मानव हृदय क्या है और यह कैसे कार्य करता है ? यह छाती के मध्य में, थोड़ी सी बाईं ओर स्थित होता है | यह एक दिन में लगभग 1 लाख बार धड़कता है एवं एक मिनट में 60-90 बार| यह हर धड़कन के साथ शरीर में रक्त को पम्प करता है | हृदय को पोषण एवं ऑक्सीजन, रक्त के ज़रिए मिलता है जो कोरोनरी आर्टरीज़ द्वारा प्रदान किया जाता है | हृदय दो भागों में विभाजित होता है, दायां एवं बायां। हृदय के दाहिने एवं बाएं, प्रत्येक ओर दो चैम्बर (एट्रिअम एवं वेंट्रिकल नाम के) होते हैं। कुल मिलाकर हृदय में चार चैम्बर होते हैं | हृदय का दाहिना भाग शरीर से दूषित रक्त प्राप्त करता है एवं उसे फेफडों में पम्प करता है | रक्त फेफडों में शोधित होकर ह्रदय के बाएं भाग में वापस लौटता है जहां से वह शरीर में वापस पम्प कर दिया जाता है | चार वॉल्व, दो बाईं ओर (मिट्रल एवं एओर्टिक) एवं दो हृदय की दाईं ओर (पल्मोनरी एवं ट्राइक्यूस्पिड) रक्त के बहाव को निर्देशित करने के लिए एक-दिशा के द्वार की तरह कार्य करते हैं | रुमेटिक हृदय रोग रुमेटिक हृदय रोग एक ऐसी अवस्था है, जिसमें हृदय के वाल्व (ढक्कन जैसी संरचना, जो खून को पीछे बहने से रोकती है) एक बीमारी की प्रक्रिया से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। यह प्रक्रिया स्ट्रेप्टोकोकल बैक्टीरिया के कारण गले के संक्रमण से शुरू होती है। यदि इसका इलाज नहीं किया जाये, गले का यह संक्रमण रुमेटिक बुखार में बदल जाता है। बार-बार के रुमेटिक बुखार से ही रुमेटिक हृदय रोग विकसित होता है। रुमेटिक बुखार एक सूजनेवाली बीमारी है, जो शरीर के, खास कर हृदय, जोड़ों, मस्तिष्क या त्वचा को जोड़नेवाले ऊतकों को प्रभावित करती है। जब रुमेटिक बुखार हृदय को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त करता है, तो उस अवस्था को रुमेटिक हृदय रोग कहा जाता है। हर उम्र के लोग गंभीर रुमेटिक बुखार से पीड़ित हो सकते हैं, लेकिन सामान्यतौर पर यह पांच से 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चों में होता है। रुमेटिक बुखार के लक्षण बुखार सूजे हुए, मुलायम, लाल और दर्दयुक्त जोड़, खास कर घुटना, टखना., कोहनी या कलाई सूजे हुए जोड़ों पर उभार या गांठ हाथ, पैर या चेहरे की मांसपेशियों की अनियंत्रित गतिविधि कमजोरी और सांस फूलना हृदय का वाल्व क्षतिग्रस्त होने पर क्या होता है ? हृदय का एक क्षतिग्रस्त वाल्व या तो पूरी तरह बंद नहीं होता या पूरी तरह नहीं खुलता है। पहली स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में इनसफिसिएंसी और दूसरी स्थिति को स्टेनोसिस कहते हैं। पूरी तरह बंद नहीं होनेवाले हृदय के वाल्व में खून, हृदय के उसी कक्ष में वापस चला जाता है, जहां से उसे पंप किया जाता है। इसे रीगर्गिटेशन या लीकेज कहते हैं। हृदय की अगली धड़कन के साथ यह खून वाल्व से पार होकर सामान्यरूप से बहनेवाले खून में मिल जाता है। हृदय से गुजरनेवाली खून की यह अतिरिक्त मात्रा हृदय की मांसपेशियों पर अतिरिक्त बोझ डालती है। जब हृदय का वाल्व पूरी तरह नहीं खुलता