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महिलाओं के विधिक अधिकारों के लिए विधि मोड्यूल

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भारतीय न्यायपालिका – एक संक्षिप्त परिचय

भारत में सरकारी मशीनरी की संरचना कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के बीच नियंत्रण और संतुलन पद्धति द्वारा शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर की गई है। भारतीय न्यायपालिका अपनी सांविधानिक सीमा के अनुसार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस यूनिट द्वारा पाठकों को देश की न्यायपालिका का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।

एकल और एकीकृत न्यायिक पद्यति :

भारत के संविधान में एकल न्यायिक पद्धति के लिए उपबंध किया गया है जिसमें उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च स्तर पर, उच्च न्यायालय मध्यम (राज्य) स्तर पर और जिला न्यायालय स्थानीय स्तर पर होते हैं। अन्य न्यायालय (अधीनस्थ न्यायालय) उच्च न्यायालयों के अधीन कार्य करते हैं। भारत में समस्त न्यायालय एकल न्यायिक पद्धति का एक लिंक गठित करते हैं। इन सभी स्तरों के न्यायालय मिलकर एक स्वतंत्र और शक्तिशाली न्यायिक पद्धति का गठन करते हैं, जो संविधान और संविधान द्वारा गारंटीकृत मूल अधिकारों और अन्य विधिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता :

भारत के संविधान में न्यायपालिका को सही अर्थो में स्वतंत्र बनाया गया है। इसमें निम्नलिखित के लिए उपबंध है:

(1)  न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा कालेजियम की सिफारिशों पर की जाती है, जहाँ उच्चतम न्यायालय द्वारा तीन न्यायाधीशों के मामलों में अधिकथित विधि के निबंधनुसार कालेजियम के दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जाती है;

(2)  ऐसी नियुक्तियों में किसी विसंगति या विवेकाधिकार को समाप्त करने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं स्पष्ट रूप से अनुबंधित की गई हैं;

(3)  न्यायाधीशों को केवल महाभियोग के माध्यम से हटाना संभव है, जो कि एक जटिल प्रक्रिया है; और

(4)  न्यायपालिका के लिए पर्याप्त शक्तियाँ और कार्यात्मक स्वायत्तता प्रदान की गई है।

न्यायिक पुनर्विलोकन :

भारत का संविधान देश की सर्वोच्च विधि है। उच्चतम न्यायालय संविधान के निर्वचनकर्ता और संरक्षक के रूप में कार्य करता है। यह लोगों के मूल अधिकारों और स्वतंत्रताओं का संरक्षक है। इस भूमिका को निभाने के लिए वह न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति का प्रयोग करता है। उच्चतम न्यायालय के पास समस्त विधियों की सांविधानिक विधिमान्यता का अवधारण करने की शक्ति प्राप्त है। उच्च न्यायालय भी इस शक्ति का प्रयोग करते हैं।

सांविधानिक उपचारों का अधिकार [अनुच्छेद 32] मूल अधिकारों के अतिक्रमण को रोकने के लिए न्यायालयों का संरक्षण प्रदान करता है। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को क्रमश: अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के अधीन किसी मूल अधिकार के उल्लंघन की दशा में रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है। ये रिट निम्नलिखित हैं:

  • ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ एक ऐसे आदेश की प्रकृति की रिट है जिसमें उस व्यक्ति से, जिसने किसी अन्य व्यक्ति को निरुद्ध किया हुआ है, पश्चात्वर्ती को न्यायालय यह जान सके कि ऐसे व्यक्ति को किस आधार पर निरुद्ध किया गया है और यदि कारावास के लिए कोई विधिक अधिकारिता नहीं है तो वह उसे मुक्त कर सके।
  • ‘परमादेश’ किसी व्यक्ति या संगठन को निदेश देने वाली एक ऐसी आज्ञा है जिसमें उससे या उनसे उसमें विनिर्दिष्ट कुछ विशेष काम करने की अपेक्षा की जाती है, जिसका संबंध उसके या उनके कार्यालय से है और वह लोक कर्तव्य की प्रकृति का है।
  • ‘प्रतिषेध’ एक न्यायिक रिट है जो उच्चतर न्यायालय द्वारा निम्नतर न्यायालय को उस अधिकारिता का अनाधिकार ग्रहण करने से रोकने के लिए है जो उसमें विधिक रूप से निहित नहीं है। दूसरे शब्दों में, यह रिट न्यायालयों को न्यायिक कर्तव्यों के साथ अपनी अधिकारिता की सीमाओं के भीतर रहने के लिए बाध्य करती है।
  • ‘अधिकार-पृच्छा’ की रिट एक ऐसा उपचार या कार्यवाही है जिसके द्वारा न्यायालय उस दावे की वैधता की जांच करता है जिसका कोई पक्षकार किसी कार्यालय पर करता है या यदि उसका दावा सुस्थापित नहीं पाया जाता है तो उसे उसके अधिभोग से बाहर करने के विशेषाधिकार का प्रयोग करता है।
  • ‘उत्प्रेषण’ की रिट निम्नतर न्यायिक और न्यायिक्कल्प अधिकरणों द्वारा शक्तियों के प्रयोग को विधि द्वारा उन्हें समनुदेशित अधिकारिता की सीमाओं के भीतर रखती है और उन्हें अपने प्राधिकार के आधिक्य में कार्य करने से विरत करती है।

उच्चतम न्यायालय को विवादों के सभी मामलों में अधिकारिता प्राप्त है :

(1) भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच;

(2) भारत सरकार और एक ओर एक राज्य या अधिक राज्य और दूसरी ओर एक राज्य या अधिक राज्य के बीच; और

(3) दो या अधिक राज्य के बीच।

उच्च न्यायालय :

संविधान में यह अधिकथित किया गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। तथापि, दो या अधिक राज्यों में, पारस्पिक सहमति से एक संयुक्त न्यायालय भी हो सकता है।

उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है और उसे अवमान के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है (अनुच्छेद 215) । उसे सिविल और दांडिक मामलों में ‘मूल अधिकारिता’ और अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा विनिश्चित दांडिक और सिविल मामलों की बाबत ‘अपीली अधिकारिता’ प्राप्त है। उच्च न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रदत्त की गई ‘पुनरीक्षण अधिकारिता’ और भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन ‘रिट अधिकारिता’ भी प्राप्त है।

खुला विचारण :

भारत में न्यायालय स्वतंत्र हैं। वे खुले विचारणों का संचालन करते हैं। अभियुक्त को सदैव अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया जाता है। राज्य गरीबों और जरूरतमदों को नि:शुल्क विधिक सहायता प्रदान करता है।

उच्च न्यायालय के अधीनस्थ सिविल न्यायालयों का मूलभूत ढांचा

शहरों में

जिलों में

प्रथम श्रेणी मुख्य न्यायाधीश और अपर मुख्य न्यायाधीश

प्रथम श्रेणी जिला न्यायाधीश और अपर जिला न्यायाधीश

द्वितीय श्रेणी सहायक मुख्य न्यायाधीश या ज्येष्ठ सिविल न्यायाधीश

द्वितीय श्रेणी सहायक जिला न्यायाधीश या ज्येष्ठ सिविल न्यायाधीश

तृतीय श्रेणी मुनसिफ या कनिष्ठ सिविल न्यायाधीश

तृतीय श्रेणी मुनसिफ या कनिष्ठ सिविल न्यायाधीश

 

उच्च न्यायालय के अधीनस्थ दांडिक न्यायालयों का मूलभूत ढांचा

शहरों में

जिलों में

सेशन न्यायालय (सेशन न्यायाधीश, अपर सेशन न्यायाधीश और सहायक सेशन न्यायाधीश)

सेशन न्यायालय (सेशन न्यायाधीश, सेशन न्यायाधीश और सहायक सेशन न्यायाधीश)

प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट/ मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट/ मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट

शक्तियों का पृथक्करण :

  • कार्यपालिका के न्यायपालिका से पृथक्करण की स्कीम के अनुसरण में (संविधान का अनुच्छेद 50) – मजिस्ट्रेटों के दो प्रवर्ग सृजित किए गए।
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट – इन्हें उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त और नियंत्रित किया जाता है और वे न्यायिक कृत्यों का निर्वहन करते हैं।
  • कार्यपालक मजिस्ट्रेट – इन्हें राज्य सरकार द्वारा नियुक्त और नियंत्रित किया जाता है और वे कार्यपालिका कृत्यों का निर्वहन करते हैं, अर्थात, कानून और व्यवस्था बनाए रखना।

कार्यपालिका मजिस्ट्रेसी

जिलों के लिए

उपखंडों के लिए

जिला मजिस्ट्रेट

उपखंड मजिस्ट्रेट

अपर जिला मजिस्ट्रेट

अपर उपखंड मजिस्ट्रेट

कार्यपालक मजिस्ट्रेट

कार्यपालक मजिस्ट्रेट

न्यायिक सक्रियता :

भारतीय न्यायिक पद्धति ने उत्तरोत्तर सक्रिय भूमिका निभाई है। उच्चतम न्यायालय ऐसे न्यायिक विनिश्चय और निदेश जारी कर रहा है जिनका उद्देश्य लोक हित और मानव अधिकारों का सक्रिय संरक्षण करना है। न्यायपालिका जनता के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकारी पदाधिकारियों को निदेश डे रही है। अब लोक हित मुकदमेबाजी सुस्थापित है और लोक अदालतें संविधान का एक अभिन्न अंग बन गई हैं।

लोक हित मुकदमेबाजी :

इस पद्धति के अधीन, भारत के न्यायालय ऐसे किसी महत्वपूर्ण लोक या साधारण हित को सुनिश्चित करने के लिए, जिस पर किसी अभिकरण की कार्रवाई द्वारा, चाहे वह सार्वजनिक हो या प्राइवेट, प्रतिकूल प्रभाव डाला जा रहा है या उस पर इस प्रकार प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है, कार्रवाई आरंभ और प्रवर्तित कर सकते हैं। इसके अधीन कोई नागरिक या कोई समूह या कोई स्वैच्छिक संगठन, या स्वयं न्यायालय भी किसी लोक हित के संरक्षण और तुष्टि के लिए कईवाई की मांग करते हुए किसी मामले की सुचना दे सकता है।

दंड प्रक्रिया का परिचय

इस यूनिट में भारत में यथा-प्रचलित दंड प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को दांडिक मामलों में सुसंगत तकनीकी पदों, उनके अधिकारों और अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया से अवगत कराना है। यह उल्ल्लेख करने की आवश्यकता है कि विभिन्न राज्यों द्वारा दंड विधि में अनेक संशोधन किए गए है और राज्य द्वारा किए गए ऐसे विनिर्दिष्ट परिवर्तनों को ध्यान में रखने की आवश्यकता है।

अपराधों का प्रवर्गीकरण

दंड प्रक्रिया संहिता में अपराधों के तीन प्रकार के प्रवर्गीकरण के लिए उपबंध किया गया है:

संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध

  • दंड प्रक्रिया संहिता की अनुसूची 1 में भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराधों को संज्ञेय और असंज्ञेय अपराधों में वर्गीकृत किया गया है।
  • अनुसूची के भाग 2 में यह विनिर्दिष्ट किया गया है कि जब तक अन्यथा उपबंधित न हो, किसी विशेष विधि के अधीन ऐसे अपराध, जो तीन वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दंडनीय हैं, संज्ञेय अपराध होंगे।
  • असंज्ञेय अपराधों में, पुलिस किसी अभियुक्त को वारंट के बिना गिरफ्तार नहीं कर सकती। पुलिस ऐसे मामलों में तब तक प्रथम इत्तिला रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) दर्ज नहीं करती या अन्वेषण आरंभ नहीं करती जब तक मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसा करने के लिए निदेश नहीं दिया जाता है।
  • दूसरी ओर, संज्ञेय अपराधों में, पुलिस को आवश्यक रूप से प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दर्ज करनी होती है और ऐसे अपराध के किए जाने के बारे में सूचना प्राप्त होने के ठीक पश्चात कानूनी अन्वेषण करना होता है। प्रथम अनुसूची के स्पष्टीकारक टिप्पण में यह स्पष्ट किया गया है कि संज्ञेय से यह विवक्षित होता है कि पुलिस अधिकारी वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा।

जमानतीय और अजमानतीय अपराध

जमानतीय अपराध में, कोई अभियुक्त व्यक्ति अधिकारस्वरूप पुलिस थाने के थाना गृह अधिकारी को, यदि वह पुलिस अभिरक्षा में है या उस न्यायालय को, जिसके समक्ष वह उपस्थित होता है या पेश किया जाता है, पर्याप्त प्रतिभूति देने पर जमानत पर छोड़े जाने का अनुरोध कर सकता है। अजमानतीय अपराधों में, जमानत केवल न्यायालय द्वारा ही मंजूर की जा सकती है।

