অসমীয়া   বাংলা   बोड़ो   डोगरी   ગુજરાતી   ಕನ್ನಡ   كأشُر   कोंकणी   संथाली   মনিপুরি   नेपाली   ଓରିୟା   ਪੰਜਾਬੀ   संस्कृत   தமிழ்  తెలుగు   ردو

व्यक्तित्व विकास की सैद्धांतिक व्याख्या

परिचय

व्यक्तित्व के विकास की व्याख्या के लिए फ्रायड सर्वप्रथम मनोविशलेषणात्मक  सिद्धांत का प्रतिपादन किया।फ्रायड ने व्यक्ति के मनोलैंगिक विकास के संदर्भ में मुख्य रूप से पांच अवस्थाओं का उल्लेख किया है।फ्रायड के अनुसार व्यक्ति के भीतर कामुकता तथा व्यक्तित्व का विकास साथ-साथ चलता रहता है और भावी व्यक्तित्व विकास पर बाल्यकालीन भावनाओं का सशक्त्त प्रभाव पड़ता है।बालक के प्रारंभिक वर्षों (जन्म से पांच वर्ष) में व्यक्तित्व की जो संरचना निर्मित हो जाती है, वह बाद के वर्षों में सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करती है।मनोलैंगिक विकास की अवस्थाओं को में प्रदर्शित किया गया है|

मनोलैंगिक विकास की अवस्थाएं

अवस्थाएं                 अवधि                         प्रमुख व्यवहार

मुखीय अवस्था      जन्म से एक वर्ष तक                अंगूठा चूसना

गुदीय  अवस्था            1-२ वर्ष तक                 मलमूत्र का स्पर्श

लैगिक अवस्था            1-3 वर्ष तक                 लैंगिक अंगों को स्पर्श करना

अदृश्यवस्था             6-13 वर्ष तक                 लैंगिक भावनाओं पर नियंत्रण

जननेन्द्रियावस्था          किशोरावस्था                  विषमलिंगियों के प्रति आकर्षण

इन अवस्थाओं में सुखद अनुभूति होने पर समायोजित एवं दुखद अनुभूति होने पर व्यक्ति में विघटित व्यक्तित्व विकसित होता हैं।इसके अतिरिक्त व्यक्तित्व विकास के स्वरुप में व्याख्या एरिक्सन (1950 -1963) ने समजुक अनुकूलन पर केन्द्रित ‘मनो-सामाजिक विकास को सिद्धांत’ को अपनी पुस्तक “चाइल्डहुड एन्ड सोसाइटी’ में वर्णित किया है।एरिक्सन ने व्यक्तित्व विकास के आठ चरणों की व्याख्या प्रस्तुत की है जो सारणी 12.2 में वर्णित है।एरिक्सन का मानना है कि विकास के प्रत्येक चरण में एक संकट उत्पन्न होता है।जो सामाजिक अनुकूलन की समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट करता है तथा में संकट की स्थिति का समाधान करते हुए मानव अगले चरण की ओर विकसित होता है।एरिक्सन ने व्यक्तित्व विकास में सामाजिक अन्तः क्रिया के योगदान पर विशेष बल दिया है।मानव व्यक्तित्व का विकास व्यक्ति के बढ़ते हुए समजुक दायरें की ओर आकर्षित होने, उसको जानने तथा उसके साथ अन्तः क्रिया करने में तैयारी में संलग्न पूर्व निर्धारित चरणों के अनुसार होता है|

एरिक्सन द्वारा प्रतिपादित मनोसामाजिक विकास के चरण

क्रम अवधि समस्याएँ समुचित               समाधान                      अपर्याप्त समाधान     विकास की विशेषता

क्रम अवधि

समस्याएँ

समुचित समाधान

अपर्याप्त समाधान

अपर्याप्त समाधान

सफल विकास को घोतित करने वाली विशेषता

 

1

0 से 0.5 वर्ष

विश्वास बनाम अविश्वास

 

सुरक्षा तथा निश्चय का मौलिक भाव, स्वयं के अतिरिक्त बाहरी बलों पर भोरोसा

असुरक्षा, चिंता

आशा

2

0.5 से 3 वर्ष

स्वायत्ता बनाम शर्म एवं संदेह

कर्ता के रूप में ‘स्व’ का प्रत्यक्षीकरण, अपने स्वयं के शरीर को नियंत्रित करने की क्षमता तथा कार्यों को करना|

