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प्रोस्टैट ग्रंथि में सुसाध्य अतिवृद्धि या बेनाइन प्रोस्टैटिक हाईपरप्लासिया

प्रोस्टैट ग्रंथि में सुसाध्य अतिवृद्धि या बेनाइन प्रोस्टैटिक हाईपरप्लासिया

परिचय

प्रोस्टैट ग्रंथि में सुसाध्य अतिवृद्धि या बेनाइन प्रोस्टैटिक हाईपरप्लासिया

बेनाइन प्रोस्टैटिक हाईपरप्लासिया (बीपीएच) एक ऐसी अवस्था है जो पुरूषों प्रोस्टैट ग्रंथि को प्रभावित करती है । यह ग्रंथि मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग के बीच में पाई जाती है । उम्र बढ़ने के साथ पुरूषों की यह ग्रंथी धीरे-धीरे बड़ी होने लगती है । बड़े होने के साथ, यह मूत्रमार्ग पर दवाव बनाती है जिसके कारण पेशाब का प्रवाह धीमा और कम शक्तिशाली हो जाता है । “बिनाइन” शब्द का अर्थ है कि ग्रंथि का बढ़ना, कैंसर या संक्रमण के कारण नहीं हुआ है ।

लक्षण

बीपीएच के अधिकांश लक्षण धीरे – धीरे प्रकट होते हैं और वे हैं :-

  • दिन और रात में बार - बार पेशाब आना
  • पेशाब की शुरूआत में और बाद की बूंदों को झटकने में परेशानी
  • पेशाब के प्रवाह के आकार व शक्ति में कमी आ सकती है ।

ये लक्षण बीपीएच के अलावा अन्य रोगों के अवस्थाओं में भी हो सकते हैं । वे मूत्राशय के संक्रमणया मूत्राशय के कैंसर जैसे किसी ज्यादा गंभीर रोग के लक्षण भी हो सकते हैं । इनमें से किसी लक्षण के प्रकट होने पर डॉक्टर से संपर्क करें ताकि वह फैसला कर की संभावित कारण को जानने के लिए कौन सी जांच की जानी चाहिए ।

निदान

डॉक्टर पहले लक्षणों का पूरा इतिहास पूछता हैं और उसके बाद अगल कदम मलाशय की जाँच का है । इस जाँच में डॉक्टर प्रोस्टैट ग्रंथि के असल आकार को वास्तव में महसूस कर सकता है वह संक्रमण की संभावना की जाँच के लिए पेशाब का नमूना भी ले सकता है और खून की भी जाँच कराने की सलाह दी सकता है । अल्ट्रासाउंड जाँच या प्रोस्टेट की बायोप्सी डॉक्टर को निदान करने में सहायक हो सकती है ।

चिकित्सा की उपयुक्तता को दर्ज करने के लिए कट-ऑफ मूल्य का समर्थन करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं । इस जाँच में मूत्र की औसत प्रवाह दर को मापा जाता है । 25 से 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले लक्षण या रोग रहित पुरूषों में आम तौर पर शीर्ष प्रवाह दरें (क्यूमैक्स) 15 एमएल/ सेकेंड पाई जाती है । जिन पुरूषों में यह 15 एमएल/ सेकेंड होती है, उनमें उपचार कम प्रभावी होता है । मूत्रत्याग के बाद शेष बचे पेशाब की मात्रा (पोस्ट वाईड रैजिड्यूल यूरिन वॉल्यूम) जैसी अन्य नैदानिक जांचे व कुछ प्रवाह दबाव अध्ययन वैकल्पिक हैं, लेकिन बाकी  जांच (फिलिंग सिस्टोमिट्र, यूरिथ्रोसाईस्टोस्कोपी, मूत्रमार्ग का अंकन) कराने की सलाह नहीं दी जाती ।

बीपीएच का उपचार

डॉक्टर के आश्वस्त हो जाने के बाद के लक्षण प्रोस्टेट ग्रंथि की सुसाध्य वृद्धि के कारण हैं, उपचार बताया जा सकता है । हालाँकि, डॉक्टर रोगी को लक्षणों में सुधार होने का इंतजार करने की सलाह दे सकता है, क्योंकि कभी-कभी हल्के लक्षण अपने आप ठीक हो जाते हैं अगर लक्षण बढ़ते चले जाएँ, तो डॉक्टर दूसरे उपचार का विकल्प सूझा सकता है ।