शमनीय और अशमनीय अपराध

  • शमन करना से यह अभिप्रेत है कि पीड़ित व्यक्ति अभियुक्त को इस आशय की घोषणा करके दांडिक दायित्व से दोषमुक्त कर सकता है। अपराधों का शमन तब अनुज्ञात किया जाता है जब अपराध आवश्यक रूप से प्राइवेट प्रकृति का हो और अपेक्षाकृत गंभीर न हो। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 में दी गई सारणियों में ऐसे अपराधों को सूचीबद्ध किया गया है, जो उस व्यक्ति द्वारा, जिसके विरुद्ध अपराध कारित किया गया है, शमनीय हैं। इसमें उन अपराधों को भी सूचीबद्ध किया गया है, जहाँ ऐसा प्रशमन केवल न्यायालय की अनुज्ञा से ही अनुज्ञात है।
  • जहाँ अपराध शमनीय होता है, वहां यदि पक्षकार किसी समझौते पर पहुंचते हैं तो अपराध का शमन न्यायालय की अनुज्ञा से या उसके बिना किया जा सकता है।
  • प्रशमन से आवश्यक रूप से पीड़ित और अभियुक्त के बीच ऐसा समझौता अभिप्रेत है जो विधि द्वारा मान्य है और प्राय: वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, इस बात से सहमत होता है कि कतिपय रकम का संदाय करने पर अपराधी के विरुद्ध कार्यवाहियां वापस ली जा सकती हैं। इस प्रक्रिया में पीड़ित को विचरण आरंभ होने से पूर्व अपराधी से प्रतिकर के संबध में बातचीत करने का अवसर दिया जाता है।
  • किसी पीड़ित व्यक्ति को अपराध का प्रशमन करने के लिए केवल तभी सहमत होना चाहिए यदि उसे यह पक्का विश्वास हो कि उसके विरुद्ध भविष्य में कोई अपराध कारित नहीं किया जाएगा।
  • यदि कोई अपराध शमनीय नहीं है तो पक्षकार तब भी समझौते के लिए बातचीत कर सकते हैं और उच्च न्यायालय में समावेदन कर सकते है। यदि उच्च न्यायालय यह पाता है कि समझौता न्यायसंगत है तो वह कार्यवाहियों को समाप्त करने का आदेश कर सकता है।

सिविल और दांडिक मामला

सिविल और दांडिक कार्यवाहियों के बीच मुख्य अंतर यह है कि किसी सिविल कार्यवाही में, उपचार सिविल प्रकृति का होता है और किसी दांडिक कार्यवाही में, दोषसिद्धि और पारिणामिक दंड, जिसमें कारावास, जुर्माना आदि अंतर्वलित होता है, पारित किया जाता है। सिविल और दांडिक कार्यवाहियों के बीच एक अन्य अंतर यह है कि पूर्ववर्ती की दशा में, केवल व्यथित व्यक्ति अपराध की शिकायत कर सकता है। दांडिक मामलों की दशा में, यदि अपराध गंभीर है तो कोई भी अपराध कारित किए जाने के बारे में शिकायत कर सकता है।

दैनिक डायरी प्रविष्टि (डी.डी.ई.)

  • डी.डी.ई. पुलिस थाने में रखे गए रजिस्टर में पुलिस को दी गई सूचना पर टिप्पण होता है। ऐसी कोई व्यक्ति, जिसे इस बात का डर है कि उसका उत्पीड़न किया जा सकता है, तो वह अपनी आशंका और ऐसी आशंका के लिए अपने कारणों के संबंध में पुलिस को रिपोर्ट कर सकता है। वह यह भी कथन कर सकता है कि क्या वह चाहता है कि कोई तत्काल कार्रवाई की जाए या यह कि यदि भविष्य में कोई घटना होती है तो उसे कारित अपहानि के लिए अभियुक्त को अवश्य ही उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए। ऐसा विकल्प, किसी पश्चातवर्ती घटना की दशा में, ऐसे अभिलेख या साक्ष्य की पूर्ति करता है कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत की गई थी वह ही इस कार्य के लिए उत्तरदायी है। पुलिस से यह अनुरोध किया जा सकता है कि अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही की जाए और वह यह प्रतिभूति प्रस्तुत करे कि वह भविष्य में उसके विरुद्ध कोई अपराध कारित नहीं करेगा।
  • ऐसे किसी अपराध के संबंध में, जिसमें कोई महिला अंतर्वलित है या किसी महिला की इस आशंका के बारे में कि कोई अपराध कारित किया जा सकता है, सूचना उस पुलिस थाने में जहाँ अपराध कारित किया गया है या उस स्थान की बाबत पुलिस थाने में दी जा सकती है जहाँ महिला कार्य करती है या निवास करती है। यदि किसी अन्य पुलिस थाने में सूचना दी जाएगी, जो कि इसके बाद एफ.आई.आर. या असंज्ञेय रिपोर्ट दर्ज करेगा। ऐसी सूचना महिलाओं के प्रति अपराध प्रकोष्ठ में भी की जा सकती है तब उस पर महिला पुलिस पदाधिकारियों द्वारा अधिक संवेदनशीलता से कार्यवाही की जा सकती है।

असंज्ञेय रिपोर्ट (एन.सी.आर.)

पुलिस द्वारा किसी असंज्ञेय के बारे में विहित प्ररूप में लेखबद्ध सूचना को एन.सी.आर. कहा जाता है। एन.सी.आर. मजिस्ट्रेट को अग्रेषित की जानी होती है, जो कि यह आदेश कर सकेगा कि अपराध का अन्वेषण किया जाए।

प्रथम इत्तिला रिपोर्ट (एफ.आई.आर.)

  • एफ.आई.आर. पुलिस द्वारा उस समय तैयार किया गया एक लिखित दस्तावेज होता है जब कोई अपराध कारित किए जाने के बारे में पुलिस द्वारा सूचना प्राप्त की जाती है। दूसरे शब्दों में, जब किसी अपराध के संबंध में कोई रिपोर्ट पुलिस को की जाती है और पुलिस विहित प्ररूप में रिपोर्ट को लेखबद्ध कर लेती है तब उसे एफ.आई.आर. कहा जाता है।
  • एफ.आई.आर. एक महत्वपूर्ण साक्ष्य होता है। इससे दांडिक न्याय की प्रक्रिया आरंभ होती है। अपराध और साक्षी के नामों के ब्यौरे देते हुए तुरंत एफ.आई.आर. फाइल करने से अभियुक्त को दोषसिद्ध करने में काफी सहायता मिलती है। यद्यपि यह कोई सारवान साक्ष्य नहीं होता है तथापि इसका प्रयोग उस व्यक्ति की, जिसने शिकायत दर्ज की है, संपुष्टि या विरोध के लिए किया जा सकता है।
  • इसमें उस कार्य का, जिसके बारे में शिकायत की गई है, समय तारीख, स्थान, अभियुक्त की पहचान और उससे संबद्ध परिस्थितियों को विस्तार से उपवर्णित किया जाना चाहिए। सह-अपराधियों की भूमिका और अभियुक्त का समर्थन करने वाले, सहायता देने वाले या उसकाने वाले व्यक्तियों के बारे में विवरण का कथन भी स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए।
  • पीड़ित की ओर से खतरे की किसी आशंका या अभियुक्त द्वारा दी गई धमकी को, जिसके अंतर्गत पीड़ित को शिकायत करने से अवरुद्ध करने के लिए जारी की गई धमकियां भी हैं, एफ.आई.आर. में अवश्य ही लेखबद्ध करना होता है।
  • एफ.आई.आर. में मामले के संबंध में समुचित कार्रवाई करने और पीड़ित व्यक्ति की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त उपाय करने का अनुरोध भी अवश्य होना चाहिए।
  • पुलिस के पास एफ.आई.आर. दर्ज किए जाने से पूर्व किसी अपराध का अन्वेषण करने की शक्तियाँ नहीं हैं। असंज्ञेय अपराधों के मामले में, पुलिस तब तक अन्वेषण नहीं कर सकती जब तक की न्यायालय उसे ऐसा करने का निदेश नहीं देता।
  • पुलिस संज्ञेय अपराधों का अन्वेषण करने और अभियुक्त को गिरफ्तार करने के लिए कर्तव्यबद्ध है।
  • यदि अभियुक्त, यह सूचित किए जाने के बावजूद कि अन्वेषण के प्रयोजनार्थ उसकी आवश्यकता है, अन्वेषण से बचता रहता है तो ऐसा आचरण दोषिता का अवधारण करने के प्रयोजनार्थ भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अधीन अभियुक्त के विरुद्ध ग्राह्य होगा।
  • छोटी-मोटे ब्यौरों का लोप करने या इस तथ्य से की घटना की रिपोर्ट एफ.आई.आर. में विस्तार से नहीं की गई थी, अभियोजन-पत्र के कथन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • एफ.आई.आर. केवल प्रथम इत्तिला रिपोर्ट होती है न कि संपूर्ण अन्वेषण रिपोर्ट या आरोप-पत्र, जिसे अन्वेषण पूरा करने के पश्चात पुलिस को प्रस्तुत करना होता है।

पुलिस को सूचना देते समय अधिकार

  • शिकायतकर्ता के पास सूचना लेखबद्ध कराने का अधिकार है।
  • पुलिस का यह कर्तव्य है कि वह शिकायतकर्ता को सुने, शिकायतकर्ता के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करे और शिकायतकर्ता द्वारा दी गई सूचना को लेखबद्ध करे।
  • यदि पुलिस द्वारा सूचना लेखबद्ध नहीं की जाती है तो किसी ज्येष्ठ अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास समावेदन किया जा सकता है और ऐसी असफलता के विरुद्ध एफ.आई.आर. दर्ज कराई जा सकती है।
  • यदि शिकायतकर्ता क्षतिग्रस्त है तो पुलिस को उसे चिकित्सीय परीक्षा के लिए अस्पताल ले जाना होगा।
  • एन.सी.आर. करते समय, डी.डी.ई. संख्यांक दिया जाएगा।
  • यदि सूचना लिखित रूप में दी जाती है तो लिखित सूचना की तारीख और डी.डी.ई. संख्यांक सहित स्टांपित एक प्रति देनी होगी।
  • शिकायतकर्ता का यह अधिकार है कि वह अधिकारी से एफ.आई.आर. की अंतर्वस्तु को पढ़ने के लिए कहे।
  • एफ.आई.आर. पर हस्ताक्षर तभी करने चाहिए यदि आप उसकी अंतर्वस्तु से संतुष्ट हैं।
  • यदि संबंधित पुलिस अधिकारी एफ.आई.आर. दर्ज करने से इंकार करता है तो एफ.आई.आर. दर्ज कराने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क किया जाना चाहिए।
  • अपराध का संज्ञान लेने के लिए सक्षम प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट या प्रशासनिक रूप से वरिष्ठ अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी समावेदन किया जा सकता है।
  • ऐसे मामले में मजिस्ट्रेट को संज्ञान लिए बिना स्थानीय पुलिस को अन्वेषण करने का निदेश देना चाहिए या शिकायत का संज्ञान लेना चाहिए और शिकायतकर्ता और साक्षियों की शपथ पर परीक्षा करनी चाहिए। परीक्षा के सार को लेखबद्ध किया जाना चाहिए और शिकायतकर्ता, साक्षियों और मजिस्ट्रेट को उस पर हस्ताक्षर करने चाहिए।
  • यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है की भारतीय दंड संहिता की धारा 166क के खंड(ग) लैंगिक अपराधों, जैसे लैंगिक अपराधों के मामले में एफ.आई.आर. दर्ज करने से इंकार करना पुलिस के लिए एक अपराध बनाया गया है।

अन्वेषण

  • अन्वेषण ऐसी सामग्री एकत्र करने के लिए किया जाता है, जो इस बात का अवधारण करने के लिए सुसंगत हो कि अभियुक्त दोषी है अथवा नहीं। इस प्रकार, उदाहरणार्थ, कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न के बारे अन्वेषण करने में सहकर्मियों के कथन अभिलेखबद्ध करना, कार्यालय का स्थल-रेखांक तैयार करना, अभियुक्त के कार्यालय या निवास-स्थान की तलाशी लेना, सुसंगत चीजों को अभिगृहीत करना, जिसके अंतर्गत प्राय: दस्तावेज होते हैं, फोटोग्राफ लेना आदि अंतर्वलित होते हैं।
  • पुलिस द्वारा मामले का अन्वेषण करने के लिए तुरंत और प्रभावी कदम उठाने में असफल रहने के परिणामस्वरूप अभियुक्त साक्ष्य में छेड़छाड़ कर सकता है और साक्षियों पर प्रभाव या दबाव डाल सकता है। अत: ऐसी असफलता को उस क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट की जानकारी में तुरंत लाया जाना चाहिए। ऐसे कदमों के अंतर्गत कोई विनिर्दिष्ट साक्ष्य एकत्र करना, अभियुक्त को गिरफ्तार करना और/या मामला किसी ऐसे अन्य पुलिस थाने, अभिकरण या अन्वेषक अधिकारी को अंतरित करना जिससे मामले के संबंध में अधिक संवेदनशीलता और शीघ्रतापूर्वक कार्यवाही करने की प्रत्याश की जा सकती है।
  • एफ.आई.आर. दर्ज हो जाने या मजिस्ट्रेट द्वारा अन्वेषण का निदेश दिए जाने के पश्चात (असंज्ञेय अपराध की दशा में) अन्वेषक अधिकारी शिकायतकर्ता और शिकायतकर्ता द्वारा नामित साक्षियों के कथन लेखबद्ध करता है। साक्षियों के लिए अपराध कारित किए जाने के संबंध में समस्त तथ्य देना आवश्यक है। साक्षी के लिए कथन पर हस्ताक्षर करना आवश्यक नहीं है।
  • शिकायतकर्ता को यह अधिकार प्राप्त है की यदि किसी परिसर में से अपराध में फंसाने वाली कोई सामग्री या दस्तावेज बरामद किया जा सकता है तो वह अन्वेषक अधिकारी को सूचित करे।
  • अन्वेषक अधिकारी, पर्याप्त आधार होने पर, तलाशी ले सकता है और अपराध के कारित किए जाने से संबंधित समस्त साक्ष्य को अभिगृहीत कर सकता है।

अन्वेषण का अंतरण

ऐसी स्थिति में, जहाँ स्थानीय अन्वेषण अभिकरण निष्पक्ष या प्रभावी रूप से अन्वेषण नहीं करता या यह विश्वास करने का कारण है कि वह प्रभावी और निष्पक्ष रीति में अन्वेषण का संचालन करने में समर्थ नहीं होगा वहां दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156, 173 और 482 के अधीन और भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के अधीन उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय यह आदेश कर सकते है कि अन्वेषण सी.बी.आई. को अंतरित कर दिया जाए।