है, तब हृदय को खून की सामान्य से अधिक मात्रा पंप करनी पड़ती है, ताकि संकरे रास्ते में पर्याप्त खून शरीर में जाये। सामान्यतौर पर इसका कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देता, जब तक कि रास्ता अत्यंत संकरा न हो जाये। इसकी पहचान कैसे होती है ? छाती के एक्स रे और इसीजी (एलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) दो ऐसी सामान्य जांच हैं, जिनसे पता चलता है कि हृदय प्रभावित हुआ है या नहीं। उपचार क्या है ? चिकित्सक इसका उपचार मरीज के सामान्य स्वास्थ्य, चिकित्सकीय इतिहास और बीमारी की गंभीरता के आधार पर तय करते हैं।चूंकि रुमेटिक बुखार हृदय रोग का कारण है, इसलिए इसका सर्वोत्तम उपचार रुमेटिक बुखार के बार-बार होने से रोकना है। इसे कैसे रोका जा सकता है ? रुमेटिक हृदय रोग को रोकने का सर्वश्रेष्ठ उपाय रुमेटिक बुखार को रोकना है। गले के संक्रमण के तत्काल और समुचित उपचार से इस रोग को रोका जा सकता है। यदि रुमेटिक बुखार हो, तो लगातार एंटीबायोटिक उपचार से इसके दोबारा आक्रमण को रोका जा सकता है। जन्मजात हृदय रोग जन्मजात हृदय रोग, जन्म के समय हृदय की संरचना की खराबी के कारण होती है। जन्मजात हृदय की खराबियां हृदय में जाने वाले रक्त के सामान्य प्रवाह को बदल देती हैं। जन्मजात हृदय की खराबियों के कई प्रकार होते हैं जिसमें मामूली से गंभीर प्रकार तक की बीमारियां शामिल हैं। संकेत और लक्षणः जन्मजात हृदय की खराबियों वाले कई व्यक्तियों में बहुत ही कम या कोई लक्षण नहीं पाये जाते। गंभीर प्रकार की खराबियों में लक्षण दिखाई देते हैं- विशेषकर नवजात शिशुओं में। इन लक्षणों में सामान्यतः तेजी से सांस लेना, त्वचा, ओठ और उंगलियों के नाखूनों में नीलापन, थकान और खून का संचार कम होना शामिल है। बड़े बच्चे व्यायाम करते समय या अन्य क्रियाकलाप करते समय जल्दी थक जाते हैं या तेज सांस लेने लगते हैं। दिल के दौरे के लक्षणों में व्यायाम के साथ थकान शामिल है। सांस रोकने में तकलीफ, रक्त जमना और फेफड़ों में द्रव जमा होना तथा पैरों, टखनों और टांगो में द्रव जमा होना। जब तक बच्चा गर्भाशय में रहता है या जन्म के तुरंत बाद तक गंभीर हृदय की खराबी के लक्षण साधारणतः पहचान में आ जाते हैं। लेकिन कुछ मामलों में यह तब तक पहचान में नहीं आते जबतक कि बच्चा बड़ा नहीं हो जाता और कभी-कभी तो वयस्क होने तक यह पहचान में नहीं आता। हृदयाघात क्या होता है ? हृदय एक महत्वपूर्ण अंग है जो शरीर के विभिन्न हिस्सों में रक्त को पम्प करता है। हृदय ऑक्सीजन से भरपूर रक्त रक्त-धमनियों के ज़रिए प्राप्त करता है, जिन्हें कोरोनरी आर्टरीज़ कहा जाता है | यदि इन रक्त धमनियों में रुकावट आ जाती है, तो ह्रदय की मांसपेशियों को रक्त प्राप्त नहीं होता एवं वे मर जाती हैं। इसे हृदयाघात कहते हैं | हृदयाघात की गम्भीरता हृदय की मांसपेशियों को नुकसान की मात्रा पर निर्भर करती है, मृत मांसपेशी,पम्पिंग प्रभाव को कमज़ोर कर ह्रदय के कार्य पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है, जिससे