, उन्हें कम भोजन व चिकित्सा सुविधा दी जाती है उन्हें शिक्षा भी कम दी जाती है ।

क़ानूनी अधिकारों तथा निर्णय लेने की शक्ति की कमी

बहुत से समुदायों में महिला को सम्पति रखने, उतराधिकार में पाने, पैसा कमाने या पैसा उधार पर लेने का अधिकार नहीं है। यदि उसका तलाक हो जाता है तो उसे अपनी चीजों या अपने बच्चों के पास रखने की अनुमति भी नहीं है। यदि उसे कानूनी अधिकार प्राप्त भी है तो उसके समुदाय की परम्परायें उसे स्वयं के जीवन पर नियंत्रण नहीं करने देती हैं । प्राय: एक महिला यह निर्धारित नहीं कर सकती है कि परिवार का पैसा किस प्रकार से खर्च किया जाए अथवा कब चिकित्सा सेवा प्राप्त की जाएं। अपने पति या सास-ससुर की अनुमति के बिना वह घर से बाहर नहीं जा सकती है या समाज के निर्णयों में भाग नहीं ले सकती है ।

जब महिलाओं को इन तरीकों से, शक्तिशील बनने से वंचित रखा जाता है तो जीवित रहने के लिए उन्हें पुरुषों पर आश्रित होना ही पड़ता है । इस कारण वे उन सब चीजों की मांग आसानी से नहीं कर सकती हैं जो अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, जैसे कि अच्छा व पर्याप्त  भोजन, परिवार नियोजन, सुरक्षति यौन संबंध तथा हिंसा से मुक्ति । रोटी, कपड़ा मकान व अनुमति जैसे मूलभूत चीजों के लिए पति व परिवार पर निर्भरता के कारण वह गुलाम बन जाती है तथा अपने निहित सामर्थ्य की पूर्ति नहीं कर पाती हैं ।

अधिक बच्चों का या कम बच्चों का होना

महिलाओं के साथ भेदभाव के कारण अक्सर ही उन्हें जल्दी-जल्दी गर्भवती बनना पड़ सकता है क्योंकि केवल बच्चे पैदा करना ही, उसके स्वयं तथा अपने पति के लिए सम्मान प्राप्त करने का एकमात्र तरीका बन जाता है । इन सब परिस्थितियों में महिलाएं ख़राब स्वास्थ्य वाला जीवन बिताती है और उन्हें स्वास्थ्य सेवाएं भी कम उपलब्ध होती हैं। वे अपने इस निम्न स्तर को अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेती हैं क्योंकि उन्हें शुरू से ही पुरुषों से हीन होने का पाठ पढाया जाता है। वे अपने ख़राब स्वास्थ्य को अपनी किस्मत मानकर स्वीकार कर लेती हैं तथा चिकित्सा सहायता तभी ढूंढती हैं जब स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर या जानलेवा बन जाएं ।

स्वास्थ्य सेवा तंत्र महिलाओं की आवश्यकताओं के प्रति असंवेदनशीलता

विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में (तथा कुछ शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में), अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा तंत्र के कारण, चिकित्सा सेवाएं उन महिलाओं को या तो कम उपलब्ध होती हैं या उनके पक्ष में नहीं होती हैं जिन्हें गरीबी व भेदभाव ने पहले से ही दरकिनार किया होता है। चूँकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं आम तौर पर अपर्याप्त होती हैं इसलिए लगभग 80% स्वास्थ्य सेवाएं पैसा कर्च करके निजी तौर पर प्राप्त की जाती हैं ।

गरीबी व परिवार तथा समाज में भेदभाव के कारण महिलाओं की स्वास्थ्य समस्यायें न केवल और बढ़ जाती हैं बल्कि इसके कारण स्वास्थ्य सेवा तंत्र भी महिलाओं को ऐसी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में असक्षम हो जाता है जिनकी महिलाओं को आवश्यकता होती है। सरकारी नीतियों तथा विश्व की आर्थिक स्थितियों से समस्या और भी गहरी हो जाती है ।