न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान

जैसे ही न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 190(1) के अधीन उसके समक्ष प्रस्तुत मामले पर अपने विवेक का प्रयोग करता है तो ऐसा मजिस्ट्रेट उस अपराध का संज्ञान करता है। सेशन न्यायालय द्वारा अनन्य रूप से विचारणीय मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की सुपुर्दगी के पश्चात संज्ञान लिया जाता है।

न्यायालय द्वारा अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित करना

  • पुलिस रिपोर्ट फाइल करने और अभियुक्त के उपसंजात होने के पश्चात, उन सभी कथनों और दस्तावेजों की प्रतिया जिनका अभियोजन-पक्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 207 के अधीन अवलंब लेने की ईप्सा करता है, अभियुक्त को नि:शुल्क उपलब्ध कराई जानी आवश्यक है। यथास्थिति, आरोप या नोटिस विरचित करते समय, अभियुक्त को स्पष्ट रूप से यह सूचित कर दिया जाता है कि उसका वह विशेष कार्य उस विशेष अपराध की कोटि में आता है और इसके लिए उसका विचारण किया जाएगा। उससे यह भी पूछा जाना होता है कि क्या वह दोषी होने का अभिवाक करता है अथवा नहीं।
  • अभियोजन साक्षियों की परीक्षा और प्रति-परीक्षा किए जाने के पश्चात, समस्त साक्ष्य अभियुक्त को सौंपा जाता है और उसे उसके विरुद्ध साक्ष्य में प्रस्तुत की गई किसी बात को व्यक्तिगत रूप से स्पष्ट करने का अवसर दिया जाता है। अभियुक्त न्यायालय के समक्ष प्रतिरक्षा-पक्ष के किन्हीं साक्षियों को प्रस्तुत करने के लिए भी कह सकता है। इसके पश्चात, प्रतिरक्षा-पक्ष के साक्षियों की, यदि कोई हैं, परीक्षा और प्रति-परीक्षा की जाती है।
  • निर्णय सुनाए जाने और दंड का अवधारण किए जाने के पश्चात, विचारण समाप्त हो जाता है। गंभीर अपराधों के मामले में, यह प्रक्रम दो भागों में विभाजित होता है, दोषसिद्धि और दंड का पृथक-पृथक सुनवाईयों में पृथक-पृथक सुनाया जाना।

जमानत मंजूर करने के संबंध में उपबंध

  • जमानतीय अपराधों के लिए, अभियुक्त को गिरफ्तारी के पश्चात रिहा कर दिए जाने का अधिकार प्राप्त है। अजमानतीय अपराधों के लिए, अभियुक्त जमानत पर छोड़े जाने के लिए आवेदन कर सकता है और न्यायालय, मामले के तथ्यों के आधार पर, जमानत मंजूर कर सकता है।
  • किसी अभियुक्त को गिरफ्तार करने का प्रयोजन विचारण के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना है। यदि अभियुक्त की उपस्थिति उसकी स्वतंत्रता को कम किए बिना या उसकी स्वतंत्रता को केवल उस सीमा तक कम करके सुनिश्चित की जा सकती है जिससे कि विचारण के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके, तो अभियुक्त को निरोध में रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। अत:, जब न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि अभियुक्त कार्यवाहियों से बचने की कोशिश नहीं करेगा और वह पर्याप्त प्रतिभूति दे देता है तब अभियुक्त को जमानत पर रिहा किया जा सकता है।
  • इस बात का अवधारण करने के लिए कि जमानत मंजूर की जानी चाहिए अथवा नहीं, ध्यान में रखे जाने वाले कारक निम्न प्रकार हैं:

(क)     आरोप की घोरता या दोषारोपण की प्रकृति।

(ख)     उस दंड की गंभीरता, जो किसी मामले में दोषसिद्धि पर दिया जाएगा।

(ग)     दोषारोपण के समर्थन में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य की प्रकृति।

(घ)     यदि अभियुक्त को जमानत पर छोड़ दिया जाता है तो उसके फरार होने का खतरा।

(ङ)     विचारण की अवधि।

(च)     अभियुक्त के निरोध की अवधि।

(छ)     अभियुक्त का चरित्र, साधन और प्रतिष्ठा।

(ज)     अभियुक्त का न्यायालय में पूर्ववर्ती आचरण और व्यवहार।

(झ)     अभियुक्त का स्वास्थ्य, आयु और लिंग।

(ञ)     अभियुक्त को प्रतिरक्षा तैयार करने और काउंसेल से मिलने का अवसर।

(ट)     इस बात का खतरा की अपराध दोहराया जाएगा।

  • उपरोक्त विचारणीय बातें साधारणतया अग्रिम जमानत मंजूर करने के लिए भी लागू होती हैं।

जमानत का रद्द किया जाना

  • जब ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जो अभियुक्त का जमानत पर रहना अनुज्ञात करने के लिए अधिक समीचीन नहीं हैं तो जमानत रद्द की जा सकती है। यदि इस बात की संभावना हो कि वह वही अपराध या कोई अन्य अपराध कर सकता है, यह कि हो सकता है की वह न्यायालय के समक्ष उपस्थित न हो, यह कि वह साक्ष्य से छेड़छाड़ करने का प्रयत्न कर रहा है या यह की उसने जमानत मंजूर करने के लिए सुसंगत विचारणाओं में से किसी विचारणा के प्रतिकूल कार्य किया है, ये बातें जमानत रद्द करने के लिए न्यायालय के ध्यान में लाई जा सकती हैं।
  • यदि अभियुक्त पीड़ित या किसी अन्य साक्षी को धमकी देता है तो शिकायकर्ता जमानत के रद्दकरण के लिए न्यायालय में समावेदन कर सकता है क्योंकि अभियुक्त का ऐसा कार्य साक्ष्य में छेड़छाड़ करने की कोटि में आता है। इसके अतिरिक्त, यदि कोई पीड़ित यह पाता है कि किसी अभियुक्त को मंजूर की गई जमानत अनुचित है तो पीड़ित व्यक्ति जमानत के रद्दकरण के लिए आवेदन फाइल कर सकता है।

अभियुक्त का न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना

मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध का संज्ञान लिए जाने पश्चात, अर्थात, उसने अपने समक्ष लाए गए मामले के संबंध में विवेक का प्रयोग किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि मामले में आगे कार्यवाही किए जाने की आवश्यकता है तो उसे यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाने होंगे कि अभियुक्त अग्रिम कार्यवागियों के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो। न्यायालय, अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए समन या वारंट जारी कर सकता है।

वारंट मामले

वारंट मामले ऐसे मामले होते हैं जिनके परिणामस्वरूप दो वर्ष से अधिक के कारावास का दंड दिया जा सकता है। न्यायालय, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति समन का अनुपालन नहीं करेगा, अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए गिरफ्तारी का वारंट जारी कर सकता है। अभियुक्त का पेश होना महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी उपस्थिति आरोप विरचित करने और साक्ष्य अभिलिखित करने के लिए आवश्यक है।

शिकायतकर्ता के काउंसेल को सुने जाने अधिकार

  • किसी दांडिक विचारण में अभियोजन का कर्तव्य न केवल हर हाल्ट में दोषसिद्धि सुनिश्चित करना होता है बल्कि अभियोजक के कब्जे में आने वाले किसी भी साक्ष्य को न्यायालय के समक्ष रखना भी होता है, चाहे वह साक्ष्य अभियुक्त के पक्ष में हो या उसके विरुद्ध हो। यह न्यायालय पर निर्भर करता है कि वह साक्ष्य के आधार पर यह विनिश्चित करे कि अभियुक्त अभिकथित अपराध का दोषी है अथवा नहीं।
  • मजिस्ट्रेट के न्यायालय में, शिकायतकर्ता की ओर से प्राइवेट काउंसेल अभियोजन-पक्ष की सहायता करने और न्यायालय के समक्ष मामला प्रस्तुत करने की अनुज्ञा की ईप्सा कर सकता है। तथापि, प्राइवेट काउंसेल, न्यायालय की इजाजत से किसी मामले में लिखित तर्क भी फाइल कर सकता है।
  • न्यायालय यह सुनिश्चित करने के लिए आबद्ध है कि न्यायिक कार्यवाहियों के अनुक्रम में साक्षी को असम्यक असुविधा कारित न हो। विधि में, शिकायतकर्ता या साक्षियों को असंगत या शरारती प्रश्न, सुझाव या अभिकथनों द्वारा असम्यक असुविधा कारित करना अनुज्ञात नहीं है।

दांडिक मामलों में सबूत का मानक

  • दांडिक कार्यवाहियों में, अपेक्षित सबूत का मानक युक्तियुक्त संदेह से परे होना आवश्यक है।

अपील

  • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के परन्तुक के अधीन किसी अभियुक्त की दोषमुक्ति के आदेश के विरुद्ध या अधिरोपित अपर्याप्त दंडादेश या सिद्धदोष व्यक्ति द्वारा संदत्त किए जाने के लिए आदेशित प्रतिकर के विरुद्ध अपील करने का अधिकार है।
  • अपील के लिए याचिका उस न्यायालय से, जिसने आदेश किया है, उच्चतर न्यायालय में की जानी चाहिए, उसके साथ उस आदेश की प्रति भी लगाई जानी चाहिए, जिसके विरुद्ध अपील की गई है और अपील के लिए आधारों का कथन भी किया जाना चाहिए। आधार ये हो सकते हैं कि आदेश में कुछ विधिक त्रुटि या गलती हैं या यह कि साक्ष्य को उचित महत्व नहीं दिया गया था।

पुनरीक्षण

  • शिकायतकर्ता उच्चतर न्यायालयों, जैसे सेशन न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय में ऐसे किसी आदेश को चुनौती देने के लिए, जो कि अन्तर्वर्तीनहीं हैं, पुनरीक्षण में आवेदन फाइल कर सकता है। किसी अपील और पुनरीक्षण के बीच अंतर यह है की अपील अधिकारस्वरूप होती है जबकि पुनरीक्षण की दशा में, न्यायालयों को याचिका को ग्रहण करने या उसे नामंजूर करने का विवेकाधिकार प्राप्त होता है।
  • न्यायालय पुनरीक्षण संबंधी अपनी शक्तियों का प्रयोग तब कर सकता है जब:

(क)     निचले न्यायालय का विनिश्चय अत्यधिक त्रुटिपूर्ण है।

(ख)     विधि के उपबंधों का अनुपालन नहीं किया गया है।

(ग)     तथ्य संबंधी निष्कर्ष साक्ष्य पर आधारित नहीं है।

(घ)     निचले न्यायालय द्वारा तात्विक साक्ष्य को अनदेखा किया गया है।

(ङ)     जिस तरीके से कार्यवाहियां चलाई जा रही हैं, उसमें अन्य कोई अवैधता है।

महिलाओं के प्रति अपराध से संबंधित विनिर्दिष्ट उपबंध

भारतीय दंड संहिता, 1860

इस यूनिट के अंतर्गत महिलाओं से संबंधित अपराधों और भारतीय दंड संहिता, 1860 में ऐसे अपराधों की बाबत शास्तिक उपबंध आते हैं। उन धाराओं के विवरण को, जिन्हें वर्ष 2013 में संशोधित किया गया है, यूनिट-4 में शामिल किया गया है। सुसंगत उपबंधों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

अपराध

धारा

दंड

संज्ञेय/ असंज्ञेय

जमानतीय/ अजमानतीय

कतिपय अपराधों से, जिसके अंतर्गत लैंगिक उत्पीड़न के मामले भी हैं, पीड़ित व्यक्ति की पहचान का प्रकटन

228क

दो वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

जमानतीय

अश्लील कार्य और गाने

294

तीन मास का कारावास या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय

जमानतीय

दहेज मृत्यु

304ख

सात वर्ष का न्यूनतम कारावास जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा

संज्ञेय

अजमानतीय

आत्महत्या का दुष्प्रेरण

306

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

गर्भपात कारित करना

312

तीन वर्ष का कारावास और जुर्माना

असंज्ञेय

जमानतीय

स्त्री की सम्मति के बिना गर्भपात करना

313

आजीवन कारावास या दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

स्त्री की सम्मति के बिना गर्भपात करने के आशय से किए गए कार्यो द्वारा कारित मृत्यु

314

दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना या आजीवन कारावास या ऊपर वर्णित दंड

संज्ञेय

अजमानतीय

शिशु का जीवित पैदा होना रोकना या जन्म के पश्चात उसकी मृत्यु कारित करना

315

दस वर्ष तक का कारावास या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय

अजमानतीय

ऐसे कार्य द्वारा जो आपराधिक मानव वध की कोटि में आता है, किसी अजात शिशु की मृत्यु कारित करना

316

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

स्त्री की लज्जा भंग करने का आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग

354

एक वर्ष का कारावास, जो पाँच वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

भारत से व्यपहरण

360

सात वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय जमानतीय

 

विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण (अवयस्क, अर्थात महिलाओं की दशा में 18 वर्ष से कम और पुरुषों की दशा में 16 वर्ष से कम)

361

सात वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

जमानतीय

विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को व्यपह्यत करना, अपह्यत करना या उत्प्रेरित करना

366

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

अवयस्क लड़की का उपापन (अवयस्क लड़की 18 वर्ष की आयु से कम की है)

366क

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

विदेश से (भारत के बाहर किसी देश से या जम्मू-कश्मीर राज्य से) लड़की का आयात करना

366ख

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

वेश्यावृत्ति आदि के प्रयोजन के लिए अवयस्क का बेचना (18 वर्ष से कम के व्यक्ति)

372

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

वेश्यावृत्ति आदि के प्रयोजनों के लिए किसी अवयस्क को खरीदना

373

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

आपराधिक न्यास-भंग

406

तीन वर्ष का कारावास और जुर्माना या दोनों

संज्ञेय

अजमानतीय

शब्द, अंगविक्षेप या कार्य, दो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है

509

एक वर्ष का साधारण कारावास या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय

जमानतीय

 

विवाह से संबंधित अपराध

विधिपूर्ण विवाह की प्रवंचना से विश्वास उत्प्रेरित करने वाले पुरुष द्वारा कारित सहवास

493

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

असंज्ञेय

जमानतीय

द्विविवाह:

(1)  पहले पति या पत्नी के जीवनकाल में पुन: विवाह करना

494

सात वर्ष का कारावास और जुर्माना

असंज्ञेय

जमानतीय

(2)  पूर्ववर्ती विवाह को छिपाकर पुन: विवाह करना

495

दस वर्ष का कारावास और जुर्माना

असंज्ञेय

जमानतीय

विधिपूर्ण विवाह के बिना कपटपूर्वक विवाह कर्म पूरा कर लेना

496

सात वर्ष का कारावास और जुर्माना

असंज्ञेय

जमानतीय

जारकर्म

497

पाँच वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों

असंज्ञेय

जमानतीय

विवाहित स्त्री के आपराधिक आशय से फुसलाकर ले जाना या ले जाना या निरुद्ध रखना

498

दो वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों

असंज्ञेय

जमानतीय

 

पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता

किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना

498क

तीन वर्ष का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय

अजमानतीय

शब्द, अंगविक्षेप या कार्य, दो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है

509

तीन वर्ष का साधारण कारावास या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय

जमानतीय

 

दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013

उद्देश्य क्या हैं?