कंजेस्टिव हार्टफेल्यर होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है एवंउसके पैरों में पसीना आने लगता है। यह क्यों होता है ? हमारी आयु बढ़ने के साथ, शरीर के विभिन्न हिस्सों की रकत वाहिकाओं में, जिनमें कोरोनरी आर्टरीज़ भीशामिल हैं, कोलेस्ट्रॉल जम जाता है एवं रक्त के बहाव में धीरे-धीरे बाधा उत्पन्न कर देता है। इस धीरे-धीरेसंकरे होने की प्रक्रिया को अथेरोस्लेरोसिस कहते हैं | महिलाओं की तुलना में पुरुषों में हृदयाघात होने की संभावना अधिक होती है। महिलाएं संभवतः मादा सेक्सहॉरमोन, एस्ट्रोजेन एवं प्रोजेस्टेरोन के प्रभाव से सुरक्षित रहती हैं। यह सुरक्षा प्रभाव कम से कम रजोनिवृत्तितक बना रहता है | एशियाई लोगों, जिनमें भारतीय शामिल हैं, को हृदयाघात का जोखिम होने की संभावनाएं अधिक दिखती हैं। हृदयाघात के कारणों में शामिल हैं: धूम्रपान मधुमेह उच्च रक्तचाप अधिक वज़न उच्च घनत्व वाला लिपोप्रोटीन बनाम निम्न घनत्व वाला लिपोप्रोटीन शारीरिक गतिविधि में कमी हृदयाघात का पारिवारिक इतिहास तनाव, गुस्सैल स्वभाव, बेचैनी आनुवांशिक कारक इसका लक्षण क्या है ? इसके लक्षणों को पहचानना कठिन होता है क्योंकि वह अन्य स्थितियों के सदृश भी हो सकते हैं। विशिष्ट रूप से: जकड़न के साथ छाती में दर्द एवं सांस लेने में कठिनाई, पसीना, चक्कर एवं बेहोशी महसूस होना छाती में आगे या छाती की हड्डी के पीछे दर्द होना, दर्द छाती से गर्दन या बाईं भुजा तक पहुँच सकता है, अन्य लक्षण जैसे वमन, बेचैनी, कफ़, दिल तेज़ी से धड़कना। सामान्यतः दर्द २० मिनट से अधिक देर तक रहता है, गंभीर मामलों में, रोगी का रक्तचाप तेज़ी से गिरने की वज़ह से उसका शरीर पीला पड़ सकता है और उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इसकी पहचान कैसे की जाती है ? डॉक्टर मेडिकल इतिहास की विस्तृत जानकारी लेते, हृदयगति जांचते एवं रक्तचाप दर्ज करते हैं, रोगी का इलेक्ट्रोकार्डिओग्राम, ईसीजी, लिया जाता जो कि हृदय की विद्युत गतिविधि का रिकार्ड होता है, ईसीजी, हृदय धड़कन की दर की जानकारी देता है। साथ ही, यह बताता है कि हृदय धड़कन में कोई असामान्य लक्षण तो विद्यमान नहीं तथा हृदय की मांसपेशी का कोई हिस्सा हृदयाघात से क्षतिग्रस्त तो नहीं हुआ है। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रारम्भिक चरणों में सामान्य ईसीजी, हृदयाघात होने की संभावनाको खत्म नहीं करता, हृदय की मांसपेशी को नुकसान की पहचान करने के लिए रक्त परीक्षण उपयोगी होता है, छाती का एक्स-रे परीक्षण किया जा सकता है, ईकोकार्डिओग्राम एक प्रकार का स्कैन है जो हृदय की कार्यप्रणाली के बारे में उपयोगी जानकारी देता है, कोरोनरी धमनियों में रुकावट का निर्णायक प्रमाण कोरोनरी एन्जिओग्राम द्वारा मिलता है। हृदयाघात के दौरान मरीज़ को क्या प्राथमिक उपचार दिया जाना चाहिए ? शीघ्र उपचार से जान बचाई जा सकती है, विशेषज्ञ मेडिकल सहायता आने तक, मरीज़ को लेटाया जाना चाहिए एवं कपड़ों को ढीला कर दिया जानाचाहिए, यदि ऑक्सीजन सिलिंडर उपलब्ध हो