सर्जरी को सबसे प्रभावी उपचार माना जाता है और जिन पुरूषों में लक्षण काफी गंभीर स्थिति  में होते हैं, उनकी सर्जरी ही की जाती है । यह प्रोस्टेट के कैंसर का बहुत शूरूआती आवस्था में पता लगाने और उसका इलाज करने का भी सबसे अच्छा तरीका है । आमतौर पर सर्जरी मूत्रमार्ग के जरिए की जाती है और उसके निशान नहीं रहते । लेकिन, सर्जरी के अपने खतरे भी हैं । रक्त बह सकता है, संक्रमण हो सकता है और व्यक्ति नापूंसक हो सकता है । पर आम तौर पर ये खतरे छोटे होते हैं ।

उपचार के अनेकों विकल्प हैं । इनमें निगरानी के साथ इंतजार, मेडिकल थेरेपी, मूत्राशय को फूलाना तथा विभिन्न सर्जरी पद्धतियाँ शामिल हैं ।

बीपीएच उपचार के विकल्प

  • निगरानी के साथ इंतजार : रोग प्रबंधन की एक ऐसी रणनीति जिसमें रोगी के लक्षणों पर निगाह तो रखी जाती है, लेकिन उसका कोई सक्रिय उपचार नहीं किया जा रहा होता।
  • अल्फ़ा ब्लॉकर थरेपी: इस उपचार में अल्फ़ा-1 – एड्रोनेजिर्करिसेप्टर ब्लॉकर के इस्तेमाल के जरिए प्रोस्टैट की चिकनी मांसपेशी को सिकुड़ने से रोक दिया जाता है ।
  • फिनास्टीराइड थेरेपी :  इस उपचार में एक एंजाइम निरोधी, फिनास्टीराइड के इस्तेमाल से प्रोस्टेट के एंड्रोजन स्तरों को नीचे लाया जाता है । इसके परिणाम स्वरुप, प्रोस्टेट का आकार कुछ कम हो जाता है ।
  • मूत्राशय को फैलाना : इसमें एक नाल का उपयोग किया जाता है, जिसके अंतिम सिरे पर एक गुब्बारा होता है । इसे मूत्रमार्ग के जरिए प्रोस्टेट यूरिथ्रा में प्रवेश कराया जाता है । फिर गुब्बारे को इस तरह फुलाया जाता है की मूत्रमार्ग उस बिन्दु पर फ़ैल जाए जहाँ प्रोस्टेट ने उसे संकरा कर दिया है । इस पद्धति का चलन आम नहीं है।
  • ट्रांसयूरिथ्रल इनसिजन ऑफ प्रोस्टेट : एंडोस्कोप के द्वारा की गई सर्जरी जिसमें अपेक्षाकृत छोटे प्रोस्टेट (30 ग्राम से कम) वाले रोगियों में प्रोस्टेट में एक –  दो चीरे लगाने और मूत्रमार्ग की सिकुड़न को जरिए एक उपकरण का प्रवेश कराया जाता है ।
  • ट्रांसयूरिथ्रल रिसेक्शन ऑफ प्रोस्टेट : इसमें मूत्रमार्ग में एंडोस्कोप के द्वारा प्रोस्टेट की भीतरी हिस्सा आपरेशन के जरिए निकाल दिया जाता है । सक्रिय उपचारों में यही सबसे आम उपचार है।
  • होल्मियम लेजर रिसेक्शन ऑफ प्रोस्टेट : इसमें लेजर के द्वारा प्रोस्टेट के बढ़े हुए हिस्से का आपरेशन कर उसे निकाल दिया जाता है । इससे रक्त न्यूनतम मात्रा में बहता है और अस्पताल में ठहरने की अवधि भी कम हो जाती ।
  • ओपन प्रोस्टैक्टोमी : उदर के निचले हिस्से में एक चीरे लगा कर प्रोस्टेट को निकाल दिया जाता है । इसमें ह्स्पातल में अपेक्षाकृत ज्यादा लंबे समय तक रूकना पड़ता है ।