गरीब देशों में अनके लोगों को किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं और महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव के कारण जो थोड़ा बहुत पैसा उपलब्ध भी है उसकी स्वास्थ्य संबंधित आवशयकताओं पर शायद कभी खर्च नहीं किया जायेगा इसलिए यदि कोई महिला अच्छी सेवाओं के लिए पैसा खर्च करने की स्थिति में भी है तो भी संभवतया उसे वे सेवाएं उपलब्ध नहीं होगी। हो सकता है कि कुछ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा रही हों परन्तु अपनी सभी स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूर्ति करने के लिए उसे यह तो किसी के साथ अपने खर्च पर जिला अस्पताल या शहर के बड़े अस्पताल जाना पड़ेगा । इसलिए महत्पूर्ण है कि प्रशिक्षित डॉक्टरों के अभाव में नर्सों, दवाईयों या स्वास्थ्य कर्मचारियों को पर्याप्त रूप से प्रशिक्षण दिया जाये ताकि वे महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कर सकें।

ऋण तथा संरचनात्मक सामंजस्य:गरीबों को गरीब बनाये रखना

1970 व 1980 के दशकों में अनके निर्धन देशों पर दबाव डाला गया कि वे धनवान देशों के बैंकों से ऋण लें। यधपि कई बड़ी परियोजनाएं शुरू की गईं तथापि ये लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थीं। वास्तव में इनके कारण अपनी जमीन से विस्थापित होना पड़ा और वे आर्थिक शरणार्थी बनने पर मजबूर हो गये लेकिन अब इन बैंकों ने अपना पैसा वापस मांगना शुरू कर दिया और इस कारण इन देशों को अपनी आर्थिक नीतियों को बदलने या उनमें ‘सामंजस्य’ लाने को विवश होना पड़ा । उन्हें न केवल मूल राशि वापस करनी पड़ रही है बल्कि उस पर भारी ब्याज भी देना पड़ रहा है । कई देशों की लगभग 30-40 : कमाई केवल ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाती है ।

निर्धन राष्ट्र इससे सर्वाधिक पीड़ित हैं क्योंकि उनके कल्याण कार्यों के बजट पहले से ही कम और अपर्याप्त हैं । वे उन कल्याण कार्यक्रमों पर उतना पैसा खर्च नहीं कर सकते हैं जिनसे गरीबों का कल्याण हो जैसे कि स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, अस्पताल बनाना या लोगों को उचित दामों पर भोजन तथा इंधन उपलब्ध करना । अंतर्राष्ट्रीय संगठनो द्वारा निर्धन राष्ट्रों की सरकारों को अकसर भोजन या स्वास्थ्य सेवाओं में कोई रियायत नहीं देने को कहा जाता है और उन्हें निर्देश दिया जाता है कि इनके लिए शुल्क लिया जाये व इनका निजीकरण किया जाए।  तदापि ये देखा जा रहा है कि संसाधनों की कमी की वजह से कल्याण क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है ।

सावित्री की कहानी

जब सावित्री एक छोटी बच्ची थी तो वह एक ऐसे बड़े घर में रहने के सपने देखती थी जिसमें बिजली होगी तथा पक्का फर्श होगा। उसका पति सुन्दर व दयालु होगा और वो जो चाहे, कर सकेगी । लेकिन सावित्री का परिवार गरीब था वह चार लड़कियों में सबसे छोटी थी । कभी-कभी जब उसका पिता शराब पीता था तो वह उसकी मां को मरता पिटता था और अपनी किस्मत पर रोता था कि उसकी इतनी लड़कियाँ हैं ।

जव सावित्री की आयु 14 वर्ष की थी और शादी के लायक मान ली गयी थी तो वह यह जानकार बहुत रोई थी कि उसका सपने कभी साकार नहीं होंगे। यह पहले से ही तय हो गया था सावित्री की शादी, उसके पिता द्वारा चुने गए एक पुरुष के साथ होगी। उसके पिता ने सुना  था कि आदमी जमींदार है । सावित्री के पिता को यह विश्वास था कि इस विवाह से उसके परिवार को लाभ होगा । इस विषय में सावित्री की इच्छा का कोई स्थान ना था। उसे स्कूल की पढाई छोड़नी पड़ी और शादी करनी पड़ी।