तो मरीज़ को ऑक्सीजन दी जानी चाहिए, यदि नाइट्रोग्लीसरिन या सोर्बीट्रेट टैबलेट उपलब्ध हों तो एक या दो गोली जीभ के नीचे रखी जा सकती है, एस्पिरिन भी घोल कर दी जानी चाहिए। इसका उपचार क्या है ? हृदयाघात की स्थिति में रोगी को चिकित्सकीय देखभाल एवं अस्पताल में भर्त्ती कराने की आवश्यकता होतीहै, प्राथमिक चरणों में पहले कुछ मिनट एवं घंटे संकटपूर्ण होते हैं, कोरोनरी धमनियों में जमे थक्के को घोलनेके लिए दवाइयां दी जा सकती है, हृदय की धड़कन पर नज़र रखी जाती है एवं असामान्य धड़कन की शीघ्रता से उपचार किया जाता है। दर्दनिवारक दवाएं दी जाती एवं मरीज़ को आराम करने तथा सोने के लिए प्रेरित किया जाता है, यदि रक्तचाप अधिक हो, तो उसे कम करने के लिए दवाइयां दी जाती हैं, वास्तविक उपचार व्यक्ति विशेष के हिसाब से होता है तथा मरीज़ की आयु, हृदयाघात की गंभीरता, हृदय कोपहुंचे नुकसान एवं धमनियों में रुकावट की स्थिति पर निर्भर करता है, कई बार, रुकावट को दूर करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया ज़रूरी हो सकती है। यह कोरोनरीएन्जिओप्लास्टी, गुब्बारे की मदद से धमनियों के विस्तार, या कोरोनरी बायपास सर्जरी के रूप में हो सकतीहै। हृदयाघात से कैसे बचा जा सकता है ? हृदयाघात से पीड़ीत लोगों को निम्न उपायों का पालन करना चाहिए: जीवन शैली में परिवर्तन उन्हें स्वस्थ आहार लेना चाहिए जिसमें कम चर्बी एवं नमक, अधिक रेशा एवं जटिल कार्बोहाइड्रेट्स हों, अधिक वज़न वालों के लिए वज़न कम करना आवश्यक है, शारीरिक व्यायाम नियमित रूप से किया जाना चाहिए धूम्रपान पूर्ण रूप से बंद कर दिया जाना चाहिए, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या उच्च कोलेस्ट्रोल के रोगी को, रोग नियंत्रण के लिए नियमित रूप से दवाईयां लेनीचाहिए। हृदय की विफलता "हृदय की विफलता" का सीधा सा अर्थ है आपका हृदय जितना आवश्यक है, उतने अच्छे तरीके से रक्त की पम्पिंग नहीं कर रहा है। हृदय की विफलता का अर्थ यह नहीं है की आपके हृदय ने कार्य करना बंद कर दिया है या आपको हृदयाघात हो रहा है (लेकिन जिन लोगों को हृदय विफलता की समस्या है उन्हें अक्सर पूर्व में हृदयाघात हो चुका होता है)। हृदय की विफलता को कन्जेस्टिव हार्ट फेल्यर (CHF) भी कहा जाता है। "कन्जेस्टिव" का अर्थ है शरीर में तरल पदार्थ की मात्रा बढ़ रही है, क्योंकि हृदय उचित तरीके से पम्पिंग नहीं कर रहा है। हृदय की विफलता के कारण हृदय की विफलता के विभिन्न कारण हैं। कभी-कभी सही कारणों का पता नहीं चल पाता है। हृदय की विफलता के सामान्य कारण निम्न हैं: हृदय की धमनियों का रोग (जिसमें ह्रदय को रक्त प्रदाय में आंशिक या पूर्ण रूप से रुकावट आ जाती है); पूर्व में हृदयघात हुआ हो या उसके बगैर हृदय की मांसपेशियों में ही समस्या (कार्डिओमायोपैथी) उच्च रक्तचाप (हाइपरटेन्शन) हृदय के किसी वॉल्व के साथ समस्याएं हृदय की असामान्य धड़कन (एरिद्मिअस) विषैले पदार्थों का उपयोग (जैसे की अल्कोहल या नशीली दवाएं) जन्मगत हृदयरोग (हृदय की समस्या या दोष, जिसके