दंड विधि के उपबंध, जैसे कि वे 2013 के संशोधन से पूर्व थे, महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते अपराधों से निपटने के लिए अपर्याप्त पाए गए थे। न्यायमूर्ति वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर दंड विधि संशोधन अधिनयम, 2013 अधिनियमित किया गया था। इसके द्वारा भारतीय दंड संहिता, 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 में संशोधन किए गए। इन संशोधनों में:

  1. महिलाओं के विरुद्ध नए अपराधों की पहचान की गई है, जैसे अम्ल हमले, लैंगिक उत्पीड़न, दृश्यरतिकता, पीछा करना और व्यक्तियों का दुर्व्यापार;

2.  बलात्संग की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है;

3.  बलात्संग और अम्ल हमले से पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सीय-विधिक परीक्षा की प्रक्रियाओं में परिवर्तन किया गया है;

4.  बलात्संग की दशा में सशस्त्र बलों के सदस्यों/वर्दीधारी कार्मिकों को साधारण दांडिक विधि के अधीन अभियोजित करने का उपबंध किया गया है।

लैंगिक अपराधों की शिकार महिलाओं को प्रदत्त विनिर्दिष्ट अनुतोष

  1. जब किसी पीड़ित व्यक्ति द्वारा उसके विरुद्ध कारित लैंगिक हमले या बलात्संग के अपराध के बारे में सूचना दी जाती है तब वह सूचना किसी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा लेखबद्ध की जानी आवश्यक है।
  2. जब किसी पीड़ित व्यक्ति या किसी नि:शक्त व्यक्ति की कथन लेखबद्ध किया जाना हो तब वह उस व्यक्ति के निवास-स्थान पर या ऐसे व्यक्ति के लिए सुविधाजनक स्थान पर लेखबद्ध किया जाएगा। इसके अलावा, किसी महिला पुलिस अधिकारी द्वारा लेखबद्ध किया जाने वाले कथन की विडियोग्राफी की जानी होती है और पीड़ित व्यक्ति को द्विभाषिया या विशेष शिक्षक उपलब्ध कराया जाना होता है।
  3. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अधीन पीड़ित व्यक्ति का कथन अपराध कारित किए जाने के यथाशीघ्र पश्चात लेखबद्ध किया जाएगा। यदि पीड़ित व्यक्ति शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से नि:शक्त है तो वह कथन द्विभाषिए या किसी विशेष शिक्षक की सहायता से लेखबद्ध किया जाना है और उसकी विडियोग्राफी भी की जाएगी।
  4. किसी नि:शक्त व्यक्ति का ऐसा कोई कथन मुख्य परीक्षा (भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 137 के अधीन) के बदले में किया गया कथन समझा जाएगा जिससे कि कथन करने वाले व्यक्ति की ऐसे कथन के संबंध में विचारण के समय उसे लेखबद्ध किए जाने की आवश्यकता के बिना प्रतिपरीक्षा की जा सके।
  5. शीघ्र और यथासमय न्याय सुनिश्चित करने के लिए, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 309 के परन्तुक में यह अधिकथित किया गया है कि बलात्संग से संबंधित किसी अपराध की जांच या विचरण, जहाँ तक संभव हो, आरोपपत्र फाइल किए जाने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा।
  6. भारतीय दंड संहिता की यथासंशोधन धारा 166क, धारा 166ख, धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 370, धारा 375, धारा 376क, धारा 376घ या धारा 509 के अधीन अभिकथित रूप से कारित किसी अपराध के अभियुक्त लोक सेवक की दशा में किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

भारतीय दंड संहिता के अधीन महिलाओं के प्रति अपराध के संबंध में नए अपराध

धारा

अपराध

दंड

प्रकृति

166-क [उपखंड ग]

विधि के अधीन निदेश की अवज्ञा करने वाला लोक सेवक

न्यूनतम छह मास का कारावास, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और जमानतीय

166-ख

अस्पताल द्वारा पीड़ित का उपचार न करना

एक वर्ष का कारावास या जुर्माना या दोनों

असंज्ञेय और जमानतीय

326-क

स्वेच्छया अम्ल फेंकना या फेंकने का प्रयत्न करना

कम से कम दस वर्ष कारावास, जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और जुर्माना। पीड़ित को संदत्त किया जाने वाला जुर्माना

संज्ञेय और जमानतीय

354-क

अवांछनीय शारीरिक संपर्क और अग्रक्रियाओं या लैंगिक स्वीकृति के लिए मांग या अनुरोध, अश्लील साहित्य दिखाने की प्रकृति का लैंगिक उत्पीड़न

कारावास, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय और जमानतीय

 

लैंगिक आभासी टिप्पणियाँ करने की प्रकृति का लैंगिक उत्पीड़न

कारावास, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माना या दोनों

संज्ञेय और जमानतीय

354ख

स्त्री पर विवस्त्र करने के आशय से हमला या आपराधिक बलप्रयोग

कम से कम तीन वर्ष का कारावास, जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

354ग

दृश्यरतिकता (प्राइवेट कृत्य में लगी किसी स्त्री को एकटक देखना या उसका चित्र खींचना)

कम से कम एक वर्ष का कारावास, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

दूसरी और पश्चात्वर्तीदोष दोषसिद्धि के लिए कम से कम तीन वर्ष का कारावास, जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और जमानतीय

354घ

पीछा करना

प्रथम दोषसिद्धि के लिए तीन वर्ष तक का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

 

 

दूसरी और पश्चात्वर्तीदोषसिद्धि के लिए पाँच वर्ष तक का कारावास और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

376 [खंड (1)]

बलात्संग

कम से कम सात वर्ष का कठोर कारावास जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

376 [खंड (2)]

किसी पुलिस अधिकारी या लोक सेवक या सशस्त्र बल के सदस्य या किसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह या अभिरक्षा के अन्य स्थान के या स्त्रियों या बालकों की किसी संस्था के प्रबंधतंत्र या कर्मचारीवृन्द के किसी व्यक्ति या किसी अस्पताल के प्रबंधतंत्र या कर्मचारीवृन्द के किसी व्यक्ति द्वारा बलात्संग और बलात्संग की पीड़िता के प्रति विश्वास या प्राधिकारी की हैसियत वाले व्यक्ति द्वारा और बलात्संग की पीड़िता के नजदीकी नातेदार द्वारा बलात्संग

ऐसी अवधि का कठोर कारावास, जो कम से कम दस वर्ष की होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल या मृत्यु होने तक कारावास

संज्ञेय और अजमानतीय

376-क

बलात्संग और ऐसा क्षति पहुँचाने का अपराध कारित करने वाला व्यक्ति, जिससे मृत्यु कारित होती है या स्त्री की लगातार विकृतशील दशा कारित होती है

कम से कम बीस वर्ष का कठोर कारावास, जो की आजीवन कारावास तक का हो सकेगा, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास होगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

376-ख

पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ पृथक्करण के दौरान मैथुन

कम से कम दो वर्ष का कारावास जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय (किन्तु केवल पीड़िता की शिकायत पर) और जमानतीय

376-ग

प्राधिकार में किसी व्यक्ति द्वारा मैथुन (जो बलात्संग की कोटि में नहीं आता है)

कम से कम पाँच वर्ष का कठोर कारावास जो की दस वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

376-घ

सामूहिक बलात्संग

कम से कम बीस वर्ष का कठोर कारावास, जो की आजीवन कारावास तक का हो सकेगा, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास होगा और जुर्माना, जो पीड़िता को संदत्त किया जाना है

संज्ञेय और अजमानतीय

376-ड.

पुनरावृत्तिकर्ता अपराधी

आजीवन कारावास, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए या मृत्यु तक कारावास होगा

संज्ञेय और अजमानतीय

व्यक्ति का दुर्व्यापार (भारतीय दंड संहिता की धारा 370 के स्थान पर धारा 370 और धारा 370-क रखी गई)

धारा

अपराध

दंड

प्रकृति

370

अवयस्क का या एक से अधिक अवसरों पर दुर्व्यापार करने के अपराध के लिए दोषसिद्धि व्यक्ति

आजीवन कारावास, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास होगा तथा जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

 

अवयस्क के दुर्व्यापार में अंतर्वलित लोक सेवक या कोई पुलिस अधिकारी

आजीवन कारावास, जिसका अभिप्राय उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास होगा तथा जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

370-क

ऐसे बालक का, जिसका दुर्व्यापार किया गया है, शोषण

कम से कम पाँच वर्ष का कारावास, जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

 

ऐसे व्यक्ति का, जिसका दुर्व्यापार किया गया है, शोषण

कम से कम तीन वर्ष का कारावास, जो पाँच वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना

संज्ञेय और अजमानतीय

 

 

भारतीय दंड संहिता, 1860 में किए गए अन्य संशोधन

धारा

अपराध

विद्यमान उपबंध

संशोधन

228-क उपधारा(1)

कतिपय अपराधों आदि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान का प्रकटीकरण

धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, या धारा 376घ के अधीन किसी अपराध का किया जाना अभिकथित है या किया गया पाया गया है, दोनों में किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी दंडनीय।

धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, या धारा 376घ शब्दों और अंकों और अक्षरों के स्थान पर धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ या धारा 376ड. शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे।

354

स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग

दोनों में किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माना या दोनों।

दोनों में किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि कम से कम एक वर्ष होगी और जो पाँच वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माना से भी दंडनीय।

509

शब्द, अंगविक्षेप या कार्य, जो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है।

सादा कारावास, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माना या दोनों।

सादा कारावास जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माना।

 

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में बलात्संग और अम्ल हमले से पीड़ित व्यक्तियों के प्रतिकर और उपचार के लिए सम्मिलित विनिर्दिष्ट उपबंध

धारा 357ख: धारा 357क के अधीन राज्य सरकार द्वारा संदेय प्रतिकर भारतीय दंड संहिता की धारा 326क या धारा 376घ के अधीन पीड़िता को जुर्माने का संदाय किए जाने के अतिरिक्त होगा।

धारा 357ग: सभी लोक या प्राइवेट अस्पताल, चाहे वे केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय निकायों या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा चलाए जा रहे हैं, भारतीय दंड संहिता की धारा 326क, धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ या धारा 376ड. के अधीन आने वाले किसी अपराध के पीड़ितों को तुरंत नि:शुल्क प्राथमिक या चिकित्सीय उपचार उपलब्ध कराएंगे और ऐसी घटना की पुलिस को तुरंत सूचना देंगे।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में अंत: स्थापित नई धाराएं

धारा 53क: भारतीय दंड संहिता की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 376, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376ड. के अधीन किसी अपराध के अभियोजन में पीड़िता के शील या ऐसे व्यक्ति का किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव का साक्ष्य सुसंगत नहीं होगा।

धारा 114क: बलात्संग के मामलों में सम्मति न होने के संबंध में उपधारणा, जहाँ स्त्री न्यायालय के समक्ष साक्ष्य में यह कथन करती है कि उसने सम्मति नहीं दी थी।

धारा 146: परन्तु भारतीय दंड संहिता की धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ या धारा 376ड. के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन में, जहाँ सम्मति का प्रश्न विवाद्य है वहां पीड़िता की प्रतिपरीक्षा में उसके साधारण व्यभिचार या किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव के बारे में साक्ष्य देना या प्रश्न पूछना अनुज्ञेय नहीं होगा।

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 में अंत:स्थापित नई धाराएं

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 42 के स्थान पर निम्नलिखित धाराएं रखी जाएंगी, अर्थात:

धारा 42: जहाँ किसी कार्य या लोप से इस अधिनियम के अधीन और भारतीय दंड संहिता की धारा 166क, धारा 354क, धारा 375, धारा 376, धारा 376क, धारा 376घ, धारा 370, धारा 370क, धारा 375, धारा 376, धारा 376क, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376ड. या धारा 509 के अधीन भी दंडनीय कोई अपराध गठित होता है, वहां तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसे अपराध को दोषी पाया गया अपराधी उस दंड का भागी होगा, जो इस अधिनियम के अधीन या भारतीय दंड संहिता के अधीन मात्रा में गुरुतर है।

धारा 42क: इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिर्कित होंगे न कि उनके अल्पीकरण में और किसी असंगति की दशा में इस अधिनियम के उपबंधों का उस असंगति की सीमा तक ऐसी किसी विधि के उपबंधों पर अध्यारोही प्रभाव होगा।

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013

उद्देश्य

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम 2013 महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से संरक्षण और लैंगिक उत्पीड़न के परिवादों के निवारण तथा प्रतितोषण के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया है। लैंगिक उत्पीड़न, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के अधीन गारंटीकृत किसी महिला के समता के मूल अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार प्राण और गरिमा से जीवन व्यतीत करने संबंधी उसके अधिकार के अतिक्रमण के रूप में समझा जाता है। इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(छ) के अधीन किसी वृत्ति का व्यवसाय करने या कोई उपजीविका, व्यापार या कारबार करने के अधिकार के, जिसके अंतर्गत लैंगिक उत्पीड़न से मुक्त सुरक्षित वातावरण का अधिकार भी है, अतिक्रमण के रूप में भी समझा जाता है।

यह विधि किसे संरक्षण देती है?

