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वास्तविक बीमारी के दौरान क्या किया जा सकता है?

वास्तविक बीमारी के दौरान: बच्चा जब पहली बार लकवाग्रस्त हो|

कोई दवा नहीं: बीमारी के दौरान या बाद में कोई भी दवा मददगार हो|

विश्राम : महत्वपूर्ण  है| शक्ति लगाने वाले यह जोर जबरदस्ती के व्यायाम से बचें| कोई भी इंजेक्शन न लगवाएं| मालिश न करें| कुछ जगहों पर बच्चों के अंगों पर सख्त पट्टी बांध दी जाती है| इनसे भी बचा जाना चाहिए|

बीमारी में संपोषण के दौरान अच्छा भोजन बच्चे को स्वस्थ एवं मजबूत बनाता है| परन्तु ध्यान रहे कि बच्चा कहीं बहुत ज्यादा न खाता जो वह मोटा लगे| आवश्यकता से अधिक वजन वाले बच्चे के लिए चलने फिरने तथा अन्य गतिविधियों में तकलीफ बढ़ सकती है|

वास्तविक बीमारी के दौरान विश्राम की सही स्थिति

स्थिति: बच्चे  की सुविधाजनक स्थिति होनी चाहिए, ताकि संकुचन से बच सके| सबसे पहले मासपेशी दर्दयुक्त हो सकती है और बच्चा जोड़ों को सीधे नहीं करना चाहता| धीरे और नरमी से उन्हें सीधे करने की कोशिश करें जिससे हाथ व पाँव जितना संभव हो रह सके|

सही स्थिति एवं अच्छा आहार देना जारी रखें |जैसे ही बुखार ख़त्म ही; तुरंत ही संकुचनो व शक्ति वापसी के लिए व्यायाम शुरू कर दें| गति की अभ्यास भी करें| सक्रिय खेलों, तैराकी तथा अंगों को सक्रिय रखने वाले अन्य क्रियाकलाप बच्चों को ज्यादा से ज्यादा कराएँ| पुनर्वास के दौरान तक इनका विशेष महत्व है| वैसाखियों तथा पैरों की बंधनी (खपच्चियों) तथा अन्य सहायक एवं विकृतियाँ रोकने में मददगार हो सकती हैं|

कुछ खास मरीजों के लिए संकुचन ठीक करने के लिए या मांसपेशी की जगह बदलने के लिए शल्यक्रिया को भी जरुरत पड़ सकती है| ताकि कमजोर मांसपेशी भी काम करने लगे| जब कोई पैर बहुत कुछ ही लचकदार या शिथिल है या एक तरफ झुका हुआ है| शल्यक्रिया कुछ निश्चित हड्डियों को जोड़कर पैर को मदद पंहुच सकता है| लेकिन हड्डी की शल्यक्रिया से पैर का विकास रुक जाता है| इसलिए आमतौर पर यह क्रिया 12 या 13 साल की आयु से पहले नहीं की जानी चाहिए|

बच्चे को अपना शरीर और दिमाग ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाने ले लिए प्रोत्साहित कीजिये, जैसे कि वह दूसरे बच्चों के साथ खेले, अपनी दैनिक जरुरत के काम कर सके, काम में मदद पहुँचाए, स्कूल जाये| जहाँ तक संभव हो उससे सामान्य बच्चों जैसा व्यवहार करें|

स्रोत:- जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची|



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