साथ आपका जन्म हुआ था) मधुमेह थायरॉयड की समस्याएं हृदय विफलता के लक्षण हृदय विफलता के शिकार लोगों में पायी जाने वाली कुछ प्रमुख लक्षण हैं: सांस फूलना (चलते समय, सीढियां चढ़ते समय या अधिक हरकत करते समय) लेटे हुए ही सांस फूलना भूख में कमी सांस रुकने से रात में अचानक नींद से जागना सामान्य रूप से थकावट या कमजोरी, जिसमें व्यायाम करने की क्षमता में कमी शामिल है पैरों, पंजों या टखनों में सूजन पेट में सूजन तेज़ या अनियमित हृदयगति दीर्घकालीन कफ या जोर-जोर से सांस लेना मतली हृदय की विफलता के खतरे को कम करने का सुझाव आहार: खाने में नमक की मात्रा कम कर दें एवं कम वसा तथा कम कॉलेस्ट्रोल युक्त आहार लें अल्कोहल: शराब आदि का पूर्णतः परित्याग करें या उसे कम मात्रा में लेंव्यायाम: हृदय विफलता से पीड़ित व्यक्ति को व्यायाम करनी चाहिए। लेकिन इसे शुरू करने से पहले डॉक्टर से परामर्श करेंवज़न: अपना वज़न कम करने की कोशिश करेंपरिवार की मदद: आपका परिवार सहायता का बड़ा स्रोत हो सकता है इसलिए इसे रोकने में उनकी भी सहायता लेंमदद के अन्य स्रोत: आपके डॉक्टर आपको मदद करने वाले समूहों की जानकारी दे सकते हैं। कभी-कभी ऐसी ही समस्या से पीड़ित लोगों से चर्चा करना लाभदायक होता है । पेरिकार्डियल बहाव पेरिकार्डियल बहाव पेरिकार्डियल स्थान में द्रव्य की असामान्य मात्रा में उपस्थिति परिभाषित करता है। यह स्थानीय या प्रणालीगत विकारों के कारण हो सकता है, या यह अज्ञात हेतुक हो सकता है। पेरिकार्डियल बहाव तीव्र या दीर्घकालिक हो सकता है, तथा इसके विकसित होने में लगने वाले समय का रोगी के लक्षणों पर एक गहरा प्रभाव हो सकता है। पेरिकार्डियल स्थान में सामान्य रूप से 15-50 मिली लीटर द्रव होता है, जो पेरिकार्डियम की आंतरिक और पार्श्विका परतों के स्नेहन के रूप में कार्य करता है। पेरिकार्डियम और पेरिकार्डियल द्रव हृदय सम्बन्धी कार्य में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। सामान्य पेरिकार्डियम हृदय में बराबरी से वितरित बल को अंत:पेरिकार्डियल दबाव में सार्थक बदलाव किये बगैर द्रव की कम मात्रा को समायोजित करने के लिए फैल सकता है, पेरिकार्डियल संरचनायें मायोकार्डियम के एक समान संकुचन को सुनिश्चित करने में सहायता करते हैं व हृदय के आरपार बल का वितरण करते हैं। पेरिकार्डियल बहाव की नैदानिक अभिव्यक्तियां पेरिकार्डियल थैली में द्रव्य के जमने की दर पर अत्यधिक निर्भर हैं। पेरिकार्डियल द्रव का तीव्र गति से संचय 80 मिलीग्राम जितनी कम मात्रा के तरल पदार्थ से भी अंत:पेरिकार्डियल दबाव में बढ़ोतरी कर सकता है, जबकि धीमी गति से बढ़ते द्रव 21 तक बिना लक्षणों के बढ़ सकते हैं। पेरिकार्डियल बहाव के कारण असामान्य द्रव्य उत्पादन की वज़ह अंतर्निहित कारणों पर निर्भर करती है - आमतौर पर चोट के बाद (अर्थात, पेरिकार्डिटिस) ट्रांस्यूडेटिव द्रव तरल निकासी में बाधक होते हैं, जो लिंफ़ैटिक वाहिका के माध्यम से होता है। क्स्यूडेटिव तरल पेरिकार्डियम के भीतर संक्रमण, सूजन, घातक या स्व-प्रतिरक्षित