विवाह के एक सप्ताह के बाद सावित्री को सच्चाई पता लगी। उसके पति के पास जो जमीन का एक छोटा टुकड़ा था वह भी उसे एक जमींदार के हाथों गँवा बैठा था अब वह भूमिहीन था उसके बाद उसे मजबूरन काम की तलाश में शहर जाना पड़ता था उसका लालन पालन एक बहुत ही निर्धन परिवार में हुआ था और वह गांव के स्कूल से आठवीं कक्षा तक भी पास नहीं कर पाया था । इसलिए उसे मोटर गाड़ियों की मरम्मत की एक छोटी से दुकान में एक छोटी से नौकरी ही मिल पाई जो कुछ ना होने से तो अच्छा था। सावित्री और बच्चे गांव में ही रहते थे जब की उसके पति को काम के लिए शहर और गांव के बीच आना जाना पड़ता था।

जब उसके तीन बच्चे हुए तो सावित्री के पति को उसे बहुत निराशा हुई क्योंकि वे तीनो बच्चे लड़कियाँ थी सावित्री के पति का उसके प्रति व्यवहार बदलने लगा वह घर से जल्दी जल्दी बाहर रहने लगा तथा उसने घर पर आना भी कम कर दिया । उसने शराब भी पीनी शुरू कर दी तथा उसके साथ मार-पीट करना भी शुरू कर दिया जब सावित्री को चौथा बच्चा-एक लड़का-हुआ तो उसके पति ने उसको तंग करना कम कर दिया जल्द ही सावित्री को शक होने लगा कि शायद उसके पति का शहर में अन्य महिलाओं से यौन सम्बन्ध है । लेकिन सावित्री ने इस बारे में अधिक ध्यान नहीं दिया । वह चौथे तथा पांचवे बच्चे के जन्म के बावजूद पुरवत खेतों में मेहनत तथा घर में बच्चों की देखभाल करती रही उसका पांचवा बच्चा-एक लड़का मर गया ।

एक दिन जब सावित्री शौच कर रही थी तो उसने गौर किया कि उसकी योनी से रक्त स्त्राव हो रहा है हालांकि वह उसके मसिक धर्म का समय नहीं था । उसने कभी भी अपने स्वास्थ्य का परीक्षण नहीं कराया था पर अब उसने अपने पति से पूछा कि क्या वह अपनी जाँच करने के लिए स्वास्थ्य कर्मचारी के पास जा सकती है । उसें उत्तर दिया की डॉक्टर में विश्वास नहीं है । इसके आलावा उसके पास उसकी हर चिंता का समाधान करने के लिए पैसे नहीं है जब सावित्री की आयु 40 की हुई तब उसके पेट के निचले भाग में लगातार दर्द रहने लगा इस दर्द के विषय में उसे काफी चिन्ता थी पर उसे यह समझ नहीं आ रहा था की इस बारे में किससे बात करे । वह गांव के वैद के पास गयी जिसने उसे कुछ जड़ी बूटी खाने को दी फिर भी रक्त स्त्राव होना जारी रहा। उसने अपनी सास से इस बारे में बात करने की कोशिश की तो उसने सावित्री को ही झाड़ दिया – यह कह कर वह काम से बचने के लिए बहाने कर रही है ।

गांव की एक वृद्ध महिला ने उसे सलाह दी कि इन लक्षणों के बारे में उसे किसी से बात नहीं करनी चाहिये । उसने सावित्री को एक काढ़ा पीने को दिया साथ-साथ यह भी कहना शुरू कर दिया, “ पहले तो उसके लड़का नहीं हुआ और अब दर्द शुरू हो गया – लगता है इसके ऊपर प्रेत का साया है वह अपने पिछले जन्मों के कर्मों का फल भुगत रही है कुछ महीनों के बाद सावित्री ने यह निश्चय कर लिया की वह अपने पति की इच्छा के विरुद्ध भी अपना इलाज कराएगी । इसके लिए अपनी एक सहेली से पैसा उधार लिया उसे अपने जीवन की बहुत चिन्ता होने लगी थी ।

स्वास्थ्य केन्द्र में उसके योनि स्त्राव के उपचार के लिए कुछ दवाइयां मिली हालांकि स्वास्थ्य कर्मचारी ने पहले उसका मुआयना नही किया उस रात सावित्री काफी थकी-मांदी व घर लौटी उसे इस बात की चिन्ता खाए जा रही थी कि उसने अपने पति की इच्छा के विरुद्ध कार्य किया और साथ ही, अपनी सहेली की बचत पूंजी को खर्च कर दिया समय गुजरने के साथ-साथ सावित्री का स्वास्थ्य बिगड़ता गया और वह इस बात का एहसास करके काफी हताश हो गयी कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ अवश्य है ।