यह विधि किसी व्यथित महिला को किसी कार्यस्थल के संबंध में संरक्षण देने की ईप्सा करती है, अर्थात:

  • इसके अंतर्गत घरेलू कर्मकार, विद्यार्थी और स्वयंसेवी (18 वर्ष की आयु से ऊपर) भी हैं।
  • किसी भी आयु की कोई महिला, चाहे वह नियोजन में है अथवा नहीं, जो लैंगिक उत्पीड़न के किसी कार्य की शिकार होने का अभिकथन करती है।
  • इस विधि में ऐसे व्यक्ति के विधिक वारिस के लिए ऐसी स्थितियों में, जहाँ व्यथित कर्मचारी शारीरिक असमर्थता, मानसिक असमर्थता या मृत्यु के कारण परिवाद फाइल करने में असमर्थ है, परिवाद फाइल करने का भी उपलब्ध किया गया है।

कार्यस्थल क्या है [धारा 2 (ण)]

कार्यस्थल में निम्नलिखित में से कोई भी शामिल है:

  • संगठित क्षेत्र;
  • असंगठित क्षेत्र (किसी व्यष्टि के स्वामित्वाधीन कोई उद्यम या माल के उत्पादन या विक्रय या किसी किस्म की सेवाएं प्रदान करने में लगे हुए स्वनियोजित कर्मकारी);
  • सरकारी निकाय;
  • प्राइवेट और लोक सेक्टर संगठन;
  • गैर-सरकारी संगठन;
  • ऐसे संगठन, जो वाणिज्यिक, व्यावसायिक, शैक्षिक, मनोरंजन, औद्योगिक या वित्तीय क्रियाकलाप कर रहे हैं;
  • अस्पताल और नर्सिंग गृह;
  • शैक्षिक संस्थाएं;
  • खेलकूद संस्थाएं;
  • ऐसे स्टेडियम, जिनका उपयोग व्यष्टियों को प्रशिक्षण देने, खेलकूद या अन्य क्रियाकलापों के लिए किया जाता है;
  • निवास स्थान या कोई गृह;
  • कर्मचारी द्वारा अपने नियोजन से या उसके अनुक्रम में उद्भूत आने जाने का स्थान।

अधिनियम के अधीन लैंगिक उत्पीड़न से क्या अभिप्रेत है? [धारा 2 (ढ)]

  • लैंगिक उत्पीड़न के अंतर्गत निम्नलिखित कोई एक या अधिक अवांछनीय कार्य या व्यवहार है, चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से या विवक्षित रूप से हो:
  • शारीरिक संपर्क और अगर्गमन;
  • लैंगिक अनुकूलता की मांग या अनुरोध करना;
  • लैंगिक अत्युक्त टिप्पणियाँ करना;
  • अश्लील साहित्य दिखाना; या
  • लैंगिक प्रकृति का कोई अन्य अवांछनीय शारीरिक, मौखिक या अमौखिक आचरण करना।
  • इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित परिस्थितियाँ भी लैंगिक उत्पीड़न की कोटि में आ सकती हैं (यदि वह लैंगिक उत्पीड़न व्यवहार के संबंध में होती है या विद्यमान हैं):
  • नियोजन में अधिमानी व्यवहार का विवक्षित या सुस्पष्ट वचन;
  • नियोजन में अहितकर व्यवहार का विवक्षित या सुस्पष्ट वचन या धमकी;
  • वर्तमान या भावी नियोजन के बारे में विवक्षित या सुस्पष्ट वचन या धमकी;
  • कार्य में हस्तक्षेप या अभित्रासमय या संतापकारी या प्रतिकूल कार्य वातावरण सृजित करना;
  • महिला कर्मचारी के स्वास्थ्य या सुरक्षा को प्रभावित करने की संभावना वाल अपमानजनक व्यवहार।

कर्मचारी कौन है? [धारा 2(च)]

इसकी परिभाषा के अंतर्गत, नियमित, अस्थायी, तदर्थ कर्मचारी, दैनिक मजदूरी के आधार पर सीधे नियोजित हो या किसी अभिकर्ता के माध्यम से नियोजित व्यष्टि, संविदा श्रमिक, सह-कर्मकार, परिवीक्षाधीन, प्रशिक्षु और शिक्षु, चाहे प्रधान नियोजक की जानकारी से या उसके बिना, चाहे पारिश्रमिक के लिए है अथवा नहीं, स्वैच्छिक आधार पर या अन्यथा कार्य करने वाले, चाहे नियोजन के निबंधन अभिव्यक्त हो या विवक्षित।

परिवाद समिति

इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें संगठित और असंगठित, दोनों क्षेत्रों के लिए परिवाद प्रतिरोषण पीठ स्थापित करना परिकल्पित है।

क. आंतरिक परिवाद समिति [धारा 4]

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013 में प्रत्येक नियोजक से ऐसे संगठन के, जिसमें 10 या उसके अधिक कर्मचारी नियोजित हैं, प्रत्येक कार्यालय या शाखा में लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित परिवादों की सुनवाई करने और उसका निपटारा करने के लिए “आंतरिक परिवाद समिति” (आई.सी.सी.) स्थापित करने की अपेक्षा की गई है।

ख. आई.सी.सी. की संरचना [धारा 4(2)]

पीठासीन अधिकारी

कर्मचारियों में से कार्यस्थल पर ज्येष्ठ स्तर पर नियोजित महिला

सदस्य

कर्मचारियों में से कम से कम 2 ऐसे सदस्य, जो महिलाओं की समस्याओं के प्रति अधिमानी रूप से प्रतिबद्ध हैं या जिनके पास सामाजिक कार्य में अनुभव है या विधिक ज्ञान है।

बाह्य सदस्य

ऐसे गैर-सरकारी संगठन या एसोसिएशन में से, जो महिलाओं की समस्याओं के प्रति प्रतिबद्ध है या ऐसा व्यक्ति, जो लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित मुद्दों से सुपरिचित है।

 

अन्य अपेक्षाएं

  • आई.सी.सी. के सदस्यों में से कम से कम आधे सदस्य महिलाएं होंगी।
  • आई.सी.सी. सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष से अधिक नहीं होगा।
  • जाँच के संचालन के लिए आई.सी.सी. के कम से कम तीन सदस्य, जिसके अंतर्गत पीठासीन अधिकारी भी है, उपस्थित होने चाहिए।

जिला अधिकारी की अधिसूचना (धारा 5)

प्रत्येक जिले में, सरकार को जिला मजिस्ट्रेट या अपर जिला मजिस्ट्रेट, कलक्टर या उप-कलक्टर को इस अधिनियम के अधीन शक्तियों का प्रयोग करने या कृत्यों का निर्वहन करने के लिए जिला अधिकारी के रूप में अधिसूचित करना होगा।

स्थानीय परिवाद समिति (धारा 6)

कोई व्यथित महिला अधिनियम की धारा 9 के अधीन परिवाद फाइल कर सकती है। लिखित परिवाद की 6 प्रतियां, समर्थनकारी द्स्वावेजों और साक्षियों के नाम और पतों सहित आई.सी.सी. या एल.सी.सी. को दी जानी आवश्यक हैं। परिवाद घटना की तारीख से तीन मास के भीतर और घटनाओं की किसी श्रृंखला की दशा में, अंतिम घटना की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर फाइल किया जाना चाहिए। आई.सी.सी./एल.सी.सी. परिवाद फाइल करने की समयसीमा में उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएँ, तीन मास की अवधि के लिए विस्तार कर सकती है।

अंतरिम अनुतोष

  • आई.सी.सी./एल.सी.सी., परिवादी के अनुरोध पर, नियोजक को अंतरिम उपायों की सिफारिश कर सकती है, जैसे:

(1) व्यथित महिला या प्रत्यर्थी का किसी अन्य कार्यस्थल पर स्थानांतरण।

(2) व्यथित महिला को अपनी नियमित कानूनी/संविदागत छुट्टी हकदारी के अतिरिक्त तीन मास की अवधि तक की छुट्टी मंजूर करना।

मिथ्या या द्वेषपूर्ण परिवाद (धारा 14)

  • अधिनियम में यह सुनिश्चित करने के लिए विधि के अधीन परिकल्पित संरक्षणों का दुरूपयोग न किया जाए, मिथ्या या द्वेषपूर्ण परिवादी के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उपबंध शामिल किए गए हैं।
  • अधिनियम में परिवाद की अंतर्वस्तु, परिवादी, प्रत्यर्थी और साक्षियों की पहचान और पते, सुलह से संबंधित किसी जानकारी और जांच कार्यवाहियों, आई.सी.सी./एल.सी.सी. की सिफारिशों और की गई कार्रवाई के प्रकाशन को प्रतिषिद्ध किया गया है।
  • कानून में लैंगिक उत्पीड़न की कसी पीड़ित को सुनिश्चित न्याय के संबंध में जानकारी का, नाम, पता, पहचान या कोई ऐसी अन्य विशिष्टियां, जिसके परिणामस्वरूप परिवादी या साक्षी की पहचान हो सकती है, प्रकट किए बिना प्रसार अनुज्ञात किया गया है।
  • इस अधिनियम में सुलह के लिए एक उपबंध है (धारा 10) । आई.सी.सी./एल.सी.सी. व्यथित महिला और प्रत्यर्थी के बीच मामले का निपटान करने के लिए कदम उठा सकती है, तथापि इस विकल्प का प्रयोग केवल महिला के अनुरोध पर ही किया जाएगा। इसमें यह उपबंध भी है कि धनीय परिनिर्धारण को सुलह का आधार नहीं बनाया जाएगा।

नियोजक के कर्तव्य (धारा 19)

अधिनियम में प्रत्येक नियोजक को अधिनियम के अधीन कतिपय कर्तव्य सौंपे गए हैं:

  • कार्यस्थल पर सुरक्षित कार्य वातावरण उपलब्ध कराना जिसके अंतर्गत कार्यस्थल पर ऐसे व्यक्ति के, जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है, संपर्क में आने से सुरक्षा भी है;
  • कार्यस्थल पर किसी सहजदृश्य स्थान पर लैंगिक उत्पीड़न के शास्तिक परिणामों और आंतरिक परिवाद समिति गठित करने वाले आदेश को प्रदर्शित करना;
  • कर्मचारियों को अधिनियम के उपबंधों से सुग्राही बनाने के लिए नियमित अंतराल पर कार्यशालाएं और जागरूकता कार्यक्रम और आंतरिक समिति के सदस्यों के लिए अभिविन्यास कार्यक्रम ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, आयोजित करना;
  • यथास्थिति, आंतरिक समिति या स्थानीय समिति को परिवाद पर कार्यवाही करने और जांच का संचालन करने के लिए आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना;
  • यथास्थिति, आंतरिक समिति या स्थानीय समिति के समक्ष प्रत्यर्थी और साक्षियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में सहायता करना;
  • आंतरिक समिति या स्थानीय समिति को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना, जो वह किए गए परिवाद के संबंध में अपेक्षा करे;
  • महिला को, यदि वह उस अपराध के संबंध में भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) या तत्समय प्रवृत्व किसी अन्य विधि के अधीन कोई परिवाद फाइल करना चाहे, सहायता प्रदान करना;
  • उस कार्यस्थल में, जिसमें लैंगिक उत्पीड़न की घटना हुई थी, अपराधकर्ता के विरुद्ध या यदि व्यथित महिला ऐसी वांछा करती है, जहाँ अपराधकर्ता कोई कर्मचारी नहीं है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कार्रवाई आरंभ कराना;
  • लैंगिक उत्पीड़न को सेवा नियमों के अधीन एक कदाचार मानना और कदाचार के मामलों में कार्रवाई आरंभ करना;
  • आंतरिक समिति द्वारा समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने को मानीटर करना।

समय-सीमाएं

  • लिखित परिवाद (6 प्रतियां) समर्थनकारी दस्तावेजों और साक्षियों के नामों और पतों सहित, घटना की तारीख से तीन मास के भीतर फाइल किए जाने हैं। यह समय सीमा अतिरिक्त तीन मास के लिए बढ़ाई जा सकेगी।
  • परिवाद की प्राप्ति पर, परिवाद की एक प्रति सात दिनों के भीतर प्रत्यर्थी को भेजी जानी है।
  • परिवाद के प्रति की प्राप्ति पर, प्रत्यर्थी से 10 कार्यदिवसों के भीतर समर्थनकारी द्स्वावेजों और साक्षियों के नामों और पतों सहित परिवाद का उत्तर देना अपेक्षित है।
  • परिवाद की प्राप्ति की तारीख से कुल 90 दिन के भीतर जांच रिपोर्ट जारी की जानी है।
  • जाँच पूरी हो जाने की तारीख से 10 दिन के भीतर जांच रिपोर्ट जारी की जानी है।
  • आई.सी.सी. की रिपोर्ट को “अनुशासनिक मामले” में जांच रिपोर्ट समझा जाना है।
  • नियोजक के लिए जांच रिपोर्ट की प्राप्ति के 60 दिन के भीतर आई.सी.सी./एल.सी.सी. की सिफारिशों पर कार्रवाई करना अपेक्षित है।
  • समिति के विनिश्चय के विरुद्ध अपील सिफारिशों की तारीख से 90 दिन के भीतर अनुज्ञात की जाती है।

