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शारीरिक विकास पर विभिन्न कारकों का प्रभाव

परिचय

शारीरिक विकास का संरूप सभी बच्चों में सामान्य होते हुए भी इसमें भिन्नता पायी जाती है | यह विविधता अलग- अलग देशों के निवासियों में अलग- अलग पायी जाती है टैनर (1990) ने इस विविधता का कारण पोषण, गरीबी, बीमारी, जलवायु इत्यादि को माना है |

प्रभावित करने वाले कुछ अन्य प्रमुख कारक हैं :

शारीरिक विकास पर विभिन्न कारकों का प्रभाव

(1) कालिक प्रवृति : शारीरिक वृद्धि में कालिक प्रवृति का प्रभाव पाया जाता है, अथार्त शरीरिक आकार में वृद्धि की गति, विकसित देशों में एक पीढ़ी सीदूसरी पीढ़ी में पृथक पायी जाती है | इनमें ज्यादातर बच्चे अपने माता – पिता, दादा- दादी की तुलना में अधिक लम्बे एवं अधिक लम्बे एवं अधिक भार वाले पाये गये | यह प्रवृति यूरोपीय देशों, जापान और अमेरिका आदि में दिखाई देती है| यह वैभिन्य पूर्व बाल्यावस्था में प्रकट होकर, किशोरावस्था में तीव्र गति से घटित होता हुआ परिपक्वता के पश्चात् कम होने लगता है| नयी पीढ़ी के बच्चों में अधिक लम्बाई का कारण तीव्र गति से परिपक्वता का आना है| 1960-1970 के पश्चात् प्रति दशक, परिपक्वता की अवधि 3-4 माह पूर्व प्रारंभ होता गया है|

कालिक सम्प्रति का कारण विकसित पोषण एवं स्वस्थ्य सुविधा है| यह प्रवृति निम्न आर्थिक स्तर के बच्चों में नहीं पायी जाती है| कुपोषण या बीमारी से ग्रसित बच्चों में शारीरिक आकार के विकास में कमी पायी गयी (टोबयास, 1975)|

परंतु अनुवांशिक विशेषताओं को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता है| लम्बाई या भार वृद्धि, अनुवांशिक गूणसूत्रों की परिधि में ही संवर्धन पाते हैं| समृद्ध पोषण एवं उपयुक्त सामाजिक दशाओं का प्रभाव प्रत्येक आवधि में देखा गया है|

शारीरिक वृद्धि पर हारमोंस का प्रभाव

बाल्यावस्था एवं किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तनों के नियंत्रण में, एंडोक्रइन ग्रंथियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है| इन ग्रंथियों से श्रवित हारमोंस, विशिष्ट कोशिकाओं से स्रवित होकर, एक कोशिका से अन्य कोशिकाओं तक पहुंचते हैं| इन कोशिकाओं में से कुछ एक के ही संग्राहक इन हारमोंस के प्रति क्रियाशील होते हैं| पिट्यूटरी ग्रन्थि जो हैपोथैलमस के निकट पायी जाती है, से इनका स्राव होता है ये हारमोंस रक्त स्रोत में प्रवेश कर शरीर के टिशू को क्रियाशील करते हैं जिससे गतिशील क्रिया होती है इस ग्रंथि के विशिष्ट संग्राहक, रक्तस्रावमें हारमोंस को खोज लेते हैं|

वृद्धि हार्मोन एक मात्र पिट्यूटरी स्राव है जो जीवन पर्यन्त चलता रहता है| यह स्राव केन्द्रीय स्नायु संस्थान, संभवत: एड्रीनल ग्रंथि तथा लैंगिक क्षेत्र के अतिरिक्त शरीर के सारे भाग को प्रभावित करता है| इस क्रिया में एक अन्य हार्मोन जिसे सोमैटोनेडीन कहते हैं, भी सहायक की भूमिका निभाता है| हैपोथैलमस एवं पिट्यूटरी ग्रंथियां सामूहिक रूप से गले में निहित थायराइड ग्रंथि को सक्रिय करती हैं | इनका प्रभाव मस्तिष्क की स्नायु कोशिकाओं एवं सामान्य शरीरिक विकास पर पड़ता है | थायराक्सिन की न्यूनता के कारण मानसिक मदन्ता की संभवना होती है | थायराक्सिन की कमी के शिकार बच्चों की शारीरिक वृद्धि औसत से धीमी गति से होती है | चूंकि मस्तिष्क का विकास शीघ्र ही जाता है अतएव केंद्रीय स्नायु संस्थान पर इसका प्रभाव नहीं पड़ पाता| टैनर के अनुसार यदि ऐसे बच्चों की सही देखभाल की जाए तो वे शीघ्र ही औसत वृद्धि की गति पा लेते हैं| पिट्यूटरी स्राव द्वारा यौन हारमोंस (एंड्रोजेन तथा एस्ट्रोजेन) का नियंत्रण होता है| ये हारमोंस लड़के लड़कियों के यौन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|

 

स्रोत: जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची



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