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भावात्मक एवं शारीरिक देखभाल

भावात्मक एवं शारीरिक देखभाल

परिचय

नवजात शिशु में जन्म से ही अपने परिवेश के साथ समायोजन एवं प्रतिक्रिया करने की क्षमता विद्यमान रहती है । उसकी चेष्टायें ही उसके व्यवहार का संगठित संरूप होती हैं । ‘चूसना’ जहाँ उसके जीवन मूल्यों से संबंध होता है तो अन्य चेष्टायें यथा पद चालन उसके भावी गत्यात्मक विकास एवं कौशल का द्योतक होता है ।

 

भूमिका

नवजात शिशु में उद्दोलन की छ: दशाएँ पायी जाती हैं। आयु वृद्धि के साथ ये अधिक संगठित एवं पूर्वकथनीय होती जाती हैं। निद्रा अत्यंत प्रबल दशा है। आरंभ में नवजात शिशु की आर. ई. एम निद्रा अवधि सर्वाधिक होती है जो आयु वृद्धि के साथ उत्तरोत्तर कम होती जाती है। शिशु का रूदन वयस्कों के लिए, परेशानी का कारण होता है। फिर भी उन्हें धैर्य पूर्वक विभिन्न ढंगों से चुप कराया जाता है। नवजात शिशु की क्षमताओं का मापन संभव है। इससे प्राप्त जानकारी के आधार पर चिकित्सक एवं विकास मनोवैज्ञानिक नवजात के विकास के संदर्भ में, विस्तृत विवरण या पूर्वकथन कर सकते हैं।

 

नवजात शिशु जन्म के तत्काल बाद से ही सीखने की अद्वितीय क्षमता प्रकट करने लगता है पुनरावृति द्वारा उपस्थिति उद्दीपकों  के प्रति वह कम ध्यान देता है। आयु वृद्धि के साथ इस प्रक्रिया द्वारा उसमें प्रतिभिज्ञा (स्मृति) का विकास होता है। नवजात शिशु, माता-पिता से भावात्मक लगाव भी सही ढंग से विकसित नहीं हो पाता है। इसका प्रमुख कारण है गहन चिकित्सा इकाई में शिशु को जन्म के तुरंत बाद रखने के कारण उसके साथ सम्पर्क का बाधित होना, पालन पोषण में कठिनाई एवं शिशु के प्रति कम आकर्षण आदि। ऐसे बच्चे बाल दुर्व्यहार एवं निरादर के शिकार हो जाते हैं।

 

अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम की दुर्घटना अर्थात सोते- सोते अचानक शिशु की मृत्यु हो जाना माता- पिता के लिए अत्यंत पीड़ादायी होती है। अपरिपक्व बच्चों में सिंड्रोम अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त गर्भकाल में नशीले पदार्थों के सेवन करने वाली माताओं के शिशुओं में भी इस सिंड्रोम की आशंका तीन गुनी अधिक होती है। भविष्य में एतद्विषयक व्यापक शोध द्वारा  इसके कारकों की पूर्ण एवं स्पष्ट व्याख्या की जा सकेगी।

 

स्रोत: जेवियर समाज सेवा संस्थान, राँची



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