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देश की पहली मानसिक स्वास्थ्य नीति


मानसिक स्वास्थ्य नीति का उद्देश्य

इस नीति का उद्देश्य सभी स्तरों पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ बढ़ाना तथा मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नेतृत्व को सुदृढ़ करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक व्यापक पहुँच प्रदान करना है। यह नीति गरीबों के अनुकूल होगी क्योंकि वर्तमान में भारत में सिर्फ समाज के उच्च वर्ग को ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच है।देश की पहली मानसिक स्वास्थ्य नीति का शुभारंभ

कार्यक्रम की अवधारणा

स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार यह नीति “मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य कार्य योजना 365” द्वारा समर्थित है। इसमें केंद्र सरकार, राज्‍य सरकारों, स्‍थानीय निकायों एवं सिविल सोसायटी संगठनों द्वारा अदा की जाने वाली विशेष भूमिकाओं का स्‍पष्‍ट रूप से उल्‍लेख हैं। उन्‍होंने स्‍वास्‍थ्‍य सेवा महानिदेशालय द्वारा प्रकाशित निम्‍नलिखित दो पुस्तिकाओं का भी विमोचन किया: “सामान्‍य प्रैक्टिस में अनिवार्य मनश्चिकित्‍सा का प्रशिक्षण मॉड्यूल” और “सामान्‍य प्रैक्टिस में मनश्चिकित्‍सा के लिए मार्गदर्शन”।

मंत्री महोदय ने कहा कि - “हम संसद में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विधेयक प्रस्‍तुत करेंगे क्‍योंकि पूर्व में अर्थात् वर्ष 1987 में किए गए प्रयास में अनेक खामियों के कारण सफलता नहीं मिली थी। इस बार एक नीति समूह ने अपनी सिफारिशें तैयार करने हेतु समर्पित रूप से कार्य किया है। मैं इस बात को स्‍वीकार करने के लिए उनका आभार व्‍यक्‍त करता हूँ कि भारत में मानसिक रूप से बीमार अधिकतर लोग गांव में रहते हैं और वहां सचमुच उनके लिए कोई देखभाल सुविधा उपलब्‍ध नहीं है”।

उन्‍होंने बताया कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती म‍रीजों पर ही विचार किया गया था। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके 9 वर्ष के उपरांत मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य अधिनियम, 1987 अस्तित्‍व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी भी किसी राज्‍य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया।

राष्‍ट्रीय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस के महत्‍व पर चर्चा करते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा “यह अवसर मानसिक अस्‍वस्‍थता और उससे संबंधित भ्रामक अवधारणों पर जागरुकता बढ़ाने का है। हम एक ऐसा राष्‍ट्र चाहते हैं जो मानसिक रोगियों के मानवाधिकारों का समर्थन करता हो। साथ ही, यह अवसर मानसिक रूप से अस्‍वस्‍थ व्‍यक्तियों पर दोष मढ़ने के खिलाफ जागरुकता पैदा करने तथा अवसाद, सीजोफ्रेनिया, बाई पोलर सिंड्रोम आदि से पीड़ित व्‍यक्तियों के लक्षणों को स्‍पष्‍ट करने और उपचारात्‍मक सुविधाएं प्रदान करने का है”।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने पूर्वानुमान लगाया है कि वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत जनसंख्‍या किसी न किसी प्रकार की मानसिक अस्‍वस्‍थता से पीड़ित होगी। देश में केवल 3500 मनोचिकित्‍सक है। अत: सरकार को अगले दशक में इस अंतराल को काफी हद तक कम करने की समस्‍या से जूझना होगा।

डॉ हर्षवर्धन ने कहा, “विश्व विकलांग रिपोर्ट, 2010 सहित कई रिपोर्टों में मानसिक अस्वस्थता और गरीबी के बीच परस्‍पर संबंध स्पष्ट होता है, जिसके मुताबिक मानसिक रूप से अक्षम लोग सबसे निचले स्तर पर हैं। यह हमें चेतावनी देता है कि यह एक स्वास्थ्य संकट बन सकता है जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

इसलिए डॉ हर्षवर्धन ने इस नीति के प्रारूप को व्यक्तिगत रूप से देखा है। उन्‍होंने इस जटिल समस्या, जो जीवन के विविध आयामों को प्रभावित करती है, के ठोस समाधान के रूप में इसकी परिकल्‍पना की है।

 