प्रक्रियाओं के बाद होता है। अज्ञातहेतुक: अधिकांश मामलों में, अंतर्निहित कारण की पहचान नहीं हो पाती है। संक्रामक निम्नलिखित कई तंत्रों के माध्यम से एचआईवी संक्रमण पेरिकार्डियल बहाव उत्पन्न कर सकता है: बैक्टीरियल संक्रमण के बाद अवसरवादी संक्रमण हानिकर्ता (कपोसि सार्कोमा, लिम्फोमा) वायरल: पेरिकार्डिटिस और मायोकार्डिटिस संक्रमण का सबसे आम कारण वायरल है। सामान्य जीवधारियों में शामिल हैं। पायोजेनिक (निमोकॉक्सी, स्ट्रेप्टोकॉक्सी, स्टेफिलोकॉक्सी, निसेरिया, ट्युबर्क्यूलस) कवकीय या फफूंद (हिस्टोप्लासमोसिस, कॉक्सिडिऑइडोमाइकोसिस्, कैंडिडा) अन्य संक्रमण (सिफिलिटिक, प्रोटोजुअल, परजीवी) ऑपरेशन के पश्चात/प्रक्रियात्मकता के पश्चात हृदय प्रत्यारोपण के रोगियों में पेरिकार्डियल बहाव तीव्र अस्वीकृति की एक वृद्धि की व्यापकता के साथ जुड़े रहे हैं। अन्य कम आम कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं: युरेमिआ मिक्सेडेमा गंभीर फुफ्फुसीय उच्च रक्तचाप विकिरण चिकित्सा मुक्त दीवार टूटने की जटिलता सहित तीव्र माइओकार्डिअल इंफार्क्शन महाधमनी विच्छेदन की वज़ह से पेरिकार्डियल थैली रिसाव के कारण रक्तस्रावी बहाव आघात अतिसंवेदनशीलता या स्व-प्रतिरक्षा से सम्बन्धित सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमाटोसस रियूमेटॉइड आर्थ्राइटिस एंकिलोज़िंग स्पॉंडिलाइट रियूमेटिक फीवर ड्रग-संबद्ध (जैसे, प्रोकेनामाइड, हाइड्रालेज़ीन, आइसोनिआज़िड, मिनोक्सिडिल, फिनाइटॉइन, अंटिकोएगुलंट्स, मिथाइसर्गाइड) लक्षण: कार्डियोवैस्कुलर सीने में दर्द, दबाव, बेचैनी: चरित्रगत रूप से, पेरिकार्डिअल दर्द में उठकर बैठने पर एवं आगे झुकने पर राहत मिलती है तथा सीधे लेटे रहने पर बढ़ता है। सिर हल्का होना, बेहोशी हृदय की धड़कन बढ़ना श्वसन सम्बन्धी खांसी डिस्प्निआ स्वर बैठना गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल हिचकियां न्यूरोलॉजिक व्यग्रता भ्रम पेरिकार्डिअल बहाव- लक्षण पेरिकार्डिअल घर्षण रगड़: पेरिकार्डिटिस के सबसे महत्वपूर्ण भौतिक चिह्न में 3 घटक प्रति कार्डिक चक्र हो सकता है और उच्च पिच का होता है, खुरचने जैसा और कर्कश। यह कभी-कभी तभी प्रकट होता है जब स्टेथोस्कोप के डायफ्रम से छाती की बाईं निचली स्टर्नल सीमा पर तेज़ दबाव दिया जाता है। टेकिकार्डिआ टेकिप्निआ सांस की घटती आवाज़ (अप्रधान फुफ्फुस बहाव के लिए) हीपेटोस्प्लेनोमेग़ाली (बढ़ा हुआ जिगर और तिल्ली) कमजोर परिधीय नाड़ी एडीमा साइनोसिस अच्छे कोलेस्ट्रॉलयुक्त भोजन यकृत द्वारा उत्पन्न एवं कुछ प्रकार के भोजन में पाये जाने वाले मोम जैसा पदार्थ, कोलेस्ट्रॉल, विटामिन डी तथा कुछ हॉर्मोंस के निर्माण, कोशिका की दीवार बनाने एवं बाइल लवण जो कि आपकी वसा पचाने में मदद करता है, बनाने के लिए ज़रूरी होता है। वास्तव में, शरीर पर्याप्त कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता है इसलिए भले ही आप कभी भी तला हुआ पनीर नहीं छुएं तब भी आप ठीक रहेंगे। लेकिन कोलेस्ट्रॉल से पूरी तरह से बचाना कठिन है