अंततः सावित्री इनती कमजोर हो गयी कि पड़ोसियों ने उसके पति को शहर से बुलवाया । उसके पति को अंततः विश्वास हो गया कि वास्तव में वह गंभीर रूप से बीमार है और उसे सावित्री को दूर शहर के अस्पताल में ले जाना चाहिये लेकिन उसे शहर तक सवारी जुटने के लिए पैसे का इंतजाम करने में कुछ वक्त लगा । कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद सावित्री को अस्पताल ले जाया गया । अंततः उसे बताया गया कि उसे गर्भास्शय की ग्रीवा का बढ़ी हुई अवस्था का कैंसर था । डॉक्टरों ने बताया की वे उसके गर्भाशय को शल्य चिकित्सा के द्वारा निकाल सकते थे परन्तु कैंसर पहले से ही शरीर के अन्य भागों में फ़ैल चुका था केवल एक उपचार जो जान बचा सकता था, देश के अन्य भागों की स्थिति में ईलाज़ अस्पताल में उपलब्ध था और काफी महंगा था डॉक्टर ने उससे पूछा, “जब आपको ये लक्षण शुरू हुआ तभी अपने “पेप टेस्ट” क्यों नहीं करवाया था? यदि हमें इस कैंसर का जल्दी पता चल जाता तो हम आसानी से इसका उपचार कर सकते थे” लेकिन अब तक काफी देर हो चुकी थी । सावित्री अपने घर चली गई तथा दर्द और अकेलेपन से पीड़ित रहने लगी । दो महीनो से कम समय में ही मृत्यु हो गई ।

सावित्री की मृत्यु क्यों हुई ?

यहां इस प्रश्न के कुछ अहम उत्तर दिये गए हैं –

एक डॉक्टर कह सकता है – सावित्री की मृत्यु गर्भाशय की ग्रीवा के बढ़े हुए कैंसर के कारण हुई चूंकि उसने समय पर अपना उपचार नहीं करवाया ।

या एक अध्यापिका कहेगी – सावित्री की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उसे “पेप टेस्ट” करवाने के बारे में जानकारी नहीं थी

या एक स्वास्थ्य कर्मचारी – सावित्री की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उसके पति ने उसे जनान अंगों के तथा अन्य यौन संचारित रोग दिये । इनके कारण उसे गर्भाशय की ग्रीवा का कैंसर होने का खतरा बढ़ गया ।

ये सभी उत्तर सही हैं । ऐसी महिलाओं को गर्भपात की ग्रीवा के कैंसर का खतरा अधिक होता है जो कम आयु में ही यौन सम्बन्ध बना लेती है और जो जनन अंगों के मस्सों के सम्पर्क में आती हैं । और अगर ऐसे कैंसर का जल्दी निदान हो जाए (आम तौर पर पेप टेस्ट करवा कर) तो अधिकतर इसका पूर्ण उपचार हो सकता है फिर भी इन सभी उत्तरों से इस समस्या को पूर्णत: समझने की कमी झलकती है । इन सभी में सावित्री को या उसके पति को ही दोषी ठहराया गया है और उसके आगे कुछ नहीं । कई कारणों से सावित्री के गर्भाशय की ग्रीवा का कैंसर से मरने का खतरा अधिक था ।

यधपि उसकी मृत्यु का कारण गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर था तथापि उसकी मृत्यु कुछ अन्य ऐसे कारणों से गहनता से जुड़ी हुई है जिन्होंने उसे बार-बार गर्भ घारण करने तथा शीघ्र उपचार शुरू न करने से बाध्य किया वह अकेली इसके लिए जिमेदार नहीं थी । गरीबी, सामाजिक तथा संस्कृतिक लालन-पालन ने सावित्री और उसके पति की मानसिकता पर गहरी छाप छोड़ी थी । उसके पति ने, अपने लिए, अपने पिता को छोड़ कर किसी और को आदर्श पुरुष के रूप में कभी नहीं देखा था उसका पिता मर्दानगी दिखने की आड़ में अपनी पत्नी को पीटा करता था । उसका यह गहरा विश्वास था की औरतें होती ही धौस जमाने के लिए ।

