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गर्भकालीन विकास की प्रवृत्ति

परिचय

गर्भकालीन विकास की प्रक्रिया यद्यपि क्रमबद्ध एवं पूर्वकथानात्मक होती है तथापि प्रत्येक शिशु के गर्भकालीन विकास में वैयक्तिक भिन्नताएँ पायी जाती है| यह भिन्नता, शिशु के आकार, त्वचा के रंग, अनुपात क्षमता एवं विकास की गति के रूप में परिलक्षित होती है| उदहारण के लिए – गर्भकाल की पूर्ण अवधि 40 सप्ताह की होती है| परंतु शिशु का जन्म 37-43 सप्ताह के बीच कभी भी हो सकता है यह वैयक्तिक भिन्नता का उदहारण है| विकास की सामान्य प्रवृति पायी जाती है अथार्त यह शरीर के ऊपरी अंगों से होकर निचले भाग की ओर अग्रसर होता है जिसे सिफेलो – काडल प्रवृति कहते हैं| विकास की एक अन्य प्रवृति भी पायी जाती है जिसे निकट – दूर प्रवृति कहते हैं (चित्र संख्या 5.3) अथार्त विकास मध्य भाग से वाह्य भाग की ओर अग्रसारित होता है| ये संरूप भ्रूण तथा गर्भस्थ शिशु में एवं जन्म लेने के बाद भी शिशु की वृद्धि में पाये जाते हैं (सांडर्स, 1065)| उदाहरणार्थ शिशु की आंख एवं सिर का नियंत्रण पहले भुजाओं एवं हाथ में उसके बाद, पैरों एवं टांगों में सबसे बाद में पाया जाता है|

गर्भस्थ शिशु स्पर्श करने से पूरे शरीर में गति करता है परंतु जन्म के पश्चात यह अनुक्रिया स्थानगत हो जाती है| इसे विकास की ‘सामान्य से विशिष्ट प्रवृति’ कहा जाता है| इसके अतिरिक्त विकास क्रम में “विभेदन एवं एकीकरण” की प्रवृति भी पायी जाती है| जैसे – कोशिकाएं सर्वप्रथम तीन भागों में विभाजित होकर, शरीर के विभिन्न अंगों के रूप में विकसित होने लगती है| तत्पश्चात शीघ्र ही एक साथ संयोजित होकर पूर्ण अंग या संस्थान का रूप धारण कर लेती हैं| आगे ये दोनों प्रक्रियाएं साथ – साथ चलने लगती है|

गर्भकालीन विकास परिवेशीय कारकों पर प्रभाव

गर्भकालीन विकास पूर्वाकथानात्मक एवं पूर्वनिर्धारित क्रमानुसार चलता है| शिशु माँ का गर्भ में, एम्निआटीक सैक में निहित एम्निआटीक फ्लूड कुशन के अंदर सुरक्षित रहता है| वह प्लेसेंटा एवं अम्वीलिकल कार्ड के माध्यम से, माँ द्वारा ऑक्सीजन एवं पोषण प्राप्त करते हुए विकसित होता है| इतने सुरक्षित परिवेश के बावजूद कुछ परिवेशीय कारक एवं टेरोटोजेन्स के प्रभावों की भी पुष्टि होती है|

परिवेशीय प्रभाव

गर्भकालीन अवस्था में माँ का चिन्तन, संवेगिक दशाएं, प्रतिबल इत्यादि का गर्भस्थ शिशु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है यह धारणा भ्रांतिपूर्ण है| वर्तमान अनुसंधानों एवं भारतीय धर्मशास्त्र एवं दांत कथाओं से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है की माँ का परिवेश, सूचना संप्रेषण प्रक्रम (चिंतन, उद्दीपन का अवसर इत्यादि) गर्भस्थ शिशु के विकास को सीधे- सीधे प्रभावित करते हैं| अनूसंधान (मोंतांग, 1950) दर्शाते हैं कि तीव्र एवं दीर्घकालिक सांवेगिक प्रतिबल के कारण एंडोक्राइन संस्थान से हारमोंस का स्खलन अधिक मात्रा में होता है जिससे विकास पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है| प्रतिबल से ग्रसित माँ पोषण एवं स्वास्थ्य देख रेख के प्रति लापरवाह हो जाती है| इधर हार्मोन स्खलन से हानिकारक तत्व, अम्बिलिकल कार्ड के माध्यम से शिशु तक पहुँच जाते है|