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005

विधि की पृष्ठभूमि

महिलाओं के साथ प्राय: उनकी गृहस्थी में हिंसा की जाती है। हिंसा के यह कार्य उन लोगों द्वारा किए जाते हैं जो उनके निकट-संबंधी होते हैं। इनमें पिता, पुत्र, भाई, पति और उसके नातेदार हो सकते हैं। इसके साथ-साथ, कई बार महिलाओं के साथ उनके पुत्र या बहु द्वारा बुरा बर्ताव किया जाता है। जब महिलाओं के साथ उनके पति या उसके नातेदारों द्वारा क्रूरता बरती जाती है तब उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498क के अधीन उपचार प्राप्त होता है। तथापि, महिलाओं को कोई सिविल उपचार उपलब्ध नहीं है, अत:, यह अधिनियम अधिनियमित किया गया था।

अधिनियम का उद्देश्य

  • यह विधि किसी प्रकार की घरेलू हिंसा के विरुद्ध व्यथित महिलाओं के अधिकारों को संरक्षा प्रदान करती है और यदि उनके अधिकारों की अतिक्रमण होता है तो उन्हें विधिक उपचार प्रदान करती है।
  • यह अधिनियम उन महिलाओं के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने की ईप्सा करता है, जो कुटुम्ब के भीतर किसी किस्म की हिंसा से पीड़ित हैं, अर्थात, किसी घरेलू नातेदारी में, अर्थात: ऐसे दो व्यक्तियों के बीच नातेदारी, जो सांझी गृहस्थी में एक साथ रहते हैं या किसी समय एक साथ रह चुके हैं, जब वे समरकत्ता, विवाह द्वारा या विवाह, दत्तक ग्रहण की प्रकृति की किसी नातेदारी द्वारा संबंधित हैं या एक संयुक्त कुटुम्ब के रूप में एक साथ रहने वाले कुटुम्ब के सदस्य हैं। इसके अंतर्गत निम्नलिखित होंगे:
  • पत्नी
  • बहन
  • माता
  • सास
  • विवाह की प्रकृति वाला संबंध रखने वाली कोई महिला, जिसमें पूर्व पत्नी भी है
  • पुत्री
  • संयुक्त कुटुम्ब के सदस्यों के रूप में रहने वाली महिलाएं
  • बालक/दत्तकग्रहण किए बालक

घरेलू हिंसा (धारा 3)

(क) ऐसा कोई कार्य या लोप या आचरण, जो स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, अंग की अपहानि करता है या कोई क्षति कारित करता है, जिसके अंतर्गत व्यथित महिला का शारीरिक दुरूपयोग, लैंगिक दुरूपयोग, मौखिक, भावनात्मक दुरूपयोग और आर्थिक दुरूपयोग भी है।

(ख) दहेज या किसी अन्य मूल्यवान संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति के लिए किसी अन्य अविधिपूर्ण मांग की पूर्ति के लिए प्रपीड़ित करने की दृष्टि से कोई उत्पीड़न, अपहानि या क्षति।

(ग) महिलाओं या उसके नातेदार किसी अन्य व्यक्ति को क्षति या अपहानि कारित करने की धमकी।

(घ) व्यथित व्यक्ति को क्षति पहुंचाना या अपहानि, चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक, कारित करना।

दुरूपयोग के वे रूप जिन्हें घरेलू हिंसा समझा जाता है:

  1. शारीरिक दुरूपयोग – ऐसा कोई कार्य, जो व्यथित व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, क्षति पहुंचाता है या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य को चोट या खतरा कारित करता है या उसके स्वास्थ्य या विकास का ह्रास करता है।

इसके अंतर्गत निम्नलिखित हैं:

  • हमला
  • पीटना
  • थप्पड़ मारना
  • चोट पहुंचाना
  • काटना
  • मुक्का मारना
  • लात मारना
  • धक्का देना
  • धकेलना
  • बाल खींचना
  • ऐसा कोई अन्य शारीरिक बल जिसके परिणामस्वरूप पीड़ा, असुविधा या क्षति होती है।

2.  लैंगिक दुरूपयोग – लैंगिक प्रकृति का ऐसा कोई आचरण, जो महिला की गरिमा का दुरूपयोग, अपमान, तिरस्कार करता है या अन्यथा अतिक्रमण करता है। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बलात लैंगिक संभोग
  • अश्लील साहित्य/अन्य अश्लील सामग्री देखने या उसमें भाग लेने के लिए बाध्य करना
  • आवांछनीय लैंगिक आचरण, जैसे मुख मैथुन
  • लैंगिक प्रकृति का कोई ऐसा अन्य आचरण, जिससे महिलाओं की गरिमा का अतिक्रमण होता है

3.  मौखिक और भावनात्मक दुरूपयोग – अपमान, उपहास और तिरस्कार, गाली देना, विशेष रूप संतान या नर बालक न होने के संबंध में गाली। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  • दहेज न लाने के बारे में टिप्पणी करना
  • महिला को घर से बाहर जाने या अन्य व्यक्तियों से मिलने से रोकना
  • महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह करने के लिए मजबूर करना, आत्महत्या करने की धमकी देकर किसी महिला की अपनी पसन्द के व्यक्ति से विवाह करने की योजना में हस्तक्षेप करना
  • महिला को अपनी नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना
  • गाली देना
  • चरित्र हनन
  • किसी महिला को नर बालक को जन्म न देने के लिए नीचा दिखाना
  • महिला का परित्याग करने/अपहानि पहुँचाने की धमकी देना
  • उपहास करना
  • बच्चे को जन्म देने के संबंध में अपमान करना
  • उसकी प्रतीति/खाना पकाने की कुशलता के बारे में ताने देना
  • किसी व्यथित महिला को मौखिक या लिखित भाषा का प्रयोग करके किसी अन्य कार्य द्वारा अपहानि कारित करना या किसी महिला को बेवकूफ या बेकार बनाना

4.  आर्थिक दुरूपयोग – जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं और ह्क्दारियों के लिए किसी ऐसे वित्तीय या आर्थिक संसाधन से वंचित करना, जिसके लिए व्यथित व्यक्ति हकदार है।

  • महिला और/या बच्चों के भरणपोषण के लिए धनराशि देने से इंकार करना
  • महिला और/या बच्चों को खाना/कपड़े/दवाईयां/अन्य आवश्यक वस्तुएं न देने या उनका उपयोग करने से मना करना
  • महिला के नियोजन में हस्तक्षेप करना
  • महिला की आय/वेतन/मजदूरी/आस्तियों को लेना
  • महिला को अपना धनराशि का अपनी इच्छा के अनुसार उपयोग करने से प्रतिषिद्ध करना
  • उसे अपनी गृहस्थी से निष्कासित करना
  • महिला द्वारा घर के किसी भाग का उपयोग करने में हस्तक्षेप करना
  • यदि किराए के परिसर में रह रहे हैं तो किराए का भुगतान न करना
  • ऐसी आस्तियों का, जिसमें उसका हित है, उसकी इच्छा के विरुद्ध व्ययन करना
  • उसकी सहमति के बिना कोई अन्य कार्य करना, जिससे किसी महिला के वित्तीय संसाधनों का नियंत्रण होता है या उन संसाधनों का दुरूपयोग करना

शिकायत की प्रक्रिया [धारा 4,5]

शिकायतकर्ता     -----              किसे शिकायत की जानी है

व्यथित व्यक्ति या व्यथित  -----            मजिस्ट्रेट, संरक्षण अधिकारी, सेवा

व्यक्ति की ओर से कोई     -----            प्रदाता, पुलिस

अन्य व्यक्ति

प्रदत्त उपचार

18. संरक्षण आदेश [धारा 18] – मजिस्ट्रेट व्यथित व्यक्ति और प्रत्यर्थी को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात और उसका प्रथमदृष्टया समाधान होने पर कि घरेलू हिंसा हुई है या होने की संभावना है, व्यथित व्यक्ति के पक्ष में एक संरक्षण आदेश पारित कर सकेगा तथा प्रत्यर्थी को निम्नलिखित से प्रतिषिद्ध कर सकेगा-

(क) घरेलू हिंसा का कार्य कारित करना;

(ख) घरेलू हिंसा के कार्य कारित करने में सहायता या दुष्पेरण करना;

(ग) व्यथित व्यक्ति के नियोजन के स्थान में या यदि व्यथित व्यक्ति बालक है तो उसके विद्यालय में या किसी अन्य स्थान में, जहाँ व्यथित व्यक्ति बार-बार आता जाता है, प्रवेश करना;

(घ) व्यथित व्यक्ति से संपर्क करने का प्रयत्न करना, चाहे वह किसी भी रूप में हो, इसके अंतर्गत वैयकित्तक, मौखिक या लिखित या इलौक्ट्रानिक या दूरभाषी संपर्क भी है;

(ड.) किन्हीं आस्तियों का अन्यसंक्रामण करना, उन बैंक लॉकरों या बैंक खातों का प्रचालन करना, जिनका दोनों पक्षों द्वारा प्रयोग या धारण या उपभोग व्यथित व्यक्ति और प्रत्यर्थी द्वारा संयुक्तत: या प्रत्यर्थी द्वारा अकेले किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत उसका स्त्रीधन या अन्य कोई संपत्ति भी है, जो मजिस्ट्रेट की इजाजत के बिना या तो पक्षकारों द्वारा संयुक्तत: या उनके द्वारा पृथकत: धारित की हुई है;

(च) आश्रितों, अन्य नातेदारों या किसी ऐसे व्यक्ति के साथ, जो व्यथित व्यक्ति को घरेलू हिंसा के निवारण से सहायता देता है, हिंसा कारित करना;

(छ) ऐसा कोई अन्य कार्य कारित करना जो संरक्षण आदेश में विनिर्दिष्ट किया गया है।

संरक्षण आदेश का भंग करना एक वर्ष के कारावास या 20,000 रूपए के जुर्माने या दोनों से दंडनीय है।

निवास आदेश [धारा 19] – किसी आवेदन का निपटारा करते समय, मजिस्ट्रेट, यह समाधान हो जाने पर कि घरेलू हिंसा हुई है, निम्नलिखित निवास आदेश पारित कर सकेगा-

(क) प्रत्यर्थी को साझी गृहस्थी से किसी व्यथित व्यक्ति के कब्जे को बेकब्जा करने या किसी अन्य रीति में उस कब्जे में विध्न डालने से अवरुद्ध करना, चाहे प्रत्यर्थी उस साझी गृहस्थी में कोई विधिक या साम्यापूर्ण हित रखता है या नही;

(ख) प्रत्यर्थी को उस साझी गृहस्थी से स्वयं को हटाने का निदेश देना;

(ग) प्रत्यर्थी या उसके किसी नातेदार को साझी गृहस्थी के किसी भाग में, जिसमें व्यथित व्यक्ति निवास करता है, प्रवेश करने से अवरुद्ध करना;

(घ) प्रत्यर्थी को साझी गृहस्थी का अन्यसंक्रामण करने या व्ययन करने या उसका विल्लंगम करने से अवरुद्ध करना;

(ङ) प्रत्यर्थी को, मजिस्ट्रेट की इजाजत के सिवाय, साझी गृहस्थी में अपने अधिकारों का त्यजन करने से अवरुद्ध करना;

(च) प्रत्यर्थी को व्यथित व्यक्ति के लिए उसी स्तर की अनुकल्पिक वास-सुविधा, जैसी वह साझी गृहस्थी में उपयोग कर रही थी, या उसके लिए किराए का संदाय करने, यदि परिस्थितियाँ ऐसी अपेक्षा करें, सुनिश्चित करने के लिए निदेश देना।

  • ऐसे किसी व्यक्ति के विरुद्ध, जो एक महिला है, ऐसा आदेश पारित नहीं किया जा सकता है।
  • मजिस्ट्रेट व्यथित व्यक्ति या ऐसे व्यथित व्यक्ति की किसी संतान की संरक्षण प्रदान करने या सुरक्षा की व्यवस्था करने के लिए कोई अतिरिक्त शर्त अधिरोपित कर सकेगा या कोई अन्य निदेश पारित कर सकेगा, जो वह युक्तियुक्त समझे या घरेलू हिंसा किए जाने का निवारण करने के लिए प्रत्यर्थी से प्रतिभू सहित या उसके बिना बंधपत्र निष्पादित करने के लिए कह सकेगा।
  • न्यायालय व्यथित व्यक्ति को संरक्षण देने या उसे या आदेश के कार्यान्वयन में उसकी ओर से आवेदन करने वाले व्यक्ति की सहायता करने के लिए निकटतम पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को निदेश देते हुए आदेश भी पारित कर सकता है।
  • मजिस्ट्रेट पक्षकारों की वित्तीय आवश्यकताओं और संसाधनों को ध्यान में रखते हुए, किराए और अन्य संदाय के उन्मोचन और व्यथित व्यक्ति को उसके स्त्रीधन या किसी अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति लौटाने से संबंधित बाध्यताओं को भी प्रत्यर्थी अधिरोपित कर सकेगा।