आत्म नियंत्रण से सम्बन्धित अपर्याप्त अनुभूति, घटनाओं का नियत्रण

इच्छाशक्ति

3

3 से 6 वर्ष

उपक्रम बनाम ग्लानि

सृजन या पहल करने के लिए अपने ऊपर विश्वास

‘स्व’ के महत्व की कर्मी का भाव

उद्देश्य

4

6 से यौवनारंभ

उद्यम  बनाम हीनता

मौलिक सामाजिक तथा बौद्धिक कार्यों में प्रवीणता, मित्र मण्डली द्वारा स्वीकृति

आत्मविश्वास की कमी, असफलता की अनुभूति

सक्षमता

5

किशोरावस्था

पहचान बनाम भूमिका की अस्पष्टता

एक व्यक्ति के रूप में ‘स्व’ का सहज भाव विशिष्ट एवं सामाजिक रूप से स्वीकृत व्यक्ति के रूप में

विखंडित ‘स्व; का अनुभव, बदलता हुआ एंव अस्पष्ट भाव

निष्ठा

6

प्रारम्भिक प्रौढावस्था

अंतरंगता बनाम अलगाव

आत्मीयता एवं दूसरों के प्रति प्रतिबद्धता की योग्यता

एकाकीपन, अकेलापन, अलगाव, अंतरंगता की आवश्यकता को झुठलाना

प्रेम

7.

मध्य प्रौढावस्था

उत्पादकता बनाम गतिरोध

अपने से पूरे समाज, भविष्य की पीढ़ी पर ध्यान

सुश्रुषा भविष्योन्मुखता की कमी, आत्मकेंद्रित

 

8.

उत्तर प्रौढावस्था

समग्रता बनाम निराश

सम्पूर्णता का भाव एवं जीवन से मूल संतुष्टि

व्यर्थता एवं निराश की अनुभूति

बुद्धि

सामाजिक अधिगम सिद्धांत

व्यक्तित्व विकास की व्याख्या अल्वर्ट बैन्डूरा द्वारा प्रतिपादित ‘सामाजिक अधिगम सिद्धांत’  के आधार पर किया, गया है।परिवेशीय दशाएं व्यक्तित्व विकास को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है।इस सिद्धांत के प्रतिपादक बैन्डूरा एवं वाल्टर्स (1963) ने अपनी पुस्तक ‘ सोशल लंर्निग एन्ड पर्सनालिटी डेवेलपमेंट”’ में व्यक्तित्व विकास में पर्यावरणीय परिस्थिति के महत्व को प्रदर्शित किया है।डोलार्ड तथा मिलर (1941) के अनुसार, विकास मूलतः व्यक्ति एवं पर्यावरण की अन्तःक्रिया का परिणाम है।बैन्डूरा का मानना है कि व्यक्तित्व के विकास में सामाजिक, संज्ञानात्मक एवं प्रेक्षणात्मक कारक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।परिवेश हमारे व्यवहार का नियमन करता है।इसमें प्रेरकों, अंतनोर्दों या किसी के व्यक्तिगत जीवन में अंतद्वर्न्दों के स्थान पर वर्तमान परिस्थिति में लोगों के क्रियाकलापों पर बल दिया गया है (बैण्डूरा, 1973) |

व्यक्तित्व संरचना के विकास  की व्याख्या, प्रमुख मानवतावादी मनोवैज्ञानिक कार्ल रोजर्स (190२ -1987) ने ‘स्व सिद्धांत’ के आधार पर प्रस्तुत किया।रोजर्स का मानना है कि प्राणी के सभी प्रकार के अनुभवों का केंद्र उसका शरीर होता है।अर्थात् मानव के साथ जो कुछ घटित होता है उसके लिए वह बहुत कुछ स्वयं जिम्मेदार है।रोजर्स ने व्यक्तित्व के विकास में ‘स्व’ तथा व्यक्ति की अनुभूतियों की संगति को महत्वपूर्ण बताया है।जब ‘स्व’  तथा अनुभूतियों के बीच अंतर उत्पन्न हो जाता है तो व्यक्ति में चिता उत्पन्न हो जाती है जिससे वह कुसमायोजित हो जाता है।रोजर्स का विश्वास था कि यदि व्यक्ति का ‘स्व’ उस व्यक्ति के वास्तविक अनुभवों के अनुरूप होता है तब व्यक्ति का समायोजन अच्छा होता है।इस प्रकार व्यक्तित्व  के विकास में स्व की भूमिका अत्यंत  महत्वपूर्ण होती है|

स्त्रोत: मानव विकास का मनोविज्ञान, ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान



© 2006–2019 C–DAC.All content appearing on the vikaspedia portal is through collaborative effort of vikaspedia and its partners.We encourage you to use and share the content in a respectful and fair manner. Please leave all source links intact and adhere to applicable copyright and intellectual property guidelines and laws.
English to Hindi Transliterate