क्योंकि कई प्रकार के भोजन में यह विद्यमान होता है। शरीर में अत्यधिक कोलेस्ट्रॉल होने से हृदयरोग जैसी गम्भीर समस्याएं हो सकती हैं। उच्च कोलेस्ट्रॉल के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं जिसे नियंत्रित किया जा सकता है। कोलेस्ट्रॉल की मात्रा आपके एचडीएल कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) एवं एलडीएल कोलेस्ट्रॉल (बुरा कोलेस्ट्रॉल) के स्तर पर निर्भर करती है। स्वास्थ्यकर कोलेस्ट्रॉल का स्तर बनाए रखने के लिए एलडीएल की तुलना में एचडीएल अधिक होना महत्वपूर्ण है। आपके आहार में वसा के प्रकार पर निगाह रखना सुनिश्चित करना, विशेष रूप से ट्रांस वसा (असंतृप्त वसा) से बचना, अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का एक तरीका है। नियमित कार्डियोवैस्कुलर व्यायाम करना, कम कोलेस्ट्रॉल का आहार लेना, धूम्रपान छोड़ देना या कभी नहीं करना, बुरे कोलेस्ट्रॉल से दूर रहने के अन्य तरीके हैं। उच्च एचडीएल यद्यपि शरीर अत्यधिक वसा ग्रहण नहीं करना चाहता, फिर भी शरीर को कुछ मात्रा में वसा की आवश्यकता होती है। हममें से अधिकतर लोग बहुत अधिक खाते हैं। एक दिन में कुल कैलोरीज़ की आवश्यक मात्रा वसा से आनी चाहिए लेकिन उसका केवल एक छोटा सा अंश संतृप्त वसा से उत्पन्न होना चाहिए। ये नुकसानदायक वसा फास्ट फूड तथा तले हुए भोजन में पाए जाते हैं। संतृप्त वसा एलडीएल की संख्या को बढ़ाते हैं। शरीर ट्रांस वसा (असंतृप्त वसा का एक प्रकार) से भी दूर रहना चाहता है। यदि सामग्री की सूची में आंशिक हाइड्रोजनेटेड वनस्पति तेल शामिल हों, तो आप ट्रांस वसा खाने जा रहे हैं। ये हानिकारक हैं क्योंकि न सिर्फ ये एलडीएल की मात्रा बढ़ाएंगे बल्कि एचडीएल की मात्रा को भी कम करेंगे। यह उसके ठीक विपरीत है जो शरीर चाहता है। इसके बजाय दो अन्य वसा पर ध्यान दें: मोनोअनसैचुरेटेड एवं पॉलीअनसैचुरेटेड। आप इन्हें जैतून के तेल या सफेद सरसों के तेल में पाएंगे, साथ ही कुछ प्रकार की मछलियों एवं दानों में। एवोकॅडोस भी मोनोअनसैचुरेटेड वसा का अच्छा स्रोत हैं। ओमेगा-3 वसीय अम्लों की अधिकता वाले भोजन का सेवन में आपके एचडीएल से एलडीएल के अनुपात सुधार में मदद कर सकता है। ये वसीय अम्ल ट्यूना एवं साल्मन सहित कई मछलियों में पाए जा सकते हैं। हफ्ते में एक-दो बार इन मछलियों का सेवन करना आपके कोलेस्ट्रॉल की संख्या पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। दूसरे “अच्छे” कोलेस्ट्रॉल भोजन में शामिल हैं मछली का तेल, सोयाबीन उत्पाद, एवं हरी पत्तेदार सब्ज़ियां। लेकिन एक सर्वोत्तम तरीका है व्यायाम करना। यदि आप हफ्त में पांच दिन, एवं प्रत्येक बार लगभग 30 मिनट के लिए ऐरोबिक व्यायाम (पैदल चलना, दौड़ना, सीढ़ी चढ़ना आदि) करें तो आप सिर्फ दो महीनों में अपना एचडीएल 5 प्रतिशत से बढ़ा सकते हैं। और यह बगैर किसी “अच्छे” कोलेस्ट्रॉल वाले भोजन के सेवन के बगैर है। यदि दोनों बातें एक साथ की जाएं तो वह आपके कोलेस्ट्रॉल की संख्या निश्चित रूप से बढ़ाएंगी। यदि आप धूम्रपान करते