उन्होंने कहा, “मैंने यह सुनिश्चित किया है कि यह हमारे मूल्य प्रणाली का अभिन्न हिस्सा बन जाए जो भागीदारीपूर्ण और मानवाधिकारों के पैमाने पर खरा उतरे। हमने इस बात का भी ध्यान रखा है कि यह सेवा गरीब और उपेक्षित वर्ग के लोगों को भी मिले।

देश की पहली मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य नीति के शुभारंभ के अवसर पर डॉ. हर्षवर्धन के अलावा विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की प्रतिनिधि सुश्री नाता मेनाब्‍दे, स्‍वास्‍थ्‍य सचिव श्री लव वर्मा, डी जी एच एस डॉ. जगदीश प्रसाद तथा मंत्रालय के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी भी मौजूद थे।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने कहा कि देश में मानसिक बीमारियों के बोझ का कुछ अनुपात बढ़ा है। इसके चलते सरकार ने तय किया है कि वह मानसिक स्वास्थ्य पर पहली आधिकारिक राष्ट्रीय नीति तैयार करेगी।

आगरा में 155 साल पुराने मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय का दौरा करने के बाद स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि वह उन घटनाओं से काफी विचलित हुए हैं जो कि मानसिक रोगियों के जीवन में घटीं।

“मानसिक रोगियों के इलाज के तौर-तरीकों में काफी प्रगति हुई है और उनके ठीक होने की दर भी बढ़ी है। लेकिन दुर्भाग्य से समाज में मनोरोग संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को कलंक के तौर पर देखा जाता है। ऐसी स्थिति में उनके इलाज में या तो देरी होती है या फिर इलाज से इंकार कर दिया जाता है। हमें इस तरह के पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए एक सामाजिक आंदोलन और मानसिक बीमारियों के मानवीय आयाम पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा, “इस दिन लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाएगा। उन्हें मानसिक बीमारियों के बारे में बताकर उनकी गलत धारणाओं को खत्म किया जाएगा। हम ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जहां मानसिक रोगियों के भी मानव अधिकार हों।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वर्ष 2020 तक भारत की 20 फीसदी जनसंख्या किसी ना किसी तरह के मानसिक रोगों से पीड़ित होगी।

जबकि देश में सिर्फ 3,500 मनोरोग चिकित्सक हैं। यही वजह है कि सरकार पिछले एक दशक से इस फासले को कम करने की समस्या का सामना कर रही है।

स्वास्थ्य मंत्री ने इस संदर्भ  में पूर्व में घोषणा की थी  कि इस संबंध में एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाई जाएगी। इसमें इस क्षेत्र से जुड़े देश के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ शामिल होंगे। इस नीति में मेडिसिन शाखा के सभी पेचीदे मामलों को भी शामिल किया जाएगा। उन्होंने इस बात के भी संकेत दिए कि बेंगलुरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोलॉजिकल साइंसेज की तर्ज पर कई और संस्थान शुरू किए जाएंगे।

इस संबंध में उन्होंने कहा कि केंद्र ने आगरा चिकित्सालय के आधारभूत ढांचे व अध्यापन सुविधाओं को उन्नत करने के लिए केंद्र ने 28.8 करोड़ रुपये का अनुदान दिया है।

श्रमशक्ति विकास योजना के तहत अब मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा की सभी शाखाओं (साइकियाट्री, साइकाइट्री नर्सिंग, साइकाइट्री सोशल वर्क और क्लिनिकल साइकोलॉजी) में छात्रों को दाखिला दिया गया है। वार्डों का नवीनीकरण किया गया है और कई नई उन्नत तकनीक खरीदकर मुहैया कराई गई है। उन्होंने संस्थान के विकास को लगातार समर्थन देते रहने का आश्वासन दिया।

डॉ हर्षवर्धन ने कहा था , “मैं इस दिशा में पहला सुधारात्मक कदम उठा चुका हूं। सार्वभौमिक स्वास्थ्य आश्वासन कार्यक्रम (यूएचएएम) में मानसिक रोगों की अनदेखी नहीं की जाएगी। नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, जो राज्यों के परामर्श के बात आएगी, में भी मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा में वो लोग भी आएंगे जिन्हें सामान्य समस्याओं के इलाज की जरूरत है।

मंत्री ने आगरा मेडिकल कॉलेज को एम्स जैसा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल बनाने के लिए एक योजना की भी घोषणा की जिसके तहत इस संस्थान को उन्नत बनाने के लिए 200 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। इसमें से 170 करोड़ रुपये केंद्र देगा और शेष राशि राज्य सरकार देगी।

स्रोत: पत्र सूचना कार्यालय व अन्य समाचार



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