ख़राब स्वास्थ्य सेवा तंत्र तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों व पारम्परिक चिकित्सकों की, महिलाओं के स्वास्थ्य समस्याओं के शीघ्र निदान के क्षेत्र में ख़राब प्रशिक्षण के कारण – वे इस योग्य नहीं थे कि वे बीमारी का जल्दी निदान कर पाते और सावित्री को समय रहते किसी कुशल डॉक्टर या अस्पताल भेज पाते ।

किस प्रकार गरीबी तथा महिला का निम्न स्तर, मिल जुल कर, सावित्री की मृत्यु का कारण बने

सावित्री व उसका परिवार निर्धन थें, इसलिए उसे कम उम्र में विवाह करने के लिए विवश होना पड़ा । एक महिला के रूप में, अपने पति के साथ सम्बन्धों उसका कोई मत नहीं था । उसका किस विषय पर कोई नियंत्रण नहीं था उसका की उसके कितने बच्चे हों व कब-कब हों । अपने पति के अन्य महिला के साथ यौन सम्बन्धों के बारे में वह बेबस थी उसके परिवार के निर्धनता का अर्थ था कि वह पूरी जिंदगी कुपोषण का शिकार रही जिसने उसके शरीर को कमजोर कर दिया तथा उसे बीमारियाँ होने का खतरा बढ़ गया।

हालांकि सावित्री की समुदाय को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं थी फिर भी नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्र में महिलाओं के लिए कुछ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध थीं जैसे कि, परिवार नियोजन, बच्चों का टीकाकरण , लौह तत्व का गोलियों का वितरण तथा बुखार के लिए दवाइयां। लेकिन स्वास्थ्य कर्मचारियों को न तो इस बारे में जानकारी ही थी और न ही प्रशिक्षण कि महिलाओं कि स्वास्थ्य समस्यायें होती हैं – यहां तक कि उन्हें गर्भाशय की ग्रीवा के कैंसर के बारे में भी कुछ पता न था । अगर महिला स्वास्थ्य कर्मचारी से भी परमर्श किया जाता तो उसे भी महिला के शरीर की अंदरूनी जाँच (योनि, ग्रीवा या अन्य आतंरिक जननांगो की जाँच ) करना नहीं आता था। एक अनजान व्यक्ति होने के कारण व रोगी का विश्वास भी प्राप्त नहीं कर सकती थी व कागजी कारवाही में इतनी व्यस्त रहती थी कि उसकी पास अपने रोगी को ठीक से जानने के लिए समय नहीं था ना ही उसके पास रोगी के घर जाने के लिए कोई वाहन था। अत: अगर सावित्री पहले ही अपने जाँच कराने के लिए स्वास्थ्य कर्मचारी के पास चली जाती तो भी शायद वह स्वास्थ्य कर्मी उसकी सहयता नहीं कर पाती। सावित्री के पास एक डॉक्टर के पास जाने के लिए साधान, पैसे,समय तथा वाहन नहीं थे, जो उसे क्या बीमारी है। तब तक काफी देर हो चुकी थी ।

अन्त में, सावित्री का देश निर्धन था और उसके पास स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी। अन्य गरीब देशों की तरह, उसके देश की सरकार ने भी अन्य महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का भी ध्यान केन्द्रित उचित समझा परन्तु महिलाओं के स्वास्थ्य पर नहीं । जो भी पैसा उसके सरकार ने महिलाओं के स्वास्थ्य पर खर्च, व भी बड़े शहरों महंगे अस्पतालों में लगाया है न कि ऐसे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्मों पर जिनका लाभ सावित्री जैसी महिलाओं तक पहुंच सकता था । इसका अर्थ यह निकला की गर्भाशय की ग्रीवा के कैंसर का निदान व उपचार तथा अन्य महिला स्वास्थ्य समस्याओं से संबंधित उपलब्ध नहीं थी।

इस प्रकार, गरीबी तथा महिलाओं का समाज में निम्न स्तर ने सावित्री के विरुद्ध तीन स्तरों पर कार्य किया – उसके परिवार, उसके समुदाय, तथा उसके देश के स्तर पर । इन सब से मिलकर एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा बनी जिसने सावित्री की जान ले ली।

स्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान, वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया



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