धनीय अनुतोष [धारा 20] – मजिस्ट्रेट घरेलू हिंसा के परिणामस्वरूप व्यथित व्यक्ति और व्यथित व्यक्ति की किसी संतान द्वारा उपगत व्यय और सहन की गई हानियों की पूर्ति के लिए धनीय अनुतोष का संदाय करने के लिए प्रत्यर्थी को निदेश दे सकेगा और ऐसे अनुतोष में निम्नलिखित सम्मिलित हो सकेंगे:

(क)  उपार्जनों की हानि;

(ख)  चिकित्सीय व्यय;

(ग)   व्यथित व्यक्ति के नियंत्रण में से किसी संपत्ति के नाश, नुकसानी या हटाए जाने के कारण हुई हानि; और

(घ)   व्यथित व्यक्ति और उसकी संतान, यदि कोई है, के लिए भरणपोषण।

इस धारा के अधीन अनुदत्त धनीय अनुतोष पर्याप्त, उचित और युक्तियुक्त होगा तथा उस जीवन स्तर से, जिसका व्यथित व्यक्ति अभ्यस्त है, संगत होगा। भरणपोषण के लिए संदाय एकमुश्त या मासिक संदाय हो सकेगा।

प्रत्यर्थी की ओर से आदेश के निबंधनानुसार संदाय करने में असफलता पर, मजिस्ट्रेट प्रत्यर्थी के नियोजक या किसी ऋणी को प्रत्यर्थी को प्रत्यक्षत: संदाय करने या मजदूरी या वेतन का एक भाग न्यायालय में जमा करने या प्रत्यर्थी के खाते में शोध्य या उद्भूत ऋण को, जो प्रत्यर्थी द्वारा संदेय धनीय अनुतोष मद्धे समयोजित कर लिया जाएगा, जमा करने का निदेश दे सकेगा।

अभिरक्षा आदेश [धारा 21]

  • मजिस्ट्रेट इस अधिनयम के अधीन संरक्षण आदेश या किसी अन्य अनुतोष के लिए आवेदन की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर व्यथित व्यक्ति को या उसकी ओर से आवेदन करने वाले व्यक्ति को किसी संतान की अस्थायी अभिरक्षा दे सकेगा और यदि आवश्यक हो तो, प्रत्यर्थी द्वारा ऐसी संतान या संतानों से भेंट के इंतजाम को विनिर्दिष्ट कर सकेगा।
  • यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि प्रत्यर्थी की कोई भेंट संतान या संतानों के हितों के लिए हानिकारक हो सकती है तो मजिस्ट्रेट ऐसी भेंट अनुज्ञात करने से इंकार करेगा।

प्रतिकर आदेश [धारा 22]

  • मजिस्ट्रेट, ऐसे अन्य अनुतोषों के अतिरिक्त, जो इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त किए जाएं, व्यथित व्यक्ति द्वारा आवेदन किए जाने पर, प्रत्यर्थी को क्षतियों के लिए, जिसके अंतर्गत उस प्रत्यर्थी द्वारा की गई घरेलू हिंसा के कार्यों द्वारा कारित मानसिक यातना और भावनात्मक कष्ट सम्मिलित हैं, प्रतिकर और नुकसानी का संदाय करने के लिए निदेश देने वाला आदेश पारित कर सकेगा।

वे प्राधिकारी, जिनके समक्ष शिकायत की जा सकती है, निम्नलिखित है:

  • पुलिस: अधिनियम के कार्यान्वयन में पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण है। वे व्यथित व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन उपबंधित अधिकारों और उपचारों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं, जिसके अंतर्गत पूर्व में उल्लिखित विभिन्न आदेशों को प्राप्त करना और संरक्षण अधिकारी और सेवा प्रदाताओं तक पहुंच सुकर बनाना शामिल है।
  • संरक्षण अधिकारी: वे अधिनियम के कार्यान्वयन का निरीक्षण करने के लिए नियुक्त नोडल अधिकारी होते हैं। वे न्यायालयों को उनके कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता करने, व्यथित व्यक्ति को आश्रय, चिकित्सा और विधिक सहायता सुकर बनाने और न्यायालय से समुचित अनुतोष प्राप्त करने में सहायता देने के लिए कर्तव्यबद्ध हैं। जब कोई संरक्षण अधिकारी अपनी सेवाएं प्रदान करने में असफल होता है या उससे इंकार कर देता है तो वह एक वर्ष तक के कारावास या 2,000 रुपए के जुर्माने या दोनों के लिए दंडनीय होता है।
  • सेवा प्रदाता: ये सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, कंपनी अधिनियम या अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक/गैर-लाभप्रद संगठन हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों और हितों की संरक्षा करना है और जिन्हें इस अधिनियम के अधीन घरेलू हिंसा द्वारा प्रभावित महिलाओं को विधिक सहायता, चिकित्सीय और वित्तीय सहायता, आश्रय, परामर्श, व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि प्रदान करने के लिए अधिसूचित किया गया है।
  • न्यायालय: आपातकालीन अनुतोष तक सरल पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य के अनुसरण में, अधिनियम किसी व्यथित व्यक्ति को घरेलू हिंसा की शिकायतों के लिए न्यायालय में सीधे समावेदन करने की अनुज्ञा देता है। समावेदन करने के समुचित न्यायालय प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, जो भी लागू हो, हैं।

आश्रय गृह – इनसे व्यथित व्यक्ति को, जब व्यथित व्यक्ति द्वारा या संरक्षण अधिकारी द्वारा ऐसा अनुरोध किया जाए, आश्रय प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है।

चिकित्सीय सुविधाएं – चिकित्सीय सुविधा के भारसाधक व्यक्ति से, जब ऐसा अनुरोध किया जाए, चिकित्सीय सहायता प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है।

स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम

स्त्री अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1986, विज्ञापनों के माध्यम से या प्रकाशनों, लेखों, रंगचित्रों, आकृतियों में या किसी अन्य रीति से स्त्रियों के अशिष्ट रूपण का प्रतिषेध करने के लिए अधिनियमित किया गया था। प्रस्तुत रूप में इस अधिनियम के अंतर्गत प्रमुख रूप से प्रिंट मीडिया आता है। इस अधिनियम के अधिनियमन के पश्चात प्रोद्योगिकी क्रांति के परिणामस्वरूप संसूचना के नई रूपों का विकास हुआ है, जैसे इंटरनेट और सेटेलाइट आधारित संसूचना, मल्टी-मीडिया संदेश केबल दूरदर्शन, सोशल मीडिया, आदि।

अशिष्ट रूपण

स्त्री अशिष्ट रूपण से किसी स्त्री की आकृति, उसके रूप या शरीर या उसके किसी अंग का, किसी ऐसी रीति में ऐसे रूप में चित्रण करना अभिप्रेत है जिसका प्रभाव अशिष्ट हो अथवा जो स्त्रियों के लिए अपमानजनक या निंदनीय हो अथवा जिससे लोक नैतिकता या नैतिक आचार के विकृत, भ्रष्ट या क्षति होना की संभावना है।

इस अधिनियम के अधीन प्रतिषेध

अधिनियम की धारा 3 में ऐसे किसी विज्ञापन का प्रकाशन या प्रदर्शन प्रतिषिद्ध है जिसमें किसी भी रूप में स्त्रियों का अशिष्ट रूपण अंतर्विष्ट है।

  • अधिनियम की धारा 4 में किसी ऐसी पुस्तक, पुस्तिका, कागज-पत्र, स्लाइड, फिल्म, लेख, रेखाचित्र, रंगचित्र, फोटोचित्र, रूपण या आकृति का, जिसमें किसी रूप में स्त्रियों का अशिष्ट रूपण अंतर्विष्ट है, उत्पादन, विक्य, भाड़े पर देना, वितरण, परिचालन या डाक द्वारा भेजना प्रतिषिद्ध है।
  • धारा 4 के अधीन छुटप्राप्त प्रकाशनों/विज्ञापनों आदि के प्रवर्गे में निम्नलिखित शामिल हैं:

(1) ऐसी पुस्तकें/प्रकाशन आदि, जो विज्ञान, साहित्य, कला अथवा विद्या के हित में न्यायोचित साबित हो जाती है या धार्मिक व्यक्तियों द्वारा सद्भावपूर्वक रखी या उपयोग में लाई जाती हैं।

(2) किसी प्राचीन संस्मारक या किसी मंदिर या मूर्तियों के प्रवहण के उपयोग में लाए जाने वाले यान पर कोई रूपण (तक्षण, उत्कीर्ण, रंगचित्र, आदि) ।

(3) चलचित्र अधिनियम, 1952 में भाग 2 के अंतर्गत आने वाले कोई फिल्म।

प्रवेश करने और तलाशी लेने की शक्तियाँ

अधिनियम की धारा 5 में यह उपबंधित है कि राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत अधिकारी, किसी ऐसे स्थान में, जिसमें उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया गया है या किया जा रहा है, प्रवेश कर सकेगा या उसकी तलाशी ले सकेगा। वह किसी ऐसे विज्ञापन या पुस्तक, रेखाचित्र, रंगचित्र, लेख आदि को अभिगृहीत कर सकेगा जो अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन करता है। उपर्युक्त शक्ति इस शर्त के अध्यधीन है कि किसी प्राइवेट निवास-गृह में प्रवेश वारंट के बिना अनुज्ञात नहीं है और यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन किसी वस्तु का अभिग्रहण करता है तो वह यथाशक्य शीघ्र निकटतम मजिस्ट्रेट को उसकी इत्तिला देगा और उस वस्तु की अभिरक्षा के संबंध में आदेश प्राप्त करेगा।

अपराधों की प्रकृति

अधिनियम की धारा 8 के अधीन सभी अपराध संज्ञेय और जमानतीय हैं।

शास्तिक उपबंध

धारा 3 या धारा 4 के उपबंधों का उल्लंघन, प्रथम दोषसिद्धि पर दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से जो दो हजार रूपए तक का हो सकेगा दंडनीय है। द्वितीय या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि की दशा में, कारावास जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु जो पाँच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, जो दस हजार रूपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो एक लाख रूपए तक का हो सकेगा, विहित किया गया है।

कंपनियों द्वारा अपराध

जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो उस समय, जब अपराध कारित किया गया था, (i) कंपनी का भारसाधक था; (ii) कंपनी के कारबार के संचालन के लिए कंपनी के प्रति उत्तरदायी था, यस अपराध का दोषी समझा जाएगा।

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 अनैतिक व्यापार के निवारण के प्रयोजनार्थ व्यक्तियों के अनैतिक व्यापार के अधिक्रमण और अन्य व्यक्तियों के देह व्यापार द्वारा शोषण से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की कन्वेंशन के अनुरूप अधिनियमित किया गया था। इसकी पृष्ठभूमि यह भी थी कि विभिन्न राज्यों द्वारा अधिनियमित पृथक-पृथक विधानों में एकरूपता की कमी थी।

अधिनियम के अधीन संरक्षण

  • इस विधि के अधीन उन व्यक्तियों को, जिसके अंतर्गत पुरुष, महिलाएं और बच्चे भी हैं, जिनका दुर्व्यापार किया गया है या जो दुर्व्यापार किए जाने के लिए भेदय हैं, संरक्षण प्रदान किया गया है। भारत में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का भिन्न-भिन्न कारणों से दुर्व्यापार किया जाता है। महिलाओं और लड़कियों का देश के भीतर वाणिज्यिक लैंगिक शोषण और बलात विवाह के लिए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ लिंग अनुपात पुरुषों के पक्ष में अधिक विषम है, दुर्व्यापार किया जाता है। पुरुषों और लड़कों का श्रम के लिए दुर्व्यापार किया जाता है और दुर्व्यापारकर्ता द्वारा जिगोलो (पुरुष वेश्य), मालिक विशेषज्ञों, सहगामीयों, आदि के रूप में सेवा करने के लिए लैंगिक शोषण किया जा सकता है। बच्चों से कारखाना कर्मकार, घरेलू नौकर, भिखारी और कृषि कर्मकार के रूप में बलात श्रम कराया जाता और उनका उपयोग कुछ आंतकवादी और विद्रोही समूहों द्वारा सशस्त्र लड़ाकू के रूप में भी किया जाता है।

अपराध और दंड

धारा-3

अपराध/जुर्म

दंड

ऐसा व्यक्ति, जो कोई वेश्यागृह चलाता है या उसका प्रबंधन करता है या परिसर का वेश्यागृह के रूप में प्रयोग अनुज्ञात करता है या उसमें सहायता करता है।

प्रथम दोषसिद्धि: कम से कम एक वर्ष और अधिकतम तीन वर्ष का कठिन कारावास और 2000 रूपए तक का जुर्माना।

द्वितीय या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि: कम से कम दो वर्ष और अधिकतम पाँच वर्ष और जुर्माना।

(i) किसी परिसर का अभिधारी, पट्टेदार, अधिभोगी या भारसाधक व्यक्ति, जो ऐसे परिसर या उसके भाग का वेश्यागृह के रूप में प्रयोग करता है या जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को प्रयोग अनुज्ञात करता है।

(ii)    किसी परिसर क स्वामी, पट्टेदार या भूस्वामी अथवा ऐसे स्वामी, पट्टेदार या भूस्वामी का अभिकर्ता उसे या उसके किसी भाग को यह जानते हुए पट्टे पर देता है कि उसका या उसके किसी भाग का वेश्यागृह के रूप में प्रयोग किया जाना आशयित है अथवा ऐसे परिसर या उसके किसी भाग का वेश्यागृह के रूप में प्रयोग करने का जानबूझकर पक्षकार।

प्रथम दोषसिद्धि: दो वर्ष तक कारावास और 2000 रूपए तक का जुर्माना।

 

 

 

 

द्वितीय दोषसिद्धि: पाँच वर्ष तक का कठिन कारावास और जुर्माना

 