प्रतिकूल प्रभाव

ऐसे उपचारों को कोई अस्तित्व नहीं जिनका कोई प्रतिकूल प्रभाव न होता हो । बीपीएच के उपचारों के संदर्भ में विशेषकर ऐसा है । इसमें उपलब्ध उपचारों के हानि-लाभों के बीच नाजुक सा संतुलन है ।

बीपीएच के उपचार के बाद होने वाले प्रतिकूल प्रभावों में नापूंसकता, सर्जरी के बाद तनाव को नियंत्रित कर पाने की क्षमता के केवल 3 प्रतिशत और पेशाब को नियंत्रित करें की क्षमता के केवल 1 प्रतिशत तक रह जाने की संभावनाएं शामिल हैं । फिर से उपचार संभावनाएं शामिल हैं । फिर से उपचार की जरूरत भी पड़ सकती है ।

अनेकों उपचार विकल्पों में पांच साल के बाद फिर से उपचार की जरूरत पड़ती है । इस तरह निगरानी में इंतजार करने, बैलून व मेडिकल उपचार के मामलों में करीब 30-40 प्रतिशत लोगों को पांच साल बाद फिर उपचार की जरूरत हो सकती है । आपरेशन द्वारा किए गए उपचार में पांच साल बाद ऐसी जरूरत 2-10 प्रतिशत रोगियों को हो सकती है ।

उपचार के नए विकल्प

अब उपचार के कई नए विकल्प उपलब्ध होते जा रहे हैं । नई चिकित्साओं के कुछ निश्चित समूह है ।

लेजर प्रोस्टैक्टोमी में प्रोस्टेट के ऊतकों को नष्ट करने के लिए दिशा – निर्धारित नियोडाइमियमिटीरियम अल्यूमिनियम गार्नेट लेजरों की ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है । प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए प्रगति के चलते सही कोण पर स्थित फाइबर के जरिए लेजर ऊर्जा को ज्यादा सीधे तरीके से ऊतक पर केन्द्रित किया जा सकता है । नई होल्मियम लेजर प्रत्यक्ष सिस्टेस्कोपी द्वारा निर्देशित होती हैं । सफलता की दर और सुरक्षा की मात्रा अब काफी ज्यादा है ।

हाइपरथर्मिया : इस चिकित्सा में माइक्रोवेव्स के द्वारा प्रोस्टेट के ऊतकों को ‘पकाया’ जाता है और उन्हें नष्ट कर दिया जाता है । माइक्रोवेव्स को मलाशय या मूत्रमार्ग के जरिए प्रवेश कराने के लिए अनेकों प्रौद्योगिकियों का प्रयोग किया जा चुका है ।

ट्रांस – यूरिथ्र्ल नीडल एब्लेशन एक ऐसी पद्धति है जिसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी के द्वारा प्रोस्टेट ग्रंथि को नष्ट कर दिया जाता है ।

रोटरीसेक्शन एक ऐसी पद्धति है जिसमें यांत्रिक आवृति (मेकेनिकल रोटेशन) के साथ विद्युत ऊर्जा के द्वारा प्रोस्टेट ग्रंथि हो हटा दिया जाता है । प्रोस्टैटिक स्टेंट धातु के ऐसे यंत्र है जिन्हें प्रोस्टैटिक मूत्राशय में लगा कर मूत्राशय को चौड़ा कर दिया जाता है ताकि पेशाब आसानी से बाहर जा सके ।

उपचार वरीयता

बीपीएच जीवन की दीर्घता को नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करता है । अत: चिकित्सा की जरूरत इस बात से तय होती है कि इस रोग के लक्षणों से रोगी को कितनी परेशानी हो रही है । उपचार के हर विकल्प के तुलनात्मक हानि व लाभ यह तय करने में मदद देते हैं कि इस किस चिकित्सा पद्धति को वरियता दी जाए ।

स्त्रोत: हेल्पेज इंडिया/ वोलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया



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