हैं तो आप अपना अच्छा कोलेस्ट्रॉल सिर्फ उसे छोड़कर बढ़ा सकते हैं। जब आप धूम्रपान करते हैं तो आपका शरीर जो रसायन अन्दर लेता है वे वास्तव में एचडीएल को कम करते हैं। यदि आप धूम्रपान छोड़ देते हैं, तो आपका एचडीएल 10 प्रतिशत से बढ़ सकता है। वज़न कम करना भी आपके अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का अन्य तरीका है। प्रमाणों ने यह दर्शाया है कि शरीर का वज़न प्रत्येक छ: पाउण्ड कम करने पर आप शरीर में अच्छा कोलेस्ट्रॉल 1 मिली ग्राम/डेसि.लि. से बढ़ा सकते हैं। “अच्छे” कोलेस्ट्रॉल का भोजन खाना भी आपको वज़न तेज़ी से कम करने में मदद कर सकता है। एलडीएल एवं एचडीएल कोलेस्ट्रॉल: क्या अच्छा और क्या बुरा ? कोलेस्ट्रॉल रक्त में नहीं घुल सकता है। उसका कोशिकाओं तक एवं उनसे वापस परिवहन लिपोप्रोटींस नामक वाहकों द्वारा किया जाता है। लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन या एलडीएल, “बुरे” कोलेस्ट्रॉल के नाम से जाना जाता है। हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन या एचडीएल, “अच्छे” कोलेस्ट्रॉल के नाम से जाना जाता है। ट्राइग्लीसिराइड्स एवं Lp (a) कोलेस्ट्रॉल के साथ ये दो प्रकार के लिपिड, आपके कुल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बनाते हैं, जिसे रक्त परीक्षण के द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। एलडीएल (बुरा) कोलेस्ट्रॉल जब रक्त में अत्यधिक एलडीएल (बुरा) कोलेस्ट्रॉल का दौरा होता है, तो यह धीरे-धीरे हृदय तथा मस्तिष्क को रक्त प्रवाह करने वाली धमनियों की भीतरी दीवारों में जमा हो सकता है। यदि एक थक्का जमकर संकरी हो चुकी धमनी में रुकावट डाल देता है, तो इसके परिणामस्वरूप हृदयाघात या स्ट्रोक हो सकता है। एचडीएल (अच्छा) कोलेस्ट्रॉल रक्त के कोलेस्ट्रॉल की एक-चौथाई से एक-तिहाई मात्रा हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन (HDL) द्वारा ले जाई जाती है। एचडीएल कोलेस्ट्रॉल को “अच्छा” कोल्स्ट्रॉल भी कहा जाता है, क्योंकि एचडीएल का उच्च स्तर आभासित रूप से हृदयाघात के विरुद्ध बचाव करता है। एचडीएल का कम स्तर (40 मिग्रा./डे.लि.) भी हृदयरोग के जोखिम को बढ़ा देता है। ट्राइग्लीसिराइड ट्राइग्लीसिराइड शरीर में बनने वाल एक वसा का प्रकार है। ट्राइग्लीसिराइड्स की बढ़ी हुई मात्रा अधिक वज़न/मोटापे, शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, शराब के अत्यधिक सेवन तथा अत्यधिक उच्च कार्बोहाइड्रेट (कुल कैलोरीज़ का 60 प्रतिशत या अधिक) की वज़ह से हो सकता है। जिन लोगों में उच्च ट्राइग्लीसिराइड्स होते हैं, उनका एलडीएल (बुरा) तथा एचडीएल (अच्छा) स्तर मिलाकर कुल कोलेस्ट्रॉल स्तर अक्सर अधिक होता है। हृदयरोग तथा/या मधुमेह रोग वाले कई लोगों में भी ट्राइग्लीसिराइड का उच्च स्तर होता है। एलपी (ए) कोलेस्ट्रॉल एलपी (ए), एलडीएल (बुरे) कोलेस्ट्रॉल का एक आनुवांशिक भेद है। एलपी (ए) का उच्च स्तर, धमनी में समयपूर्व वसा जमाव बढ़ने का एक प्रमुख कारक है। स्रोत: www.nutralegacy.com