धारा-4

अठारह वर्ष की आयु से अधिक का कोई व्यक्ति, जो जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति के उपार्जनों पर पूर्णत: या भागत: जीवन निर्वाह करता है।

दो वर्ष तक का कारावास या 1000 रूपए तक का जुर्माना या दोनों पीड़ित व्यक्ति के बालक या अवयस्क होने की दशा में, कम से कम सात वर्ष और अधिकतम दस वर्ष का कारावास।

 

धारा-5

वेश्यावृत्ति के लिए किसी व्यक्ति उपाप्त करना या उपाप्त करने का प्रयत्न करना या उत्प्रेरित करना या ले जाना या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने का प्रयत्न करना या लिवाना या किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति कराना या कराने के लिए उत्प्रेरित करना।

बालकों की दशा में, कम से कम सात वर्ष का कठिन कारावास जो कि आजीवन कारावास तक हो सकेगा। अवयस्क की दशा में, कम से कम सात वर्ष और अधिकतम चौदह वर्ष का कारावास।

धारा-6

किसी व्यक्ति को उसकी सम्मति से या उसके बिना- (क) किसी वेश्या-गृह, या (ख) किसी परिसर में या पर इस आशय से निरुद्ध करना कि ऐसा व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ, जो ऐसे व्यक्ति का पति या पत्नी नहीं है, मैथुन करे।

कम से कम सात वर्ष का कारावास जो कि दस वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना।

टिप्पण: जहाँ कोई व्यक्ति किसी वेश्यागृह में किसी बालक के साथ पाया जाता है वहां जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कि उसने बालक को निरुद्ध करने का अपराध कारित किया है।

 

धारा-7

राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित सार्वजनिक स्थानों या धार्मिक पूजास्थल, शैक्षणिक संस्थाओं, छात्रावास, अस्पताल या अन्य सार्वजनिक स्थान के दो सौ मीटर के भीतर वेश्यावृत्ति चलाना।

तीन मास तक का कारावास।

यदि उपर्युक्त अपराध बालक या अवयस्क की बाबत हिया

कम से कम सात वर्ष किन्तु वह आजीवन कारावास या दस वर्ष तक का हो सकेगा।

-    ऐसा व्यक्ति, जो किसी सार्वजनिक स्थान का पालक है और वेश्याओं को उनका व्यापार चलाने देता है।

या

-    ऐसे परिसर का किराएदार/पट्टेदार/अधिभोगी

या

-    स्वामी/पट्टेदार/भूस्वामी

-    प्रथम दोषसिद्धि: तीन मास तक या जुर्माना

-    द्वितीय या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि: छह मास तक का कारावास।

 

धारा 8

शब्दों, अंगविक्षेप, आदि वेश्यावृत्ति के प्रयोजन के लिए विलुब्ध करना या याचना करना।

प्रथम दोषसिद्धि: छह मास तक का कारावास या जुर्माना

द्वितीय या पश्चातवर्ती अपराध: एक वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।

 

धारा 9

अभिरक्षा में के व्यक्ति को विलुब्ध करना।

कम से कम सात वर्ष का कारावास जो आजीवन कारावास या दस वर्ष तक का हो सकेगा।

 

धारा 14

इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध संज्ञेय हैं, तथापि, वारंट के बिना गिरफ्तारी पुलिस निरीक्षक के रेंक से अन्यून किसी विशेष पुलिस अधिकारी द्वारा ही की जा सकती है।

टिप्पण: भारतीय दंड संहिता की धारा 370 और धारा 370क के उपबधों के अंतर्गत व्यक्तियों के दुर्व्यापार और दुर्व्यपार किए गए व्यक्तियों का शोषण करने के अपराध भी आते हैं और उनके प्रति भी निर्देश किया जा सकता है।

धारा

शीर्षक

शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट

7(1)

सार्वजनिक स्थान में या उनके समीप वेश्यावृत्ति

जिला न्यायालय

11(4)

पुनरावृत्ति करने वाले अपराधी को पेश किया जाना

मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या कोई प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट

15(5)

वारंट के बिना तलाशी: मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना

मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या कोई प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट

16

व्यक्ति को छुड़ाना

मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या कोई प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट

18

वेश्यागृह को बंद करना और परिसरों से अपराधियों की बेदखली

जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट

19

संरक्षा गृह में रखे जाने या न्यायालय द्वारा देखरेख और संरक्षण प्रदान करने के लिए आवेदन

मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या कोई प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट

20

वेश्या का किसी स्थान से हटाया जाना

जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट

22

मामलों का संक्षिप्त विचारण करने की न्यायालय की शक्ति

मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या कोई प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट

 

प्रसूति सुविधा (संशोधन) अधिनियम, 2017

द्वारा यथा-संशोधित प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961

इस विधि की पृष्ठभूमि

अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्रियाकलापों में स्त्रियों की बढ़ती भागीदारी के साथ-साथ, जैविक कारणों पर आधारित भेदभाव की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। इस प्रकार के भेदभाव को रोकने और स्त्रियों के आर्थिक और प्रजनन संबंधी अधिकारों के संवर्धन, उनके स्वास्थ्य के संरक्षण और सुरक्षा के लिए प्रसूति प्रसुविधाएं सुनिश्चित करने और उन्हें नियोजन की असुरक्षा और आय की हानि के बारे में चिंता किए बिना अपना बहुमूल्य समय अपने बच्चों के देने में समर्थ बनाने के लिए प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम अधिनियमित किया गया था।

अधिनियम का उद्देश्य

यह अधिनियम:

  • कतिपय स्थापनों में शिशु जन्म के पूर्व और पश्चात स्त्रियों के नियोजन को विनियमित करने और प्रसूति प्रसुविधा और अन्य प्रसुविधाओं का उपबंध करने के लिए है;
  • स्त्री और उसके बालक को, जब वह स्वास्थ्य की दशाओं के कारण अपने कर्तव्य का पालन करने में समर्थ नहीं है, संपूर्ण स्वास्थ्य देखरेख प्रदान करके मातृत्व की गरिमा को संरक्षण प्रदान करने के लिए है।

प्रसूति प्रसुविधा

प्रसूति प्रसुविधा एक ऐसा संदाय (प्रसूति भत्ता) है जो किसी नियोजक द्वारा किसी गर्भवती महिला कर्मचारी को गर्भावस्था के दौरान उसकी वास्तविक अनुपस्थिति की अवधि के लिए औसत दैनिक मजदूरी की दर पर संदत्त किया जाता है।

कतिपय अवधियों के दौरान स्त्रियों के नियोजन पर प्रतिषेध (धारा 4)

  • कोई भी नियोजक किसी स्त्री को उसके प्रसव या गर्भपात या गर्भ के चिकित्सीय समापन के दिन के अव्यवहित पश्चात छह सप्ताह के दौरान किसी स्थापन में जानते हुए नियोजित नहीं कर सकेगा।
  • कोई भी स्त्री अपने प्रसव या गर्भपात या गर्भ के चिकित्सीय समापन के दिन के अव्यवहित पश्चातवर्ती छह सप्ताह के दौरान किसी स्थापन में काम नहीं कर सकेगी।
  • किसी भी स्त्री से, उसके द्वारा प्रार्थना किए जाने पर उसके प्रसव की प्रत्याशित तारीख से पूर्व छह सप्ताह की ठीक पूर्ववर्ती एक मास की अवधि के दौरान उसके नियोजक द्वारा कोई ऐसा काम करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी जो कठिन प्रकृति का हो या जिसमें दीर्घकाल तक खड़ा रहना अपेक्षित हो या जिससे उसकी गर्भवर्तीत्व में या भ्रूण के प्रसामान्य विकास में किसी भी प्रकार विध्न होना संभाव्य हो या जिससे उसका गर्भपात कारित होना या अन्यथा उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य हो।

प्रसूति प्रसुविधा के संदाय का अधिकार (धारा 5)

  • प्रत्येक स्त्री उस प्रसूति प्रसुविधा के संदाय के लिए, जो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति की अवधि के लिए औसत दैनिक मजदूरी की दर पर उसे संदेय रकम है, हकदार है और उसका नियोजक उसके लिए दायी है। वह अधिकतम अवधि, जिसके लिए कोई स्त्री प्रथम दो बालकों के लिए प्रसूति प्रसुविधा की हकदार होगी, छब्बीस सप्ताह है जिसमें से आठ सप्ताह से अनधिक उसके प्रसव की प्रत्याशित तारीख से पूर्व है।
  • ऐसी कोई स्त्री, जिसके दो या अधिक बालक हैं, बारह सप्ताह की प्रसूति प्रसुविधा की हकदार है जिसमें से छह सप्ताह से अनधिक अवधि उसके प्रसव की प्रत्याशित तारीख के पूर्व हो सकती है।
  • ऐसी स्त्री, जो तीन मास से कम आयु के किसी शिशु का विधिक रूप से दत्तकग्रहण करती है या कोई कमीशनिंग माता भी उस तारीख से जब शिशु, यथास्थिति, दत्तकग्रहण करने वाली माता या कमीशनिंग माता को सौंपा जाता है, बारह सप्ताह की अवधि के लिए प्रसूति प्रसुविधा की हकदार होगी।
  • प्रसूति प्रसुविधा लेने के लिए, स्त्री कर्मचारी को प्रसव से पूर्व बारह मास के दौरान कम से कम अस्सी दिनों के लिए उस नियोजक के स्थापन में काम करना चाहिए।
  • मृत्यु की दशा में, प्रसूति प्रसुविधा मृत्यु के दिन तक संदेय है तथापि जब जन्मा शिशु जीवित है तो नियोजक संपूर्ण अवधि के लिए प्रसूति प्रसुविधा प्रदान करने के लिए दायी है।
  • ऐसी स्त्री जो प्रसूति प्रसुविधा के लिए हकदार है, गर्भपात या गर्भ के चिकित्सीय समापन की दशा में छह सप्ताह की मजदूरी सहित छुट्टी की भी हकदार है।
  • ट्यूबेक्टामी की दशा में, प्रसूति प्रसुविधा दो सप्ताह की है।
  • कोई स्त्री, अन्य ह्क्दारियों के अतिरिक्त, गर्भावस्था से संबंधित बीमारी की दशा में एक मास की प्रसूति प्रसुविधा की भी हकदार है।
  • जहाँ किसी स्त्री को समनुदेशित कार्य ऐसी प्रकृति की है कि वह घर से कार्य कर सकती है तो नियोजक उसे प्रसूति प्रसुविधा का उपभोग करने के पश्चात ऐसी अवधि के ली और ऐसी शर्तो पर, जिनसे नियोजक और वह स्त्री परस्पर सहमत हों, ऐसा करने की अनुज्ञा डे सकता है।
  • ऐसे प्रत्येक स्थापन में, जिसमें पचास या उससे अधिक कर्मचारी हैं, क्रैंच सुविधा होना आवश्यक है। स्त्री का एक दिन में क्रैंच में चार बार जाना अनुज्ञात है। इसके अंतर्गत उसे अनुज्ञात विश्राम के लिए अंतराल भी है। जब तक उसका शिशु पन्द्रह मास की आयु का नहीं हो जाता, उसे अपने दैनिक कार्य के अनुक्रम में पन्द्रह-पन्द्रह मिनट के दो परिचर्या व्यवधान अनुज्ञात हैं।

गर्भावस्था के कारण अनुपस्थिति के दौरान पदच्युति पर प्रतिषेध (धारा 12)

ऐसी किसी स्त्री को, जो इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार कार्य से अनुपस्थित रहती है, सेवा से पदच्युत नहीं किया जा सकता है।

अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन के लिए दंड

  • यदि कोई नियोजक इस अधिनियम के उल्लंघन में संदाय करने में असफल रहता है या किसी स्त्री को उसकी प्रसूति छुट्टी के दौरान पदच्युत करता है तो वह कम से कम तीन मास कारावास के लिए, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा और कम से कम 2000 रूपए के जुर्माने से, जो 5000 रूपए तक का हो सकेगा, दायी है।
  • यदि कोई नियोजक इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों का उल्लघन करता है तो वह एक वर्ष तक के कारावास या जुर्माने के लिए, जो 5000 रूपए तक का हो सकेगा या दोनों के लिए दायी होगी।

शिकायत किसे की जानी है/शिकायत कहां की जानी है

  • धारा 17: इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत के लिए, व्यथित स्त्री अधिनियम के अधीन नियुक्त निरीक्षक को समावेदन कर सकती है।
  • धारा 23: जहाँ कोई शिकायतकर्ता निरीक्षक द्वारा पारित आदेशों से असंतुष्ट हैं या जहाँ विधि का बृहत्तर प्रश्न अन्तर्वलित है वहां वह मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या सक्षम अधिकारिता वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट को समावेदन कर सकती है।
  • ऐसी किसी रजिस्ट्रीकृत ट्रेड यूनियन का कोई पदाधिकारी, जिसकी ऐसी स्त्री सदस्य है या सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक संगठन या कोई निरीक्षक भी व्यथित स्त्री की ओर से न्यायालय में कोई मामला फाइल कर सकता है।
  • उस तारीख से, जिसको अभिकथित रूप से अपराध कारित किया गया है, एक वर्ष के अवसान के पश्चात कोई अभियोजन निरीक्षक की पूर्व मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा।

धारा 28 के अधीन: प्रवर्तन मशीनरी

  • श्रम मंत्रालय में केन्द्रीय औद्योगिक संबंध मशीनरी (सी.आई.आर.एम.) इस अधिनियम के प्रवर्तन के लिए उत्तरदायी है। सी.आई.आर.एम. मंत्रालय का सहबद्ध कार्यालय है और वह मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) संगठन के कार्यालय के रूप में ज्ञात है।

 

स्त्रोत: राष्ट्रीय महिला आयोग



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