क्रांतिक एवं संवेदनशील आवधि

गर्भकालीन विकास कई चरणों में आगे बढ़ता है| इस अवधि में कुछ अवसर अत्यंत संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण होते हैं जिनमें होने वाले परिवर्तन विकास के स्वरूप को प्रबल रूप से प्रभावित करते हैं इनमें से प्रमुख हैं |

1. संवेदनशील अवधि : वह समय जब गर्भस्थ शिशु किसी विशिष्ट प्रभाव (परिवर्तन) के प्रति अनूक्रियाशील होता है|

2. क्रांतिक आवधि : का तात्पर्य है वह अवसर जब कोई विशेष अंग, संरचना एवं संस्थान किसी विशिष्ट प्रभाव के प्रति संवेदनशील होते हैं| यह प्रभाव जन्म के पूर्व एवं पश्चात भी प्रभावी होते हैं |

प्रथम त्रैमासिक के अंतर्गत, गर्भ कालीन विकास पर परिवेशीय प्रभाव सर्वाधिक पाया जाता है क्योंकि इस अवधि में आन्तरिक अंग (लिंब), सरंचनाएं जैसे – आँख, कान इत्यादि शीघ्रता से निर्मित होते हैं| प्राय: स्त्री को गर्भवती होने का तब तक आभास भी नहीं हो पाता| यह अवधि अंगों एवं तंत्रों के विकास को क्रांतिक एवं संवेदनशील अवधि होती है| इसमें परिवेशीय क्षतिकारक उद्दीपन सहजता से प्रभाव डाल सकते हैं | माँ में रूबेला बीमारी के कारण शिशु में अंधापन, हृदय दोष, बहरापन, मस्तिष्क विकास में क्षति या लिम्बदोष पाया जाता है| अधिकांश अंगों के विकास के लिए प्रथम त्रैमासिक अति संवेदनशील एवं क्रांतिक आवधि होती है (ग्रीनवर्ग एवं अन्य, 1957; शिखर, 1967)| प्रमुख अनूसंधान जो 1960 के दशक में किये गये, वे दर्शाते  हैं की क्रांतिक आवधि में थैलिदोमाइड दवाओं का गर्भस्थ शिशु के विकास पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है | इन दवाओं का उपयोग प्राय: उल्टी के नियंत्रण हेतु किया जाता है | एक सर्वेक्षण के अनुसार 2 वर्ष के अंदर 10,000 दोषयुक्त/अविकसित बच्चे पैदा हुए | ऐसा इस औषधि के उपयोग के कारण हुआ| दवा का प्रभाव कितना तीव्र होगा, यह इस बात पर निर्भर करत है की गर्भ की किस अवधि में दवा का उपयोग किया गया है| गर्भधान के 34वें से 38वें दिन के बीच यदि दवा ली गयी तो बच्चे के कान अविकसित पाया गया, 38-47 दिन के बीच दवा के उपयोग से उसकी बांह नहीं थी, 42-47 दिन के बीच दवा के उपयोग से पैर नहीं था, परंतु 50 दिन या बड दवा लेने पर कोई दोष नहीं पाया गया, (शर्दिन, 1976) अर्थात दवा का प्रभाव उन अंगों पर अधिक पाया गया जो विकास की क्रांतिक अवधि में थे|

स्त्रोत: ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान



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